समकालीन समाज में महिलाओं की समस्याओं को समझाइए

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समकालीन समाज में महिलाओं की समस्याओं को समझाइए

समकालीन समाज में महिलाओं की समस्याओं को समझाइए

समकालीन समाज में महिलाओं की समस्यायें

  • 1. सामाजिक समस्यायें
  • 2. पारिवारिक समस्यायें
  • 3. आर्थिक समस्यायें
  • 4. शैक्षिक समस्यायें
  • 5. विवाह से सम्बन्धित समस्यायें
  • 6. स्वास्थ्य की समस्यायें

समाज में परम्परागत रूप से महिलाओं की स्थिति अत्यन्त निम्न है। प्रत्येक समाज में स्त्रियों और पुरुषों की सामाजिक स्थिति उनके आदर्शों और कार्यों के अनुसार निश्चित होती है। इन आदर्शा और कार्यों का निर्धारण उस समाज की संस्कृति करती है। चाहे कामकाजी महिलाये हों या गृहणी, विधवा हो या सधवा अथवा परित्यक्ता सभी महिलाये अनेक सामाजिक, आर्थिक, नैतिक समस्याओं से ग्रसित हैं। यद्यपि स्वतन्त्रता के पश्चात महिलाओं की समस्या के निराकरण के लिये अत्यधिक प्रयास किये गये हैं और इनकी दयनीय दशाओं में सुधार हुआ है किन्तु पूर्णरूप से निराकरण आज भी नहीं हो सका है। इस समाज में महिलाओं की प्रमुख समस्यायें निम्नलिखित हैं

1. सामाजिक समस्यायें - समाज में महिलाओं की अनेक सामाजिक समस्यायें हैं। मध्यकाल में नारियों की सामाजिक स्थिति दयनीय हो गयी। महिलाओं का कार्यक्षेत्र सीमित हो गया तथा सभी के कामों , की पूर्ति करने वाली दासी बन कर रह गयी। इन सामाजिक समस्याओं में पर्दाप्रथा, सती प्रथा, पुरुष की अधीनता, असहाय होने की समस्या, अपहरण और बलात्कार आदि की समस्या में नारियाँ अधिक पीडित रही हैं। यद्यपि स्वतन्त्रता के पश्चात इनकी समस्याओं के निराकरण के लिये अनेक व्यापक प्रयास किये गये किन्तु फिर भी आज भी महिलाओं के समक्ष अपहरण, बलात्कार तथा वेश्यावृत्ति आदि की समस्यायें बनी हुई हैं। इसके अतिरिक्त स्त्रियों को समाज में पुरुषों के समान न तो सम्मान प्राप्त है, और न ही अधिकार प्राप्त हैं। भारत के ग्रामीण समाज में तो आज भी पर्दा प्रथा और पति को परमेश्वर मानने वाली धारणा व्याप्त है, इसके अतिरिक्त महिलायें आज भी कई सामाजिक कुरीतियों से ग्रसित हैं।

2. पारिवारिक समस्यायें - नारियों की पारिवारिक समस्यायें भी उनके व्यक्तित्व के विकास और सुखमय जीवन में हमेशा से बाधित रही हैं। डॉ. राजेन्द्र प्रसाद ने अपनी आत्मकथा में लिखा है कि - "संयुक्त परिवार में पति-पत्नी इतनी कृत्रिम और अस्वाभाविक परिस्थिति में मिलते हैं कि उनमें प्रेम का विकास तो दूर की बात है मामूली परिचय भी कम होता है।' पारिवारिक तनाव और पारिवारिक समस्या का सामना भी महिलाओं को ही करना पड़ता है।

डॉ. मजूमदार ने लिखा है कि - "हिन्दू परिवार में सबसे अधिक रूढ़िवादी तत्व स्त्री है और इस प्रकार परम्परात्मक रूढ़ियों का पालन इनके द्वारा ही कराया जाता है। इस प्रकार स्पष्ट है कि महिलाओं की पारिवारिक समस्या हमेशा से बनी रही है और आज तो पारिवारिक सामन्जस्य की बड़ी प्रबल समस्या पायी जाती है।

3. आर्थिक समस्यायें - भारत में महिलाओं की आर्थिक समस्यायें भी गम्भीर रूप धारण किये रही हैं इसके अतिरिक्त कार्यरत महिलाओं के समक्ष आज भी अनेक समस्यायें व्याप्त हैं। इसी प्रकार नारिया क समक्ष सम्पत्ति पर उत्तराधिकार की गम्भीर समस्या स्वतन्त्रता के पूर्व तक बनी रही है। स्वतन्त्रता के पश्चात् महिलाओं की दयनीय आर्थिक स्थिति में अत्यधिक सुधार हुआ है और इन्हें सम्पत्ति पर व्यापक अधिकार प्रदान किये गये हैं।

4. शैक्षिक समस्यायें - प्राचीन काल से ही महिलाओं के समक्ष शिक्षा की समस्या बनी हुई है और आगे चलकर मध्यकाल में नारियाँ शिक्षा प्राप्त करने से पूर्णरूप से वंचित कर दी गयी और इनके लिये कठोर प्रतिबन्ध लगा दिये गये, जबकि वैदिक युग में स्त्रियों को शिक्षा का पूर्ण अधिकार था तथा अनेक महिलायें विदुषी हुई हैं। तत्कालीन समाज में शिक्षा के क्षेत्र में पुरुषों के समान ही नारियों को भी अधिकार था। ब्रिटिश शासनकाल से महिलाओं की शिक्षा पर पुनः ध्यान दिया गया और आज पुरुषों के समान ही नारियों को शिक्षा ग्रहण करने का पूर्ण अधिकार है। ग्रामीण समुदाय में आज भी महिलाओं के लिये शिक्षा की समस्या व्याप्त है और उसके निराकरण हेतु विशेष प्रबन्ध किये जा रहे हैं।

5. विवाह से सम्बन्धित समस्यायें - महिलाओं के समक्ष विवाह से सम्बन्धित अनेक समस्यायें हैं, जैसे - महिलाओं के अन्तर्जातीय विवाह पर प्रतिबन्ध है तथा वह मूल्य अथवा दहेज की समस्या है, विधवा विवाह, बेमेल विवाह, बहुपत्नी विवाह आदि की समस्या बनी हुई है।

6. स्वास्थ्य की समस्यायें - स्वास्थ की समस्या महिलाओं में प्रबल समस्या रही है और इनके निराकरण के लिये प्रयास किये जा रहे हैं।

अतः समकालीन समाज में नारियों की अनेक समस्यायें आज भी बनी हुई हैं यद्यपि इनके निराकरण हेतु कार्य किये जा रहे हैं।

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