बड़कू भैया का चरित्र चित्रण - Badku Bhaiya Ka Charitra Chitran

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बड़कू भैया का चरित्र चित्रण - Badku Bhaiya Ka Charitra Chitran

सहनशील - योद्धा कहानी में भैया सहनशील प्रवृति के है। वह अपने से बड़े व्यक्ति का सम्मान करता है और अपने से छोटी उम्र वालों के प्रति स्नेह भाव रखता है। वह उँची आवाज में बात करने वाला नहीं है। बड़कू को दद्दा से हर दिन डाँट डपट पड़ती रहती है, वह कभी भी दद्दा के समक्ष प्रतिवाद नहीं करता है। वह किसी भी परिस्थिति पर पहले मंथन करता है और फिर अपना विचार रखता है। लोहारखाने में अगर कोई शिकायत आती तो पिता के हिस्से की मार-झिड़की भी बड़कू ही सहन करता है । बड़कू के पिता लँगड़े थे और बड़कू अपने पिता का सहारा था। सहनशीलता ने उसके व्यक्तित्व को अलग तरह से निखार दिया था। लोहारखाने में अवधूसिंह शिकायत लेकर आता है, तो बड़कू डाँट डपट खाकर भी किसी प्रकार का प्रतिवाद नहीं करता है, "सिंह ने लोहे के टुकडों को उनके सामने फेंक दिया, ई का है? भैया ने वे टुकड़े उठाकर दद्दा को दिए। दद्दा ने लोहे के टुकड़े को परखते हुए हैरानी प्रकट की, टूट गया? इत्ता बड़ा हो गया अभी तक लोहा पहचानने की तमीज़ नहीं आई? सिर झुकाकर अपराधी की तरह सुनते रहे भैया । उन्होंने ढूँढ- ढाढ़ कर लोहे का एक दूसरा टुकड़ा निकाला और उसे आग पर चढ़ा दिया ।

वाद-संवाद से दूर रहने वाला - 'योद्धा' कहानी में भैया किसी भी वाद-विवाद में नहीं पड़ता है। भैया के छोटे भाई की प्रवृति सवाल करना है लेकिन भैया किसी दूसरे से सवाल करने की अपेक्षा मनन करने में विश्वास करता है। बड़कू का छोटा भाई किसी वाद-संवाद में अपना दायित्व निभाता, लेकिन भैया कहीं भी अपनी हिस्सेदारी नहीं निभाता है। छोटा भाई सवाल करता और दूसरों के लिए उसके सवाल बहस का मुद्दा बन जाते है और अन्ततः उसका सवाल झगड़े का कारण बनता है। भगवान की जात पूछे जाने पर शूरसिंह, सरूप और फेरु काका में विवाद इस हद तक बढ़ जाता है कि एक-दूसरे को मारने की नौबत आ जाती है। छोटू के शब्दों में- "मैंने भैया को इस शास्त्रार्थ में कभी भी हिस्सा लेते नहीं देखा। फेरु काका ने मुझे डण्डा हिला - हिलाकर चेताया, कल से झगड़ा लगाया तो खैर नहीं।"

ईमानदार: 'योद्धा' कहानी में भैया एक ईमानदार चरित्र है। झूठ, छल इत्यादि उसके चरित्र का हिस्सा नहीं हैं। वह कोरी बातें नहीं करता है बल्कि समस्याओं का समाधान खोजता है । गाँव भर में यह सम्मान किसी भी संघर्ष शील प्रतिभाशाली को दिया जाता है। रामचेत सम्मान के लिए छोटू चयन करता है। शुरु-शुरु में इस कार्य के लिए गाँव में काफी थू-थू हुई लेकिन जब से रामलीला कमेटी को भी 500 रूपये दिये जाने लगे हैं तब से गाँवों में हर जाति के होनहार लड़के-लड़कियों को सम्मान - स्वरूप पैसे और पहचान मिलने लगती है। विरोध स्वीकृति में डलता जाता है लेकिन इस सम्मान के प्रति भैया का मन कुढ़ने लगता है, क्योंकि भैया की दृष्टि में वो व्यक्ति सम्मान का वाजिब हकदार होता जो ईमानदार है, जो समाज सेवी है, जो कठिन संघर्ष के उपरान्त पढ़ाई में सफल होता है इत्यादि। 'रामचेत सम्मान' देने के लिए छोटू लड़के-लड़कियों का मैरिट के आधार पर चयन करता है जिस कारण से भैया का इस कार्य मोहभंग होने लगता है, पिछले साल रामलीला के ठीक पहले भैया का दिमाग गड़बड़ाया, छोटकू मझे छुट्टी दे दो। किस बात की ? मैंने हैरत से पूछा । वही उस इनाम - इकराम से । मैं अवाक् होकर लगा देखने भैया को, जिन्दगी भर हीनता के बोध में दबा हुआ एक कुण्ठित व्यक्तित्व ! बन्द कर दें ? मैंने चिढ़कर पूछा। मैंने कब कहा ? फिर आप हाथ क्यों खींच रहे हैं? हम चाहते है कि पैसा सही आदमी को दिया जाए, वरना न दिया जाए।" इससे पुष्टि होती है कि भैया एक ईमानदार व्यक्ति है।

विद्रोही: बड़कू ईमानदार, सहनशील एवं विद्रोही पात्र है। वह एक ऐसा चरित्र है जो बोलता कम है और सोचता ज्यादा है। प्रतिवाद करने की प्रवृति उसमें दिखाई नहीं देती है, लेकिन प्रतिशोध लेना वह अच्छी तरह जानता है। वह जातिगत भेदभाव की परम्परा को मानने वाला पात्र नहीं है। वह मनुष्यत्व पर विश्वास करता है इसलिए मानवता को बनाए रखने के लिए ईमानदारी के रास्ते पर चलता है, लेकिन उँची जाति के लोगों ने जो छोटी जातियों के साथ दुर्व्यवहार किया है वह उसका बदला लेना नही भूलता है, इसलिए वह अवधू सिंह को लोहा पकाकर नहीं देता है," बचपन से चोटें ही तो झेलता रहा हूँ काकी, कभी किसी के हिस्से की, कभी किसी के ..... कभी ऊपर-ऊपर दिख जाती है, कभी नहीं, कभी - कभी तो वर्षों रिसती और टीसती रहती है। घायल हुआ हूँ तो घायल किया भी है हमने... लोहा न पहचान पाने के चलते दद्दा से कितनी मार खाई थी हमने। तुम्हें मालूम, लोहा पहचानते थे हम। जान-बूझकर कच्चा लोहा दिया उन्हें हमने।"

पश्चातापी: 'योद्धा' कहानी में बड़कू पश्चातापी चरित्र के रूप में भी उभरता है। वह ईमानदार है लेकिन अपने बदले की भावना को लेकर पश्चातापी भी है। वह मानता है जिस प्रकार ऊँची जाति के लोगों ने छोटी जाति के लोगों से दुर्व्यवहार किया उसी प्रकार छोटी जाति के लोग आर्थिक सम्पन्नता के चलते बड़ी जाति के लोगों के प्रति भी ऐसा ही भाव रखेंगे तो यह प्रवृति ब्राह्मणवादी होने की द्योतक है, लेकिन वे सब मामूली चोटें थी जिस चोट ने मुझे सबसे ज्यादा तकलीफ दी, जानते हो, वह क्या है ? क्या ? हमारे अनचाहे ही खुद बभनपने में समाते जाना- हमी नहीं, ज्यादातर लोगों का । युगों के इस बभनपने के मारे लोगों में तो बभनपना नहीं आना चाहिए था न!"

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