चरित्र चित्रण की परिभाषा तथा विशेषताएं बताइये।

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चरित्र चित्रण की परिभाषा तथा विशेषताएं बताइये।

चरित्र चित्रण की परिभाषा : किसी उपन्यास के पात्रों का उनके चरित्र की विशेषता के आधार पर वर्णन करना चित्रण करना कहलाता है। उपन्यास सम्पूर्णं मानव जाति या समाज का चित्र कहा जाता है। वास्तव में उपन्यास का मुख्य विषय मानव और उसका चरित्र है। मानव एक पहेली हैं दूसरा के लिए ही नहीं, प्राय: अपने लिए भी। उस पहेली को सुलझाने की, उस रहस्य को खोलने की चेष्टा प्रत्येक उपन्यास में मिलती हैं। इस दृष्टि से पात्र और उनका चरित्र चित्रण उपन्यास का सबसे महत्वपूर्ण तत्व बन जाता है। प्रत्येक मनुष्य के दो रूप होते है। एक बाहरी रूप अर्थात वह जो दूसरों को नजर आता है, और दूसरा भीतरी रूप, अर्थात वह जो वास्तव में हैं।

यथार्थ और समुचित प्रभाव के साथ चरित्र चित्रण करना उपन्यासकार की सफलता का द्योतक है। चरित्र-चित्रण के लिए समाज और जीवन का प्रत्यक्ष और विशद अनुभव आवश्यक है। यदि उपन्यास के पात्र उपन्यास के चरित्रों- जैसे ही न लगकर जीवन में देखे सुने और सम्पर्क में आये व्यक्तियों के समान लगते हैं और उनके साथ ममता, घृणा, द्वेष करुणा आदि के भाव स्वतः जगने लगते हैं, तो समझिए कि उपन्यास में सफल चरित्र चित्रण हुआ है। अत: पात्रोंकी सजीवता अत्यन्त आवश्यक है।

जिस किसी ने भी उपन्यास लिखने की चेष्टा की हैं, तो उसे पात्र तथा उनके चरित्र-चित्रण की ओर ध्यान देना ही पड़ा है। उपन्यासकार अपने पात्रो का निर्माण इसलिए करता है कि उनके जरिए वह अपना प्रतिपाद्य कहना चाहता है। उपन्यास में पात्र कभी आनुशंगिक, कभी जान-बूझकर, कभी अनायास आते रहते है। पात्र और उनके चरित्र चित्रण के बिना उपन्यास उपन्यास नहीं कहलाया जा सकता। उपन्यास का मूलाधार ही मानव और उसका चरित्र है। इसी से स्पष्ट हैं कि उपन्यास में पात्र तथा चरित्र-चित्रण को बड़ा ही महत्व है।

उपन्यास लिखने के लिए उपन्यासकार जब भी लेखनी उठाता है, तो अपने पात्रों को साकार करने के लिए बेचैन हो उठता है। हम एकाद बार कथानक को भूल सकते हैं, पर उपन्यास द्वारा द्वारा निर्मित कुछ विशिष्ट शब्द मूर्तियाँ हम भूल नहीं सकते। हमारे अन्दर कितना कुछ अव्यक्त होता है। कहीं उस सब को स्वीकारते हुए उसे बाहर निकालकर अपने अन्दर को रिक्त करते जाना ही सृजन हैं। उपन्यासकार अपने भीतर से प्रेरणा पाकर पात्रो को शब्द रूप देकर उन्हें पाठक की कल्पना में अमर करने की चेष्टा करता है।

उपन्यासकार अपने अनुभव वृत्त के आधार पर स्वयं की आत्माभिव्यक्ति करता हुआ कुछ शब्द मूर्तियाँ गढ लेता है। उन शब्द मूर्तियाको नाम, लिंग तथा स्वतंत्र व्यक्तित्व प्रदान कर संवादों और व्यवहार से पाठक से उनका परिचय करवाता है। यही शब्दमूर्तियाँ ही उपन्यास के पात्र है।

