Thursday, 14 June 2018

वीर रस की परिभाषा उदाहरण सहित

वीर रस की परिभाषा उदाहरण सहित

veer ras ki paribhasha udaharan sahit

वीर रस की परिभाषा : शत्रु के उत्कर्ष को मिटाने, दीनों की दुर्दशा देख उनका उद्धार करने और धर्म का उद्धार करने आदि में जो उत्साह मन में उमड़ता है वही वीर रस का स्थाई भाव है। जिसकी पुष्टि होने पर वीर रस की सिद्धि होती है।
अवयव :
स्थाई भाव            :           उत्साह।
आलंबन (विभाव)  :          अत्याचारी शत्रु।
उद्दीपन (विभाव)   :          शत्रु का अहंकार, रणवाद्य, यश की इच्छा आदि।
अनुभाव               :          गर्वपूर्ण उक्ति, प्रहार करना, रोमांच आदि।
संचारी भाव          :          आवेग, उग्रता, गर्व, औत्सुक्य, चपलता आदि।

उदाहरण (1) 
मैं सत्य कहता हूँ सखे, सुकुमार मत जानो मुझे
यमराज से भी युद्ध में, प्रस्तुत सदा मानो मुझे
है और कि तो बात क्या, गर्व मैं करता नहीं
मामा तथा निज तात से भी युद्ध में डरता नहीं

स्पष्टीकरण : अभिमन्यु का ये कथन अपने साथी के प्रति है। इसमें कौरव- आलंबन, अभिमन्यु-आश्रय, चक्रव्यूह की रचना-उद्दीपन तथा अभिमन्यु के वाक्य- अनुभाव है। गर्व, औत्सुक्य, हर्ष आदि संचारी भाव हैं। इन सभी के संयोग से वीर रस के निष्पत्ति हुई है।

उदाहरण 2 
साजि चतुरंग सैन अंग में उमंग धारि,
सरजा सिवाजी जंग जीतन चलत हैं।
भूषन भनत नाद बिहद नगारन के,
नदी नाद मद गैबरन के रलत हैं।।

स्पष्टीकरण : प्रस्तुत पद में शिवाजी कि चतुरंगिणी सेना के प्रयाण का चित्रण है। इसमें शिवाजी के ह्रदय का उत्साह स्थाई भाव है। युद्ध को जीतने कि इच्छा आलंबन है। नगाड़ों का बजना उद्दीपन है। हाथियों के मद का बहना अनुभाव है तथा उग्रता संचारी भाव है। इनमें सबसे पुष्ट उत्साह नामक स्थाई भाव वीर रस की दशा को प्राप्त हुआ है।


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