Thursday, 21 April 2022

आधुनिक समय में जाति व्यवस्था में क्या परिवर्तन हुए हैं ?

आधुनिक समय में जाति व्यवस्था में क्या परिवर्तन हुए हैं ?

जाति व्यवस्था में आधुनिक परिवर्तन

  1. समाज के खंडात्मक विभाजन में परिवर्तन
  2. जातीय संस्तरण में परिवर्तन 
  3. जाति सदस्यता में परिवर्तन 
  4. विवाह संबंधी प्रतिबंधों में शिथिलता 
  5. व्यवसाय के चुनाव में स्वतंत्रता 
  6. जातियों के बदलते हुए सम्बन्ध 
  7. ब्राह्मणों की स्थिति में गिरावट
  8. जातीय समितियों का निर्माण
  9. भोजन सम्बन्धी प्रतिबन्धों में परिर्वतन 
  10. जन्म के महत्व में कमी 
  11. अस्पृश्य जातियों के अधिकारों में वृद्धि
  12. विवाह सम्बन्धी प्रतिबन्धों में परिवर्तन

1. समाज के खंडात्मक विभाजन में परिवर्तन - जाति की एक जानी मानी विशेषता समाज का कई खंडों में विभाजन है। प्रत्येक खंड के सदस्यों के निश्चित पद व कार्य होते हैं। इनके प्रति सदस्य निष्ठा दिखाते हैं। अब जातीय संकीर्णता व सीमाओं के ऊपर सदस्य उठ रहे हैं तथा खंडात्मक विभाजन की सीमायें अब ढहने लगी हैं।

2. जातीय संस्तरण में परिवर्तन - जाति के आधार पर समाज विभिन्न स्तरों में बंटा है। इस ऊँच-नीच के संस्तरण में ब्राह्मणों को सर्वोच्च पद तथा शूद्रों को निम्नतम स्थिति प्राप्त है। अब ब्राह्मणों की उच्च स्थिति में क्षरण हुआ है तथा शूद्रों की स्थिति में सुधार । स्थिति निर्धारण में जाति के अलावा धन, शिक्षा, व्यक्तिगत गुणों व धर्मनिरपेक्षता का महत्व बढ़ा है।

3. जाति सदस्यता में परिवर्तन - जाति की सदस्यता जन्म से मिलती है और उसमें परिवर्तन सम्भव नहीं, किन्तु आज धन, सत्ता व शहरी भीड़भाड़ से लाभ उठाकर जाति बदलने व छिपाने का फैशन है, किन्तु यह प्रवृत्ति तेज नहीं हो पाई है, क्योंकि अनुसूचित जातियों के सामने सुविधाओं, संरक्षणों व अवसरों के अनेक प्रलोभन हैं।

4. विवाह संबंधी प्रतिबंधों में शिथिलता - जाति का आधार व आदर्श जाति अन्तःविवाह है। इससे संबंधित नियम और निषेधों में परिवर्तन हुए हैं। नये विधानों, साथ-साथ काम करने व पुरस्कारों व प्रमाण-पत्रों से अन्तःजातीय, अन्तःधर्मी विवाहों को प्रोत्साहन मिला है। धर्म, प्रथा-परम्पराओं का शिकंजा ढीला हुआ है।

5. व्यवसाय के चुनाव में स्वतंत्रता - जाति व पेशे में घनिष्ठ संबंध है। उनकी ऊंचाई-निचाई भी धर्म से निर्धारित थी। उसका स्थान धन व सत्ता ने ले लिया है। लाभकर पेशों के प्रति सभी का आकर्षण बढ़ा है अब पेशों पर किसी जाति का एकाधिकार नहीं रहा सम्पूर्ण जातियाँ किसी भी व्यवसाय के अपनाने व छोड़ने में स्वतंत्र हैं। दक्षिण भारत में अनेक हरिजनों को पुरोहिताई, रेलवे में पानी पिलाने का काम भी निम्न जातियों को मिला है। यह सामाजिक क्रांति है।

6. जातियों के बदलते हुए सम्बन्ध - वर्तमान में जातियों के पारस्परिक संबंधों में परिवर्तन आया है। पहले दो जातियों के बीच जजमानी सम्बन्ध पाये जाते थे और एक जाति दूसरी जाति की अपने व्यवसाय द्वारा सेवा करती थी। अब जजमानी सम्बन्ध टूटे हैं तथा राजनीतिक शक्ति को लेकर उनमें टकराव होने लगा है। शक्ति के नवीन समीकरण पनपे हैं, सत्ता अब प्रभु जाति एवं उच्च जातियों के हाथ से निम्न एवं बहुसंख्यक जातियों के हाथ में आयी है। यह बात पंचायतों के चुनावों से स्पष्ट है।

7. ब्राह्मणों की स्थिति में गिरावट - जाति प्रथा के अन्तर्गत सामाजिक, धार्मिक, आर्थिक तथा राजनीतिक क्षेत्र में ब्राह्मणों का एकाधिकार एवं प्रभुत्व रहा है, किन्तु वर्तमान में व्यक्तिगत गुणों एवं धन का महत्व बढ़ जाने के कारण निम्न जातियों के व्यक्ति भी शिक्षा ग्रहण कर, धन संचय कर एवं चुनाव में विजय प्राप्त कर अपनी सामाजिक, आर्थिक एवं राजनीतिक स्थिति को ऊँचा उठाने में सफल हुए हैं। यहाँ तक कि कई बार तो ब्राह्मणों को निम्न जातियों के अधिकारियों के अधीन कार्य करना पड़ता है। धार्मिक क्रियाओं एवं पूजा पाठ का महत्व घटने के कारण भी ब्राह्मणों की परम्परागत प्रभुत्ता को ठेस पहुंची है।

8. जातीय समितियों का निर्माण - विभिन्न जातियों ने वर्तमान में अपने प्रान्तीय एवं राष्ट्रीय स्तर के संगठन बनाये हैं जो अपने जातीय हितों की रक्षा करते हैं। ये जातीय समितियाँ जाति को सामाजिक एवं राजनीतिक गतिशीलता तथा शक्ति प्रदान करने एवं आर्थिक लाभ पहुँचाने का कार्य करती हैं।

9. भोजन सम्बन्धी प्रतिबन्धों में परिर्वतन - परम्परागत जाति प्रथा में खान-पान सम्बन्धी अनेक निषेध थे। शाकाहारी, मांसाहारी कच्चे एवं पक्के भोजन के बारे में पवित्रता एवं अपवित्रता की धारणा प्रचलित थी, किन्तु अब कुछ ब्राह्मण भी मांसाहारी भोजन करने लगे हैं। कच्चे एवं पक्के भोजन का भेद समाप्त हुआ है। होटल रेस्तरां एवं क्लब में सभी जातियों के व्यक्ति साथ-साथ खाने-पीने लगे हैं। धातु एवं मिट्टी के बर्तनों को लेकर पवित्रता एवं अपवित्रता की धारणा थी, वह अब काफी कम हुई है। अब उच्च जातियाँ निम्न जातियों के यहाँ भोजन एवं पानी ग्रहण करने लगी हैं।

10. जन्म के महत्व में कमी - जाति व्यवस्था में जन्म का अधिक महत्व था। ब्राह्मण के परिवार में जन्म लेने वाला व्यक्ति इसलिये श्रेष्ठ समझा जाता था कि उसने ऊँची जाति में जन्म लिया है, किन्तु वर्तमान में जन्म के बजाए शक्ति के कर्म एवं गुणों का महत्व बड़ा है। आज योग्य, कुशल एवं साहसी व्यक्ति को श्रेष्ठ माना जाता है। चाहे वह निम्न जाति का ही क्यों न हो।

11. अस्पृश्य जातियों के अधिकारों में वृद्धि - परम्परागत जाति-व्यवस्था में शूद्र एवं अस्पृश्य जातियों को अनेक सामाजिक-धार्मिक, आर्थिक एवं राजनैतिक अधिकारों से वंचित किया गया था। किन्तु समाज सुधारकों एवं सरकारी प्रयत्नों के कारण आज उन्हें उच्च जातियों के समान ही सभी अधिकार एवं सुविधाएँ प्राप्त हैं। उन्हें आर्थिक एवं राजनीतिक संरक्षण प्रदान किया गया है। विधान मण्डलों, संसद, सरकारी नौकरियों एवं अन्य क्षेत्रों में उनके लिए स्थान सुरक्षित रखे गये हैं। कानूनी रूप से अस्पृश्यता का अन्त कर दिया गया है।

12. विवाह सम्बन्धी प्रतिबन्धों में परिवर्तन - जाति व्यवस्था का मूल आधार जाति अन्तर्विवाह रहा है। प्रत्येक व्यक्ति को अपनी जाति में ही विवाह करना होता था। यही नहीं, जाति प्रथा ने बाल-विवाह, कुलीन-विवाह एवं विधवा विवाह निषेधों को जन्म दिया, किन्तु वर्तमान में जाति के विवाह सम्बन्धी नियन्त्रण शिथिल हुए हैं, अब अन्तर्जातीय विवाह, विलम्ब विवाह, विच्छेद एवं विधवा पुनर्विवाह होने लगे हैं।


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