अंतः समूह और बाह्य समूह से आप क्या समझते हैं ?

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अंतः समूह और बाह्य समूह से आप क्या समझते हैं ?

    अंतः समूह किसे कहते हैं लिखिए

    अन्तःसमूह (In-group)-जिन समूहों के साथ कोई व्यक्ति पूर्ण एकात्मकता या तादात्म्य स्थापित करता है उन्हें उसका अन्त:समूह कहा जाता है। अन्त:समूह के सदस्यों के मध्य अपनत्व की भावना पाई जाती है। वे अन्तःसमूह के सुख को अपना सुख तथा दुःख को अपना दुःख मानते हैं। समूह का अस्तित्व सदस्य स्वयं का अस्तित्व मान लेते हैं। दूसरे शब्दों में इस प्रकार के समूह में 'हम की भावना' (We feeling) पाई जाती है। प्रत्येक सदस्य एक-दूसरे से भावात्मक सम्बन्धों द्वारा बंधा होता है। प्रेम, स्नेह, त्याग और सहानुभूति का भाव स्पष्ट रूप से सदस्यों के मध्य दृष्टिगोचर होता है। अधिकांश व्यक्तियों के लिए परिवार अन्तःसमूह का एक चिरपरिचित उदाहरण है। अपना गाँव, जाति, धार्मिक सम्प्रदाय, राष्ट्र आदि अन्त:समूह के अन्य उदाहरण हैं। प्रत्येक व्यक्ति का राष्ट्र उसका अन्त:समूह है। वह अपने देश की प्रशंसा उसकी प्रगति से प्रारम्भ करता है। इसके विपरीत देश की अवनति या बुराई से उसे दु:ख होता है। ठीक इसी प्रकार पड़ोस या जिस शिक्षण संस्था का वह सदस्य है, वह व्यक्ति का अन्त:समूह होता है। वह उस अन्त:समूह से विशेष लगाव व स्नेह रखता है तथा ठीक वैसे ही कार्य करता है, जैसे कि समूह की इच्छा होती है। अत: अन्त:समूह, सदस्यों की दृष्टि में उसका अपना समूह होता है। उसके साथ सदस्य अपना तादात्म्य स्थापित करते हैं। अन्त:समूह प्राथमिक भी हो सकते हैं, द्वितीयक भी, वे स्थायी भी हो सकते हैं तथा अस्थायी भी।

    बाह्य समूह किसे कहते हैं ?

    बाह्य समूह (Out-group)-कोई व्यक्ति बाह्य समूह का उल्लेख अपने अन्त:समूह के सन्दर्भ में करता है। बाह्य समूहों के लिए वह 'वे' या 'अन्य' जैसे शब्दों का प्रयोग करता है। बाह्य समूह में जो गुण पाए जाते हैं वे अन्त:समूह से विपरीत होते हैं। इसमें इस तरह की भावना होती है व्यक्ति इसे दूसरों का समूह समझता है। इसी कारण बाह्य समूह के प्रति सहयोग, सहानुभूति, स्नेह आदि का सर्वथा अभाव होता है। उसके स्थान पर बाह्य समूह के प्रति दूरी या अलगाव, खिन्नता, घृणा, प्रतिस्पर्धा, पक्षपातपूर्ण भावना रहती है। यह भावना यदा-कदा शत्रुता या वैर के रूप में भी हो सकती है। उदाहरण के लिए, हम इस पड़ोस के सदस्य हैं लेकिन, 'वो' पड़ोस बहुत भ्रष्ट और गन्दा है। वहाँ के रहने वाले जानवर से भी गए-गुजरे हैं। इसमें 'वो' समूह एक बाह्य समूह है। शत्रु सेना, विदेशी समूह, प्रतिस्पर्धा करने वाले समूह आदि बाह्यसमूह के ही प्रमुख उदाहरण हैं।

    प्रश्न - अन्तः समूह और बाह्य समूह की अवधारणा किसने दी ?

    उत्तर - समूह के सदस्यों में घनिष्ठता व सामाजिक दूरी के आधार पर समनर ने अन्तः समूह और बाह्य समूह की अवधारणा किसने दी। समनर ने समस्त समूहों को समूह और बाह्य समूह दो प्रकारों में वर्गीकृत किया है

    अन्तः समूह और बाह्य समूह में अंतर

    संख्या  प्राथमिक समूहद्वितीयक समूह
    1.अन्त:समूह को व्यक्ति अपना समूह मानता है अर्थात् इसके सदस्यों में अपनत्व की भावना पाई जाती है।बाह्यसमूह को व्यक्ति पराया समूह मानता है अर्थात् इसके सदस्यों के प्रति अपनत्व की भावना का अभाव पाया जाता है।
    2.अन्त:समूह के सदस्यों में 'हम की भावना' पाई जाती हैं।उनमें बाह्यसमूह के सदस्यों के प्रति विरोधपूर्ण भावनाएँ पाई जाती हैं।
    3.अन्त:समूह के सदस्यों में पाए जाने वाले सम्बन्ध घनिष्ठ होते है।बाह्यसमूह के सदस्यों के प्रति घनिष्ठता नहीं पाई जाती है।
    4.अन्त:समूह के सदस्य अपने समूह के दु:खों एवं सुखों को अपना दु:ख एवं सुख मानते है।बाह्यसमूह के प्रति इस प्रकार की भावना का अभाव होता है।
    5.अन्त:समूह के सदस्य प्रेम, स्नेह, त्याग व सहानुभूति के भावों से जुड़े होते हैं।बाह्यसमूह के प्रति द्वेष, घृणा, प्रतिस्पर्धा एवं पक्षपात के भाव पाए जाते हैं।
    6.अन्त:समूह के सदस्यों में अपने समूह के कल्याण के सामने व्यक्तिगत हितों की शिथिलता पाई जाती है। बाह्यसमूह के सदस्यों के प्रति सन्देह, घृणा एवं भेदभाव पाया जाता है।
    7.अन्तःसमूह का आकार तुलनात्मक रूप में छोटा होता है।बाह्यसमूह का आकार तुलनात्मक रूप से बड़ा होता है।
    8.अन्तःसमूह का लक्षण 'सामान्य हित' है। बाह्यसमूह का 'हितों में संघर्ष' है। 

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