उपन्यास एक लोक हैं और पात्र उस लोक के प्राणी। उपन्यास और उसके पात्र इसी मृत्यु लोक और मनुष्य की छाया है। इसी लिए मानवीय स्वभावों और कार्यों का वर्णन उपन्यास में रहता है। उपन्यास के पात्र मनुष्य की भाँति शारीरिक अस्तित्व नहीं रखते, परन्तु उनका व्यक्तित्व उसी तरह सजीव होता है जैसा हाड़-मांस के बने मनुष्य का।

चरित्र-चित्रण कला की विशेषता यह बताई गई है कि उसके द्वारा पात्रों के शीलगुणों और अवगुणोंका वास्तविक और स्वाभाविक चित्रण अवश्य हो जाय। घटनाओकी सृष्टि द्वारा और कथोपकथना के सहारे उन पर अधिकाधिक इस प्रकार प्रकाश डाला जाय कि वह मनोवैज्ञानिक सिद्धांतों के बिलकुल अनुरूप हो। मनुष्य का मनुष्यत्व हैं उसका व्यक्तित्व उसके कुछ विशिष्ट गुणोका समन्वय, जो उसे अन्य मनुष्यों से अलग बनाता है।

उपन्यास में पात्रों का चरित्र-चित्रण सजीवता, सत्यता और स्वाभाविकता के साथ अत्यन्त प्रभावशाली ढंग से होना चाहिए । पात्र की प्रकृति के अनुरूप ही उसके कार्य और बातें होना आवश्यक है। पात्रों की चरित्रगत विभिन्नताएँ कथावस्तु के उचित विकास में सहायक होती है। पात्रों का चरित्र-चित्रण दो प्रकार से होता हैं एक में लेखक स्वयं वर्णन द्वारा पात्र का चरित्र चित्रण करता है और दूसरी लेखक पात्रों के विषय में स्वयं कुछ न कहकर पात्रों से ही अपने और दूसरे पात्रों के चरित्र पर प्रकाश डालता है।

चरित्र-चित्रण की विशेषताएँ

(1) चरित्र का व्यक्तित्व - व्यक्तित्व के भीतर पात्र का आकार, रूप, रंग, वेशभूषा आदि सम्मिलित रहती है। जिसके द्वारा हम उसे पहचानते हैं । यदि उपन्यास के भीतर इन बातों का विवरण नहीं हो तो हम अपनी कल्पना और अनुभव के आधार पर उसके व्यक्तित्व का एक रूप बना लेते हैं। यह व्यक्तित्व जितना ही प्रभावशाली हो तथा अन्य सजातीय पात्रों से भिन्न जान पड़े उतना ही अच्छा होता है।

(2) उसके बौदिक गुण - बौदिक गुणों के भीतर अध्ययन, बतुरता, आदि की विशेषताएँ आती हैं। इसके लिए उसके गुण यदि ठोक कल्याणकारी हुए तो हम सम्मान और प्रशंसा करते हैं और यदि अकल्याण कारी है, तो हम पर निन्दा करते हैं, इन गुणों का हम पर प्रभाव पडता है।

(3) चारित्रिक गुण - चारित्रिक गुणों का प्रभाव सबसे अधिक पडता है। उसके भीतर दूसरों के सुख में सुखी और दुःख में दुखी होने की कितनी शक्ति हैं, वह कितना संवेदनशील और भावुक है, परिस्थितियों का घात-प्रतिघात सहकर भी उसमें कितनी करुणा और सहृदयता हैं, इन बातो पर हमारा ध्यान उसके प्रति प्रेम या घृणा का भाव जाग्रत करता है। चारित्रिक विशेषताओं में उसके आचरण और दूसरों के प्रति व्यवहार को परखा जाता है।

