Friday, 26 July 2019

होली पर निबंध – Holi Essay in Hindi

Holi Essay in Hindi : दोस्तों आज हमने होली पर निबंध कक्षा 1, 2, 3, 4, 5, 6, 7, 8, 9 ,10, 11, 12 के विद्यार्थियों के लिए लिखा है इस Holi Par Nibandh में हम जानेंगे की होली कैसे मनाई जाती है, होली का इतिहास क्या है तथा इसके पीछे कौन-कौन सी पौराणिक मान्यताएं जुड़ी हैं। 

होली पर निबंध – Holi Essay in Hindi

You will get some Long and Short Essays on Holi The Festival of colors in Hindi language with Headings for students under various sections.

Short Essay on Holi in Hindi For Class 1, 2, 3

भारतीय परंपरा में होली आनंद और उल्लास का त्योहार है। यह नाचने गाने, हंसी ठिठोली और मौज मस्ती का त्योहार है। होली को वसंत ऋतु का यौवन भी कहा जाता है। होली का यह त्यौहार मन में बसी ईर्ष्या, द्वेष, आपसी वैमनस्य, बैर भाव जैसे कुविचारों को मन से निकाल फेंकने का सुअवसर प्रदान करता है। होली से एक दिन पूर्व फागुन पूर्णिमा के रात होलिका का दहन किया जाता है। लोग घरों से लकड़ियां इकट्ठी करते हैं और अपने अपने मोहल्ले में अलग-अलग होली जलाते हैं। होली जलाने से पूर्व स्त्रियां लकड़ी के ढेर को फूलों का हार पहनाती हैं। उसकी पूजा की जाती है और रात्रि को उसे अग्नि की भेंट कर देते हैं। लोग होली के चारों ओर को नाचते और गाते हैं। होलिका दहन के अगले दिन रंगों से होली खेली जाती है। इस दिन मुंह पर अबीर, गुलाल, चंदन या रंग लगाते हुए गले मिलने का कुछ अलग ही आनंद होता है। निशाना साधकर पानी भरा गुब्बारा मारने में जो मजा आता है, वह सब जीवन की सजीवता को प्रकट करते हैं। चारों और अबीर-गुलाल, रंग भरी पिचकारी और गुब्बारों का समा बंध जाता है। छोटे-बड़े, नर-नारी सभी होली के रंग में रंग जाते हैं। इस प्रकार यह त्योहार संपूर्ण भारत को एकता के सूत्र में गिरोता है। 

Essay on Holi in Hindi For Class 4, 5, 6

होली भारत का सर्वाधिक उल्लास से मनाया जाने वाला महोत्सव है। इसके मूल में एक पौराणिक कथा इस प्रकार है। प्राचीन समय में हिरण्यकश्यप नामक एक दैत्य राजा था। वह स्वयं को भगवान मानता था। किंतु उसका पुत्र प्रहलाद भगवान विष्णु का अनन्य भक्त था। हिरण्यकश्यप ने उसे विष्णु भक्ति से दूर करने के लिए कई उपाय किए, किंतु प्रह्लाद ना माना। अंत में उसने अपनी होलीका नाम की बहन को प्रहलाद को मारने का काम सौंप दिया। होलिका को अग्नि में ना जलने का वरदान प्राप्त था। वह प्रहलाद को लेकर अग्नि में बैठ गई। किंतु भगवान की कृपा से प्रहलाद बच गया और होलिका जल गई। सारी प्रजा ने होलिका के जलने पर और प्रहलाद के बच जाने पर प्रसन्नता व्यक्त की और खुशियां मनाई। तभी से इस दिन को होली के उत्सव के रूप में मनाया जाता है। 

गांव गांव में फाल्गुनी पूर्णिमा की रात्रि को पहले से इकट्ठी की गई लकड़ियों के ढेर में आग लगा दी जाती है। तत्पश्चात लोग पूजा प्रदक्षिणा करते हैं और सभी वर्ण और वर्ग के लोग आपसी बैर-भाव व वैमनस्य भूलकर मिलजुल कर एक दूसरे पर अबीर-गुलाल लगाते हैं। सड़कों पर टोलियां बनाकर स्त्री-पुरुष, बूढ़े-बच्चे सभी लोग होली के गीत गाते हैं और प्रफुल्लित दिखाई पड़ते हैं। देश, काल, भेद से इस उत्सव को मनाने की प्रथा में अनेक भेद हैं। 

