Monday, 4 April 2022

औपनिवेशिक भारत में स्त्रियों की दशा का वर्णन करें।

औपनिवेशिक भारत में स्त्रियों की दशा का वर्णन करें।

औपनिवेशिक भारत में अर्थात भारत में ब्रिटिश राज की स्थापना होने तक स्त्रियों की हालत दयनीय हो चुकी थी। नारी भ्रूण हत्या, सती, बाल विवाह, स्त्रियों की शिक्षा पर प्रतिबन्ध, बहुपति प्रथा और विधवा-पुनर्विवाह-निषेध जैसी अनेक सामाजिक बुराइयाँ बहुत तेजी से बढ़ रही थीं। स्त्रियाँ सशक्तिकरण से दूर रखी गयी थीं। लगभग 200 वर्षों तक ब्रिटिश सरकार ने भारत के लोगों की धार्मिक और सामाजिक स्थिति में अपनी तटस्थ नीति के अनुसार, कोई हस्तक्षेप नहीं किया। लेकिन जब उनकी स्थिति सुदृढ़ हो गयी तब ब्रिटिश राज न उन सजग भारतीय सामाजिक कार्यकर्ताओं के प्रयासों को सकारात्मक प्रोत्साहन देना प्रारंभ कर दिया जिन्होंने ऐसे आन्दोलन चलाये जो स्त्रियों को बुराइयों के शिकंजे से बाहर निकाल सकें। 1829 और 1947 के बीच के युग में कई कानून बनाये गये जिनका लक्ष्य सामाजिक कुरीतियों से स्त्री को मुक्त करना था। भारतीय समाज सुधारकों को अनेक कठिनाइयों और सामाजिक विरोधों का सामना करना पड़ा। परिवर्तन के विरोधी समाज ने सती प्रथा रोकने और विधवा विवाह इतनी आसानी से स्वीकार नहीं किया। 1829 में सती प्रथा पर पाबन्दी लगायी गयी फिर भी सती प्रथा चलती रही। यद्यपि कानून के रूप में सती प्रथा पर 1829 में पाबन्दी लगा दी गयी थी फिर भी 2002 तक हमें सती होने के प्रमाण मिलते रहे हैं। सती जैसी अमानवीय प्रथा 21 वीं शताब्दी तक चलती रही है जब कि विज्ञान, प्रौद्योगिकी आदि में बहुत बड़ा परिवर्तन आ चुका है तो आप अनुमान लगाएँ कि एक सौ पचहत्तर वर्षों पहले नारी-मुक्ति का यह कार्य कितना प्रबल संघर्षपूर्ण रहा होगा।

औपनिवेशिक भारत में स्त्रियों की दशा का वर्णन करें।

विधवा पुनर्विवाह : विधवा पुनर्विवाह स्त्रियों की मुक्ति का एक बहुत बड़ा कदम रहा है। यद्यपि सती पर प्रतिबन्ध थोड़ा बहुत प्रभावशाली रहा पर विधवा पुनर्विवाह अधिनियम, 1856 सामाजिक विरोधों के कारण प्रभावशाली ढंग से नहीं लागू हो सका जो नारी-मुक्ति के संघर्ष में निश्चित ही एक महत्वपूर्ण उपलब्धि थी। सती पर रोक और विधवा पुनर्विवाह अधिनियम के बाद ऐसा वातावरण बन गया जो स्त्री मुक्ति की तरफ ले जा सके।

बाल विवाह : नारी मुक्ति में सबसे बड़ी कठिनाई बाल विवाह था। बाल विवाह निषेध, 1929 ने लड़की के विवाह की न्यूनतम आयु 14 वर्ष व लड़के की 18 वर्ष निर्धारित की। यद्यपि लड़की के लिये 14 वर्ष की उम्र निर्धारित सही नहीं थी। वास्तव में 14 वर्ष की उम्र ऐसी है जो लड़की के स्कूल जाने की उम्र है। अतः विवाह की उम्र को बढ़ाना आवश्यक हो गया। जब विवाह की उम्र को बढ़ा दिया गया तब लड़कियाँ स्कूल जाने लगी। देखा जाय तो बाल विवाह निषेध अधिनियम, 1929 स्त्रियों की मुक्ति का पहला अधिनियम था जो आजादी से पहले पारित किया गया और जिसने मुक्ति को संभव बना दिया।

स्त्री शिक्षा : 19 वीं शताब्दी के अधिकांश समाज सुधारकों ने स्त्री शिक्षा पर बहुत जोर दिया। ये सुधारक यह मानकर चले कि स्त्रियों को मुक्त करने के लिये शिक्षा अत्यधिक आवश्यक उपकरण है। स्कूलों का खुलना, विशेष करके लड़कियों के लिये, स्त्री मुक्ति की तरफ एक महत्वपूर्ण कदम रहा है। जब स्त्रियों को यह अवसर मिल गया कि वे घर से बाहर जाने लगी और बाहरी दुनियाँ से उनका सम्पर्क जुड़ गया तब वे अशिक्षा के बंधन से मुक्त हो गयीं। यद्यपि कट्टर माता-पिता वास्तव में अपनी लड़कियों को स्कूल भेजने के लिये राजी नहीं थे। फिर भी शिक्षा ने एक ऐसा वातावरण पैदा कर दिया जहाँ स्त्री मुक्ति की दिशा स्पष्ट रूप से दिखायी देने लगी।

19वीं शताब्दी का समाज सुधार आंदोलन और 20 वीं शताब्दी के प्रारंभ में किए गए यूरोप और उत्तरी अमेरिका के प्रयत्नों ने भारत में ताकतवर महिला आंदोलन की जड़ों को मजबूत किया। यूरोप और उत्तरी अमेरीका के 19 वीं शताब्दी के महिला आंदोलनों ने भारतीय महिला आंदोलन को मजबूत आधार प्रदान किया। आजादी के आन्दोलन ने लोगों में ऐसी चेतना, तथा वातावरण पैदा किया कि स्त्रियाँ घरों से बाहर आ गईं और अपने अधिकारों के लिये तैयार हो गयी। इस नारी-मुक्ति आंदोलन के दो मुख्य उद्देश्य थे। पहला तो देश की आजादी और दूसरा दमनकारी सामाजिक रीतिरिवाजों को समाप्त करना। पहले पहल पुरुषों ने स्त्रियों को समान अधिकार देने के लिये पेशकश की और फिर यह महिला आंदोलन औरतों के हाथ में आ गया। ई. 1880-1930 के बीच में सारे देश में स्त्री आंदोलन उभर कर आया। जब हिन्दुस्तान को आजादी मिल गयी तब देश एक ऐसी अवस्था में आ गया जहाँ यह आंदोलन मजबूत हो गया।


SHARE THIS

Author:

I am writing to express my concern over the Hindi Language. I have iven my views and thoughts about Hindi Language. Hindivyakran.com contains a large number of hindi litracy articles.

0 comments: