Monday, 14 September 2020

Hindi Essay on "Sampradayikta Ek Abhishap", "Communalism", "साम्प्रदायिकता एक अभिशाप पर हिंदी निबंध" for Students

साम्प्रदायिकता एक अभिशाप पर हिंद निबंध: इस लेख में हम पढ़ेंगे साम्प्रदायिकता एक अभिशाप पर हिंदी निबंध जिसमें हम जानेंगे भारत में साम्प्रदायिकता के कारण, "साम्प्रदायिकता को दूर करने के उपाय", "साम्प्रदायिकता का अर्थ", "साम्प्रदायिकता के प्रकार" आदि। Hindi Essay on Sampradayikta Ek Abhishap.

Hindi Essay on "Sampradayikta Ek Abhishap", "Communalism", "साम्प्रदायिकता एक अभिशाप पर हिंदी निबंध" for Students 

अपनी मूल अवधारणा में, सम्प्रदाय या मज़हब वास्तव में बड़े ही पवित्र और भावनात्मक शब्द हैं। इनका सम्बन्ध मस्तिष्क के साथ उतना नहीं, जितना मन की भावुकता-भावना केसाथ है। भावनाएँ वास्तव में बड़ी हा कामल, बड़ी ही नाजुक और साथ ही पवित्र भी हुआ करती है। अतः कहा जा सकता है कि अपने-आप में किसी विशेष सम्प्रदाय या मजहबकी मान्यताओं को मानना, उनके अनुसार चलना-कोई बुरी बात नहीं है। अपने लाभदायिक विश्वासों के अनसार चलते हए दसरे सम्प्रदायों के प्रति भी सम्मान का भाव रखना का मानवता है। प्रत्येक सम्प्रदाय के सन्तों-महापुरुषों का आदेश और सन्देश भी यही है और भारतीय संविधान ने भी इसी प्रकार की पवित्र साम्प्रदायिकता को मान्यता प्रदान कर रखीहै। सम्प्रदाय या साम्प्रदायकिता की भावना बुरी तब बन जाती है, जब उसमें अहंकार,अपनी श्रेष्ठता या उच्चता का भाव, कट्टरता या संकीर्णता और इन सब कारणों से असहिष्णता की अमानवीय दुर्भावना का राक्षस हुंकारने लगता है। इस प्रकार की सम्प्रदायिक भावना राष्ट्र और मानवता की शत्र बनकर तो सामने आती ही है, अपने लिए भी वास्तव में शत्रु काकाम ही करती है। वह ऐसे कि उसकी अपनी संकीर्णता और असहिष्णुता अन्य सम्प्रदायों में प्रतिक्रिया और प्रतिशोध की भावना जगा कर अपने गिरने-मरने के लिए भी अपने हाथोंसे खाई खोद लिया करती है। इसी कारण साम्प्रदायिकता को एक सर्व-संहारक विष कहकर उससे दूर रहने की बात कही और प्रेरणा दी जाती है।

भारत आरम्भ से ही अपनी समन्वयवादी दृष्टि के कारण बहु धर्मों-सम्प्रदायों का देश रहा है। यह ठीक है कि इसके विभाजन का मूल कारण कट्टर साम्प्रदायिकता ही थी, फिरभी, आज भी यहाँ विभिन्न धर्मों-सम्प्रदायों को मानने वाले लोग स्वतन्त्रतापूर्वक निवास करतेहैं। दुःख तब होता है, समस्या तब उत्पन्न होती है जब ये विभिन्न प्रकार के सम्प्रदायअन्यों के साथ तो लड़ते-झगड़ते ही हैं, अनेक बार अपनी जाति के भीतर के अपने हीभिन्न सम्प्रदायों से लड़ने झगड़ने लगते हैं। शिया-सुन्नी, रोमन-कैथोलिक-प्रोटेस्टेण्ट,सिख-निरंकारी सनातनी-आर्य समाजी आदि में होने वाले झगड़े इसी प्रकार की घृणित साम्प्रदायिकता की उपज कहे जा सकते हैं। विषम स्थिति तो यह है कि भारत मेंआज दीवालिया मनोवृत्तियों वाले राजनीतिज्ञों ने अनेक नये सम्प्रदाय भी खड़े कर दिये हैं। ज़मींदारों के सम्प्रदाय अलग गठित हो गये हैं, किसानों के अलग। इसी प्रकार नगरीय सम्प्रदाय, ग्रामीण सम्प्रदाय,मज़दूर सम्प्रदाय, अमीर-गरीब. जाट-बाह्मण, स्पश्य-अस्पृश्य न जाने कितने सम्प्रदाय उत्पन्न होकर सभी मात्र अपनो सरक्षा की माँग कर रहे हैं। दूसरी को जहाँ तक हो नीचा दिखाने और समाप्त कर देने की चेष्टा कर रहे हैं। देश और राष्ट्र का नाम तक भूला बैठे हैं ये नव-सम्प्रदायवादी। परिणामस्वरूप आज देश के प्रत्येकक्षेत्र में, प्रत्येक नगर, गाँव और गली-मुहल्ले तक में साम्प्रदायिकता का भूत अपना नग्न ताण्डव कर रहा है। पिस रही है बेचारी राष्ट्रीयता, बेचारी मानवता ! आज भारत मे हिन्दू,मुसलमान, सिख, ईसाई, ब्राह्मण, जाट हरिजन गिरजन, अल्पसंख्यक, बहसंख्यक, अगड़े-पिछड़े, पंजाबी, असमी, बंगाली, बिहारी और मद्रासी आदि तो हैं; पर केवल भारतीय कोई नहीं रह गया। यह स्थिति बड़ी ही निराशाजनक है। राष्ट्र का इन सबसेबड़ा अहित हो रहा है। यथाशीघ्र इसे समाप्त करना बहत ही आवश्यक हो गया है।अन्यथा हमारी समन्वय साधना के सभी उदात्त मूल्य अतीत की भूली-बिसरी कहानी मात्र रह जायेंगे।

