दूध का जला छाछ भी फूंक-फूंककर पीता का अर्थ और वाक्य प्रयोग

Admin
0

दूध का जला छाछ भी फूंक-फूंककर पीता है का अर्थ

दूध का जला छाछ/मट्ठा फूंक-फूंककर पीता का अर्थ है– एक बार की हानि भविष्य के लिए सचेत कर देती है; एक बार नुकसान उठाकर सतर्क हो जाना; एक बार धोखा खाने पर अत्यधिक सावधान होना।

दूध का जला छाछ भी फूंक-फूंककर पीता है का वाक्य प्रयोग

वाक्य प्रयोग: एक बार रेलगाड़ी में सूटकेस चोरी चले जाने के बाद वह हमेशा सफर में सूटकेस को अपने सिर के नीचे रखता है, क्योंकि दूध का जला छाछ फूंक-फूंककर पीता है। 

वाक्य प्रयोग: देवदत्त की एक बार जेब कट गई थी, अब वह पैसे अपने बैग में रखता है। ठीक ही है- दूध का जला छाछ भी फूंक-फूंककर पीता है। 

वाक्य प्रयोग: पिछली बार एक दिन की गैरहाजिरी में राजू को दफ्तर से जवाब मिला था; इसलिए अब वह देरी से जाने से भी डरता है, क्योंकि 'दूध का जला छाछ भी फूँक – फूँक कर पीता है'।

वाक्य प्रयोग: जब से दादाजी ने रमेश को देर खेलने के लिए फटकार लगाई, वह समय से घर आ जाता है क्योंकि दूध का जला छाछ भी फूंक-फूंककर पीता है। 

दूध का जला छाछ/मट्ठा फूंक-फूंककर पीता का अर्थ एक प्रसिद्ध हिन्दी मुहावरा है जिसका का अर्थ है– एक बार की हानि भविष्य के लिए सचेत कर देती है; एक बार नुकसान उठाकर सतर्क हो जाना; एक बार धोखा खाने पर अत्यधिक सावधान होना। मान लीजिये यदि एक बार आप कोई गलती कर देते हैं तो दोबारा से आप और अधिक सावधान हो जायेंगे।

Tags

Post a Comment

0Comments
Post a Comment (0)

#buttons=(Accept !) #days=(20)

Our website uses cookies to enhance your experience. Learn More
Accept !