रोहित का चरित्र चित्रण - एक सत्य हरिश्चन्द्र

रोहित का चरित्र चित्रण - डॉ० लक्ष्मीनारायण लाल ने अपने नाटक 'एक सत्य हरिश्चन्द्र' में रोहित का बाल चित्रण मिथक की आवश्यकताओं और माँग को ध्यान में रखते

 रोहित का चरित्र चित्रण - एक सत्य हरिश्चन्द्र

रोहित का चरित्र चित्रण - डॉ० लक्ष्मीनारायण लाल ने अपने नाटक 'एक सत्य हरिश्चन्द्र' में रोहित का बाल चित्रण मिथक की आवश्यकताओं और माँग को ध्यान में रखते हुए भी अपने ढंग से उसे प्रस्तुत किया है। रोहित राजा हरिश्चन्द्र और रानी शैव्या का पुत्र है। उसकी आयु कितनी है, इसका पता हमें नहीं चलता। मिथक से यह अवश्य पता चलता है कि रोहित एक बाल पात्र है, लेकिन इस नाटक में वह एक बड़ा बालक अवश्य लगता है जिसके अपने विचार हैं, अपनी मान्यताएँ हैं, अपनी सोच है और उनकी अभिव्यक्ति का अपना ढंग है। ऐसा लगता है कि रोहित काफी समझदार और प्रबुद्ध बालक है। उसके विचारों में कहीं कोई घालमेल नहीं हैं, अस्पष्टता नहीं है, विरोधी वक्तव्य नहीं हैं। राजा का शिक्षित पुत्र होने के नाते ऐसा नहीं लगता कि नाटककार ने उसके व्यक्तित्त्व पर अपनी ओर से कुछ थोप दिया है या अतिरिक्त बुद्धिवादी बना दिया है। उसका चरित्र स्पष्ट रूप से हमारे सामने आता है और इनमें नाटककार ने अपनी मौलिक उद्भावना की है। 

आदर्श चरित्र

इस नाटक में कई पात्र ऐसे हैं जो दोहरा चरित्र लिए हुए हैं जैसे लौका (हरिश्चन्द्र), देवधर (इन्द्र), जीतन (विश्वामित्र), गपोले (नारद), मिस पदमा (शैव्या) । रोहित का चरित्र ऐसा है जिसे हम इकहरा कह सकते हैं। उसके दो रूप नहीं हैं। वह केवल रोहित है और कुछ नहीं। अतः उसके चरित्र विकास को हमें इसी रूप में देखना चाहिए । इस नाटक में एक और नाटक चलता है जिसका नाम है 'सत्य हरिश्चन्द्र' । यह रोहित पात्र इसी

दूसरे नाटक का एक पात्र है जो इससे पहले या इस नाटक के अतिरिक्त और कहीं हमारे सामने नहीं आता। इसका पहली बार अवतरण दूसरे दृश्य में होता है। मुनि विश्वामित्र हरिश्चन्द्र और शैव्या को काशी बेचने के लिए ले जा रहे हैं क्योंकि उन्हें बेचकर उससे अपनी दक्षिणा चुकानी है। रोहित भी अपने माता-पिता के साथ है। यह दृश्य अयोध्या और काशी के बीच में रास्ते का है यहाँ ये सब लोग जा रहे हैं। रास्ते में एक चरवाहा बाँसुरी बजाता हुआ चला जा रहा है। विश्वामित्र पूछते हैं कि यह क्या गा रहा है ? इसका उत्तर रोहित देता है- "गीत अपना अकेले कंठ से सहूंगा। सब कुछ भोगूंगा इसी गीत के लिए। उसके लिए अपने को बेच दूंगा। पर उसे नहीं बिकने दूंगा।