चरित्र-चित्रण की प्रणालियाँ

(1) विश्लेषणात्मक पद्धति - जब लेखक विभिन्न प्रकार के पात्रों के चरित्र, आचार-विचार, व्यवहार आदि का वर्णन स्वयं करता उनके बारे में स्वयं सब कुछ कह देता है और अपने शब्दों में पाठक को पूर्ण परिचय दे देता है तो चरित्र चित्रण करने की ऐसी विधि को विश्लेषणात्मक पध्दति कहा जाता है ।

(२) नाटकीय पद्धति - इसके अन्तर्गत उपन्यासकार किसी पात्र के चरित्र को उसकी वेश-भूषा, भाव भंगिमा, बातचीत, क्रियाकलाप, आकृति आदि के द्वारा प्रस्तुत करता है ।

(३) स्वगत कथनात्मक पद्धति - अप्रकट मनोभावों को अथवा उन भावनाओं को जिन्हें किन्हीं कारणों से पात्र दूसरे अन्य पात्रों के समक्ष नहीं व्यक्त कर पाता, जब वह केवल सोचकर ही रह जाता है, तो चरित्र चित्रण की इस विधि को स्वगत कथनात्मक पध्दति कहते हैं ।

(4) आत्मकथात्मक पद्धति - इस पद्धति के कई रूप होते हैं- जैसे आत्मअन्वेषण करना, आत्म-परीक्षण करना, आत्म समर्थन करना । चरित्र चित्रण की इस विधि का उपयोग मुख्य रूप से उन उपन्यासा में मिलता है, जो आत्मकथा के रूपमें लिखे गये है ।

(5) संवादों के माध्यम से चरित्र चित्रण - 

इसके अन्तर्गत किसी पात्र का चरित्र चित्रण करने के लिए किसी अन्य पात्र के साथ होने वाले वार्तालाप का आश्रय लिया जाता है। दो पात्रों की यह बातचीत किसी तीसरे पात्र के चरित्र को उद्घाटित कर सकती है। संवादों के माध्यम से ही किसी पात्र की बोदिकता, उसके शिक्षित या अशिक्षित होने, सामाजिक व्यवहारा में उसकी कुशलता का सहज ही प्रमाण उपलब्ध हो जाता है ।

चरित्र दो प्रकार के होते हैं 

  • टाईप (वर्ग-विशेष के प्रतिनिधि )
  • विशिष्ट व्यक्तित्व वाले ।

पात्रों के दो भेद होते हैं

  • आदर्शवादी
  • यथार्थवादी ।

यदि कोई उपन्यासकार अपनी कृति में सशक्त और प्रभावशाली चरित्र की सृष्टि नहीं कर पाता, तो वह कदापि सफल नहीं हो सकता। यदि किसी हृदय पर उपन्यास के पात्रो में सजीवता या सशक्तता होती है, तो वे पाठक के भारी प्रभाव डालते हैं। चरित्र-चित्रण की सफलता का एक परिमाण यह भी है कि किसी पाठक के हृदय में उपन्यासके पात्र का जो स्वरूप भावसात्मक रूपमें अंकित हो और उसके क्रियाकलाप की जो कल्पनात्मक सँभावनाएँ हो, उपन्यास में चित्रित पात्र से उसका साम्य बैठ जाय । इन दोनों की पारस्परिक निकटता ही चरित्र- चित्रण की कला है।

जिस प्रकार से कथानक उपन्यास का अनिवार्य तत्व है, जिसके अभाव में उपन्यास की रचना नहीं हो सकती, उसी प्रकार आधुनिक युग में यह मान्यता इट होती जारही हैं कि पात्र अथवा चरित्र-चित्रण का भी उपन्यास में उतनाही अधिक महत्व है, जितना कथानक का क्योंकि इस तत्व के अभाव में उपन्यास कोई निश्चित कलात्मक अथवा साहित्यिक स्वरूप नहीं ग्रहण कर सकता । सफल उपन्यासकार अपने पात्रों का चरित्र-चित्रण यथार्थ और वास्तविक जीवन का आधार देकर इस प्रकार से करता है कि वे सामान्य मनुष्याको अपेक्षा अधिक जीवंत प्रतीत होने लगते है

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