Saturday, 28 July 2018

पंचतंत्र की कहानी - मूर्ख गधा और सियार

पंचतंत्र की कहानी - मूर्ख गधा और सियार

panchtantra stories
एक धोबी के पास एक गधा था। गधा प्रतिदिन गंदे कपड़ों की गठरी पीठ पर लादकर घाट पर जाता था और शाम के समय धुले हुए कपड़ों का गट्ठर लेकर फिर घर लौट आता था। उसका प्रतिदिन यही काम था। रात में धोबी उसे खुला छोड़ देता था। 

रात का समय था, गधा घूम रहा था। कहीं से घूमता हुआ एक सियार पहुंचा। गधे और सियार में कुछ देर तक बातचीत हुई। दोनों ने एक दूसरे का हाल-चाल पूछा। फिर दोनों परस्पर मित्र बन गए। गधा और सियार दोनों बातचीत करते हुए एक खेत में पहुंचे। खेत में ककड़ियां बोयी हुई थी। दोनों ने जी भरकर ककड़ियां खायीं। 

ककड़ियां उन्हें अधिक स्वादिष्ट लगीं। अतः गधा और सियार, दोनों प्रतिदिन रात में ककड़ी खाने के लिए उस खेत में जाने लगे। दोनों जी भरकर ककड़ियां खाते और चुपचाप खेत में से निकल जाते थे। मीठी-मीठी ककड़ी खाने के कारण दोनों मोटे-ताजे हो गए, साथ ही उन्हें ककड़ी खाने की लत भी लग गई। जब तक ककड़ी खा नहीं लेते, उन्हें चैन नहीं आता। 

धीरे-धीरे कई महीने बीत गए। एक दिन चांदनी रात थी, आकाश में चंद्रमा जगमगा रहा था। गधा और सियार दोनों अपनी-अपनी आदत के अनुसार खेत में पहुंचे। दोनों ने जी भरकर ककड़ी खायी। गधा जब ककड़ी खा चुका, तो वह बोला, “कितनी सुंदर रात है, चंद्रमा आकाश में चंद्रमा जगमगा रहा है। दोनों और दूध की धारा बह रही है। ऐसी सुंदर रात में मेरा मन गाने को कर रहा है।” 

गधे की बात सुनकर सियार बोला, “गधे भाई, ऐसी भूल मत करना। तुम गाना गाओगे तो खेत का रखवाला दौड़ पड़ेगा। फिर ऐसी पिटाई करेगा की छठी का दूध याद आ जाएगा।” गधा गर्व के साथ बोला, “वाह ! मैं क्यों ना गाऊँ ? मेरा कंठ स्वर बड़ा सुरीला है। तुम्हारा कंठ स्वर सुरीला नहीं है, इसलिए तुम मुझे गाने से मना कर रहे हो। मैं गाऊंगा, अवश्य गाऊंगा।” 

सियार बोला, “गधे भाई, मेरा कंठ स्वर तो जैसा है, वैसा है। तुम्हारे सुरीले कंठ स्वर को सुनकर खेत का रखवाला प्रसन्न तो नहीं होगा, डंडा लेकर अवश्य दौड़ पड़ेगा। पीठ पर इतने डंडे मारेगा की आंखें निकल आयेंगी।” पर सियार के समझाने का प्रभाव गधे के ऊपर बिल्कुल भी नहीं पड़ा। वह बोला, “तुम मूर्ख और कायर हो। मैं तो गाऊंगा, अवश्य गाऊंगा।” 

गधा सिर ऊपर उठाकर रेंकने के लिए तैयार हो गया। सियार बोला, “गधे भाई, जरा रुको मुझे खेत से बाहर निकल जाने दो, तब गाओ। मैं खेत से बाहर तुम्हारी प्रतीक्षा करूंगा।” सियार अपनी बात समाप्त करके खेत से बाहर चला गया। गधा रेंकने लगा, एक बार, दो बार और तीन बार। गधे की आवाज चारों ओर गूंज उठी। खेत के रखवाले के कान में भी आवाज पड़ी। वह हाथ में डंडा लेकर दौड़ा। रखवाले ने खेत में पहुंचकर गधे को पीटना आरंभ कर दिया। उसने थोड़ी ही देर में गधे को इतने डंडे मारे कि वह बेदम होकर गिर पड़ा। गधे के गिरने पर रखवाले ने उसके गले में रस्सी डाल दी। 

गधे को जब होश आया तो वह लंगड़ा-लंगड़ा रस्सी को घसीटता हुआ खेत से बाहर आया। वहां सियार उसकी प्रतीक्षा कर रहा था। वह गधे को देखकर बोला, “क्यों गधे भाई, तुम्हारे गले में यह क्या पड़ा है? क्या तुम्हारे सुरीले कंठ स्वर को सुनकर रखवाले ने तुम्हें यह पुरस्कार दिया है?” गधा लज्जित हो गया। वह गर्दन नीचे करके बोला, “अब और लज्जित मत करो यार। भाई, झूठे अभिमान का यही नतीजा होता है। अब तो किसी तरह इस रस्सी को गले से छुड़ाकर मेरे प्राण बचाओ।”

सियार ने रस्सी काटकर गले से अलग कर दिया। गधा और सियार फिर मित्र की तरह घूमने लगे, पर गधे ने फिर कभी अनुचित समय पर गाने की मूर्खता नहीं की।

कहानी से शिक्षा : 
मूर्ख मनुष्य का साथ कभी नहीं करना चाहिए।
जो झूठा गर्व करता है उसे हानि उठानी पड़ती है।

बोलने के पहले सही समय का विचार कर लेना चाहिए।

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