बद्री पहलवान का चरित्र चित्रण - Badri Pahalwan ka Charitr Chitran

बद्री पहलवान का चरित्र चित्रण- 'राग दरबारी' उपन्यास में आए पात्र बद्री पहलवान आजकल के नेता लोगों के सहायक हैं। ब्रदी पहलवान वैद्यजी के जेठ पुत्र हैं।

बद्री पहलवान का चरित्र चित्रण - Badri Pahalwan ka Charitr Chitran

बद्री पहलवान का चरित्र चित्रण- 'राग दरबारी' उपन्यास में आए पात्र बद्री पहलवान आजकल के नेता लोगों के सहायक हैं। ब्रदी पहलवान वैद्यजी के जेठ पुत्र हैं। वे पिताजी के सलाहकार और आदेशों के पालनकर्ता हैं। बद्री पहलवान का अखाड़ा है, जहाँ वे गुंडों, बदमाशों का गिरोह तैयार करते हैं। वे इन शिष्यों के गुरु कहलाते हैं। छोटे पहलवान इनके अखाड़े से प्रशिक्षित गंजहां है। उनके शिष्य समाज में आतंक फैलाए निरंकुश घूमते हैं। वे चोरी, मारपीट, डकैती, व्यभिचार आदि गैरकानूनी हथियार रखने आदि में लिप्त रहते हैं। गुरु बद्री पहलवान को इन शिष्यों को सुरक्षा तथा सरंक्षण देने और जमानत में लाने के लिए काफी प्रयत्न करना पड़ता है । इसलिए उन्हें गाँव के बाहर किसी गाँव में या अदालत के सिलसिले में शहर जाना पड़ता है। ऐसे शिष्यों को बद्री पहलवान 'पालक बालक' मानते हैं । 'पालक बालक' उनकी शक्ति है। पिताजी के इशारे से ये प्रतिपक्ष को डंडे के बल से चित कर देते हैं। सारी समस्याएँ इस तरह से सुलझ जाती हैं।

बद्री पहलवान सभी ‘पालक बालक' से प्रेम रखता है। जमानत, सिफारिश, आर्थिक सहायता आदि जैसी आवश्यकता हो, पहुँचकर इनको कृतकृत्य कर देते हैं। वे भी अपनी जान की बाजी लगाकर गुरु के कहने पर कूद पड़ने को तैयार रहते हैं।

बद्री पहलवान और अफसरों की कार्यप्रणाली से अच्छी तरह परिचित है। वे जानते हैं कि बाहुबल से गाँव में और अर्थबल से शहर में काम करना आसान है । अपने सहयोगियों की सहायता करने के लिए वे हमेशा नोटों की गड्डी अपने पास रखते हैं। आवश्यकता पड़ने पर पिताजी से भी पैसे लेकर किसी की जमानत करने अदालत में जाते हैं। एक बार बद्री पिताजी से डेढ़ हजार रुपए लेकर एक ‘पालक बालक’ की जमानत लेने शहर जाते हैं । वे पैसे लेने का कारण रंगनाथ को बताते हुए कहते हैं ‘गुंडे इजसाल के नीचे नहीं, ऊपर भी होते हैं.... नकदी में बड़ा आराम है। जैसे ही हाकिम कहेगा कि हजार रुपए जमानत दो, वैसे ही दस हरे-हरे नोट मेज पर फेंक दूंगा और कहूँगा कि लो भाई रख लो जहाँ मन चाहे।"

एक बार बद्रीनाथ आसपास के जिलों का चक्कर लगाने के लिए चले जाते हैं, क्योंकि उनके दो-तीन चेले अपने भोलेपन के कारण राहजनी और डकैती के मामलों में गिरफ्तार हो गए थे। बद्री पर जैसे पिताजी के रक्षा विभाग की जिम्मेदारी है। एक समय बहुत सी अड़चनें आ पहुँची। खन्ना वैद्यजी के वश में नहीं आ रहे थे। रुप्पन उनके साथ था। डिप्टी डाइरेक्टर कॉलेज की जांच करने आने वाले थे। कोआपरेटिव इंस्पेक्टर का तबादला नहीं हो पा रहा था। ऐसी हालत में सभी समस्याओं का समाधान -सूत्र प्रस्तुत करके बद्री पहलवान पिता से कहते हैं- “ ये झगड़े तो दस मिनट में खत्म हो जाएँगे। कोऑपेरेटिव इन्सपेक्टर को दस जूते मार दिए जाए, ठीक हो जाएगा। डिप्टी डाइरेक्टर न मानें और जाँच करने आएँ तो उनका भी किसी से भरत मिलाप करा देंगे। खन्ना मास्टर के लिए हुकुम कर देंगे कि वे और उनकी पार्टी के लोग कल से कॉलेज के अंदर न जाएँ, सबको बराबर गैरहाजिर बनाकर पंद्रह दिन बाद निकाल बाहर कर देंगे।” तुम यह सब ऐसे ही छोड़ दो, प्रिंसिपल ठीक कर लेगा। छोटे ने इधर दो-तीन पट्ठे तैयार किए हैं। कॉलेज के बाहर उन्हीं की ड्यूटी लगा देंगे। खन्ना को कॉलेज भीतर जाते हुए जूते मारेंगे।

रंगनाथ चाहे जितना गिचिर-पिचर करे, उसकी फिक्र क्या ? शहर का आदमी है। सुअर का - सा लेंड न लीपने के काम आए न जलाने के। तुम उधर देखो ही नहीं। घबराकर वापस भाग जाएगा। रहे रुप्पन, उन्हीं को दो-चार थप्पड़ मारने होंगे। सो जब कहोगे, मार दूंगा।

“वह फिर वैद्यजी को आश्वासन देते हैं कि (इंस्पक्टर) छुट्टी लेकर बाहर निकल जाए तो जूता लगाने की कोई कसम भी नहीं छोड़ देगें।”

वैद्यजी और बद्री पहलवान का काम है झगड़ा पैदा करना, समाधान के लिए रिश्वत लेना, सुविधा मिली तो गबन करना, फिर उसकी भरपाई करना, रिश्वत के पैसों से अपना हिस्सा लेना आदि। जोगनाथ ने दारोगा पर जा हर्जाने का मुकदमा चलाया था, उसे वापस लेने के लिए दारोगा भी पैसे देते हैं। उससे जोगनाथ कुछ लेता है। बद्री कहीं से तेरह सौ रुपए लाते हैं। फिर कोऑपरेटिव यूनियन में दो हजार जमा करने की तैयारी करता है। बाप-बेटे में ऐसा हिसाब चलता रहता है। बद्री ने भी कॉलेज के पैसे से आटा चक्की अपने गाँव से दस मील दूर दूसरे गाँव में लगाई थी।

रामाधीन रुप्पन के खिलाफ बद्री पहलवान से शिकायत करता है। वह कहता है - " वैद्यजी के घर में तुम्हीं एक आदमी हो, बाकी तो सब पन्साखा हैं। इसलिए तुम से कह रहा हूँ।" बद्री पहलवान रामाधीन को अभयदान देते हैं। तो फिर तुम्हारे यहाँ डाका वाका न पड़ेगा। जाओ, चैन से सोओ। रूप्पन डाका नहीं डालते। लौंडे हैं, मसखरी की होगी।"

बद्री पहलवान अपने पेशे के अनुरूप पोषाक पहनते हैं। मलमल का कुरता, बिना बनियान के, कमर में लंगोट, कभी-कभी लंगोट पर लुंगी। साफ-सुथरे घुटे हुए सिर पर कड़वे तेल की चमक वे भांग पीने के शौकीन हैं।

बद्री जब जम्हाई लेते हैं तो शेर की तरह मुँह खोल देते हैं उन्हें ब्राह्मण होने का गर्व है। जब रिक्शावाला बार-बार उन्हें ठाकुर साहब कहकर संबोधन करता है तो बद्री पहलवान को अपनमान की अनुभूति होती है। वे उसकी बनियान पकड़कर कहते हैं-" अब्बे, घंटे भर से यह ठाकुर साहब, ठाकुर साहब' क्या लगा रखा है। जानता नहीं, मैं बांमन हूँ।"

