Wednesday, 15 December 2021

रानी चेनम्मा की कहानी - Kittur Rani Chennamma Story in Hindi

रानी चेनम्मा की कहानी - Kittur Rani Chennamma Story in Hindi

रानी चेनम्मा की कहानी : रानी चेनम्मा भारत के कर्नाटक के कित्तूर राज्य की रानी थीं। उनकी शादी देसाई वंश के राजा मल्लसर्ज से हुई। महाराज की दो रानियाँ थीं, बड़ी रुद्रम्मा और छोटी चेनम्मा। काकतीय राजवंश में जन्मी चेनम्मा प्रारंभ से ही मेधावी थी। उन्होंने कन्नड़, उर्दू, मराठी और संस्कृत इत्यादि भाषाओं में निपुणता प्राप्त कर ली थी। शास्त्री जी उन्हें संगीत की शिक्षा भी दे रहे थे। वह आखेट, शस्त्र संचालन और घुड़सवारी में भी पारंगत हो गयी। महाराज कलाप्रेमी थे और विद्वानों का बहुत आदर करते थे। एक दिन उन्होंने अपने राजमहल में श्रीरंगपट्टण के प्रसिद्ध संगीताचार्य सदाशिव शास्त्री के संगीत का आयोजन किया। संगीताचार्य शास्त्री जी ने अपनी कला प्रस्तुति से राजा और प्रजा दोनों को मुग्ध कर दिया। राजा मल्लसर्ज ने वस्त्राभूषण तथा अलंकार इत्यादि देकर संगीताचार्य को सम्मानित किया और साथ ही उनसे अनुरोध किया कि वे उनकी छोटी रानी चेनम्मा को संगीत की शिक्षा दें।

रानी चेनम्मा की कहानी - Kittur Rani Chennamma Story in Hindi

रानी चेनम्मा के साहस एवं उनकी वीरता के कारण देश के विभिन्न हिस्सों खासकर कर्नाटक में उन्हें विशेष सम्मान हासिल है और उनका नाम आदर के साथ लिया जाता है।

जब महाराजा मल्लसर्ज को पूना के पेशवा ने कैद कर लिया तो कुछ ही दिनों में उनकी इह लीला समाप्त हो गयी। कित्तूर पर संकट के बादल गहराने लगे। रानी चेनम्मा के पुत्र का भी अल्प आयु में ही निधन हो गया था। बड़ी रानी रुद्रम्मा के पुत्र शिवलिंग रुद्रसर्ज द्वारा राज्य का संचालन कराया किन्तु वे भी गंभीर रूप से बीमार हो गये और अपने बचने की कोई आशा न देख उन्हें पुत्र गोद लेने का परामर्श दिया गया। उन्होंने अपने स्वजन के पुत्र को गोद लेने का मन बनाया किन्तु दीवान मल्लप्पा शेट्टी को उनका यह विचार ठीक नहीं लगा। मल्लप्पा शेट्टी ने कहा कि इसके लिए धारवाड़ के कलेक्टर मि.थैकरे की अनुमति लेनी होगी। इस पर रानी चेनम्मा कुपित हो उठी और कहा कि हमारे घरेलू मामलों में दखल देने वाले अंग्रेज कौन होते हैं? अब शिवलिंग रुद्रसर्ज ने मास्त मरडीगौड़ा के पुत्र को गोद लेकर उसका नाम गुरुलिंग मल्लसर्ज रखा। कुछ दिन बाद शिवलिंग रुद्रसर्ज का निधन हो गया। राज-काज का सारा भार रानी चेनम्मा पर आ पड़ा।

दीवान मल्लप्पा शेट्टी पहले से ही नाराज चल रहा था। वह राज्य को हथियाना चाहता था पर रानी के सामने उसकी कुछ भी न चल पाती थी। ईर्ष्या और द्वेष के कारण मल्लप्पा ने इस गोद लेने की सूचना धारवाड़ के कलेक्टर मि. थैकरे को दे दी।

तत्कालीन गवर्नर लार्ड डलहौजी की हड़प नीति से सब भली-भाँति परिचित थे। अंग्रेजों की नियत इस फिराक में रहती थी कि कोई देशी रियासत उन्हें हड़पने को मिले। फलस्वरूप कलेक्टर मि. थैकरे ने गोद लिए पुत्र गुरुलिंग मल्लसर्ज को उत्तराधिकार मानने से इनकार कर दिया और कहा कि रानी संरक्षिका का भार छोड़कर सभी अधिकार दीवान शेट्टी को सौंप दें। रानी चेनम्मा ने इसे अमान्य करते हुए कित्तूर की स्वाधीनता के लिए अपनी प्रतिबद्धता प्रकट की।

कलेक्टर थैकरे ने कई संदेश भेजे और बराबर धमकियाँ भी देते रहे किन्तु रानी जस की तस बनी रही। वह यह भी जानती थीं कि उसके दोनों दीवान मल्लप्पा शेट्टी और वेंकट राव अंग्रेजों से मिले हए हैं क्योंकि उन दोनों को राज्य का कुछ भाग पाने का आश्वासन मि. थैकरे दे चुके थे।

रानी ने आसन्न संकट को देखते हुए युद्ध की तैयारियाँ प्रारंभ कर दी और इसके लिए अपनी प्रजा का आह्वान भी किया। कित्तूर की प्रजा जी-जान से अपनी रानी के साथ थी। दोनों देशद्रोही दीवान यद्यपि उनके विरुद्ध थे किन्तु गुरु सिद्दप्पा जैसे योग्य दीवान और बालण्णा, रायण्णा, जगवीर एवं चेन्नवासप्पा जैसे योद्धा उनके साथ थे।

पूरा राज्य युद्ध की तैयारियाँ करने लगा। हिंदू और मुसलमानों दोनों ही पूर्ण सहयोग प्रदान कर रहे थे और वे स्वयं भी युद्धाभ्यास में जुट गईं। रानी स्वयं इन सब तैयारियों का निरीक्षण कर रही थीं। देशद्रोही दीवान मल्लप्पा शेट्टी और वेंकटराव इन तैयारियों की जानकारी अंग्रेजों को दे रहे थे। ये दोनों देशद्रोही दीवान गुरु सिदप्पा को अपने मार्ग की बाधा मान रहे थे। उन्होंने एक कुचक्र रचा और रानी की रसोइया महातब्बा को प्रलोभन दिया और खीर में विष मिलाकर रानी को देने को कहा, वह झांसे में आ गई। जैसे ही वह विष मिली खीर देने को हुई कि रानी की शुभेच्छु कलावती ने इसका भंडाफोड़ कर दिया और रानी बच गईं। वह खीर महातव्बा को खिलाई गयी और वह तड़प-तड़प कर मर गयी।

उसी रात चेनम्मा ने अपने सभी सैनिकों को तैयार रहने के लिए कहा साथ ही यह भी कहा कि यह युद्ध केवल कित्तूर के लिए ही नहीं है- यह हमारी पुण्य भूमि भारत की अस्मिता के लिए है।

23 सितम्बर 1824 को रानी ने थैकरे की सेना पर आक्रमण कर दिया। फाटक खोल दिए गये- रानी की मदानगी झलक रही थी और वे सिंहनी के समान अंग्रेजी सेना पर टूट पड़ी। रानी की तलवार शत्रुओं के शीश काटे जा रही थी। देखते-देखते ही थैकरे को भी मार गिराया। मैदान लाशों से पट गया और थैकरे के गिरते ही अंग्रेजी सेना भाग खड़ी हुई। बहुत से सैनिकों को बंदी बनाया गया जिसमें शिविर के अफसर स्टीवेशन और इलियत भी थे। दोनों देशद्रोही दीवान शेट्टी और वेंकटराव को भी गिरफ्तार कर लिया। बाद में मंत्री परिषद की सलाह लेकर उन्हें मृत्यु दंड दे दिया।

अंग्रेज फिर तैयारी में लग गये। मद्रास और मुंबई से कुमुक मँगाकर डीकस के नेतृत्व में 3 दिसंबर 1824 को पुनः आक्रमण कर दिया। इस बार उनका सैन्यदल सशक्त और विशाल था किन्तु रानी के देशभक्त सैनिकों का मनोबल भी कुछ कम नहीं था। एक बार फिर अंग्रेज हारकर भाग खड़े हुए।

अंग्रेजों को यह हार खटक रही थी और तीसरी बार फिर कित्तूर पर आक्रमण किया। इस बार कटनीति के सहारे कित्तर के कछ लोगों को प्रलोभन देकर अपने पक्ष में कर लिया जिसमें कित्तूर का किलेदार वासप्पा भी सम्मिलित था। उसने बारूद में सूखा गोबर मिलवा दिया साथ ही कुछ अन्य भेद भी दे डाले। भयंकर युद्ध हुआ अंग्रेजों की सेना की भारी क्षति हुई। अंत में रानी को गिरफ्तार कर लिया गया और उनके विश्वासपात्र सैनिकों यथा रायण्णा, जगवीर, नागरकट्टी, चेन्नवासप्पा तथा बालण्णा इत्यादि को गिरफ्तार कर इन योद्धाओं को फाँसी पर लटका दिया।

रानी यह सदमा बरदाश्त न कर सकी और बैंगलहोल में कैद रानी चेन्नम्मा ने अपने आत्मबल से ही अपने प्राणों की आहुति दे दी।

धन्य है वह कित्तूर की नारी, धन्य है शौर्य और साहस की प्रतीक रानी चेन्नम्मा जिसने अंग्रेजों के छक्के छुड़ा दिये। देश की बलवेदी पर अपने प्राण न्यौछावर करने वाली उस तेजपुंज को नमन और श्रद्धा सुमन समर्पित।


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