Wednesday, 4 May 2022

बहुसांस्कृतिक भारतीय समाज

बहुसांस्कृतिक भारतीय समाज 

बहुसांस्कृतिकता : बहुसांस्कृतिक से तात्पर्य सांस्कृतिक विविधता अथवा सांस्कृतिक बहुलता से है । दूसरे शब्दों में एक ही साथ सभी संस्कृतियों का सम्मान करना तथा संवैधानिक रूप से उन्हें बराबर का स्थान देना बहुसांस्कृतिकता का आधार है। कोई भी देश तभी बहुसांस्कृतिक कहलाता है, जब वह अपने यहां उपस्थित लगभग सभी संस्कृतियों को समान महत्व देता है अर्थात् कोई भी एक संस्कृति किसी अन्य पर हावी न हो, और न ही उसके विशालकाय स्वरूप में तथाकथित छोटी संस्कृतियाँ लुप्त हो जाएँ।

स्पष्ट तौर पर कहा जा सकता है कि बहुसांस्कृतिक राष्ट्र वह है जिसकी सीमा में सभी उपलब्ध संस्कृतियाँ अपने पूर्ण अस्तित्व के साथ बनी रहती हैं। समाज में सांस्कृतिक बहुलता एक ऐसे व्यवस्था की ओर ईशारा है जहां विभिन्न विश्वास, धर्म और भाषा आदि के लोग एक साथ रहते हैं।

पिछले कुछ दशकों में यह बहुसांस्कृतिकता एक राजनीतिक विचार बन कर उभरी है, बहुसांस्कृतिकवाद कहा जाता है । 'व्हाट इज़ मल्टीकल्चरलिज्म' नामक शीर्षक में भीखू पारेख ने बहुसांस्कृतिकवाद को एक दार्शनिक सम्प्रदाय या कार्यक्रमोन्मुख राजनीतिकसिद्धान्त मानने की बजाय मानव जीवन को देखने का एक तरीका या नज़रिया बताया है । बहुसांस्कृतिकवाद कोई निर्विवाद विचार नहीं है । आज अगर राष्ट्र इसे राजकीय नीति के तौर पर स्वीकार करते हैं और अलग-अलग सांस्कृतिक पहचानों की विशिष्टता को मान्यता देते हैं, तो दूसरी ओर कई हल्कों में कई कोणों से इसका विरोध भी किया जाता है।

बहुसांस्कृतिक भारतीय समाज 

भारतीय सन्दर्भ में बहुसांस्कृतिकता धार्मिक बहुलता तथा एक व्यापक सामाजिक-सांस्कृतिक इतिहास लेखन नामक दो भिन्न धाराओं से प्रतिबिम्बित होती है । मुख्य रूप से हिन्दु, मुसलमान, ईसाई, सिख, बौद्ध, जैन, पारसी जनसंख्याओं के साथ भारत विश्व में सर्वाधिक विविध धर्मी देश है।बहुसांस्कृतिकता के अन्तर्गत केवल 'संस्कृति' और 'सांस्कृतिक समूह' को ही मान्यता नही देनी चाहिये अपितु इस दायरे में धर्म, भाषा, वर्ण, राष्ट्रीयता और नस्ल से सम्बन्धित तथ्यों का भी महत्व है।

भारत की सांस्कृतिक बहुलता कोई नवीन प्रक्रिया नहीं है । इसकी विशाल ऐतिहासिकता है। भारतीय संस्कृति अत्यन्त प्रचीन है और विभिन्न लोगों के बीच संवाद और सम्पर्क परिणाम है । इस प्रकार भारतीय संस्कृति ऐसी संस्कृति रही जिसने उन सभी तत्त्वों को आत्मसात करने का प्रयास किया जो इसके संपर्क में आये । इस आत्मसात करने की भारतीय परम्परा को हम हड़प्पा काल से देख रहें हैं।

सिंधु सभ्यता के मृदभांडों और सील का मेसोपोटामिया शहरों में पाया जाना और सिंधु सभ्यता के लोथल से मिले पोतगाह स्थापित करते हैं कि हड़प्पावासियों के बाहरी लोगों से सम्पर्क थे। हड़प्पाई लोगों के धार्मिक विश्वासों के साक्ष्य भी हमें प्राप्त होते हैं जिनसे पता चलता है कि प्रकृति-पूजा भी होती थी। एक हड़प्पाई सील में लोगों को पीपल वृक्ष के समक्ष खड़े हुए और पूजा करते हुए दिखाया गया है। यह परम्परा पीपल के वृक्ष की पूजा के रूप में आज भी जारी है।

भारत अनेक भाषाओं और संस्कृतियों की भूमि है। यहां प्राचीनकाल से भाषिक और सांस्कृतिक जड़ों की विपुल धाराएं पाई जाती हैं। लोगों के खान-पान, वेशभूषा, धार्मिक व सांस्कृतिक मान्यताएँ, सामाजिक मानदण्ड और समाज द्वारा अपनी कही व प्रयोग की जाने वाली ये मान्यताएँ क्षेत्रीय सीमाओं के पार फैलते बहुविध सांस्कृतिक रिवाजों के अन्तर्गत आती हैं।

बहुसांस्कृतिकता के घटक तत्व

  1. भौगोलिक विविधता
  2. प्रजातीय विविधता
  3. भाषा सम्बन्धी बहुलता
  4. धार्मिक विविधता
  5. जातीय विविधता
  6. अनेकता में एकता

भौगोलिक विविधता : 3,287,263 वर्ग किलोमीटर के क्षेत्रफल के साथ भारत एक विशाल देश है जहाँ वृहत भौगोलिक विविधता है। यहाँ मरुस्थल, वन, बर्फ आच्छादित पहाड़, लंबी तट रेखा और उपजाऊ मैदान हैं। भारत की जलवायु क्षेत्रों के अनुसार बदलती रहती है। मानसून का भी भारतीय जलवायु पर प्रभाव है। भारत में कई क्षेत्रों में अधिक वर्ष तो कहीं कम वर्ष है।

प्रजातीय विविधता : प्रजाति से तात्पर्य ऐसे लोगों के समूह से है जिनके शारीरिक लक्षण जैसे नाक, रंग, बालों के प्रकार, चर्मादि अन्य लोगों से भिन्न होते हैं। भारत में अपनी प्रजातीय विविधता के कारण एक नृजाति विज्ञान संबंधी संग्रहालय बन गया है। एच.एच. रिस्ले ने भारत की जनसंख्या को 7 प्रजातीय रूप में विभाजित किया- तुर्की-ईरानी, इंडो आर्य, शक द्रविड़, आर्य-द्रविड़, मंगोल द्रविड़, मंगोलोइड और द्रविड़ । इस प्रकार भारत एक विविध प्रजातीय जनसंख्या वाला देश है जो इसकी सांस्कृतिक विविधता में रंग जोड़ देता है।

भाषा सम्बन्धी बहुलता : भारत अनेक भाषाओं और बोलियों का देश है। भारतीय संविधान के 8वें श्ड्यूल में 22 भाषाओं को स्वीकृति दी गयी है- आसामी, बंगाली, गुजराती, हिंदी, कन्नड़, कश्मीरी, कोंकणी, मलयालम, मणिपुरी, मराठी, नेपाली, उड़िया, पंजाबी, संस्कृत, तमिल, तेलुगु, उर्दू, सिंधी, संस्थाली, बोड़ो, मैथिली और डोगरी। देवनागरी लिपि में लिखी जाने वाली हिंदी भारत की भाषा है।

परंतु भारत में सैकड़ो की संख्या में बोली जाने वाली बोलियाँ हैं। भारत की यह भाषायी विविधता बड़े ही प्रभावशाली रूप में हिंदी की एक उक्ति में उजागर होती है- “कोस कोस पर बदले पानी, चार कोस पर बानी" । इसका यह अर्थ है कि जहाँ भारत में एक एक कोस पर पानी का स्वाद बदलने लगता है वहीं हर चार कोस के उपरांत लोगों की बोली में भी बदलाव आने लगता है। अतः भाषाओं की बहुलता से देश में सांस्कृतिक बहुलता स्थापित होती है।

धार्मिक विविधता : भारतीय संस्कृति का एक विशिष्ट लक्षण इसकी धार्मिक विविधता है। भारत लगभग सभी धर्मों का देश है । 2011 की गणना के अनुसार धार्मिक समुदायों की प्रतिशत में जनसंख्या इस प्रकार है- हिंदू79.80%, मुस्लिम-14.23%, ईसाई-2.3%, सिख-1.72%, बौद्ध-0.70%, जैन-0.37% तथा अन्य0.66% । अतः धार्मिक विविधता से देश में सांस्कृतिक बहुलता देखी जा सकती है।

जातीय विविधता : समाज में ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य और शूद्र पर आधारित चार वर्गीय विभाजन का परिणाम कई जातियों के रूप में हुआ । विभाजन का यह स्वरूप ऋग्वेद के दशम मण्डल में वर्णित हैं । आज भारत में अनेक जातियाँ हैं और जाति से तात्पर्य एक ऐसे अनुवांशिक समूह से है जो एक विशेष पारंपरिक व्यवसाय का अनुसरण करता है।

अनेकता में एकता : भारतीय संस्कृति की विशिष्टता इसकी अनेकता में एकता है। भारत की सांस्कृतिक विरासत यह दर्शाती है कि कई प्रकार के अंतरों के बावजूद भारत में एकता का एक ऐसा सूत्र है जो सभी भारतीयों को आपस में बाँधता है।

उपसंहार : उपरोक्त वर्णन से यह स्पष्ट होता है कि सांस्कृतिक बहुलता भारत के अस्तित्त्व का आधार है। आर्यों के उपरान्त, यूनानी, शक, कुषाण, हुण, अरबवासी, ईरानी, तुर्की, मंगोल और यूरोपवासी भिन्न समय पर भारत आये। ये लोग अपने साथ अपनी सांस्कृतिक परम्पराएँ लाये जो कालांतर में भारतीय जीवन शैली में समाहित होती गई। जिससे भारतीय संस्कृति में विविधता आई।


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