छोटे पहलवान ने अदालत में जोगनाथ - बेला प्रेम - प्रकरण की बात कहकर बेला का चरित्र हनन का काम किया था तो बद्री बिगड़ते हैं क्योंकि उसने एक भले घर की लड़की की इज्जत फींचकर सारी दुनिया के आगे रख दी थी। छोटे यकीन दिलाता है कि 'अदालत में कही गई बात का कोई एतबार नहीं। इससे किसी का कुछ नहीं बिगड़ता।” बद्री उसे सावधान कर देते हैं कि तुम्हें पालक बालक समझकर माफ कर दिया।" बता देते हैं कि बेला से मैं शादी कर रहा हूँ। उससे वादा कर चुका हूँ।"

वे पिताजी से न शिष्ट बर्ताव करते हैं, न शिष्ट भाषा का प्रयोग। बचपन में उन्हें बापू कहकर स्नेह और सम्मान प्रकट करते थे। पर पहलवान बन जाने पर कोई संबोधन करना उनको अरुचिकर लगा क्योंकि यह बचकानी बात है। वैद्यजी जब बेला से विवाह प्रसंग में बद्री को मूर्ख कहते हैं तो बद्री लापरवाही से जम्हाई-सी लेते हुए कहते हैं घर में गाली-गलौज करने से क्या फायदा ? यह अच्छी बात नहीं है।” जब वैद्यजी डाँटते हैं कि समझदार होकर भी तुम गयादीन की कन्या से कैसे फंस गए ? इसके उत्तर में बद्री कहते हैं, आपसे बात करना बेकार है। वैद्यजी इसे नाक काटने वाली बात कहते हैं तो मर्यादा की सारी सीमाएँ तोड़ कर बद्री कहते हैं- “नाक - वाक वाली बात न करो, नाक कहाँ है ? वो तो पंडित अजुध्या प्रसाद के दिनों में ही कट गई थी।" वे फिर बरस पड़े। तुम कहते हो कि मैं बेला से फंस गया हूँ । तुम हमारे बाप हो, तुमको कैसे समझाया जाए। फंसना - फसाना चिड़िमार का काम है। तुम्हारे खानदान में तुम्हारे बाबू अजुद्या प्रसाद जैसे रघुवंश की महतारी से फंसे थे। इसे कहते हैं फंसना।” वे पिताजी को साफ-साफ सुना देते हैं -“जो कुछ करूँगा, कायदे से करूँगा। इधर-उधर की किचिर-पिचिर मुझे पसंद नहीं है।” रुप्पन जब पिताजी के सामने यही फंसने वाली बात करते हैं तो बद्री पहलवान रुप्पन की गर्दन पकड़कर धकेल देते हैं। जिससे रूप्पन गिरते-गिरते बच गया है । बद्री कहते हैं - “ तुम घर ही में नेतागिरी करोगे ? मेरे लिए कहते हो कि मैं उससे फंस गया हूँ ? और वह भी मेरे मुँह पर कहते हो ! चिमिरखी कहीं के।"

इस मर्यादित प्रेम-प्रसंग के अलावा बद्री पहलवान के जीवन में पहलवान का आचरण ही रहा। बाहुबल को सर्वोपरि मानने के सिद्धांत पर अडिग रहे। वे अपने पालक बालकों की मदद से सारे संकट दूर करने में समर्थ रहे और पिता वैद्यजी को राजनीतिक मैदान में निरंकुश घूमने का माहौल बनाए रखने समर्थ हुए।

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बद्री पहलवान का चरित्र चित्रण- 'राग दरबारी' उपन्यास में आए पात्र बद्री पहलवान आजकल के नेता लोगों के सहायक हैं। ब्रदी पहलवान वैद्यजी के जेठ पुत्र हैं।
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