आज जो नियोजित ढंग से साम्प्रदायिकता की आग यहाँ-वहाँ सहसा भड़क उठती है।वह कम से कम भारत नामक राष्ट्र का भला तो किसी भी रूप में नहीं कर सकती। जब भारत का भला सम्भव नहीं,तो उसके नाम वाली भूमि पर रहने वालों की भलाई की कल्पना भी नहीं की जा सकती। हमारे विचारों में रह-रहकर इस साम्प्रदायिकता के घणित रूप के उभार का प्रमुख कारण यहाँ की निहित स्वार्थों वाली राजनीति और राजनीतिज्ञ ही हैं। भावी चुनाव में अपने लिए वोट सुरक्षित करने के लिए वे लोगों को भिन्न प्रकार से उकसाते या बेकार की अनचाही सुविधाएँ या अनेक प्रलोभन देते रहते हैं। दूसरे राजनीतिक स्वयं ही यहाँ के सभी निवासियों को भारतीय मात्र न कह उन्हें अनेक प्रकार के विभिन्नता में वाले खानों और खेमों में बाँट कर ऊटपटाँग नारे लगाते रहते हैं। परिणामस्वरूप साम्प्रदायकिता को नाहक प्रश्रय और भड़काव मिलता रहता है। यदि देश के सभी राजनीतिक दल यह बन्दर-बॉट छोड़ केवल भारत और भारतीय नागरिक के बारे में ईमानदारी से सोचना और कार्य करना शुरू कर दें, तो दावे के साथ कहा जा सकता है कि अन्त में सभी प्रकारकी साम्प्रदायिकता अपने-आप समाप्त हो जायेगी। परन्तु वोट-प्रधान राजनीति और तथाकथित जन-सेवा वाले आज के युग में ऐसा हो पाना सम्भव नहीं लगता।

साम्प्रदायिक विष की समाप्ति के लिए एक स्तर पर भारतीय संविधान में भी संशोधन और परिवर्तन आवश्यक है। संविधान से अल्पसंख्यक, बहसंख्यक और इसी प्रकार केविभाजक शब्द और सूत्र हटा कर मात्र भारतीय और भारतीयता को ही रखने की आवश्यकता है। वर्ग-विशेष या विशेष वर्गों को भाषा या अन्य प्रकार की अलग सविधा देने, उनकेलिए अलग प्रकार का संविधान होने जैसी बातों को भी समाप्त करना होगा। ऐसा करनेसे ही भारत की धर्मनिरपेक्ष गणतन्त्र प्रणाली सार्थक ढंग से कार्य करके सफल हो सकेगी।सभी प्रकार की साम्प्रदायिकताओं का अन्त भी तभी हो पायेगा। इसके साथ-साथ आज सहिष्णुता, समता के भाव, पारस्परिक स्नेह और सद्भाव, सभी धर्मों के प्रति समान भावरखने की सहज मानवीय भावना के विकास की भी बहुत अधिक आवश्यकता है। इन्हीं सब उपार्यों पर चलकर ही साम्प्रदायिकता के विष से छुटकारा पा, केवल मानव बने रहकर सुख-शान्तिपूर्वक जिया जा सकता है। अन्य कोई उपाय या रास्ता नहीं।


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