संगीत प्रवीण

इससे हमारे सामने दो बातें स्पष्ट होती हैं। एक, रोहित में तत्पर बुद्धि है। दो, उस संगीत का ज्ञान है, विशेष रूप से बाँसुरी गायन से वह निपुण है। उसके शब्दों को पकड़ सकता है, उसका अर्थ लगा सकता है।

इस पर विश्वामित्र मुग्ध हो जाते हैं। वह रोहित की बात पर मुग्ध नहीं होते बल्कि चरवाहे के गीत पर मुग्ध होते हैं और उसे 'महान्' की संज्ञा देते हैं। तभी रोहित जैसे उनकी बात को काट कर कहता है- “सब मोह है उसका। उस पर फेंका हुआ किसी का माया जाल है।" इतना ही नहीं, वह इसमें यह भी जोड़ता है- "इस तरह अपने संगीत से यह सबको फंसाता है। लोगों को बांधता है। महा-मायावी है।" 

इस सन्दर्भ में उसे याद आ जाता है अपने पिता द्वारा किया हुआ स्वप्न में दान जिसका परिणाम यह है कि वे लोग राजपाट छोड़कर बिकने के लिए जा रहे हैं। अतः वह चरवाहे के गीत और स्वप्न के दान को जोड़कर यह टिप्पणी करता है- "जैसे वह दान नहीं छल था, वैसे ही यह संगीत नहीं माया जाल है। इसी संगीत से बहेलिया जंगल में शिकार करता है। जैसे दान का झूठा धर्म रचकर एक दूसरे को बेचता खरीदता है ।"

इससे स्पष्ट होता है कि जो कुछ हुआ उससे रोहित संतुष्ट नहीं है। इतना ही नहीं, वह उससे क्षुब्ध भी है और आक्रोश से भरा हुआ है। तभी वह इस प्रकार के आक्रामक शब्द बोल सकता है। 

विचारावान

विश्वामित्र इस सबका बुरा नहीं मानते और वह उसकी बातों में रस लेते हैं। उसके विचारों को अन्य प्रसंगों में भी सुनना चाहते हैं। इसीलिए वह उससे कभी दान पर और कभी सत्य पर प्रश्न करते हैं, उसकी राय जानना चाहते हैं। सत्य पर रोहित के दो टूक विचार इस प्रकार है- “मेरे लिए वह सत्य झूठ है जिसके लिए जीवन भर केवल विपत्तियाँ झेलनी पड़ें। त्याग और बलिदान की सूली पर चढ़कर सत्य की परीक्षा देनी पड़े। मेरे लिए सत्य वही है, जो सहज ही जीवन में जिया जा सके। जो जिया न जा सके वह झूठ है, वह धोखा है। " 

रोहित अपनी बात पर द ढ़ है, विचारों में स्पष्ट है और कहीं किसी प्रकार डगमगाता नहीं। उनके विचारों में द्वन्द्व अवश्य देखा जा सकता है। वह द्वन्द्व इस प्रकार का नहीं है कि क्या चाहिए क्या नहीं, कैसे कहना चाहिए कैसे नहीं, क्या सही कहा गया क्या गलत कहा, बल्कि द्वन्द्व घटित घटना की पृष्ठभूमि में है। वह अपने आप से लड़ रहा है, आरोपित दुखद घटना से लड़ रहा है और उसके कारक हैं मुनि विश्वामित्र । वह उनसे भी अप्रत्यक्ष रूप से लड़ रहा है। हरिश्चन्द्र और शैव्या उसे बीच-बीच में रोकते-टोकते रहते हैं परन्तु रोहित पर उसका कोई प्रभाव नहीं पड़ता और वह अपनी बात धड़ल्ले के साथ कहता चला जाता है। हरिश्चन्द्र विश्वामित्र को महाज्ञानी मानते हैं परन्तु रोहित ऐसा नहीं मानता। वह उलट कर यह कह देता है- “महाज्ञानी से दान-धर्म के उस रहस्य को जानना चाहता हूँ जिसके कारण एक लेने वाला बनता है, दूसरा देने वाला।"

