Wednesday, 4 May 2022

प्राथमिक समूह और द्वितीयक समूह में अंतर - Prathmik Samuh aur Dwitiyak Samuh mein Antar

प्राथमिक समूह और द्वितीयक समूह में अंतर - Prathmik Samuh aur Dwitiyak Samuh mein Antar

प्राथमिक एवं द्वितीयक समूहों में अंतर प्राथमिक एवं द्वितीयक समूहों की विशेषताएँ पूर्णतः एक-दूसरे के विपरीत होती हैं। दोनों में निम्नलिखित प्रमुख आधारों पर अन्तर स्पष्ट किया जा सकता है


प्राथमिक समूह और द्वितीयक समूह में अंतर

बिंदु   प्राथमिक समूहद्वितीयक समूह
1. आकारप्राथमिक समूह का आकार छोटा होता है। उदाहरण के लिए, परिवार, पड़ोस तथा मित्र-मण्डली का आकार सीमित है। फेयरचाइल्ड के अनसार इसमें तीन-चार व्यक्तियों से लेकर पचास-साठ व्यक्तियों तक तथा कूले के अनुसार इसमें दो से साठ व्यक्तियों तक की संख्या हो सकती है। द्वितीयक समूह का आकार बड़ा होता है। इसके सदस्यों की संख्या असीमित हो सकती है। सम्पूर्ण राष्ट्र भी एक द्वितीयक समूह है जिसकी संख्या असीमित होती है।
2. सम्बन्धप्राथमिक समूह के सदस्यों में आमने-सामने के वैयक्तिक व घनिष्ठ सम्बन्ध पाए जाते हैं। वैयक्तिक सम्बन्धों के कारण इनमें औपचारिकता नहीं होती है। इसके विपरीत प्रेम, सहयोग, सद्भावना आदि आन्तरिक गुणों का समावेश होता है। इनमें हम की भावना की प्रधानता रहती है। द्वितीयक समूह में अप्रत्यक्ष एवं अवैयक्तिक सम्बन्ध पाए जाते हैं। इनमें सहयोग, स्नेह, घनिष्ठता की कमी होती है और 'हम' के स्थान पर 'मैं' की प्रधानता रहती है।
3. हितप्राथमिक समूह में कोई विशेष हित नहीं होता है। सभी कार्यों में प्रत्येक सदस्य पूर्ण हृदय से हिस्सा लेते हैं। वे समूह के लिए बड़े से बड़ा त्याग करने को तैयार रहते हैं।द्वितीयक समूह में, जो कि विशेष स्वार्थ समूह के नाम से जाने जाते हैं, प्रत्येक सदस्य अपने लक्ष्य को प्राप्त करने के लिए जी जान से कोशिश करता है। यदि उसे अपने हित के लिए दूसरे सदस्यों के हितों की अवहेलना भी करनी पड़ जाए तो भी वह इसके लिए तत्पर रहता है।
4. सम्बन्धों का जन्मप्राथमिक सम्बन्धों का जन्म स्वतः होता है। इस प्रकार के सम्बन्धों की स्थापना में किसी प्रकार की कोई शर्त या दबाव नहीं होता है। द्वितीयक समूह में सम्बन्ध स्थापित करने के लिए आडम्बर या कृत्रिमता का आश्रय लिया जाता है।इनमें प्राथमिक सम्बन्धों (जो कि आमने-सामने के सम्बन्ध हैं) के विपरीत, सम्बन्ध अप्रत्यक्ष अथवा दूर-संचार के माध्यम से होते हैं।
5. दायित्व प्राथमिक समूहों में दायित्व की कोई सीमा नहीं होती है। यह नहीं बताया जा सकता कि माँ अपने पुत्र के प्रति कितने दायित्वों को निभाएगी। द्वितीयक समूहों में सदस्यों का दायित्व सीमित व शर्तों या नियमों के अनुसार होता है।
6. नियमप्राथमिक समूह में किसी प्रकार का लिखित नियम नहीं होता है। ये समूह अनौपचारिक होते हैं। ये अपने सदस्यों पर कोई कानून या शर्त नहीं लगाते हैं। द्वितीयक समूह की प्रकृति औपचारिक है। इसमें अनेक प्रकार के नियम, कानून तथा कार्यविधियों को सदस्यों पर थोपा जाता है और नियम का उल्लंघन करने वालों को औपचारिक दण्ड मिलता है।
7. नियन्त्रणप्राथमिक समूहों में नियन्त्रण की प्रकृति अनौपचारिक होती है। निन्दा व तिरस्कार आदि के द्वारा सदस्यों का व्यवहार नियन्त्रित होता है। द्वितीयक समूहों के नियन्त्रण की प्रकृति औपचारिक होती है। द्वितीयक समूह अपने सदस्यों के व्यवहार पर नियन्त्रण कानून, पुलिस आदि द्वितीयक साधनों की सहायता से करता है।
8. क्षेत्रप्राथमिक समूह प्रत्येक काल व प्रत्येक समाज में पाए जाते हैं। अन्य शब्दों में, ये सार्वभौमिक होते हैं। ये समूह बहुत छोटे क्षेत्र में व्याप्त होते हैं।द्वितीयक समूह सार्वभौमिक नहीं होते हैं। इनका भौगोलिक क्षेत्र अत्यधिक विस्तृत होता है। कोई-कोई द्वितीयक समूह सम्पूर्ण देश में भी फैला हो सकता है।
9. प्रभावप्राथमिक समूह व्यक्ति के विचारों व मनोवृत्तियों को बनाते हैं, अत: इनका प्रभाव सर्वव्यापी होता है।द्वितीयक समूह विशेषीकृत समूह होते हैं और इनका प्रभाव कुछ विशेष क्षेत्रों तक ही सीमित रहता है।
10. व्यक्तित्वप्राथमिक समूह में व्यक्ति के व्यक्तित्व का सम्पूर्ण भाग समूह के सम्पर्क में आता है। इसीलिए प्राथमिक समूह के सदस्य एक-दूसरे के बारे में पूर्णतया परिचित होते हैं। द्वितीयक समूह के सदस्यों में व्यक्तित्व का केवल कुछ भाग ही समूह के सम्पर्क में आता है।
11. कार्यप्राथमिक समूह मनुष्य के व्यक्तित्व का निर्माण करता है या समाजीकरण करता है। कूले के अनुसार, “यह मानव स्वभाव का निर्माण स्थल है।”द्वितीयक समूह व्यक्ति के व्यक्तित्व का विशेषीकरण करते हैं या विशेषीकरण करने वाले समूह हैं।
12. सदस्यताप्राथमिक समूह की सदस्यता अनिवार्य होती है। इसके कारण मनुष्य को अपने परिवार, खेल-समूह तथा पड़ोस में रहना पड़ता है। द्वितीयक समूह की सदस्यता अनिवार्य नहीं है। जब व्यक्ति यह महसूस करता है कि उसे हित विशेष को प्राप्त करना है, तभी वह द्वितीयक समूह का सदस्य बनता है।
13. कार्य क्षेत्रप्राथमिक समूह का कार्य-क्षेत्र सीमित तथा कम होता है।द्वितीयक समूह का कार्य-क्षेत्र अधिक विस्तृत होता है।
14. 'हम' की भावनाप्राथमिक समूह में हम की भावना पाई जाती है तथा व्यक्तियों के सम्बन्ध प्राथमिक होते हैं। द्वितीयक समूह में किसी प्रकार की हम की भावना नहीं पाई जाती है तथा सम्बन्ध गौण होते हैं।
15. व्यक्तिगत एवं सामूहिक हितप्राथमिक समूह समष्टिवादी होते हैं। इसी कारण सदस्यों के व्यक्तिगत हित सामूहिक हित में विलीन हो जाते हैं। द्वितीयक समूह व्यक्तिवादी होते हैं। इनमें सामूहिक हितों की अपेक्षा व्यक्तिगत हितों को अधिक महत्त्व दिया जाता है।


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