महाकवि बाणभट्ट का संक्षिप्त जीवन परिचय: संस्कृत गद्य साहित्य का सर्वाधिक प्रतिष्ठित तथा प्रतिभाशाली गद्यकार बाणभट्ट को माना जाता है। उनके समय, जीवन-पर
महाकवि बाणभट्ट का संक्षिप्त जीवन परिचय / Banbhatt ka Jivan Parichay
जीवन परिचय: संस्कृत गद्य साहित्य का सर्वाधिक प्रतिष्ठित तथा प्रतिभाशाली गद्यकार बाणभट्ट को माना जाता है। उनके समय, जीवन-परिचय तथा रचनाओं आदि के विषय में किसी प्रकार का सन्देह नहीं क्योंकि बाणभट्ट ने हर्षचरित के प्रारम्भिक तीन उच्छ्वासों में तथा कादम्बरी की प्रस्तावना के श्लोकों में अपना परिचय दिया है।
तदनुसार, उनके पूर्वज सोन नदी के तट पर स्थित प्रीतिकूट नामक नगर में निवास करते थे। वर्तमान में माना जाता है कि यह स्थान बिहार प्रान्त के पश्चिम भाग में शाहाबाद जनपद के अन्तर्गत स्थित है। बाणभट्ट की माता का नाम राजदेवी तथा पिता का नाम चित्रभानु था। वे वात्स्यायन वंश के कुलदीपक थे। बाण के शैशवास्था में ही उनकी माता दिवंगत हो गई थी इसलिए बाण का पालन-पोषण पिता ने ही किया। जब बाण चौदह वर्ष के हुए तभी उनके पिता भी परलोकवासी हो गये। उस समय उनके पास पैतृक सम्पत्ति अधिक थी किन्तु किसी सुयोग्य अभिभावक के अभाव से स्वच्छन्द प्रवृत्ति के होकर अपने मित्रों के साथ देश देशान्तरों का परिभ्रमण करते रहे। कुछ दिनों पश्चात् वे अपने ग्राम को लौट आये। तदनन्तर बाण ने विद्याध्ययन किया।
बाणभट्ट का समय: बाणभट्ट का समय प्रायः सुनिश्चित है। वे सम्राट हर्षवर्धन के सभा - पण्डित थे । हर्ष का राज्यकाल 606 ई0 से 648 ई0 तक का है। इन तिथियों की पुष्टि ताम्रपत्रों, दानपत्रों तथा चीनी यात्री ह्वेनसांग के वर्णनों से होती इस प्रकार बाण का समय सातवीं शताब्दी का पूर्वार्द्ध है ।
बाणभट्ट की कृतियाँ: बाणभट्ट की 'हर्षचरित' तथा 'कादम्बरी' दो ही कृतियाँ हैं। इनके अतिरिक्त बाण के नाम से कुछ अन्य रचनाओं का भी उल्लेख किया जाता है - ये रचनायें हैं- चण्डीशतक, पार्वती परिणय तथा मुकुटताडितक।
बाणभट्ट की गद्यशैली: बाण की गद्यशैली की अपनी विशेषता है। वह अपने पूर्ववर्ती गद्यकारों की शैली से नितान्त भिन्न है। उन्होंने दण्डी के 'दशकुमारचरित' की भाँति उत्तम पुरुष में कथा का वर्णन किया है परन्तु वह शुक तथा महाश्वेता तक ही सीमित नहीं है। कादम्बरी की मुख्य कथा का वर्णन जाबालि ने अन्य पुरुष में किया है। वे त्रिकालदर्शी हैं, अतएव अन्य पुरुष की प्रणाली के दोषों से भी वे मुक्त हैं। बाणभट्ट ने जिस काल में अपनी गद्यकृतियों की रचना की थी, उस समय एक ओर सुबन्धु ने समासयुक्त श्लेषमय गद्यकाव्य का आदर्श प्रस्तुत किया तो दूसरी ओर दण्डी ने सुललित पदों से युक्त गद्य का आदर्श रखा था। ऐसी दशा में बाणभट्ट के लिये भी समयानुसार समास बहुल श्लेषमयी - शैली को स्वीकार करना आवश्यक हो गया। बाण ने केवल इसी को नहीं अपनाया अपितु गद्य की दूसरी शैली सुललित पदों से युक्त प्रसादगुण युक्त शैली के साथ इसका समन्वयात्मक रूप भी प्रस्तुत किया। बाण के गद्य की रीति पाञ्चाली है, जिसमें अर्थ के अनुरूप ही शब्दों का गुम्फन होता है।
शिलाभट्टारिकावाचि बाणोक्तिषु च सा यदि॥
बाण की शैली में अलंकारों का समुचित प्रयोग अपूर्व रमणीयता का संचार करता है। उनके अलंकारों की छटा दर्शनीय है। पं0 चन्द्रशेखर पाण्डेय के शब्दों में “उनके लम्बे-लम्बे समास यदि गिरि नदी के उद्दाम प्रवाह की भाँति है तो उनकी श्लिष्ट उपमायें इन्द्रधनुष की छाया की भाँति उसे रंगीन बना देती हैं। " बाणभट्ट के अनुप्रास, भाषा में विलक्षण स्वरमाधुर्य का संचार करते हैं:
"मधुरकुलकलंककालीकृतकालेय कुसुमकुङ्मलेषु", तथा “पल्लववेल्लितलवलीवलयः” उनके अनुप्रास प्रयोग के सुन्दर उदाहरण हैं।
बाण का भाषा कौशल अभूतपूर्व है। कल्पनावैचित्र्य के साथ उनके भाषा सौष्ठव ने उनकी रचनाओं को आकर्षक तथा लोकप्रिय बना दिया है। संस्कृत भाषा का उन्होंने अनुचरों से घिरे सम्राट की भाँति प्रस्थान कराया है और कथा को पीछे-पीछे प्रच्छन्न भाव से छत्रधर की भाँति छोड़ दिया है । "
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