मजबूरी कहानी की शिल्पगत विशेषताएँ - Majboori Kahani ki Shilpgat Visheshtayen

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मजबूरी कहानी की शिल्पगत विशेषताएँ

मजबूरी कहानी की शिल्पगत विशेषताएँ: 'मजबूरी' कहानी में भावों के अनुकूल भाषा का प्रयोग किया गया है। कहानी में अम्मा के हृदय में पूर्ण विश्वास दिखाई देता है कि उनका बेटू फिर उनके पास लौट आएगा, किंतु बेटू के न आने की घटना से उनके हृदय को गहरी ठेस लगती है। बाहर हँसती, प्रसाद चढ़ाने की बात करती अम्मा के भीतरी हृदय की हलचल को, हताशा के चरम क्षणों को वाक्य खंडों के आर्वतन द्वारा अभिव्यक्त किया गया है- "क्या कहा बेटू मुझे भूल गया, वहाँ जम गया? सच, मेरी बड़ी चिन्ता दूर हुई। इस बार भगवान ने मेरी सुन ली। जरूर परसाद चढाऊँगी रे, जरूर चढाऊँगी। मेरे बच्चे के जी का कलेश मिटा, मैं परसाद नहीं चढाऊँगी भला......ले पेडे लेता आ अब परसादी चढ़ाकर बाँट ही दूँ कौन नर्बदा, बेटू मुझे भूल गया - बस भूल ही गया"। 

'मजबूरी' कहानी की अम्मा अपने अकेलेपन के कारण व्यथित है। जब अम्मा की बहू अम्मा को अपने बेटू की सौंपने की बात करती है, तब अम्मा आश्चर्यचकित रह जाती है। बेटू को अपने पास रखने की बात से वे आनंद विभोर हो जाती है। विस्मय मिश्रित आनंद के चरमोत्कर्ष में मन्नू भडांरी की भाषा एकदम बदल जाती है- "तुम क्या कह रही हो बहू, बेटू को मेरे पास छोड़ जाओगी, मेरे पास । सच? हे भगवान, तुम्हारी सब साध पूरी हो, ! तुम बड़भागी होओ। मेरे इस सूने घर में एक बच्चा रहेगा तो मेरा तो जन्म सफल हो जाएगा.......तुम क्या जानो बहू! अपने कलेजे के टुकड़े को निकालकर मुम्बई भेज दिया । रामेसुर के बिना यह घर तो मसान जैसा लगता है। ये ठहरे सन्त आदमी, दीन-दुनिया से कोई मतलब नहीं। मैं अकेली ये पहाड़ जैसे दिन कैसे काटती हूँ सौ मैं ही जानती हूँ। भगवान तुम्हें दूसरा भी बेटा दे, तुम उसे पाल लेना। पर देखो, अपनी बात से मुडना नहीं.......मैं......मैं........" इस प्रकार भावों के अनुरूप मन्नू भंडारी ने भाषा का प्रयोग किया है।

भावों के अनुरूप भाषा प्रयोग के साथ-साथ मन्नू भंडारी के साहित्य में पात्रों के अनुकूल भाषा का प्रयोग भी किया गया है। जो भाषा को जीवन्त रूप प्रधान करता है। 'मजबूरी' कहानी की अम्मा गाँव में रहने अनपढ़ स्त्री है। उनकी भाषा में परिवेश के अनुरूप ग्रामीण शब्दावली का प्रयोग हुआ है। "अरे पढ़ लेगा बहू, पढ़ लेगा! ऊमर आएगी तो पढ़ भी लेगा। यह मत सोचना कि मैं उसे गँवार ही रहने दूँगी। रामेसुर को भी मैंने ही पाला-पोसा है, उसे क्या गंवार ही रख दिया? फिर यह तो मुझे और भी प्यारा है। मूल से ब्याज़ प्यारा होता है सो इसे तो मैं खूब पढाऊँगी - तू ज़रा भी चिन्ता मत करना बहू।" मन्नू जी के पात्र जिस परिवेश से आते है, उसी के अनुकूल भाषा का प्रयोग करते हैं ।

