दीपा का चरित्र चित्रण - Deepa Ka Charitra Chitran

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दीपा का चरित्र चित्रण - Deepa Ka Charitra Chitran

दीपा का चरित्र चित्रण: 'यही सच है' कहानी 'दीपा नामक युवती एक ऐसी मानसिकता को स्पष्ट करती है जो क्षण के दर्शन को श्रेष्ठ मानकर उसके अनुसार अपने भावजगत को ढाल लेती है। दीपा भावुक, स्वप्निल, अस्थिरमन वाली युवती है। पुरानी कहानी की तरह दीपा घुट-घुटकर अपने आप में नहीं जीती। उल्टे जो सामने आया है उसे सहजता से स्वीकार कर जीती है। जो वर्तमान है उसे अपनाने का सामर्थ्य उसमें है ।

यहाँ दीपा के रूप में लेखिका ने ऐसी नारी का चित्रण किया है जो पारम्परिक रूढ़ियों से भी स्वयं को पूरी तरह मुक्त नहीं कर पायी है और न ही पूरी तरह आधुनिकता को अपना सकी है जिसके कारण वह असमंजस की स्थिति में है वह यह समझ ही नहीं पाती कि आखिर सच्चा प्रेम क्या है और यह प्रेम किससे करती है। किशोरावस्था में प्रेम की प्रथम अनुभूति उसे निशीथ से प्राप्त होती है परन्तु बहुत जल्द धोखा मिलने पर वह उससे अलग हो जाती है। दीपा कानपुर आ जाती है और रिसर्च कार्य में व्यस्त हो जाती है वहाँ उसकी जिन्दगी में संजय आता है। वह संजय से प्रेम करने लगती है। संजय रजनीगंधा के फूल लेकर दीपा के पास आता है तो वह बहुत प्रसन्न हो जाती है। "ये फूल जैसे संजय की उपस्थिति का आभास रहते हैं. 'अक्सर मुझे भ्रम हो जाता है कि ये फूल नहीं हैं, मानों संजय की अनेकानेक आँखें हैं जो मुझे देख रही है और अपने को यो असंख्य आँखों से निरंतर देखे जाने की कल्पना से ही मैं लज्जा जाती हूँ।" दीपा जानती है कि संजय निशीथ को लेकर सशंकित हो उठा है। दीपा सोचती है पर मैं उसे कैसे विश्वास दिलाऊँ कि मैं निशीथ से नफरत करती हूँ। उसकी याद मात्र से मेरा मन घृणा से भर उठता है। फिर अठारह वर्ष की आयु में किया हुआ प्यार भी कोई प्यार होता है भला । निरा बचपन होता है, महज पागलपन । उसमें आवेश रहता है पर स्थायित्व नहीं । गति रहती है पर गहराई नहीं। जिस वेग से वह आरम्भ होता है, जरा सा झटका लगने पर उसी वेग से टूट भी जाता है। दीपा संजय से कहती है । "विश्वास करो संजय, तुम्हारा मेरा प्यार ही सच है। निशीथ का प्यार तो मात्र छल था, भ्रम था झूठ था।" बहुत दुखी मन से दीपा संजय को छोड़कर कलकत्ता इन्टरव्यू के लिए आती है । कलकत्ता आने के बाद निशीथ के बारे में सोचती है। "तीन साल हो गये अभी तक निशीथ विवाह क्यों नहीं किया ? करे न करे मुझे क्या ?" दीपा निशीथ प्यारा लगता है। "ढलते सूरज की धूप निशीथ के बाएँ गाल पर पड़ रही थी और सामने बैठा निशीथ इतने दिन बाद एक बार फिर मुझे बड़ा प्यारा - सा लगा।” दीपा यह भी जान लेती है कि निशीथ कलकत्ता में उसे नौकरी मिले इसलिये बहुत प्रयत्न कर रहा है। जब दीपा कलकत्ता से कानपुर के लिए निकल पड़ती तब निशीथ प्लेटफार्म पर आता है। वह गाड़ी के साथ कदम बढ़ाता और हाथ पर धीरे से अपना हाथ रख देता है। तब दीपा कहती है "मेरा रोम-रोम सिहर उठता है मन चाहता है चिल्ला पहूँ - मैं सब समझ गई, निशीथ सब समझ गई। जो कुछ तुम इन चार दिनों में नहीं कह पाये, वह तुम्हारे इस क्षणिक स्पर्श ने कह दिया । विश्वास करो यदि तुम मेरे हो तो मैं भी तुम्हारी हूँ, तुम्हारी । एकमात्र तुम्हारी.......मुझे लगता है यह स्पर्श, यह सुख यह क्षण सत्य है, बाकी सब झूठ है। अपने को भूला का भरमाने का असफल प्रयास है।" संजय से अब वह कहेगी कि, "मैं तुम्हें प्यार नहीं करती। आज एक बात अच्छी तरह जान गई हूँ कि प्रथम प्रेम ही सच्चा प्रेम होता है ।" बाद में किया हुआ प्रेम तो अपने को भूलने का, भरमाने का प्रयत्न मात्र है । वह सोच रही थी वह निशीथ से ही प्रेम करती है इतने में संजय का लिफाफा देखती है। जिससे उसे मालूम होता है कि पाँच-छह दिन के लिए वह कटक गया है। वह निशीथ को पत्र भेजती है और पत्र का इन्तजार करती रहती है। दीपा द्वंद्व की स्थिति में कैद है वह समझ नहीं पाती कि वह संजय की प्रतीक्षा कर रही है या निशीथ के पत्र की । इस तरह दीपा जो क्षण जी रही है उसी को सत्य मानती है। प्रेमिका के एक नये बदलते रूप रंग की छवि उसमें दिखाई देती है। इस कहानी में दीपा के माध्यम से नारी की नई रोमांटिक भूमिका और दो ध्रुवों के बीच डोलती मनःस्थिति को उजागर किया गया है। प्रेमिका की संक्रान्त मानसिकता का चित्रण दीपा के माध्यम से इस कहानी में हुआ है। प्यार की तरफ उसका एप्रोच एकदम आधुनिक है। जिस क्षण वह जो कुछ अनुभव करती है वह क्षण ही उसके लिए सत्य है और क्षण की महत्ता इसी में है।

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