Sunday, 24 February 2019

क्लोनिंग के लाभ तथा हानि पर निबंध Essay on Cloning in Hindi

क्लोनिंग के लाभ तथा हानि पर निबंध Essay on Cloning in Hindi

Cloning in Hindi
वैज्ञानिक क्‍लोनिंग पर वर्षो से शोधरत है। पादपों के विषय में तो आशातीत सफलतायें मिली हैं, किंतु प्राणियों पर अनुसंधान करने वाले वैज्ञानिकों की उपलब्‍धियाँ विशेष रूप से चर्चित रही हैं क्‍योंकि प्राप्‍त सफलताओं ने मानव-क्‍लोन बनाने के लिए संभावनाओं के द्वार खोल दिए हैं।
क्‍लोन ऐसा जीव है जिसको बनाने के लिए केवल एक ही जनक माता अथवा पिता की आवश्‍यकता होती है और वह भी अलैंगिक तरीके से। इस प्रकार बना हुआ क्‍लोन अपने जनक से न केवल शरीरिक रूप से समान होता है वरन आनुवांशिक रूप से भी उसी जैसा होता है।

लैंगिक प्रजनन में आमतौर से सं‍तति में माता-पिता दोनों के ही आधे-आधे आनुवांशिक लक्षण आते हैं। वैसे परम्‍परागत रूप से क्‍लोनिंग उद्यान विज्ञानियों में प्रचलित रहा है जहाँ वृक्ष की एक टहनी से पूरा वृक्ष तैयार करते हैं। ग्रीक भाषा में क्‍लोन का अ‍र्थ टहनी है और अब प्राणियों के लिए भी इसी शब्‍द का प्रयोग करते हैं।
यदि हम प्राणियों में क्‍लोनिंग के इतिहास पर नजर डालें तो एक बात तो उभर कर सामने आती है वह यह है कि अपेक्षाकृत यह नया इतिहास है-लगभग 50 वर्षों का ही।

आइए पहले आनुवांशिकी के आधार को समझा जाए। सभी प्राणी कोशिकाओं द्वारा संच‍रित होते है। मानव शरीर में लगभग 1013 कोशिकाएं हैं। प्रत्‍येक कोशिका में एक केन्‍द्रीय संरचना जिसे केन्‍द्रक के नाम से जाना जाता है, धागे के समान दिखने वाले गुणसूत्रां को संजाएरखता है। मानव में इन गुणसूत्रों की संख्‍या 46 है जिसमें से 23 उसे पिता की तरफ से और शेष 23 अपनी माता से प्राप्‍त होते हैं। गुणसूत्र, आनुवांशिक पदार्थ डीएनए से बने होते हैं जो शरीर में सभी गुणों एवं क्रियाओं का निर्धारण करते हैं। प्रत्‍येक प्राणी की विशिष्‍टता, गुणसूत्रों के अनियमित समन्‍वय द्वारा संभव होती है। एक ही माता-पिता द्वारा उत्‍पन्‍न संतानों के अलग-अलग दिखने का कारण गुणसूत्रों का यह अनियमित समायोजन ही है। कभी-कभी किसी दम्‍पत्ति को जुड़वा संतानें भी पैदा होती हैं। ये जुड़वाँ बच्‍चे जो दिखने में समान हो एकांडिक जुड़वाँ या समरूप यमज कहलाते हैं। जैसाकि नाम से जाहिर है ये एक ही अंडे से उत्‍पन्‍न होते हैं, जो किसी कारणवश दो कोशिकीय अवस्‍था में अलग होकर, प्रत्‍येक एक संपूर्ण संतान में विकसित होती हैं। एकांडिक जुड़वाँ बच्‍चों को अलग तौर पर पहचानना कठिन होता है क्‍योंकि उन्‍हें एक जैसा आनुवांशिक पदार्थ प्राप्‍त हुआ होता है।

अगर हम एक वयस्‍क व्‍यक्‍ति की किसी कोशिका से एक केन्‍द्रक लेकर, उसका एक अंडे में, जिसका केन्‍द्रक विलग किया गया हो, प्रतिरोपण करें तो उससे जो संतान उत्‍पन्‍न होगी वह उस व्‍यक्‍ति के समान ही होगी, इसी क्रिया को क्‍लोनिंग कहते हैं। हालांकि, सभी कोशिकाओं में लगभग 50 से 100 हजार जीन होते हैं पर विभिन्‍न कोशिकाएं अलग-अलग जीनों को अभिव्‍यक्‍त करती है जैसे कि इन्‍सुलिन का उत्‍पादन केवल पैनक्रिया (अग्‍नाशय) में होता है न कि मस्‍तिष्‍क में। इससे केन्‍द्रक की समानार्थकता पर प्रश्‍न लगता है। पेड़-पौधे तो उनमें पाए जाने वाली एक कोशिका से बनाए जा सकते हैं, पर जन्‍तुओं में इस क्रिया की संभावना पर अभी प्रश्‍नचिन्‍ह लगा है।