भारतवर्ष में मथुरा, वृंदावन तथा नंदगांव, बरसाने की होली प्रसिद्ध है। होलिकोत्सव ही संभवत प्राचीन काल में काम महोत्सव, वसंतोत्सव आदि रूपों में राजाओं द्वारा मनाया जाता था। अनेक वैज्ञानिक तथा आयुर्वेदिक दृष्टिकोण से भी इस महोत्सव के औचित्य का समर्थन किया जाता है। कुछ लोग इसे नव विक्रम वर्ष का स्वागत तथा कुछ नवान्न का स्वागत भी मानते हैं। 

होली के हुड़दंग में कहीं-कहीं मारपीट तेजाब फेंकने आदि की अप्रिय घटनाएं भी देखी सुनी जाती हैं। हमें प्रयत्न पूर्वक इन विकृतियों से सावधान रहना चाहिए। 

Essay on Holi in Hindi For Class 7, 8, 9 with Headings

प्रस्तावना : पर्व अथवा त्योहार में स्फूर्ति का संचार करते हैं। होली भी रक्षा बंधन, दीपावली, दशहरा की भांति भारत में मनाया जाने वाला एक प्रमुख पर्व है। यह पर्व फाल्गुन की पूर्णिमा के दिन मनाया जाता है। होली धार्मिक त्यौहार होने के साथ-साथ मनोरंजन का उत्सव भी है। यह अपने आप में उल्लास, उमंग तथा उत्साह लिए होता है। यह त्यौहार न केवल भारत बल्कि विदेशों में भी धूमधाम से मनाया जाता है। 

इस दिन घरों में गुजिया तथा अन्य मिठाइयां बनाई जाती हैं। सरकारी स्कूल, दफ्तर तथा अन्य कार्यालय इस दिन बंद रहते हैं। अबीर गुलाल तथा रंगो की दुकानों से बाजार सजा रहता है। पिचकारी की दुकानों पर बच्चों की लंबी कतार देखी जा सकती है। 

ऋतुपरिवर्तन का होली से सम्बन्ध : कुछ लोग होली को इसे शूद्रों का त्यौहार कहते हैं परंतु होली का अपना महत्व ऋतु परिवर्तन से है। यह वास्तव में ऋतु परिवर्तन की खुशी में मनाया जाने वाला त्यौहार है। होली ऋतुराज वसंत के दौरान मनाया जाने वाला त्यौहार है। इस दौरान ना तो अधिक गर्मी होती है और ना ही अधिक सर्दी। मौसम बड़ा सुहावना होता है। वृक्षों पर नई शाखाएं तथा पत्तियां निकलने लगती हैं। रंग-बिरंगे फूल अपनी छटा से मन मोहने लगते हैं। कोयल मधुर कंठ से राग अलापने लगती है। प्रकृति की यही शोभा होली मनाने की वास्तविक प्रेरणा है। 

इन दिनों गेहूं और जौ की फसल पकने लगती है। उत्तर प्रदेश के पूर्वी जिलों में तो फसल कट चुकी होती है। फसल की प्राप्ति की प्रसन्नता में किसान नाच उठते हैं। सरसों के पीले फूल की शोभा खेतों को सुशोभित कर रही होती है। मनुष्य प्रकृति को प्रश्न देख स्वयं ही उत्सव मनाने लगता है। संभवतः यही होली त्यौहार मनाने का मूल कारण है। इस दौरान वह सभी भाई-बंधुओं से मिलकर प्रसन्न होता है। रुठे हुए को मनाता है। बैर-वैमनस्य भूल जाता है। अबीर और केवड़ा मिलाकर रंग एक दूसरे पर डालता है। वस्त्रों पर रंग-बिरंगे छींटों की बहार होती है। टोलियों की टोलियां ठहाके लगाती, नाचती-कूदती, खेलती-खाती सड़कों पर निकल पड़ती हैं और कहती है-बुरा ना मानो होली है। 

होलिका दहन : यह पर्व फाल्गुन की पूर्णिमा के दिन मनाया जाता है। उस रात्रि को होलिका जलाते हैं। उसमें उपले, लकड़ियां, पुराने चरखे आदि डालकर प्रसन्नता मनाते हैं। गन्ने और धान भी उसमें डाले जाते हैं। देव पूजन व देव बली के रूप में नए अन्न का प्रयोग किया जाता है। तत्पश्चात होलिका की उस अग्नि में भूने गए प्रसाद को परस्पर बैठकर वितरित किया जाता है। 

होली का दृश्य : बंगाल और पंजाब के अधिकांश भाग में होली नहीं जलाई जाती है और पूर्णिमा के दिन ही रंग खेला जाता है। उत्तर प्रदेश में वसंत पंचमी के दिन से लोग सार्वजनिक स्थानों पर लकड़ियां जमा करना आरंभ कर देते हैं। पूर्णिमा की रात को लकड़ियों के ढेर में आग लगाकर उसके चारों और नाचते और गाते हैं। अगले दिन अर्थात प्रतिपदा के दिन रंग खेला जाता है। छोटे बड़े सभी मिलकर रंग खेलते हैं। लोग अपने इष्ट मित्रों के घर जाकर एक दूसरे पर रंग डालते और अबीर गुलाल मलते हैं। मेहमानों को मिठाई आदि खिलाकर और गले मिलकर विदा किया जाता है। कई स्थानों पर दो-दो तीन-तीन दिन रंग खेला जाता है। कुछ लोग राह चलते पर भी रंग, मिट्टी, गोबर आदि डालते और भद्दी गालियां देते हैं। यह इस पर्व पर कलंक है। 

होली का पौराणिक महत्व : इस पर्व के साथ यह पौराणिक कथा भी जुड़ी हुई है। होलिका, हिरण्यकश्यप राक्षस की बहन थी। उसे वरदान प्राप्त था कि वह आग में भी नहीं जलेगी। उसी राक्षस का पुत्र प्रहलाद पिता की इच्छा के विरुद्ध ईश्वर पर विश्वास रखता था। पिता के समझाने धमकाने और दंड से भी वह अपने निश्चय से विचलित ना हुआ। राक्षस को अपने पुत्र के इस कृत्य पर बहुत गुस्सा आया। वह अपने पुत्र को मार डालना चाहता था। उसने प्रहलाद को पर्वत से गिराया, सांपों से कटवाया। परंतु प्रहलाद फिर भी जीवित रहा। अंत में हिरण्यकश्यप ने उसे अपनी बहन होलिका के सुपुर्द कर दिया। होलिका प्रह्लाद को गोद में लेकर आग में बैठ गई। किंतु वह जल गई प्रहलाद का कुछ भी ना बिगड़ा। 

प्राचीन काल में होली : प्राचीन काल में इस पर्व को यज्ञ के माध्यम से मनाया जाता था। मनुष्य भाव उस समय प्रधान होता था। समाज में ऊंच-नीच की भावना छोटे-बड़े की भावना विद्यमान ना थी। सभी लोग मिल-जुल कर इस पर्व को मनाते थे। प्रीतिभोज आयोजित किए जाते थे। गीतों के भी उत्सव होते। जगह-जगह मिठाईयां बांटी जाती। नववर्ष की योजनाएं बनाई जाती। बीते वर्ष की न्यूनताओं पर विचार किया जाता। 

उपसंहार : धीरे-धीरे यह पर्व विकृत हो गया है। इसमें शराब और ताड़ी का प्रयोग होने लगा है। चलते फिरते राहगीरों पर कीचड़ उछालना, गाली देना, भद्दे वाक्य प्रयोग करना, स्त्रियों का भी लिहाज ना करना एक साधारण सी बात हो गई है। इससे सभ्य समाज में यह पर्व अपना महत्व खोता जा रहा है। फिर भी छोटे बड़े सभी इस त्यौहार को मिलकर मनाते हैं। इस अवसर पर छोटे-बड़े ऊंच-नीच आदि का कोई भेद नहीं रह जाता। यही इस पर्व की विशेषता है। 

Essay on Holi in Hindi For Class 10, 11, 12 with Headings

प्रस्तावना : हंसी ठिटोली का प्रतीक होली का त्यौहार रंगों व उमंग तथा उत्साह का त्यौहार भी कहलाता है। दो दिवसीय इस त्योहार में पहले दिन पूर्णिमा को होली दहन और दूसरे दिन प्रतिपदा को धुलेंडी कहा जाता है। होली दहन के दिन गली-मौहल्लों में लकड़ियों की होलिका बनाई जाती है। शाम के समय महिलएं उसका पूजन करती हैं। इस प्रकार श्रद्धापूर्वक होली का पूजन संपन होता है। अगले दिन अर्थात धुलेंडी के दिन सभी सरकारी कार्यालयों समेत निजी संस्थानों में अवकाश रहता है। होली भारत का एक ऐसा पर्व है जिसे देश के सभी धर्मों के लोग मिलकर मनाते हैं।