उसमें संगीत को, राग को समझने में क्षमता है। समाज, राजनीति, धर्म और दर्शन को समझने की योग्यता है। इसके साथ ही वह अपनी बात को विशेष अभिव्यक्ति के साथ प्रस्तुत करने में भी पटु है। इतना ही नहीं, वह व्यंग्य भी कर सकता है जैसे अभी महाज्ञानी से सम्बन्धित उद्धरण में उसने एक तीखा व्यंग्य किया है।

धैर्यवान

किसी भी व्यक्ति को धैर्य से काम लेना चाहिए, शान्ति से रहना चाहिए परन्तु उसे बर्दाश्त करने की कोई न कोई तो सीमा होती है। बिन्दु ऐसा आता है जहाँ किसी भी व्यक्ति की सहनशीलता जवाब दे जाती हैं, रोहित के साथ भी यही हुआ। उसका धैर्य भी चूक गया। इसलिए जब विश्वामित्र उसे यह कहते है कि दाता से ही धर्म बनता है और धर्म के रहस्य को समझने के लिए धैर्य चाहिए। इसका उत्तर रोहित इस प्रकार देता है "मेरे धैर्य की कल्पना तुम नहीं कर सकते महर्षि।" इससे बात साफ हो जाती है और यह नहीं कहा जा सकता कि रोहित असहज है या अधीर है। वैसी स्थिति में किसी भी व्यक्ति का धीरज चूक सकता था। जिस स्थिति में रोहित गुजर रहा था। प्रश्न शारीरिक कष्ट का ही नहीं हैं और प्रश्न भी नहीं है कि उससे सुख वैभव छिन गया, लेकिन प्रश्न यह तो है कि आखिर कोई छल क्यों करे और दूसरा क्यों छला जाये। इसलिए रोहित जैसे बात टालने के लिए एक गीत गुनगुना उठता है-

माया रचकर धर्म बनाया।

माया से फिर स्वप्न दिखाया।

उसी स्वप्न में दान ले लिया।

आँख खुली दक्षिणा बाकी ।

चले बेचने सबको काशी।

यहाँ पर भी रोहित की बुद्धिमता का परिचय मिलता है क्योंकि वह पाता है कि उससे अधिक इस प्रसंग को नहीं खींचा जा सकता। उसे जो कुछ कहना था। वह कह दिया। जिसको मानना है वह माने और जिसे नहीं मानना वह न माने। फिर भी उसके एक और गुण की झलक तो यहाँ मिल ही जाती है कि उसमें कवित्व की क्षमता भी है अर्थात् उसमें भावनाएं भी हैं। इस प्रकार रोहित विचार और भावना के समन्वय से बना हुआ चरित्र है। 

दार्शनिक

रोहित में दर्शन भी भरा हुआ है जिसका प्रमाण चौथे दृश्य में मिलता है जहाँ वे लोग बिकने के लिए बाजार में खड़े हैं। विश्वामित्र हरिश्चन्द्र को अपनी बात से हटने के लिए उकसा रहे हैं तो यहाँ पर चर्चा सामान्य जीवन से ऊपर उठकर दर्शन के धरातल पर चली जाती है। तब रोहित यह कहता है- "जो तुम हो वही देखते हो, पर जो है उसे देखने के लिए आकाश से पथ्वी पर आना होता है।"

हरिश्चन्द्र और शैव्या क्रमशः डोम और पतुरिया के हाथों बिक गये। फिर भी विश्वामित्र हरिश्चन्द्र को यह समझाते रहे कि वह अपने वचन को त्याग दें नहीं तो बहुत कुछ गलत होने वाला है। तब रोहित उनसे कहता है कि आपको दान में सब कुछ मिल गया, दक्षिणा भी मिल गयी। आखिर हमारी चिन्ता क्यों । जब विश्वामित्र इस बात पर अड़ जाते हैं कि अब रोहित बच गया है जो मेरे साथ जायेगा तो इस पर रोहित की स्पष्ट उक्ति है- "मैं हूँ हरिश्चन्द्र पुत्र । अब प्रजा में शिव की हूँ। तुम्हारी परीक्षा अब पूरी हुई ऋषिराज । जाओ, राज्य करो अयोध्या में । "

