Sunday, 3 March 2019

यदि मैं पुलिस अधिकारी होता पर निबन्ध। Yadi mein Police Adhikari Hota

यदि मैं पुलिस अधिकारी होता पर निबन्ध। Yadi mein Police Adhikari Hota

अगर मैं एक पुलिसकर्मी होता, तो मैं अपनी वर्दी की गरिमा बनाए रखने की पूरी कोशिश करता। जैसा कि हम सभी जानते हैं, पुलिस का काम देश में कानून और व्यवस्था बनाए रखना है, इसलिए मैं उन सभी को दंडित करता है जो किसी भी तरह से देश के कानूनों को तोड़ते हैं। परन्तु यदि मैं पुलिस अधिकारी होता तो मैं सिपाही होता या दरोगा ?

इसलिए मैं अपने को मानकर चलता हूं थाना प्रभारी। जो एक पुलिस अधिकारी होता है और अपने क्षेत्र की सुरक्षा का प्रहरी होता है। यदि मैं थाना प्रभारी होता तो अपने क्षेत्र में व्यवस्था और शांति रखना मेरा कर्तव्य होता और जनता की निर्भीकता से मैं रक्षा करता। 
लोगों की जेब काटना, गले से चैन खींचना, कीमती सामान चोरी होना आदि घटनाएं पुलिस की जानकारी में होती है। असामाजिक तत्व पुलिस की शह पर ही ऐसा दुस्साहस करते हैं। एक कर्तव्यनिष्ठ पुलिस अधिकारी के नाते अपने क्षेत्र के गुंडों का क्षेत्र में जीना हराम कर देता या तो वे सुधर जाते हैं या मेरा क्षेत्र छोड़कर भाग जाते।

लड़कियों को छेड़ना, तंग करना, उन्हें उठाना, उनसे बलात्कार करने वाले गुंडों को ढूंढ कर उन्हें ऐसा सबक सिखाता कि जिंदगी भर याद रखते। बाजार में सड़कों के किनारे पटरी पर स्थाई और अस्थाई दुकानदार कब्जा कर लेते हैं। ये दुकानदार सरकारी जमीन को अपनी जायदाद समझकर उस पर कई प्रकार की दुकानें बना लेते हैं। यह सब पुलिस के और नगर निगम के कर्मचारियों की कृपा का फल है। मैं पुलिस अधिकारी होता तो अपने क्षेत्र में पटरी पर चलने वाले यात्रियों के अधिकार का हनन सहन नहीं करता। पटरियों पर अधिकार जमाने वालों को हटाकर यात्रियों को उनका अधिकार दिलवाता।

थाने का क्षेत्र बहुत बड़ा और पुलिसकर्मियों की संख्या बहुत कम होती है फिर पुलिस कब और कहां तक चौकसी करें इसलिए चोरी डकैती करने वालों तो रात को ही साहस करते हैं। मैं इसका दायित्व उस क्षेत्र के  A.S.I. पर डालता। उसको मजबूर करता कि वह अपने कर्तव्य को समझे और उसे पूरा करे।

क्षेत्र में सामाजिक, राजनीतिक या धार्मिक, सरकारी उच्च अधिकारी तथा अति विशिष्ट व्यक्ति रहते हैं। यह लोग अपने अधिकारों का प्रयोग कर कानून की सीमा में रहकर नहीं करते। प्रायः पुलिस का वरिष्ठ अधिकारी भी इन पर हाथ डालने से डरता है। मैं ऐसे लोगों को कानून की भाषा पुलिस के हाथों से समझा देता ताकि वह अपनी मर्यादा में रहें और दूसरों के अधिकारों का अतिक्रमण ना कर सके। 

आजकल समाज में दो प्रकार के अपराधियों का बोलबाला है (1) दिन में डाके डालने वाले और हत्या करने वाले और (2) बम विस्फोट करने वाले। ये दोनों दुष्ट तत्व इतने मनोवैज्ञानिक विधि से काम करते हैं कि सांप भी मर जाए और लाठी भी नहीं टूटे। डाके मारना इनका धंधा है और बम विस्फोट कर आतंक फैलाना उनका स्वभाव। सच्चाई यह है कि हम पुलिस अधिकारी इस कार्य के लिए प्रशिक्षित नहीं है। सिवाय दौड़ और धूप के कुछ नहीं कर पाते। कभी-कभी बिल्ली के भाग्य से छींका टूट जाता है और कोई डाकू गिरोह या आतंकवादी पकड़ा जाता है। वरना हम असहाय हैं, बेचारे हैं। इसलिये मैं अपने सभी पुलिसकर्मियों को चुस्त-दुरुस्त रखता जिससे वह ऐसे प्रशिक्षित अपराधियों का सामना सके।  

मैं थाना परिसर में आने वाले प्रत्येक व्यक्ति की बात सुनता, रिपोर्ट लिखाता, उसके साथ बिना पक्षपात के यथासंभव न्याय करता। मंदिर में देव-प्रतिमा अपने आराधक से कुछ मांगती नहीं। स्वयं आराधक ही अपनी ओर से देव चरणों में भेंट रखता है। इसी प्रकार जो लोग यह समझते कि बिना भेंट चढ़ाए पुलिस काम नहीं करती या काम होने के बदले पुरस्कृत करना चाहते हैं तो मैं उसे पत्र-पुष्प समझ कर स्वीकार करता। क्योंकि भक्ति से अर्पित पत्र-पुष्प भगवान को भी प्रिय लगते हैं।

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