हमारे देश में शायद ही कोई ऐसा दिन हो जो किसी न किसी त्योहार पर्व से संबधित न हो। दशहरा, रक्षाबन्धन, दीवाली, रामनवमी,वैशाखी, बसंत पंचमी, मकर संक्रांति, बुद्ध पूर्णिमा आदि धार्मिक त्योहार करीब-करीब देश के कोने-कोने में मनाये जाते हैं। कुछ त्योहार ऐसे भी हैं जिन्हें सिर्फ क्षेत्रीय स्तर पर मनाया जाता है। होली धार्मिक त्यौहार होने के साथ-साथ मनोरंजन का उत्सव भी है। यह अपने आप में उल्लास, उमंग तथा उत्साह लिए होता है। इसे मेल व एकता का पर्व भी कहा जाता है। यह त्यौहार फाल्गुन मास की पूर्णिमा के दिन बड़ी धूम-धाम से मनाया जाता है। बृज क्षेत्र में इस त्यौहार का रंग करीब पखवाड़े भर पूर्व चढ़ना शुरू हो जाता है।

पौराणिक महत्व : होली के पीछे भी एक पौराणिक कथा है। दैत्यराज हिरण्यकश्यपने अपनी प्रजा को भगवान का नाम न लेने का आदेश दे रखा थालेकिन उसके बेटे प्रहलाद ने अपने पिता के इस आदेश को मानने सेइंकार कर दिया। बार-बार समझाने पर भी जब वह नहीं माना तो उसके पिता हिरण्यकश्यप ने उसे मारने के अनेक प्रयास किए, किन्तु उसका बाल भी बांका नहीं हो सका । हिरण्यकश्यप की बहन होलिका को आग में नहीं जलने का वरदान प्राप्त था। होलिका प्रहलाद को गोद में लेकर लकड़ियों के ढेर पर बैठ गई और लकड़ियों में आग लगा दी गई। प्रभु की कृपा से वरदान अभिशाप बन गया। होलिका जल गई, मगर प्रहलाद को आंच तक न पहुंची। इसीलिए होली से एक दिन पहले होलिका जलायी जाती है।

वसंत ऋतू और होली : इस त्योहार को वसंत ऋतु से संबंधित भी माना जाता है। इस अवसर खेतों में लगी फसलें पककर तैयार हो जाती हैं जिन्हें देखकर किसान खुशी से झूम उठते हैं। वे खेतों में खड़ी पकी फसल की बालियों को भूनकर उनके दाने मित्रों व सगे संबंधियों में बांटते हैं। 

होली के दिन का दृश्य : धुलेंडी के दिन होली का हुडदंग सुबह सात-आठ बजने के साथही शुरू हो जाता है। बच्चों द्वारा इसकी शुरुआत की जाती है। उन्हें देख बड़े भी उत्साहित हो उठते हैं। इसके बाद से तो टोलियों में लोग गली-मोहल्लों में निकल पड़ते हैं। घर-घर जाकर वे एक दूसरे को गुलाल लगा व गले मिल होली की बधाई देते हैं। गलियों व सड़कों से गुजर रही टोलियों पर छतों पर खड़े लोगों द्वारा रंगीन पानी की बाल्टियां उडेली जाती हैं। बच्चे पिचकारी से पानी फेंककर व गुब्बारे मारकर होली का आनन्द लेते हैं। चारों ओर लोग टोलियांमें एकत्र हो ढोल की थाप पर होली है भई होली है के तर्ज पर गानेगाते हैं। वृद्धों में भी इस त्यौहार पर उमंग व उत्साह का रंग चढ़जाता है। दोपहर दो-तीन बजे तक रंगों का खेल समाप्त हो जाता है। इसके बाद से घरों से बाहर निकले लोग घरों को लौटने लगते हैं। 

उपसंहार : कुछ लोग सारे दिन शराब आदि का सेवन कर अपने आप में झगड़ने लगते हैं। जो कि उमंग व खुशी के इस त्योहार में रंग में भंग डालने का काम करता है।

