Friday, 18 February 2022

डेविड ईस्टन का सामान्य व्यवस्था सिद्धांत को स्पष्ट कीजिये।

डेविड ईस्टन का सामान्य व्यवस्था सिद्धान्त

डेविड ईस्टन ने 1965 में प्रकाशित अपनी पुस्तक, "A. System Analysis of political life" और 1967 में प्रकाशित पुस्तक "The political System" में राजनीतिक क्षेत्र में सामान्य व्यवस्था सिद्धान्त का प्रतिपादन किया था।  डेविड ईस्टन के अनुसार-

राजनीतिक व्यवस्था किसी समाज के अन्तर्गत उन अंत: क्रियाओं की व्यवस्था को कहते हैं, जिसके माध्यम से अनिवार्य अधिकारिक आवंटन किए जाते हैं, 'चूंकि समाज में सामाजिक संसाधनों की कमी है। अतः राजनीतिक व्यवस्था का संबंध 'सामाजिक मूल्यों के आधिकारिक आवंटन से है।

डेविड ईस्टन की राजनीतिक व्यवस्था समाज व्यवस्था की एक उप-व्यवस्था है। समाज व्यवस्था की विभिन्न व्यवस्थाएँ होती हैं। जैसे - आर्थिक, धार्मिक, सांस्कृतिक आदि। राजनीतिक व्यवस्था भी इन्हीं में से एक है। यद्यपि यह समाज व्यवस्था का अंग है फिर भी अन्य सब उपव्यवस्थाओं से काफी स्वायत्तता रखता है। क्योंकि यही एक ऐसी व्यवस्था है जिसमें सभी उप-व्यवस्थाओं को आदेश देने तथा उन्हें नियंत्रित कर सकने की क्षमता होती है।

डेविड ईस्टन का मानना है कि सभी प्रकार की राजनीतिक व्यवस्थाओं में एक सामान्य व्यवस्था विद्यमान होती है जिनके लक्षण एक समान हैं जो निम्न हैं -

(1) व्यापकता - इसका तात्पर्य है कि इसमें औपचारिक संस्थाओं के साथ-साथ अनौपचारिक संस्थाओं का अध्ययन भी किया जाता है। अत: जिस किसी भी संस्था से राजनीति प्रभावित होती है. उन सभी का अध्ययन इसके तहत किया जाता है।

(2) सीमाएँ - यह सर्वमान्य तथ्य है कि प्रत्येक व्यवस्था की अपनी कुछ सीमाएँ होती हैं, राजनीतिक व्यवस्था की भी अपनी कुछ सीमाएँ हैं। जहाँ अन्य उप-व्यवस्थाओं की सीमाएँ समाप्त होती हैं वहीं से राजनीतिक व्यवस्था की सीमा प्रारम्भ होती है।

(3) अन्तर्निर्भरता - इसका तात्पर्य है कि एक व्यवस्था को दूसरी व्यवस्था पर किसी न किसी प्रकार से निर्भर रहना होता है। क्योंकि समाज की सभी उप व्यवस्थाएँ एक-दूसरे को किसी न किसी तरह से प्रभावित अवश्य करती हैं। जैसे किसी राजनीतिक व्यवस्था में राजनीतिक दलों व जन-संचार के साधनों का विस्तार होता है तो इनका किसी न किसी रूप में प्रभाव अवश्य पड़ता है।

डेविड ईस्टन का सामान्य व्यवस्था में निवेश-निर्गत विश्लेषण

डेविड ईस्टन ने आधुनिक काल में इस पद्धति का प्रतिपादन किया जो उनका महत्वपूर्ण योगदान माना जाता है। उन्होंने अपने निवेश-निर्गत विश्लेषण में राजनीतिक व्यवस्था का उसके पर्यावरण के सन्दर्भ में देखने की कोशिश की है। उनका मानना है कि पर्यावरण से निवेश के रूप में माँगें उठती हैं और उन्हें व्यवस्था का समर्थन प्राप्त दोता है। इन माँगों को राजनीतिक,दल दबाव-समूह, समाचार-पत्र व अन्य समुदाय आदि समर्थन देकर व्यवस्था में रूपांतरण एक प्रक्रिया के माध्यम से होता है। ईस्टन का मत है कि सत्ताधारियों के निर्णय व नीतियाँ निर्गत रूप से पुनः पर्यावरण में प्रवेश कर जाते हैं। और उसमें परिवर्तन करके पुनः समाज में नई माँगें निवेश के रूप में उठ खड़ी होती हैं। इस कार्य को ईस्टन नें फीडबैक या पुनर्निवेश की संज्ञा दी है। इस प्रकार निवेश रूपातंरण तथा निर्गत की यह प्रक्रिया निरंतर चलती रहती है। ईस्टन का मत है कि राजनीतिक व्यवस्था को बनाए रखने के लिए निवेश रूपान्तर और निर्गत की इस प्रक्रिया का सदा चलते रहना आवश्यक है।

(A) राजनीतिक व्यवस्था में निवेश - राजनीतिक व्यवस्था में निवेश की व्याख्या करते हुए डेविड ईस्टन दो बातें कहते हैं -

(i) माँग तथा समर्थन (ii) माँग का रूपान्तरण।

(i) माँग तथा समर्थन - प्रत्येक राजनीतिक व्यवस्था में हर समय असंख्य इच्छाएँ, आकांक्षाएँ, आवश्यकताएँ तथा अपेक्षाएँ विद्यमान रहती हैं। इसमें से केवल कुछ माँगें जैसे सार्वजनिक सुरक्षा, स्वास्थ, चिकित्सा व शिक्षा आदि ही राजनीतिक प्रणाली में प्रवेश कर पाती हैं और शेष रास्ते में ही खो जाती है। या नियामक तंत्रों द्वारा नियंत्रित कर दी जाती है। ईस्टन कहता है कि इन माँगों को उजागर करने का कार्य राजनीतिक दल, समाचार पत्र, हित समूह आदि के द्वारा होता है। निवेश का दूसरा पक्ष समर्थन है। यह समर्थन अनेक प्रकार का हो सकता है, जैसे - सकारात्मक, नकारात्मक, प्रकट अथवा अप्रकट । व्यक्ति समूह विचारधारा, ध्येय संस्था या अन्य प्रकार से व्यवस्था के पक्ष में होना समर्थन कहलाता है। समर्थन एक महत्वपूर्ण निवेश है। क्योंकि राजनीतिक व्यवस्था समर्थन के अभाव में कार्य नहीं कर सकती है। बिना समर्थन के माँगों का औचित्य ही समाप्त हो जाता है।

(ii) माँग का रूपान्तरण - रूपान्तरण वह प्रक्रिया है जिसके द्वारा निवेश को निर्गत में परिवर्तित किया जाता है। माँगों को व्यवस्था के सामने रखने का कार्य राजनीतिक दल-दबाव समूह तथा अन्य प्रतिनिधियों द्वारा किया जाता है। सत्ताधारी इन मांगों के आधार पर पक्ष या विपक्ष में निर्णय लेते हैं और इस प्रकार माँगों का रूप बदल दिया जाता है। राजनीतिक व्यवस्था में रूपान्तरण प्रक्रिया अत्यंत महत्वपूर्ण होती है क्योंकि इसके द्वारा ही शासकों का समर्थन बढ़ता या घटता है।

(B) राजनीतिक व्यवस्था के निर्गत - निर्गत उन नियमों तथा नीतियों को कहते हैं जो निवेश के रूपान्तरण के पश्चात हमें प्राप्त होती है। अर्थात निवेश को निर्गत में बदलने के लिए व्यवस्था के सामने लाया जाता है। राजनीतिक व्यवस्था इन निवेशों पर निर्णय लेती है। इस प्रकार निर्गत व्यक्तियों द्वारा रखी गई माँगों पर राजनीतिक व्यवस्था द्वारा किये गये निर्णय होते हैं।


SHARE THIS

Author:

I am writing to express my concern over the Hindi Language. I have iven my views and thoughts about Hindi Language. Hindivyakran.com contains a large number of hindi litracy articles.

0 comments: