लोक संस्कृति एवं लोक साहित्य में सम्बन्ध स्पष्ट कीजिए

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लोक संस्कृति एवं लोक साहित्य में सम्बन्ध स्पष्ट कीजिए

लोक संस्कृति से आशय किसी क्षेत्र विशेष में निवास करने वाले लोगों के पारंपरिक रीति-रिवाजों, त्योहारों, मान्यताओं और काल आदि से है। यह किसी क्षेत्र को स्वतंत्र पहचान प्रदान करती है। भारत की लोक संस्कृति में विभिन्न प्रकार के व्रत, त्योहार, पर्व, मेले का महत्व है। जितने पर्व व त्योहार भारत में मनाए जाते हैं उतने शायद किसी अन्य देश में नहीं मनाए जाते।

भारत में हिंदी मास के अनुसार निम्न पर्व व त्योहार मनाए जाते हैं-

चैत्र मास : बासोड़ा, नवरात्रे, रामनवमी

वैशाख : वैशाखी पूर्णिमा

ज्येष्ठ मास : वट सावित्री पूजन, गंगा दशहरा, निर्जला व्रत, एकादशी

आषाढ मास : योगिनी, एकादशी, गुरु पूर्णिमा

सावन मास : शिवजी व्रत व मेले, नाग पंचमी व रक्षा बंधन।

भाद्रपद भास : हरियाली तीज, अनन्त चतुर्दशी, श्री कृष्ण जन्माष्टमी, हर तालिका तीज गणेश चतुर्थी

आश्विन मास : नवराजा, दुर्गा अष्टमी, दशहरा, शरद पूर्णिमा

कार्तिक मास : करवा चौथ, अहोई अष्टमी, धन तेरस, चतुर्दशी, दीपावली, गोवर्धन पूजा, भैयादूज, कार्तिक पूर्णिमा, गंगा स्नान मेला

मार्गशीष : भैरव जयन्ती, मार्गशीष, पूर्णिमा व्रत

पोश मास : पूर्णिमा व्रत, स्नान व मेला, मकर संक्रांति

माघ मास : सकट चौथ, मौनी अमावस्या, बंसत पंचमी, माघ पूर्णिमा मेला

फाल्गुन : महाशिवरात्रि व्रत व मेले, होलिका दहन आदि

भारतीय ग्रामीण जनता, जो दूर नगरों, गांव, वन, पर्वतों में निवास करती है, लोक संस्कृति की संरक्षक व प्रतिष्ठापक है।

लोक संस्कृति एवं लोक साहित्य में सम्बन्ध

लोक साहित्य में चूंकि लोक वार्ता एवं लोक संस्कृति का चित्रण रहता है और लोक जीवन का चित्र प्रस्तुत किया जाता है, इसी कारण लोक साहित्य के अध्ययन में अन्य समाज - विज्ञानों के अनुसंधानकर्ता अधिक रुचि लेते हैं। लोक साहित्य में इतिहास, भूगोल, पुरातत्व, चित्रकला, मनोविज्ञान, समाजशास्त्र, राजनीतिशास्त्र, अर्थशास्त्र, धर्मशास्त्र, नृतत्वविज्ञान, मानवविज्ञान आदि अनेक समाज-विज्ञानों के महत्वपूर्ण तथ्य मिल जाते हैं। इसलिए इन सभी समाज - विज्ञानों के अध्येताओं का लोक साहित्य से गहरा संबंध होता है। यहां तक कि प्रत्येक जनपद के लोक साहित्य में और वहां की लोक संस्कृति में प्राचीन परंपरा से चली आ रही चिकित्सा पद्धतियों, झाड़-फूंक, तंत्र-मंत्र, टोना-टोटका आदि का समावेश रहता है, इस कारण चिकित्साशास्त्र से भी लोक साहित्य का घनिष्ठ संबंध होता है। भाषा विज्ञान और विशेषतया बोलीविज्ञान का संबंध चूंकि जनपदीय बोलियों से रहता है और लोक साहित्य तो शुद्ध रूप से लोक बोलियों में ही रचा जाता है, इस कारण बोलीविज्ञान के अध्येताओं को लोक साहित्य में प्रचुर अध्ययन सामग्री उपलब्ध हो जाती है। यहां तक कि पाठालोचन जैसी अत्याधुनिक एवं वैज्ञानिक ज्ञान - शाखा का भी लोक-साहित्य के साथ घनिष्ठ संबंध होता है।

यही कारण है कि ऐतिहासिक और तुलनात्मक अध्ययन करने वाले शोधार्थियों को लोक साहित्य से पर्याप्त सहायता मिल जाती है। अतः लोक साहित्य अन्य समाज - विज्ञानों बहुत निकट से जुड़ा हुआ है। मानव-समाज का अध्ययन करने वाले सभी समाज - विज्ञानों के अध्ययन की प्रचुर सामग्री लोक साहित्य में उपलब्ध हो जाती है। अतः इनका परस्पर संबंध बहुत प्रगाढ़ माना जाएगा। इसलिए कुछ शास्त्रों, कलाओं या समाज - विज्ञानों से लोक साहित्य के संबंधों की विवेचना यहां करेंगे। इसका तात्पर्य यह भी है कि जिस प्रकार लोक साहित्य में अन्य समाज-विज्ञानों के अध्ययन के लिए प्रचुर सामग्री उपलब्ध हो जाती है, उसी प्रकार लोक साहित्य के अध्येता को भी अन्य समाज - विज्ञानों का अध्ययन करने से अनेक महत्वपूर्ण तथ्यों की प्राप्ति हो जाती है। अतः समाज-विज्ञानों के अनुसंधानकर्ताओं को लोक साहित्य का तथा लोक साहित्य के अध्येताओं को अन्य समाज - विज्ञानों का अध्ययन अपेक्षित है, जिससे अंतअनुशासनपरक अध्ययन किए जा सकें। वर्तमान में विश्वविद्यालय अनुदान आयोग भी ऐसे तुलनात्मक अंतर अनुशासन पर आधारित शोध कार्यों एवं प्रोजेक्टों को पर्याप्त प्रोत्साहन दे रहा है।

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