Saturday, 6 April 2019

चुनाव स्थल के दृश्य का वर्णन। Chunav ka Drishya par Nibandh

चुनाव स्थल के दृश्य का वर्णन। Chunav ka Drishya par Nibandh


आम चुनाव होने वाले थे। तारीख निश्चित हो चुकी थी। प्रत्येक पार्टी अपने अपने उम्मीदवार की विजय के लिए निरंतर प्रयत्नशील थे। झूठे सच्चे प्रलोभन दिखाकर जनता को भ्रमित किया जा रहा था। कोई कहता था कि मैं ऊपर जाकर किसानों के कर हटवा दूंगा, कोई कहता था कि मैं बिक्री कर कम कराऊँगा, कोई कहता था कि मैं भारतवर्ष की गरीबी को दूर कर गरीबों और अमीरों दोनों को एक आसन पर बैठाने का प्रयत्न करूंगा, कोई कहता था कि मैं भारत को इसका पुराना स्वर्णिम काल, इसका पुराना वैभव, इसकी पुरातन शक्ति और संगठन पुनः प्राप्त कराने का प्रयत्न करूंगा। कोई कोई अपने पुराने त्याग और बलिदान की कहानी सुनाकर पुराने तपे हुए नेताओं के नाम की दुहाई देकर ही वोट मांगता था। अजीब दृश्य था। जनता को नित्य नये नये प्रलोभन दिये जा रहे थे। जनता हैरान थी कि किसकी बात मानी जाये और किसकी न मानी जाये। जो बहुत पुराने आदमी थे, वे गांधी बाबा का गुण गाते थे। जो नये थे और जिन्होंने केवल शहर देखाभर था, ज्यादा पढ़ लिखे नहीं थे, वे केवल पंचायती पुस्तकालयों में कभी कभी अखबार की मोटी सुर्खियों पर नजर डाल लिया करते थे वे बिना पढ़ लिखे पर तर्क वितर्क से अपना रोब गाँठते थे, और अपने पक्ष में वोट डालने की जब तक हां न करा लेते तब तक उन बेचारे निरक्षरों का पीछा न छोड़ते। 

गांव बड़ा था और शहर के पास ही था इसलिए शहर में जब कोई नेता जिस पार्टी का आता, बस हमारे गांव में अवश्य आता. भगवे झण्डे, लाल झण्डों और तिरेगें झण्डों की चारों ओर धूम मच रही थी। अपनी अपनी दुकानों और मकानों पर लोगों ने झण्डे लगा रखे थे, जो उनकी अभिरूचि के प्रतीक थे। उन्हें देखकर मतदाता से यह पूछने की आवश्यकता न होती थी कि तुम किसे वोट दोगे? पुरूषों की भांति महिलाओं में भी एक नई जागृति दिखाई पड़ रही थी। भिन्न भिन्न पार्टियों की स्वये सेविकायें घरों में जातीं और अपने पक्ष में वोट डालने के लिए गृहणियों से प्रार्थना करतीं। तरह तरह के झण्डे लेकर बच्चों की टोलियां गलियों में नारे लगाती हुई घूमती थीं। कोई हाथी वाले को वोट डालने को कहता, कोई शेर वाले को, कोई बैलों को, तो कोई बरगद को, कोई फूल को, तो कोई साइकिल को, कोई दीपक को, तो कोई सूरज को।

प्रचार कार्यों से जनता ऊब चुकी थी। माइक की आवाज से उनके कान बहरे हो चुके थे। दूध और दही की नदियों के स्वप्न देखते देखते लोग थक चुके थे। सब चाहते थे कि निर्वाचन का दिन जल्दी से आ जाये। पार्टियों में तोड़ फोड़ अपनी सीमा पार करती जा रही थी। कल जिसके जीतने की आशा थी, आज उसे अपनी पराजय के लक्षण दिखाई पड़ने लगे और जो कल रात तक अपने को हारा हुआ समझे बैठा था, रानीति ने ऐसा पलटा खाया कि आज उसे शत प्रतिशत जीतने की आशा होने ललगी। चौपालों पर, खलिहानों में, दुकानों पर, घरों के चबूतरों पर, मोटरों के अड्डे पर, यहां तक कि पनघटों पर भी वोट की ही चर्चा हो रही थी। जहां भी चार आदमी इकट्टठे खड़े हो जाते वहां यही चर्चा होती कि वह जीता और वह जीता। 

सहसा वह दिन भी आ गया जिस दिन प्रत्येक नागरिक अपने देश से भाग्य विधाता को चुनने के लिए उत्सुक था। चुनाव से एक दिन पहले ही पुलिस का एक छोटा दस्ता गाँव में आ चुका था। चुनाव स्थल की रक्षा तथा जनता में व्यवस्था और अनुशासन का भार पुलिस पर था,क्योंकि पिछले चुनाव में हमारे ही गांव में निर्वाचन स्थल पर खूब लाठी चली थी, लोगों कि सिर फटे थे। हमारे गांव का मालवीय इण्टर कॉलेज ही निर्वाचन स्थल था। एक दिन पहले ही शाम को चुनाव अधिकारी भी गांव में आ गये थे। उनमें शहर के गवर्नमेंट कॉलिज के प्रिंसिपल प्रिजाइडिंग ऑफिसर थे, उनके साथ चार पाँच पोलिंग ऑफिसर थे, जो भिन्न भिन्न विभागों के सरकारी कर्मचारी थे। उनके पास कुछ सामान भी था, उनके साथ वोटिंग मशीन भी थी जिसमें चुनाव चिन्ह के सामने वाला बटन दबाते ही उस चिन्ह वाले प्रत्याशी के पक्ष में मतदान सम्पन्न हो जाता है। प्रिजाइडिंग ऑफिसर ने निर्वाचन स्थल का निरीक्षण किया जहां पहले से ही बूथ बने हुए थे। 

सुबह होते ही गांव में चहल पहल नजर आने लगी। चारों ओर सफाई और  स्वच्छता नजर आथी थी। आज गांव वालों ने अपने खेतों और खलिहानों के काम बंद कर दिये थे। वे सुबह ही नहा धोकर अपनी अपनी मूंछों को ऐंठते हुए अपनी अपनी पार्टी के साथ जा मिले थे। स्त्रियां भी घरों में वोट डालने की उत्सुकता में, जल्दी जल्दी काम धाम कर रही थीं। तरह तरह के खोमचे वालों की आवाजों से गांव में एक गूँज फैल रही थी। शहर के पास होने के कारण, दस बीस रिक्शे  वाले भी गाँव में नजर आ रहे थे। धुले और प्रेस किए कोट पैन्टों में, कुछ नई शक्लें आज गांव में नजर आ रही थीं, ये थे निर्वाचन में विशेष रूचि रखने वाले शहर के कुछ राजनीतिक ठेकेदार। निर्वाचन स्थल से सौ गज की दूरी पर अर्थात् कॉलिज के गेट के बाहर सभी पार्टियों ने अपने अपने शामियाने लगा रखे थे, चांदनियां बिछी थीं, कुछ लोग कुर्सियों पर बैठे थे और कुछ चाँदनियों पर। जो लोग चाँदनी पर थे उनके आगे लम्बी-लम्बी लिस्टें खुली थीं, जिनमें मतदाताओं के नाम थे।

प्रातः आठ बजे से मतदान प्रारम्भ होने वाला था। अभी थोड़ा-सा समय शेष था, गांव के चारों ओर की सड़कें भरी चली आ रही थीं। लोगों में उत्साह था, उमंग थीं अपने प्रतिनिधि को जिताने की। आस-पास के गाँवों के वोट इसी मतदान केन्द्र पर पड़ने थे, इसलिये देखते ही देखते गाँव में एक विशाल जनसमूह इकट्ठा हो गया। तरह-तरह की पोशाकें और तरह-तरह की मुखाकृतियाँ। कोई सिर पर पगड़ी बाँधे था तो कोई साफा, कोई टोपी पहने था तो किसी ने सिर पर कपड़ा ही रख रखा था। नई रोशनी के नवयुवकों के सिरों में सीमा से अधिक तेल चमक रहा था। किसी की माँग टेढ़ी थी, तो किसी की सीधी। कुछ ऐसे भी थे जिन्हें देखकर यह मालूम पड़ता था, ये साबुन से नहाकर आये हैं। कोई साइकिल पर चला आ रहा था, कोई अपने घोड़े पर, किसी ने अपना बैल ताँगा ही काम में लिया था। जिनके पास घोड़े या साइकिलें नहीं थीं, वे पैदल ही मस्ती भरे गीत गाते हुये चले आ रहे थे। शहर में तो जिस व्यक्ति को आप अपना मत देने जा रहे हैं। वह आपकी सवारी का भी इन्तजाम करता है, परन्तु पक्की सड़कें न होने के कारण गाँव में यह सुविधा नहीं होती।