यहाँ भी रोहित की स्पष्टता, उसकी विचार शक्ति और उसकी तर्क शक्ति का पता चल जाता है। यह भी निश्चित हो जाता है कि उस बालक के ऊपर जो दिमाग है वह एक बालक का न होकर एक प्रबुद्ध व्यक्ति का है। फिर भी उसके तथा हरिश्चन्द्र शैव्या के किसी तर्क को विश्वामित्र नहीं मानते। तब रोहित अपना तर्क का रास्ता छोड़ देता है और एक नया अस्त्र फेंकता है- “काश तुम जान पाते मेरे परम पूज्य ऋषि । मैं स्वयं तुम्हारे धैर्य की अंतिम परीक्षा हूँ। यहाँ जो कुछ भी भोग्य है, उसे देकर ही माता, पिताश्री के साथ हम सबने भोगा है। पिता का निष्काम दान, हम सबका वही योग है। पहचानो मुझे, सर्वज्ञ विश्वामित्र ! मैं तुम्हारा द्रोही नहीं, तुम्हारा ही एक पुत्र हूँ ।"

विशेष भूमिका

यह बात एक सामान्य बालक नहीं कह सकता। इस तरह की बात कहने के लिए बड़े-बड़े लोग भी विफल हो जाते हैं। इसे कूटनीति कह सकते हैं। ऐसा लगता है कि चाणक्य नीति बनाते समय आचार्य विष्णु गुप्त ने इसका सहारा लिया होगा या नाटककार डॉ० लक्ष्मीनारायण लाल ने इस चरित्र में चाणक्य नीति को रख दिया है। इसके आगे बात नहीं हो सकती। इसके आगे सभी तर्क पीछे पड़ जाते है। विश्वामित्र जैसे मुनि भी दंग रह गये और वह कोई तर्क नहीं दे सके। वह रोहित को छोड़ कर चले गये। रोहित अपनी माँ शैव्या के साथ पतुरिया के कोठे पर चला गया।

इसके बाद रोहित के व्यक्तित्त्व के दूसरे रूप हमारे सामने आते हैं। एक ओर वह छैला जैसे कामुक से तर्क युद्ध कर सकता है तो दूसरी ओर उस जैसे दुष्ट और शक्तिशाली के सामने शरीर बल भी दिखा सकता है। अन्ततः वह छैला के हाथों चाकू से मारा जाता है। यहाँ नाटककार ने रोहित की मृत्यु न दिखाकर हत्या दिखाई है जो प्रचलित कथा के अनुरूप नहीं है। प्रचलित कथा में साँप के काटने से मारा जाता है। इसे नाटककार ने इस प्रकार प्रस्तुत किया है- "विलास के हाथों बिका हुआ वह मनुष्य नहीं काला सर्प था जैसे छुआ उसने, मुझमें विष फैल गया उसके जहर का।"

अन्त में श्मशान घाट पर रोहित जी कर खड़ा हो जाता है और कहता है- "मैं अब तक मरा हुआ था, इसके दिये हुए जीवन से आज मैं जी गया अपने जीवन से सुनो, अब तक जी रहे थे तुम्हारे अनुभव से, अब हम जीयेंगें अपने अनुभव से ।" इस प्रकार नाटककार ने रोहित के चरित्र के विभिन्न रूपों का बढ़िया चित्रण किया है जो सहज, स्वाभाविक है और मिथक का ध्यान रखते हुए मौलिक उद्भावनाओं के समन्वय से बना है।

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