क्‍लोनिंग से संबंधित पहला प्रयोग 1950 में मेंढक पर किया गया था। क्‍लोनिंग तकनीक में कोशिका के केन्‍द्रक का स्‍थानांतरणया अदला-बदली की जाती है। कोशिका केन्‍द्रक जीनों और गुणसूत्रों का संग्रहालय होता है, जिसमें सभी आनुवांशिक सूचनायें एकत्र रहती हैं।

केन्‍द्रक स्‍थानांतरण तकनीक में डिम्‍ब का केन्‍द्रक निकाल लिया जाता है और उसमें किसी अन्‍य कोशिका का केन्‍द्रक प्रविष्‍ट करा दिया जाता है। होता यह है कि केन्‍द्रकविहीन डिम्‍ब विद्युत स्‍पन्‍द से यह सोचने का संकेत पाता है कि वह निषेचित हो गया है और फिर दूसरा कदम यह होता है कि उसमें तेज कोशिका विभाजन होने लगता है।

मेंढक के बाद कुछ कीटों और चूहों के क्‍लोन तैयार करने से संबंधित प्रयोग किए गए। इसमें संदेह नहीं कि इस प्रकार के प्रयोगों में वैज्ञानिकों की समझ में एक बात आयी कि कहीं न कहीं प्रयोग में कोई कमी अथवा काई गड़बड़ी है। अब जब इस प्रकार के क्‍लोनों का बारीकी से प‍रीक्षण किया गया तो पता चला कि गड़बड़ी उनके केन्‍द्रकों में है। उनके केन्‍द्रक असामान्‍य थे।

प्रयोगकर्ताओं से चूक यह हो गयी थी कि उन्‍होंने डिम्‍ब के लिए जिन केन्‍द्रकों के चुनाव किये थे वे विकसित भ्रूणों और वयस्‍क कोशिकाओं से लिए जाते रहे थे। और ये केन्‍द्रक डिम्‍ब में तेज विभाजन के लिए अपने को अनुकूलित नहीं कर पाते थे। डॉली की सफलता का रहस्‍य नहीं छिपा हुआ था।

एडिनबर्ग के रॉस्लिन संस्‍थान के डॉ. इयन बिल्‍गुट ने डॉली की सृष्‍टि करके क्‍लोनिंग प्रौद्योगिकी में चमत्‍कार कर दिया। डॉली के संबंध में जब थन से कोशिका ली गई, तब इस तथ्‍य का ध्‍यान रखा गया कि यह कोशिका अपने जीवन चक्र की उस दशा में हो, जिस अवस्‍था में वह डिम्‍ब जिसमें थन कोशिका का केन्‍द्रक स्‍थानं‍तरित किया जाना था।

किया यह गया कि विशेष प्रकार के रसायनों के माध्‍यम से थन कोशिका को बहला-फुसलाकर शीत निष्क्रियता की दशा में पहुंचा दिया गया। इस प्रकार धन कोशिकायें जीवित तो थीं किन्‍तु उनका विभाजन रुका हुआ था। थन कोशिकाओं अपनी पूर्व की स्थिति में ही बनी रहीं, जैसी वे थन में थीं। जब उन कोशिकाओं के केन्‍द्रकोंको डिम्‍बों में स्‍थानांतरित किया गया तो उनमें स्‍वाभाविक विभाजन क्षमता बनी रही और आगे का काम प्रकृति ने स्‍वयं किया। इससे यह भी ज्ञात होता है कि वैज्ञानिकों को जहाँ अन्‍य प्रजातियों में असफलता हाथ आयी, उसका क्‍या कारण था। यही नहीं, जहां तक डॉली का संबंध है, केन्‍द्रकों की अदला-बदली में मात्र एक बार ही सफलता मिल पायी और सफलता अनुपात 1:278 रहा। इससे सफलता की दर का अनुमान सहज ही लगाया जा सकताहै। डॉली तो जीवित है, किंतु उसकी बहनें असमय ही काल के गाल में समा गई।

डॉली से पूर्व की अन्‍य प्रजातियों की सफलता का रहस्‍य यह रहा कि प्रयोगों में कोशिकायें भ्रूण से ले ली गयी थीं। अब यह तथ्‍य भली-भांति समझा जा चुका है कि शुक्राणु और डिम्‍ब को छोड़कर शरीर की सभी कोशिकायें आनुवांशिक रूप से समान होती हैं। फिर भी त्‍वचा का रंग, आंखों की पुतलियों का काला, भूरा, नीला होना, अथवा हृदय और जिगर में भिन्‍नता कुछ जीनों पर निर्भर करता है, जो अलग-अलग समय में अना विशिष्‍ट लक्षण प्रकट करते हैं। विकासशील भ्रूण-कोशिकाओं में पूर्ण क्षमता होती है और डॉली के जन्‍म ने यह सिद्ध कर दिया है कि सभी कोशिकायें पूर्ण क्षमता को वाहक हो सकती है।

