Tuesday, 1 March 2022

भारत में कृषक आंदोलन पर निबंध

भारत में कृषक आंदोलन पर निबंध

भारत में कृषक आंदोलन : कृषक आंदोलन से तात्पर्य है कृषि नीति को बदलने के लिये किया गया आंदोलन। कृषक आंदोलन भारत में विभिन्न प्रकार के आंदोलन होते रहे हैं। कृषक आंदोलनसमाज में भी कमजोर वर्गों में भी अपने उत्पीड़न के प्रति जागरूकता में वृद्धि हुई है। इसके कारण आज महिला आंदोलन, जनजाति आंदोलन, निम्न जाति आंदोलन, कृषक आंदोलन इत्यादि विविध प्रकार के आंदोलन भारतीय समाज में हो रहे हैं।

कृषक से अभिप्राय खेती करने या खेती से सम्बन्धित कोई अन्य व्यवसाय करने वाले व्यक्ति से है भारत की अधिकांश जनसंख्या कृषि से सम्बन्धित व्यवसायों में ही लगी हुई है अतः कृषकों की जनसंख्या भारत में अत्यधिक है तथा आज भी गाँवों में रहने वाले तीन-चौथाई व्यक्ति कृषि व्यवसाय में ही लगे हुए हैं।

कृषकों के लिए परम्परागत रूप से खेती करना एक व्यवसाय नहीं था, परन्तु यह उनकी जीवन पद्धति रहा है। अंग्रेजी शासन काल में हुए परिवर्तनों तथा स्वतन्त्रता प्राप्ति के पश्चात् हुई हरित क्रान्ति ने किसाना का अधिक कृषि उत्पादन करके इसे बाजारों में बेचने के लिए प्रेरित किया है। बढ़ती हुई कीमतों से कृषकों की समस्याएँ बढ़ गई तथा उनमें असन्तोष व्याप्त होने लगा। कृषकों को ऐसा लगने लगा कि एक तरफ तो साहूकार उनका शोषण कर रहे हैं और दूसरी ओर सरकार से नाममात्र की सुविधायें ही उन्हें मिल पा रही थीं अतः कृषकों को अपनी समस्याओं को दूर करने के लिए आंदोलन का रास्ता अपनाना पड़ा।

पहले किसान चौ० चरणसिंह को अपना मसीहा मानते रहे हैं क्योंकि उन्होंने उनकी समस्याओं को समझा तथा दूर करने का भी प्रयास किया। चौ० चरणसिंह को ही किसानों को संगठित करने का श्रेय दिया जाता है उनकी मृत्यु के पश्चात् भारत में कृषक आंदोलन का नेतृत्व अनेक नेताओं के हाथों में चला गया है जिनसे चौधरी महेन्द्र सिंह टिकैत तथा शरद जोशी के नाम उल्लेखनीय हैं। इसके अतिरिक्त चौधरी अजीत सिंह, चौधरी देवीलाल तथा कांग्रेस के अनेक नेता जैसे राजेश पायलट, बलराम जाखड़ इत्यादि किसानों के नेताओं के रूप में उभरे हैं। इन लोगों के नेतृत्व से किसानों में एक नवीन जागृति पैदा हुई है तथा वे अपनी समस्याओं के समाधान तथा शोषण को रोकने के लिए एकजुट होकर मुकाबला कर रहे हैं।

भारत में कृषक आंदोलन के कारण 

भारत में किसानों के होने वाले आंदोलनों के निम्नलिखित प्रमुख कारण रहे जो इस प्रकार से हैं

अशिक्षित होना- कृषकों में आंदोलन का एक प्रमुख कारण अशिक्षा है। अशिक्षित होने के कारण उनमें किसी भी बात को ठीक प्रकार से सोचने व समझने की शक्ति नहीं होती जिसके कारण वह की बातों में भी जल्दी आ जाते हैं और विभिन्न प्रकार के आंदोलनों में उतर आते हैं।

गाँव में बिजली पानी की असुविधा- आज भी अनेक योजनाओं के चलने के बाद भी गाँव में पूर्ण रूप से बिजली, पानी की सुविधा नहीं है जिसके कारण किसानों की खेती सम्बन्धी नुकसान होता है और उनमें विभिन्न प्रकार का आक्रोश उत्पन्न हो जाता है।

प्राकृतिक विपदाएँ- विभिन्न प्रकार की प्राकृतिक विपदायें जैसे-बाढ़, तूफान, सूखा इत्यादि के उत्पन्न होने के कारण इनकी आर्थिक स्थिति पर बहुत गहरा पड़ता है और इसी कारण वह अपनी स्थिति को सुधारने हेतु विभिन्न प्रकार के गलत कार्यों में भी हिस्सा ले लेते हैं।

आसानी से ऋण न मिलना- अपने कार्यों को सुचारू रूप से करने लिए इन पर पर्याप्त धन नहीं होता और इस धन की पूर्ति के लिए वह ऋण का सहारा लेते हैं उन्हें ऋण जब आसानी से नहीं मिलता या फिर वह ब्याज नहीं दे पाते तो वह विभिन्न प्रकार के आंदोलन उत्पन्न करते हैं।

अन्य कारण-इस अतिरिक्त आंदोलन उत्पन्न करने हेतु कुछ कारण निम्न हैं

  1. कृषि में प्रयोग की जाने वाली खादों, बीजों तथा यन्त्रों के दामों में भी अत्यधिक वद्धि।
  2. बिचौलियों तथा साहूकारों द्वारा कृषकों का शोषण।
  3. भूमिपतियों द्वारा भूमिहीन श्रमिकों का शोषण
  4. न्यूनतम वेतन की कमी।
  5. सामान्य व छोटे किसानों में व्याप्त निर्धनता।
  6. नकली बीज व खाद की बिक्री। .

कृषक आंदोलनों में सामाजिक आंदोलन की सभी विशेषताएँ देखी जा सकती हैं। ये जन-आंदोलन है सुस्पष्ट समस्याओं को लेकर हो रहे तथा इनका संचालन संगठनात्मक आधार पर नेताओं द्वारा किया जा रहा है। ऐसे आंदोलन कोई साम्यवादी या पूँजीवादी विचारधारा को लेकर नहीं हो रहे हैं अपितु उनका उद्देश्य तो कृषकों की समस्याएँ कम करना तथा इनको प्राकृतिक विपत्तियों के समय में सुविधाएँ दिलवाना है जिन्हें प्राप्त करने का अधिकार उन्हें है। अगर कृषक इसी प्रकार से संगठित रहें और अपनी समस्याओं के समाधान के लिए लड़ते रहें तो आशा की जा सकती है कि उनकी सभी समस्याओं का कोई सुविधाजनक हल जरूर ढूँढ़ा जा सकेगा और ये अधिक उत्पादन के लिए प्रेरित होंगे।


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