राजनीति शास्त्र और राजनीतिक दर्शन का अंतर स्पष्ट कीजिए।

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राजनीति शास्त्र और राजनीतिक दर्शन का अंतर स्पष्ट कीजिए।

  1. राजनीति विज्ञान और राजनीतिक दर्शन के बीच अंतर बताइए। 
  2. राजनीतिक विज्ञान का क्षेत्र राजनीतिक दर्शन से अधिक विस्तृत है। विस्तार चर्चा से कीजिए।

राजनीतिक विज्ञान एवं राजनीतिक दर्शन में अंतर

राजनीति शास्त्र का नामकरण विवादास्पद रहा है। प्रमुख विवाद है कि इसे राजनीति विज्ञान या राजनीति शास्त्र (Political Science) कहा जाये अथवा राजनीति दर्शन (Political Philosophy) आज राजनीति शास्त्र अथवा राजनीतिक विज्ञान नाम ही अधिकांशतः मान्य है, तथापि यह देखना आवश्यक है कि हम राजनीति दर्शन नाम क्यों स्वीकार नहीं करते।

राजनीति शास्त्र को राजनीति दर्शन कहने पर सबसे बड़ी आपत्ति यह है कि 'राजनीति दर्शन' शब्द बहुत संकुचित है। यह केवल राज्य की प्रकृति के मूलभूत सिद्धान्तों, नागरिकता, कर्तव्य और अधिकारों के प्रश्न तथा राजनीतिक आदर्श से सम्बन्ध रखता है। राजनीति दर्शन, सम्पूर्ण राजनीति नहीं है बल्कि उसका एक अंग मात्र है जो केवल इसके सैद्धान्तिक पक्ष मात्र की विवेचना करता है। राजनीति दर्शन अमूर्त और आदर्शात्मक है जबकि राजनीति विज्ञान का एक बड़ा भाग वर्णनात्मक और विवेचनात्मक तथा ऐतिहासिक और तुलनात्मक एवं अनुभव आश्रित है। पुनश्च, राजनीति दर्शन राजनीतिक संगठन के सिद्धान्तों की चर्चा बहुत संक्षेप में करता है और वह भी केवल यह बताने के लिये कि प्रस्तुत राजनीतिक व्यवस्था में कौन से परिवर्तन वांछनीय हैं। वास्तव में, फ्रेडरिक पोलक का वह अंश, जिसे 'व्यावहारिक राजनीति' के नाम से पुकारा जाता है, राजनीति दर्शन के क्षेत्र से बाहर हो जाता है। राजनीति दर्शन शीर्षक स्वीकार करने पर एक आपत्ति यह की जाती है कि यह एक अर्थ में 'राजनीति के विज्ञान' का पूर्वगामी है। विगत कछ अर्से से राजनीति दर्शन की कटु आलोचना करते हुए कहा गया है कि वह पुराने और पिछड़े आदर्शों की स्थापना करता है और ऐसे आदर्शात्मक ज्ञान के स्थान पर होना यह चाहिए कि एक आदर्शविहीन और मूल्यविहीन विज्ञान की स्थापना की जाए।

नाम-विभेद के इस सन्दर्भ में हम दर्शन और विज्ञान की परिभाषाओं के पचड़े में न पड़ते हुए, यह सरलता से देख सकते हैं कि राजनीति के दर्शन को उसके विज्ञान से अलग किया जा सकता। प्लेटो और अरस्तू से लेकर मार्क्स और लास्की तक राजनीति शास्त्र के सभी विद्वानों पर उसके अपने दर्शन का प्रभाव पड़ा है। यद्यपि राजनीतिक दार्शनिक अपने मत का अथवा उस समुदाय के मत का जिसका वह समर्थक होता है, प्रतिनिधित्व करता है, लेकिन साथ ही वह राजनीति के चिरन्तन सत्यों का भी गहराई से विवेचन करता है। हम प्लेटो की दार्शनिक मान्यताओं से असहमत हो सकते हैं पर इससे इन्कार नहीं सकते कि कानून, अधिकार और न्याय के प्रश्न पर उसने जो विचार व्यक्त किए. वे आज भी उन अध्येताओं के लिए मूल्यवान हैं जो इन समस्याओं का अध्ययन करना चाहते हैं। जहाँ तक मूल्यविहीन विज्ञान सम्बन्धी विचारधारा है, मूल्यविहीन राजनीति शास्त्र की वकालत करना उपयुक्त नहीं है। कार्ल फ्रेडरिक ने ठीक ही कहा है कि राजनीति शास्त्र की हम कोई भी परिभाषा क्यों न करें, उसे शक्ति, न्याय, मूल्य, कार्य, व्यक्ति, भावना, प्रतीक, समूह आदि से सम्बन्धित नहीं रख सकते। इन शब्दों तथा अवधारणाओं की कोई भी विवेचना मूल्यों को बीच में लाए बिना सम्भव नहीं है और जब हम मूल्यों की चर्चा करते हैं तो दर्शन का क्षेत्र आरम्भ हो जाता है। कार्ल फ्रेडरिक के ही शब्दों में, "राजनीति दर्शन, दर्शनशास्त्र और राजनीति विज्ञान वह शाखा है जो इन दोनों विज्ञानों को एक सूत्र में पिरोती है। राजनीति दर्शन राजनीतिक विज्ञान के तथ्यों तथा निष्कर्षों को दर्शनशास्त्र तक लाता है और साथ ही दर्शनशास्त्र के उपयुक्त और संगत पहलुओं को राजनीति विज्ञान के सम्मुख प्रस्तुत करता है। इस प्रकार राजनीति विज्ञान तथा राजनीति दर्शन निकटतम सूत्रों द्वारा आपस में बँधे हुए हैं, एक का सही अध्ययन दूसरे की सहायता के बिना नहीं किया जा सकता।"

स्पष्ट है कि राजनीति शास्त्र तथा राजनीति दर्शन दोनों में कठोर विभाजक रेखा नहीं खींची जा सकती। फिर भी आधुनिक प्रथा के आधार पर यह कहा जा सकता है कि राजनीति शास्त्र का अर्थ काफी स्पष्ट है, जबकि राजनीति दर्शन में वह स्पष्टता नहीं आ पायी है। वर्तमान परिस्थितियों में राजनीति शास्त्र निश्चय ही अधिक व्यापक संज्ञा है और इसका अर्थ भी अधिक सनिश्चित बन चुका है। अतः प्रतिपाद्य विषय-सामग्री के अध्ययन को राजनीति-शास्त्र नामकरण देना ही समीचीन है।

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