महाशूद्र कहानी का सारांश - Mahashudra Kahani Ka Saransh

Admin
0

महाशूद्र कहानी का सारांश - Mahashudra Kahani Ka Saransh

महाशूद्र कहानी का सारांश: 'महाशूद्र' हिंदी की पहली कहानी है जिसमें मशानों में अंतिम क्रियाकर्म करनेवाले ब्राह्मणों के दुःख को स्पष्ट किया है। जातीयता की मानसिकता और उसकी जड़ें कितनी दूर तक फैल चुकी हैं उसका संवेदनशील चित्रण इसमें हुआ है । ब्राह्मण होकर भी मात्र मशानों में शवों का क्रियाकर्म करने के कारण उन्हें 'महाशूद्र' कहा जाता है।

‘महाशूद्र' कहानी में दो पात्र हैं - एक नंदू डोम और दूसरे आचार्य। दोनों का कार्य है मुरदों का क्रियाकर्म करना। आचार्य जी मंत्रों द्वारा विधिवत रूप से क्रियाकर्म संपन्न करते हैं, बदले में उन्हें कुछ दक्षिणा मिल जाती है। आचार्य ब्राह्मण होने के बावजूद इस व्यवसाय के कारण उन्हें समाज में कोई प्रतिष्ठा प्राप्त नहीं है। लोग तो यही मानते हैं कि यह व्यक्ति ब्राह्मण समाज पर कलंक है, जो मुरदे के कफन तक को नहीं छोड़ता । मुरदे के शरीर से सबकुछ उतारकर बेच देता है। यहाँ तक कि मृतक की इस्तेमाल की गई वस्तुएँ भी। लोग उनके कर्मों के फल को उनकी विधवा बेटी की बात तक जोड़ देते हैं। आचार्य जी मुरदों पर पड़ी चादरें बेचते हैं। किनारी बाजार में वही चादरें धड़ल्ले से बिकती हैं। लाला वह चादरें खरीदने घर पर आता है तब परिवार वालों को अत्यंत दुःख होता है। बुरा लगता है कि पिताजी किस प्रकार का काम करते हैं? बड़ा बेटा तो कह देता है, "पिताजी, अब और नहीं सहा जाता। सारी दुनिया हम पर थू-थू करती है। हमें मुरदे की चमड़ी खींचनेवाले से लेकर कफन -खसोटू तक कहते हैं। वे कहते हैं कि हमारे घर का गुजारा ही तब तक चलता है जब कोई मरता है। किसी के घर में अँधेरा होने पर ही हमारे घर में उजाला होता है । "

मरघट पर आचार्य और नंदू रोजाना मुरदे की प्रतीक्षा करते हैं। जब मुरदा नहीं आता तो दोनों चिंतित होते हैं। अब की बार एक लावारिस मुरदा आता है उसे वैसे ही लकड़ी का इंतजाम कर जलाया जाता है। इसप्रकार लावारिस मुरदे की दक्षिणा भी नहीं मिलती। जब कोई शव नहीं आता तो दोनों ग्रहों पर विश्वास करते, बुरे दिनों की आशंका जताते हैं अंतत: आचार्य अपनी व्यथा नंदू के पास व्यक्त करते हैं कि कोई ब्राह्मण हमें अपने घर के दरवाजे के बाहर ही रखता है। और ब्राह्मण ही क्यों बहुत से लोग हमारी सूरत देखना ही अपशगुन मानते हैं। नंदू बड़े आश्चर्य से पूछता है....... क्या ब्राह्मणों में भी ऊँच-नीच होती है । वहाँ भी छुआ-छात है।" आचार्य को लोगों की घृणा, उपेक्षा और तिरस्कार का तीव्र अहसास होता है। वे नंदू के कंधों पर हाथ रखकर मन का दुःख हल्का करते हैं। 'हमें कहा जाता है महा ब्राह्मण पर इसका अर्थ जानते हो नंदू महाशूद्र ।'

आचार्यजी को कर्मों के आधारपर सामाजिक उपेक्षा सहनी पड़ती है और नंदू डोम दलित होने के कारण उसे भी सामजिक उपेक्षा सहनी पड़ती है। कहानी का प्रमुख चरित्र है आचार्य जो ब्राह्मण है, किंतु पेशा है मरघट पर आए शवों का विधिवत् अंतिम संस्कार करना। इसी व्यवसाय पर उनका उदरनिर्वाह चलता है। आचार्य रोज मरघट पर जा बैठते हैं और देर रात अपने परिवार में जाते हैं। ब्राह्मण होते हुए समाज उनके व्यवसाय के कारण उन्हें घृणा की नजर से देखता है। मरघट पर जलते शव की बदबू को वे सहते हैं । कपाल क्रिया होने तक बैठे रहना पड़ता है। समय काटने के लिए आचार्य नंदू के साथ तमाकू खाते हैं और शराब भी पीते हैं। घर लौटने पर पहले वह स्नान करते हैं। इस पेशे में उन्हें कुछ नहीं मिलता जिससे की परिवार का ठीक तरह से पालन पोषण कर सके। लोग उनके कर्म के कारण उन्हें कोसते रहते हैं। जब बेटे भी बड़े होकर अपने पिता की उपेक्षा करने लगते हैं तो वे बिल्कुल टूट जाते हैं।

महाशूद्र कहानी का उद्देश्य

महाशूद्र कहानी का उद्देश्य: जातिव्यवस्था समाज के लिए कलंक है। यह व्यवस्था केवल चार वर्णोंतक ही सीमित नहीं है, बल्कि उनमें भी उपजातियाँ हैं। उनकी मानसिकता को व्यक्त करना लेखक का प्रमुख उद्देश्य है। नंदू डोम दलित है, आचार्य ब्राह्मण हैं परंतु उनकी सामाजिक स्थिति नंदू से भी बदतर है। प्रेतों का क्रियाकर्म करने के कारण पूरा समाज और उनके बच्चे भी उनकी तरफ घृणा से देखते हैं। रोजी रोटी की चिंता में वे अपने इस व्यवसाय को छोड़ नहीं सकते। उन्हें दुःख इस बात का है कि प्रेतों के दाह-संस्कार का महत्वपूर्ण कार्य करते हुए भी उन्हें 'महाशूद्र' कहा जाता है।

Post a Comment

0Comments
Post a Comment (0)

#buttons=(Accept !) #days=(20)

Our website uses cookies to enhance your experience. Learn More
Accept !