Long Essay on Holi in Hindi with Headings

अपने मूल रूप में प्रकृति अनेक रंगों की जननी और रसभरी है। उसी प्रकृति कापर्यायवाचक होली रंगों का त्योहार है। वासन्ती रंगों का प्रतीक यह त्योहार प्रत्येक वर्ष फाल्गुन में मनाया जाता है। इस कारण इसे फाल्गुनी भी कहा जाता है । फाल्गुन मस्ती का महीना है। उज्ज्वल वासन्ती वातावरण और चारों तरफ शीतल-मन्द-सुगन्ध से पूरित पवनकी अठखेलियों के कारण रंगीनियाँ और भी बढ़ जाती हैं। प्रकृति का रंगीन वातावरण नयीउमंगें और नयी तरंगें लेकर आता है। वृक्षों ने नये अँखुए थोले, नयी कोपलें निकलीं,वसन्त ने मंजरियों का नया ताज पहनाया और उसके साथ मानव-प्राण में नया रुधिर दौडनेलगा। फिर क्यों न आबाल-वृद्ध, स्त्री-पुरूप के हृदय में भी नया जोश उत्पन्न हो ? यहमस्ती, ये अठखेलियाँ और यह जोश होली का त्योहार बनकर खेतों, खलिहानों और मैदानों में उतरता है। उससे प्रेरणा पाकर जन-मानस भी रंग-गुलाल उड़ाने लगता है। हर वर्ष होली की प्रतीक्षा बड़ी उत्सुकता से की जाती है । हर गली, हर गाँव और हरनगर में कई दिन पहले से ही होली खेलने की तैयारियाँ आरम्भ हो जाती हैं। रंग इकट्टे किये जाते हैं, योजनाएँ बनायी जाती हैं कि किस-किस को शिकार बनाया जाये। ढोलकझाँझ, करताल व मजीरों के संगीत में मस्त गली-गली में घूमती टोलियाँ फाग और होलीके गीत गाती मस्ती में खो जाती हैं। फाल्गुन मास में मनाये जाने के कारण इस त्योहारको केवल फाग, फगुआ या फाग का त्योहार भी कहा जाता है।

होलिका दहन: होली यौवन की मस्ती का त्योहार माना गया है। अत्यन्त प्राचीनकाल से भारत में यह एक लोकोत्सव के रूप में प्रचलित है । आबाल-वृद्ध नर-नारी इस लोकोत्सव में भाग लेते हैं। मुख्य त्योहार दो दिन मनाया जाता है। पहले दिन बालक और बालिकाएँ घर-घरघूम-घूमकर लकड़ियाँ इकट्ठी करते हैं। वह फाल्गुन की पूर्णिमा की रात होती है, अतः चन्द्रमाभी अपने पूरे यौवन पर होता है। पूरे हर्ष और उल्लास के साथ मन्त्र-पाठ के अनन्तर पवित्र अग्नि जलायी जाती है जिसे होलिका दहन कहते हैं। कुमारी युवतियाँ भक्ति और श्रद्धा से अग्नि देव को नारियल समर्पित करती हैं। इसके साथ ही अनेक प्रकार के लोक-गीतों की धुनों से सारा वातावरण मुखरित होने लगता है। मन उन धुनों पर नाच उठता है।

धुलेंडी या रंग खेलने का दिन: होली का दूसरा दिन होता है धुलेंडी । पौ फटते ही एक ओर सूर्य प्रकाश में रंग बिखेर देता है, दूसरी ओर धरती पर रंगों की धूम मच जाती है। बच्चों, बूढ़ों, युवक और युवतियों,में एक-दूसरे पर रंग डालने की होड़-सी लग जाती है । वातावरण हुलसित होकर कहकहोंसे गूंजने लगता है। रंग की पिचकारियाँ खुशी के फव्वारे छोड़ने लगती हैं। हुड़दंग जीवनमें एक नया रंग भर देता है। कोई भी कलाकार भारत के उस विशाल चित्र को चित्रितनहीं कर सकता, जो होली के रंगों में निखर उठता है। होली खेलने के इस दिन सारी वर्जनाएँ एक ओर रख दी जाती हैं। लजीली युवतियाँ, मुखर युवक, गम्भीर राजनीतिज्ञऔर कर्मठ मज़दूर, सभी बाँहों में बाँहें डाले रंगों के छींटों में एकाकार हो जाते हैं। होली ही वह त्योहार है, जिसमें अमीर-गरीब का भेदभाव नहीं रहता। इस दृष्टि से इसे मानवीयउमंगों का मिला-जुला त्योहार कहा जा सकता है।

