मृत्यु पर निबंध - Essay on Death in Hindi

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मृत्यु पर निबंध - Essay on Death in Hindi

मृत्यु पर निबंध : भौतिक दृष्टि से मृत्यु का आशय इस शरीर की नश्वरता से है जिसका सजीव जन्म हुआ था। इसमें व्यक्ति विशेष में निहित जीवन शक्ति का अन्त हो जाता है। इस तरह मृत्यु जीवन शक्ति की समाप्ति का सूचक है। इसमें जन्म के समय से काम कर रहे सभी प्रमुख अंगो में स्पन्दन बन्द हो जाता है। मृत्यु शाश्वत् सत्य है। स्वास्थ्य सेवाएँ, जीवन स्तर, औषधि विज्ञान, वैज्ञानिक प्रगति, चिकित्सा विज्ञान चाहे कितनी भी उन्नति क्यों न कर लें मृत्यु को सुविधाओं के आधार पर समय में परिवर्तन तो ला सकते हैं लेकिन मृत्यु को रोक नहीं सकते। इस आधार पर कहा जा सकता है कि मृत्यु शून्य नहीं हो सकती क्योंकि जिसका जन्म हुआ है उसकी मृत्यु ध्रुव सत्य है। इस तरह मृत्युक्रम का प्रमुख कार्य जनसंख्या आकार को घटाना तथा प्रजननशीलता का प्रमुख कार्य इस कमी की क्षतिपूर्ति करना है। यह सृष्टि का सृजन, पालन एवं संहार का नियमित कार्य है इसमें कोई रूकावट संभव नहीं है। 

मृत्यु सामाजिक परिवर्तन का वाहक होती है। जैसे ही अगली पीढ़ी के हाथ में व्यवस्था आती है वह सामाजिक ताने-बाने में अपने अनुसार आमूल-चूल परिवर्तन लाने का भरसक प्रयत्न करता है। इस तरह विकास एवं विनाश की प्रक्रिया सतत् चलती रहती है।

मृत्युक्रम की कुछ सामान्य विशेषताएं

  1. सामान्य रूप से मृत्युक्रम और मृत्यु का प्रयोग समानार्थक रूप में किया जाता है। 
  2. मृत्यु सत्य और अवश्यसंभावी है। यद्यपि समय की अनिश्चितता बनी रहती है। 
  3. मृत्यु एक अनैच्छिक घटना है। इस पर मानव का नियंत्रण नहीं रहता है। 
  4. ऊँची मृत्यु-दर अर्थ व्यवस्था के अविकसित अवस्था का प्रतीक होता है। 
  5. जनसंख्या वृद्धि में मृत्युक्रम महत्वपूर्ण भूमिका का निर्वाह करती है। किसी देश में जनसंख्या वृद्धि का कारण जन्म-दर में वृद्धि न होकर, मृत्यु-दर में कमी होना भी हो सकता है। 

मृत्यु के विभिन्न कारण 

  1. कुपोषण
  2. बीमारियाँ
  3. पर्यावरण सम्बन्धी दशाएँ
  4. चिकित्सकीय सुविधाओं का अभाव 
  5. सामाजिक एवं आर्थिक कारक
  6. दुर्घटनाएँ

कुपोषण (Malnutrition) : विश्व में मृत्यु एवं अस्वस्थता का सबसे प्रमुख कारण कुपोषण है। गरीब एवं आर्थिक दृष्टि से पिछड़े देशों में कुपोषण की समस्या व्यापक स्तर से विद्यमान है। Food and Agricultural Organisation की रिपोर्ट्स के अनुसार विश्व में लगभग 400 मिलियन लोग कुपोषण के शिकार हैं जिनमें 300 मिलियन लोग दक्षिणी एशिया में ही निवास करते हैं। भारत में इनकी संख्या लगभग 220 मिलियन है। अनुमान है कि 5 वर्ष से कम आयु के बच्चों की होने वाली मृत्यु में लगभग 50% मृत्यु प्रोटीन की कमी से होती है। कुपोषण प्रायः गरीबी, भोजन सम्बन्धी आदतों, सामाजिक एवं धार्मिक रूढ़ियों, अज्ञानता, दुर्व्यसन तथा प्रदूषण व मिलावटों के फलस्वरूप मनुष्यकृत रोग है। 

बीमारियाँ (Diseases) : कुपोषण से मनुष्य की रोग प्रतिरोधक शक्ति कमजोर हो जाती है फलतः जैसे ही बीमारियों के घेरे में आता है शरीर में तत्काल क्षरण तदुपरान्त मृत्यु की ओर मनुष्य जाने लगता है। सामाजिक, आर्थिक, पर्यावरण एवं जलवायु तथा संक्रामकता बीमारियों के बढ़ने के प्रमुख कारण हैं। संयुक्त राष्ट्र संघ की संस्था विश्व स्वास्थ्य संगठन ने लगभग एक हजार प्रकार की बीमारियों को पांच समूहों में वर्णित किया है जिसे निम्न रूपों में आप जान सकते हैं। इन्हीं के आधार पर विश्व में आंकड़े भी इकट्ठे किये जाते हैं -