मन्नू भंडारी ने अपनी कहानियों और उपन्यासों में मुहावरों और कहावतों का प्रयोग भी बड़ी सफलता एवं सजगता से किया है। मुहावरों और कहावतों के प्रयोग से भाषा सशक्त, प्रभावी, गतिशाली एवं धारदार हो गई है। उन्होंने मुहावरों और कहावतों के प्रयोग के कारण किसी गूढ़ रहस्यमयी और गंभीर बात को कम शब्दों के द्वारा कह दिया है। यह उनके जीवनानुभवों और भोगी हुई, सच्चाईयों के कारण ही संभव हो सका है। 'मजबूरी' कहानी में पैरों तले जमीन सरकना, खून खौलना, जमीन-आसमान एक करना, खून का घूंट पीना जैसे मुहावरे देखने को मिलते हैं। मुहावरों के प्रयोग से भाषा कैसी धारदार और अर्थ गंभीर बनती है, इसका एक उदाहरण द्रष्टव्य है– “अम्मा को कभी स्वपन में भी खयाल नहीं था कि रमा पप्पू के रहते हुए भी बेटू को ले जाने का प्रस्ताव रखेगी। जिस दिन उन्होंने सुना, "उनके पैरों तले की जमीन सरक गई।" अम्मा की आघात—जनक स्थिति को ‘पैरों तले की जमीन सरक गई' जैसे मुहावरे से सशक्त अभिव्यक्ति मिली है। इसी प्रकार 'कलेजे पर गरम सलाख दागाना मुहावरे के प्रयोग से अम्मा की बेटू के प्रति संवेदना और दुख साफ झलकता है। “अरे, बहू बेटू को ले गई? तुम तो कहती थी कि बेटू अब तुम्हारे पास ही रहेगा।" अम्मा को लगा कि, जैसे किसी ने उनके कलेजे पर गरम सलाख दाग दी हो...." कहती तो थी पर अब रखा नहीं जाता। गठिया के मारे मेरा तो उठना-बैठना तक हराम हो रहा है, तो मैंने ही कह दिया कि बहू, अब पप्पू बड़ा हुआ सो बेटू को भी ले जाओ।" मुहावरों के साथ-साथ कहावतें भी अभिव्यक्ति का सशक्त माध्यम बनकर आई हैं जैसे:- “मूल से ब्याज ज्यादा प्यारा होता है" ।

शब्द प्रयोग की बात की जाए तो मन्नू भंडारी के कथा साहित्य में पात्रों और परिवेश के अनुसार भाषा का प्रयोग देखने को मिलता है। 'मजबूरी' कहानी में अंग्रेजी, ग्रामीण, अरबी, संस्कृत भाषा के शब्द देखने को मिलते हैं। अंग्रेजी शब्द ट्राम, ग्रामीण शब्द खिलावे पिन्हाऊं, पहर, लीप, गठिया, खड़िया, मांड, चून, खटिया, चौका, खाट, मनौती, परसाद आदि । अरबी शब्द अदब संस्कृत शब्द औषधालय, प्राण, संस्कार, प्रयाण, संशय, शून्य आदि शब्दों का प्रयोग किया गया है।

प्रत्येक रचनाकार अपने भावों और विचारों को विशेष पद्धति से अभिव्यक्त करने का प्रयास करता है। इसे ही शैली कहा जाता है । मन्नू भंडारी चित्रात्मक शैली का सहारा लेकर पात्रों के हाव-भाव, मनः स्थिति या किसी घटना और स्थिति का वर्णन इतनी कलात्मकता से करती हैं कि हमारे सामने एक सजीव दृश्य आकर खड़ा हो जाता है। 'मजबूरी' कहानी की अम्मा अपने बेटू के आने की खुशी में बड़ी प्रसन्न दिखाई देती है। अम्मा के क्रिया-कलाप को लेखिका ने चित्रात्मक शैली में अंकित किया है - "बूढ़ी अम्मा ज़ोर-ज़ोर से यह लोरी गा रही थी और लाल मिट्टी से कमरा लीप रही थी । उनके घोसले जैसे बालों में से एक मोटी सी लट निकलकर उनके चेहरे पर लटक आई थी, जो उनके हिलते हुए सिर के साथ हिलहिल कर मानों लोरी पर ताल ठोंक रहीं थी।"

भावों की सजीवता, मार्मिकता एवं सशक्त अभिव्यंजना हेतु अपने कथा - लेखन में मन्नू भंडारी ने कुछ स्थानों पर गीतों की संयोजना भी की है। 'मजबूरी' कहानी में अम्मा के भीतर अपने पोते के आने की खुशी को लेखिका ने गीत के माध्यम से व्यक्त किया है। उनका वात्सल्य पूर्ण मन आज उमड़ पड़ा है। वे आँगन लीपते-लीपते लोरी गाती है-

बेटू को खिलावे जो एक घड़ी

उसे पिन्हाऊँ मैं सोने की घड़ी ।

बेटू को खिलावे जो एक पहर,

उसे दिलाऊँ मैं सोने की मोहर । " 

"आओ र चिड़िया चून करो

बेटू ऊपर राइ - नून करो

नून करो - नून करे......

गीतों की सहायता लेकर लेखिका ने अपने कथा - साहित्य में शैलीगत वैविध्य का निरूपण किया है। 

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