आँखों से सिर्फ सच नहीं, सपना भी देखिए कविता की व्याख्या और उद्देश्य

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आँखों से सिर्फ सच नहीं, सपना भी देखिए कविता की व्याख्या और उद्देश्य

आँखों से सिर्फ सच नहीं, सपना भी देखिए कविता

आँखों से सिर्फ सच नहीं, सपना भी देखिए
कलियों का रूप—रंग महकना भी देखिए
सब लोग ही पराए हैं, ये बात सच नहीं
दुनिया की भीड़ में कोई अपना भी देखिए

नदियों को सिर्फ पानी ही पानी न मानिए
नदियों का गीत गाना थिरकना भी देखिए
बरखा की स्याह रात में उम्मीद की तरह
निर्भीक जुगनुओं का चमकना भी देखिए

पत्थर का दिल पसीजते देखा न हो अगर
तो बर्फ की शिलाओं का गलना भी देखिए
जो चुभ रहे हैं —शूल हैं,ये अर्द्ध—सत्य है
इन नर्म—नर्म फूलों का चुभना भी देखिए

आँखों से सिर्फ सच नहीं, सपना भी देखिए कविता की व्याख्या

भावार्थ: कवि जहीर कुरेशी कहते हैं कि हमें अपने जीवन में सिर्फ सच नहीं, सपने भी देखने चाहिए। आज हमारा जीवन दुखों से भरा हुआ है यह बात सच है, वास्तव है। पर समाज की इस स्थिति को बदलने का सपना भी हमें देखना चाहिए। उस सपने को यदि मेहनत की झालर लगाई तो वह सपना भी सत्य हो सकता है। हमें अपनी आँखों से कलियों का रूप-रंग और महकना भी देखना चाहिए। चूँकि फूल अपने रंग-रूप और गंध से दूसरों के जीवन में आनंद भर देता है । कवि उसी परोपकार की भावना से हमें प्रेरित करता है।

यह सच नहीं कि इस दुनिया में सारे लोग पराए हैं। आज हम हर मनुष्य को शक की नज़र से देख रहे हैं। यह हमारा एकांगी दृष्टिकोन है । इस दुनिया की भीड़ में हमें अपने लोग भी देखने चाहिए, जिनके साथ हम अपना जीवन खुशी से बिता सके। नदी में केवल पानी ही नहीं उसके विविध रूपों को देखना चाहिए। नदी अपने रास्ते में आई हुई हर मुश्किल को पर करके कल-कल करती गीत - गाती, थिरकती हुई आगे बढ़ती है। उस प्रकार मनुष्य को अपनी हर समस्या का सामना करना चाहिए।

वर्षांऋतु की काली रात में छोटे-छोटे जुगनू चमते रहते हैं। इन जुगनुओं के चमकने से अंधेरा दूर नहीं होता। पर उनका चमकना राह भटके मुसाफिरों के मन में उम्मीद भर देता है। उन जुगनुओं की तरह हमें भी दूसरों की अँधियारी जिंदगी को दूर करने का प्रयास करना चाहिए। कवि कहता है कि समाज में कुछ लोग पत्थर दिल के होते हैं। जो किसी भी बात पर पसीजते नहीं। मलतब वे भावुक नहीं होते। परंतु उसी समाज में कुछ ऐसे भी लोग होते हैं जो अत्यंत संवेदनशील होते हैं। कवि उनकी तरफ देखने के लिए कहता है । कवि ऐसे लोगों को बर्फ की शिलाओं की उपमा देता है। अंत में कवि कहता है कि यह तो अधूरा सच है कि हर चूभनेवाली चीज काँटा होती है। नर्म-नर्म फूलों का चूभना काँटे के चुभने से भी ज्यादा दर्दनाक होता है। कुछ लोग दोस्ती या प्रेम के नाम पर ऐसा जख्म दे जाते हैं जो कभी भरता नहीं है। काँटों का चुभना क्षणभर दर्द देता है पर फूलों का चुभना जिंदगी भर दर्द देता है।

आँखों से सिर्फ सच नहीं, सपना भी देखिए कविता का उद्देश्य

उद्देश्य : प्रस्तुत ग़ज़ल में कवि ने दुनिया को एकांगी दृष्टि से नही तो सर्वागिण दृष्टि से देखने की आवश्यकता पर बल दिया है। ग़ज़ल का नाम लेते ही हमारे सामने इश्क या प्रेम की बातें आ जाती हैं। कवि कुरेशी जी ने इसे सामाजिकता के साथ जोड़कर एक नया विषय प्रस्तुत किया है। कवि जीवन के विषयक सकारात्मक विचार अभिव्यक्त करता है। 

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