  • समूह 1 - संक्रमण, पराश्रयी तथा श्वास सम्बन्धी बीमारियाँ 
  • समूह 2 - कैंसर 
  • समूह 3 - परिवहन तंत्रीय बीमारियाँ 
  • समूह 4 - हिंसा से मृत्यु 
  • समूह 5 - अन्य उदर सम्बन्धी अथवा आन्तरिक बीमारियाँ जैसे – वायु विकार, मधुमेह इत्यादि। 

पर्यावरण सम्बन्धी दशाएँ (Environmental Conditions): पर्यावरण सम्बन्धी दशाओं के अन्तर्गत आवासीय व्यवस्था, पेय जल, वाय. मल विसर्जन. साफ-सफाई, सीवर लाइन, कूड़ा सफाई, मिलावट, प्रदूषण आदि को सम्मिलित किया जाता है। वर्तमान समय में जल, वायु, एवं ध्वनि प्रदूषण पूरे विश्व के पर्यावरण को असंतुलित कर रहा है। विश्व स्वास्थ्य संगठन के अनुसार भारत में मात्र 85% शहरी तथा केवल ग्रामीणों को ही सुरक्षित पेयजल उपलब्ध है। शहरीकरण, औद्योगीकरण, टेनरियों की संख्या में बढ़ोत्तरी, कल-कारखानों के द्वारा कचरों का जल में बहाव नदियों के जल को गंभीर रूप से प्रदूषित करता जा रहा है। शहरों का पानी बढ़ते ऑरसैनिक जहर के कारण पेयजल योग्य नहीं रह गया है। संक्रामक रोगों का और विस्तार हुआ है। आवासीय कालोनियों में गन्दी दशाओं के कारण ही टी0बी0, डिप्थीरिया, काली खांसी, एवं मलेरिया रोगियों की संख्या में तेजी से वृद्धि हुई है। 

दुर्घटनाएँ (Accidents): बढती दुर्घटनाओं के कारण मृत्यु की संख्या में तेजी से वृद्धि हुई है। ये दुर्घटनाएँ मानव जनित या प्रकृति जनित दोनों हो सकती है। ट्रेनों का लड़ना, हवाई जहाजों का क्रैश होना, पहाड़ों पर बादल फटना, फोर लेन पर गाड़ियों की टक्कर, आंतकवादी घटनाएँ, भीड़ भाड़ के इलाके में बम विस्फोट, युद्ध या लड़ाईयाँ, घात लगाकर सैनिकों-सिपाहियों को हत करना, सूखा, बाढ़, अकाल, आपदा, आगजनी एवं सूनामी प्रकृति जन्य एवं मानव जन्य दुर्घटनाओं के मिश्रित उदाहरण हैं। 

चिकित्सीय सुविधाओं की कमी: विज्ञान, प्रौद्योगिकी एवं चिकित्सा जगत् में क्रान्ति के बावजूद आज भी निर्धन एवं अविकसित देशों में चिकित्सकीय सुविधाओं की कमी है। जो कुछ भी सुविधाएँ हैं वह समाज के उच्च वर्ग को सुलभ है। गरीबों को यह सुविधा सहज सुलभ नहीं है। जहाँ अधिक जनसंख्या निवास करती है अभी भी गाँवों में बीमारियों, कुपोषण, स्वास्थ्य सुविधाओं का दबाव है। 

सामाजिक एवं आर्थिक कारक (Socio-Economic Factors) :  किसी भी देश व समाज में व्याप्त सामाजिक एवं आर्थिक व्यवस्था मृत्यु की सीधे प्रभावित करते है। यथा - गरीबी, अशिक्षा, बेरोजगारी, ऋणग्रस्तता, पर्दा प्रथा, विवाह पद्धति, ऑनर किलिंग, प्रसव पद्धति, शिशु पालन, धार्मिक तथा सामाजिक रीति-रिवाज प्रमुख कारक हैं जिनके कारण मृत्यु-दर प्रभावित होती है व जनसंख्या वृद्धि-दर प्रभावित होती है। 

इस प्रकार मृत्युक्रम के विभिन्न निर्धारक तत्वों का अध्ययन कर अब आप जान चुके हैं कि कुपोषण, बीमारियाँ, पर्यावरण सम्बन्धी दशाएँ, दुर्घटनाएँ, चिकित्सा सुविधाओं की कमी, मृत्यु-दर का निर्धारण कितना करते हैं और आपस में ये कारण कितना अन्तर्निर्भर करते हैं।

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