समय से पहले ही प्रिजाइडिंग ऑफीसर ने सभी पार्टियों के पोलिंग एजेन्टों को बुलाकर वोटिंग मशीनों को चैक कराया कि किसी को यह सन्देह न रहे कि मशीन में कोई त्रुटि है अथवा किसी का चुनाव चिन्ह उस पर है अथवा नहीं। घड़ी ने आठ बजाये, मतदान प्रारम्भ हो गया। मतदाताओं की पंक्ति लग गई। पोलिंग स्टेशन बड़ा होने के कारण चार बूथ पुरुषों के लिये थे और एक बूथ स्त्रियों के लिए। प्रत्येक बूथ पर काम करने के लिये अलग-अलग पोलिंग ऑफीसर थे। मतदाता अपनी-अपनी पार्टी से अपनी पर्ची लिखकर लाता था, कुछ, जो किसी पार्टी से सम्बन्धित नहीं थे, वे सीधे भी चले जाते थे। पहिले एक अधिकारी मतदाता के सीधे हाथ की उंगली में न मिटने वाली स्याही का एक चिन्ह लगाते थे, जिससे यह मालूम पड़ जाये कि कौन व्यक्ति मतदान कर चुका है। इसके बाद दूसरा अधिकारी मतदाता का नम्बर चैक करता था और मतदाता के परिचय पत्र से उसकी पहचान करता था। यह सभी उसे पोलिंग बूथ में जाकर एकान्त में करना पड़ता था। इसलिये इसे गुप्त मतदान कहा जाता है और अब तो मतदान की प्रक्रिया में अधिक गोपनीयता बनाये रखने के लिये महत्त्वपूर्ण परिवर्तन किए गए हैं। सरकार की ओर से परिचय-पत्रों की व्यवस्था की गई है। जिससे एक के स्थान पर दूसरे के वोट डालने की सम्भावना समाप्त हो जाये। इसका श्रेय पूर्व मुख्य चुनाव आयुक्त श्री शेषन को है। पुरुषों और स्त्रियों के लिये वोट देने की अलग-अलग व्यवस्था की गई थी। पुरुषों के लिये पुरुष पोलिंग ऑफीसर और स्त्रियों के लिये महिला पोलिंग ऑफीसर थी। स्त्रियों के लिए पोलिंग एजेन्ट भी महिलायें ही थीं। यदि कोई अन्धा, रुग्ण या अशक्त व्यक्ति मतदान करने आता तो प्रिजाइडिंग ऑफीसर उसकी सहायता करते थे। कोई-कोई ऐसा व्यक्ति अपने साथ सहायक भी लाता था। वह जिस चिन्ह को बताता था। उसका बटन दबा देता था। इस प्रकार दोपहर तक खूब भीड़-भाड़ रही। 60 वर्षों में भारत की जनता चतुर हो चुकी है। लोग बाहर वायदा कुछ करके आते थे, परन्तु भीतर जाकर अपनी इच्छानुसार किसी को भी मत देते थे।

इलैक्ट्रॉनिक वोटिंग मशीन के आविष्कार से मतदान प्रक्रिया अधिक सरल और विश्वसनीय हो गई है। इससे फर्जी मतदान की संभावनायें भी कम हो गई हैं और मत-पत्रों को इकट्ठा करने, छाँटने और गिनती करने का कार्य समाप्त हो गया है। मतदाता को केवल अपने चुने हुए प्रत्याशी के चुनाव चिन्ह पर बटन दबाना होता है। चुनाव परिणाम भी थोड़े से समय में ही घोषित हो जाते हैं।

कुछ मतदाताओं पर पोलिंग एजेन्टों ने उनके सही व्यक्ति होने पर सन्देह प्रकट किया और झगडा बढ़ने लगा। प्रिजाइडिंग ऑफीसर ने उनका चेलेजिंग वोट डलवा दिया तथा चेलेंज करने वाले पोलिंग एजेन्टों से चेलेंज की फीस ली। ऐसे वोटों का निर्णय गणना के समय चुनाव अधिकारी किया करते हैं। बीच-बीच में कभी-कभी शहर की ओर से दौड़ती हुई मोटरकार आती और निर्वाचन स्थल का निरीक्षण करते, प्रिजाइडिंग ऑफीसर से बातें करते और फिर लौट जाते। बाद में पूछने पर कभी पता चलता कि ए० डी० एम० प्लानिंग थे, दौरे पर आए थे, कभी मालूम पड़ता कि वे डिस्ट्रिक्ट मजिस्ट्रेट थे।

दोपहर के बाद भीड़ जब कुछ कम हुई तो मैं भी मतदान करने गया। स्याही लगी, बूथ पर जाने के लिए रास्ता बता दिया गया।

पांच बजने में कुछ समय शेष रह गया था, अधिकांश भीड़ जा चुकी थी। सभी पार्टियों के प्रतिनिधि वोटों का अनुमान लगाने में व्यस्त थे कि इस पोलिंग बूथ पर किस पार्टी को कितने मत मिले। सहसा पाँच का घण्टा बजा, मतदान बन्द करने की घोषणा कर दी गई, परन्तु पोलिंग सेशन में जितने आदमी पहुँच चुके थे, उन्हें मतदान करने का अधिकार था। एक सरकारी ट्रक आया, जिसमें मशीन रख दी गयी। सभी अधिकारी उसमें बैठ गये। ट्रक धूल उड़ाता हुआ नगर की ओर चल दिया। अब गाँव की छोटी-छोटी दुकानों और खोमचों वालों का मेला भी समाप्त हो चुका था, परन्तु अभी हार-जीत की चर्चा समाप्त नहीं हुई थी।

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