लोककथा कथन में कथक्कड़ की भूमिका स्पष्ट कीजिए।

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लोककथा कथन में कथक्कड़ की भूमिका स्पष्ट कीजिए।

लोककथा कथन में कथक्कड़ की भूमिका : लोककथा के संदर्भ में कथक्कड़ की भूमिका को नहीं भुलाया जा सकता। इन लोककथाओं को विनाश के गर्त में जाने से कथक्कड़ों ने ही बचाया है। मौखिक परंपरा में कहानियों को बनाए रखने वाले कथक्कड़ होते थे, जो राजाओं को कहानियां सुनाकर उनसे बहुत बड़ा वेतन प्राप्त करते थे। ये कथक्कड़ पुरानी कहानियों को सुनाने एवं नवीन कहानियां रचने एवं उनके परिवर्तन-परिवर्धन में अपनी भूमिका निभाया करते थे। ये कथक्कड़ राजकुमारों और रानियों को कहानी सुनाकर उनका मनोरंजन करते थे और स्वयं आनंद का जीवन बिताया करते थे। इन काथिकों की स्मृति इतनी विलक्षण होती है कि वे किसी एक कथा को वर्षों के उपरांत अक्षरशः उसी रूप में पुनः सुना देते हैं, जिस रूप में उन्होंने कई वर्ष पूर्व सुनाई थी। आज भी कथक्कड़ों का ऐसा व्यवसाय है कि वे कथा कहकर अपना जीवन-निर्वाह करते हैं। गांवों में आज ऐसी अनेक वृद्धाएं हैं, जो रात को अपने बच्चों को बिना विश्राम के कथा सुनाती रहती हैं।

लोककथाओं के कथन में यह भी उल्लेखनीय है कि कथक्कड़ की मनोवृत्तियां, संस्कृति, आचार-विचार, आस्थाएं और धार्मिक मान्यताएं अभिप्रायों के परिवर्तन में बहुत सहायक होती हैं। यदि कोई लोककथा बुंदेलखंड से राजस्थान में पहुंचती है तो वहां की संस्कृति और सभ्यता का उस पर प्रभाव पड़ता है तथा कथक्कड़ अहिंसावादी और सरस्वती का उपासक है तो वह बलि संबंधी अभिप्राय को परिवर्तित कर फल-पुष्पादि के रूप में उस कथा-रूढ़ि का उल्लेख करेगा। इसी प्रकार शिवोपासक कथक्कड़ कथा में आए हुए देवी-देवताओं के साथ शिव की चर्चा अवश्य करेगा। ऐसे ही स्थानीय देवी-देवताओं को मान्यता देने वाला कथक्कड़ दूर देशों में आने वाली कहानी में अपने प्रिय देवी-देवताओं का उल्लेख अवश्य करेगा।

लोककथा के रूप-परिवर्तन में कथक्कड़ के मानसिक स्तर का भी प्रभाव पड़ता है। यदि एक ही कहानी को दो विभिन्न क्षेत्रों के कथक्कड़ कहें तो उसके कथन में शैलीगत भिन्नता अवश्य होगी। ब्लूम फील्ड का कथन है कि सर्वत्र प्रत्येक कथक्कड़ और संग्रहकर्ता, मानो ऐसा लगता है कि इन अभिप्रायों की समूची माला को उठाता है जिसकी तुलना हम मनके की माला से कर सकते हैं, उसे वह छिन्न-भिन्न कर देता है, जिससे मनके चतुर्दिक बिखर जाते हैं और फिर प्रारंभ से वह इन मनकों को पिरोता है। इस प्रकार अभिप्राय एक से होने पर भी कई प्रकार की लोककथाओं का जन्म हो जाता है। जबकि लोककथा का शैली-तत्व निर्भर करता है कथक्कड़ के मानसिक स्तर पर, तब कथक्कड़ का मानसिक धरातल निर्भर करता है देश और संस्कृति के ऊपर । साहित्य, समाज का दर्पण है, उतना ही सत्य सिद्ध होता है लोककथा के क्षेत्र में, जितना कि किसी अन्य क्षेत्र में।

लेकिन आदिवासी कथक्कड़ अपने पूर्वजों से प्राप्त कथाओं को अपरिवर्तित रूप में स्मरण करते हैं और उसी रूप में दूसरों को सुनाया करते हैं। उनका विश्वास है कि यदि पूर्वजों की बनायी गई कथाओं में कुछ परिवर्तित किया जाएगा तो वे अप्रसन्न होकर शाप दे देंगे। शाप के भय के कारण ये लोग परंपरागत कहानियों में किसी प्रकार का परिवर्तन नहीं करते। आदिवासियों की कहानियां आज उसी रूप में सुनी जा सकती हैं, जिस रूप में 40 वर्ष पूर्व सुनी गई होंगी। ये कथाएं पंचायती फैसलों में प्रमाण के रूप में कही जाती हैं। उनका विश्वास है कि उनके पूर्वजों ने विभिन्न विवादों में जो निर्णय दिए हैं, वे ही लोककथाओं के रूप में प्रचलित हैं। आज भी भीलों, वारेलाओं, गोड़ों, वैगाओं, कोलों, उरावों और संथालों में जब पंच फैसले देते हैं तो उसका समर्थन करती। इस कहानी को सुनने के उपरांत फैसले को प्रामाणिक रूप में स्वीकार किया जाता है। आदिवासियों के इन कथक्कड़ों की स्मृति बहुत विलक्षण होती है।

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