होली और भक्त प्रह्लाद की कथा: होली का केवल यही एक पक्ष नहीं। उसका एक सांस्कृतिक, ऐतिहासिक और धार्मिक रूप भी है, कहते हैं कि इस पर्व का सम्बन्ध भक्त प्रह्लाद से भी है। वह हिरण्यकश्यप का पुत्र था। पिता कट्टर नास्तिक था तो पुत्र कट्टर आस्तिक। भला उन दोनों का कैसे निर्वाह होता ! पिता ने आदेश दिया, 'यदि तुम मेरे पुत्र हो तो मुझे अपना भगवान् मानो, अन्यथा मृत्यु का आलिंगन करने को प्रस्तुत हो जाओ ।' प्रह्लाद ने स्वीकार किया दूसरा विकल्प–मृत्यु हिरण्यकश्यप ने उसे दण्डित करने का आदेश दे दिया। संयोगवश प्रहाद की बआ होलिका को यह वर प्राप्त था कि अनि उसे जला नहीं सकती। भाई की योजनानुसार वह प्रह्लाद को गोद में लेकर अग्नि में प्रविष्ट हो गयी । भगवान् की करनी ऐसी हुई कि होलिका तो जल गयी, किन्तु प्रह्लाद का बाल भी बाँका न हुआ। सम्भव है, इसी कथा के और होलिका के नाम पर होलिका-दहन का रिवाज़ चला हो और इस पर्व का नाम होली पड़ गया हो।सामान्य जन इसी पौराणिक कथन के आधार पर ही होली जलाते और भक्त प्रह्लाद की विजय को मनाने के लिए रंग खेलते हैं।

होली का फसल से सम्बन्ध: इस पर्व का सम्बन्ध कृषि से भी है । कुछ लोग इसे उस शुभ दिन की याद में भी मनाते हैं कि जब मानव ने पहली बार अन्न उगा उसकी बालियों को आग में भून पहलीबार उसका स्वाद लिया था। होली का अर्थ है होलाँ या होरा, अर्थात् कच्चा अन्न होली के दिनों में चने और गेहूँ के दाने अधकचे-अधपके तैयार हो जाते हैं। उन्हें अग्नि में भूनकर खाने में बड़ा स्वाद आता है। गाँव का किसान अपने खेत का  पहला-पहला अन्न स्वयं तोड़कर खा ले और अग्नि में उसकी आहुति न दे, यह कैसे हो सकता है? अतः प्राचीनकाल में एक सामूहिक यज्ञ किया जाता था। उस यज्ञ के प्रसाद के रूप में होरे बाँटे जाते थे। उसी यज्ञ का आधुनिक रूप होली है। आज भी होलिका-दहन के समय लोग अन्न की बालियाँ भूनकर खाते हैं और इस प्रकार प्रकृति पर मानव की पहली विजय का उत्सवधूमधाम से मनाते हैं।

अन्य पौराणिक मान्यताएं: एक अन्य पौराणिक कथा के अनुसार इसी दिन श्री कृष्ण ने पूतना राक्षसी का वध किया था। एक कथा यह भी है कि ढंढला नाम की एक राक्षसी थी। उसे पार्वती जी से यह वर मिला था कि वह जिस बालक को चाहे खा ले, किन्तु जो बालक ऊधम करते नाचते-गाते मिलेंगे, उन्हें वह नहीं खा सकेगी। कहते हैं बालक घुलैंडी के दिन हाथ-मुँह रँगकर विशेष रूप से हुड़दंग मचाया करते हैं। इस प्रकार होली केवल एक त्योहार नहीं अपितु अनेक घटनाओं और उनके साथ जुड़े विश्वासों का साकार रंगीन रूप भी है। इसीलिए इस दिन लोग अपने सारे बैर-भाव भुलाकर एक-दूसरे के गले मिलते हैं। 

उपसंहार: सचमुच,कितने मूर्ख हैं वे लोग जो इस पुण्य अवसर पर शराब पीते, कीचड़ उछालते और अश्लीलता का प्रदर्शन करके इस पवित्र पर्व के रूप को बिगाड़ते है ! यह दिन तो रंग मलने, गीत-गाने, नाचने, उछलने, बिछड़ों से गले मिलने तथा वसन्त का आनन्द मनाने का है। प्रकृति-पुत्रों के अपनी माँ प्रकृति की गोद में मग्न-मस्त हो जाने का दिन है। इसके साथ जो बुराइयाँ जुड़ गयी हैं, उन्हें त्याग कर इसके विशुद्ध स्वरूप की रक्षा की आज बहुत आवश्यकता है।

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