अभी डॉली के जन्‍म की खबर की उत्‍तेजना चल ही रही थी कि एक हफ्ते के अंतराल में एक अन्‍य प्राणी प्रजाति, बंदर की क्‍लोनिंग की खबर ने चौंका दिया।बंदर की क्‍लोनिंग का मतलब यह निकाला जा रहा है कि क्‍लोनिंग प्रौद्योगिकी ने मानव क्‍लोनिंगका मार्ग प्रशस्‍त कर दिया है। मानव क्‍लोनिंग की जाय या नहीं इस विषय में आम जन तो क्‍या वैज्ञानिक भी एकमत नहीं हैं।

डॉली ऐसी सर्वप्रथम स्‍वनपायी है जिसकी सृष्‍टि वयस्‍क प्राणी के अप्रजननशील ऊतकों से सफलतापूर्वक की गयी। इसके 24 घंटों के अंदर ही अमेरिकी राष्‍ट्रपति क्‍लिंटन प्रशासन ने इस वैज्ञानिक उपलब्धि के दूरगामी परिणामों को छान-बीन के आदेश दे दिए। जल्‍दी ही दुनिया भर के समाचार पत्रों में डॉली के जन्‍म की कहानी सुर्खियों में छा गयी। इसे लेकर अनेक शंकायें व्‍यक्‍त की जाने लगीं।

टाटा इंस्‍टीट्यूट ऑफ फंडामेंटल रिसर्च, मुंबई के आनुवांशिकीविद् ओबैद सिद्दकी कहते हैं- यह अत्‍यधिक नाटकीय है। प्रजातियाँ जिनके क्‍लोन तैयार किए जा रहे हैं, वे मानव के नजदीक आती जा रही हैं। यह भय उत्‍पन्‍न हो गया है कि मानव क्‍लोन भी बनने लगेंगे। ऐसा लगता है कि विवाद का कारण भय है।

ऐसी आशंका व्‍यक्‍त की जा रही है कि इस नयी प्रौद्योगिकी की सहायता से हिटलर भी बनाये जा सकते हैं। अथवा पुरुषों का यह भय कि अब महिलायें बिना पुरुषों के सहयोग के ही बच्‍चों को जन्‍म दे सकने में सक्षम हो जायेंगी? नई दिल्‍ली स्‍थित इंटरनेशनल सेंटर फॉर जेनेटिक इंजीनियरिंग के प्रतिष्‍ठित प्रोफेसर, डॉ. जी.पी. तलवार इस बात की पुष्‍टी करते हैं कि सैद्धांतिक रूप से यह सिद्ध हो चुका है कि महिलायें बिना पुरुषों की मदद के ही क्‍लोन के रूप में अपने आपको बनाये रख सकती हैं। धनी और सक्षम लोग अपने लोग अपने क्‍लोन के माध्‍यमसे अपने ऐश्‍वर्य के साम्राज्‍य को कायम रख सकेंगे। ऐसे लोगों के बच्‍चों और उनके स्‍वयं के क्‍लोनों के बीच कैसे संबंध होंगे? क्‍लोनों की समाज में क्‍या स्‍थिति होगी? उन्‍हें शरीर के क्षतिग्रस्‍त अंगों के बदलने के लिए ही इस्‍तेमाल किया जायेगा अथवा समाज में वे एक स्‍वतंत्र नागरिक के रूप में जी सकेंगे? जैसे प्रश्‍न सहज ही उभर कर सामने आते हैं।

यहाँ एक और प्रश्‍न उठता है कि क्‍लोन बनाने में जितना धन और श्रम व्‍यय होगा उसके बाद क्‍या क्‍लोन अपने जनक जैसा बन पायेगा? क्‍योंकि किस माहौल में पालन-पोषण होता है उसका भी प्रभाव निश्‍चित रूप से पड़ता ही है। फिर क्‍या मानसिक क्षमता में क्‍लोन अपने जनक जैसा हो सकेगा? फिर एक प्रश्‍न और उठता है कि क्‍लोन के रूप में मानवता का कोई कल्‍याण हो सकेगा क्‍या? हाँ, क्‍यों नहीं? ओबैद सिद्दकी का कहना है कि लाभ हो सकते हैं, इसका सबसे बड़ा लाभ तो यह है कि मानव के अतिरिक्‍त किसी दूसरे प्राणी में मानव आंगों को उगाया जा सकेगा जो बाद में आदमियों में, आवश्‍यकता पड़ने पर, प्रत्‍यारोपित किए जा सकेंगे। लुप्‍त हो रहे प्राणियों के क्‍लोन तैयार करके उन्‍हें बचाया जा सकता है। ऐसे प्राणि-समूहों की सृष्‍टि की जा सकती है, जिनमें मनचाही आनुवांशिक अच्‍छाइयां हों। नई तकनीक से ट्रांसजीनिक प्राणी विकसित किए जा सकेंगे जो इच्‍छित गुणों से सम्‍पन्‍न होंगे और साथ ही साथ सस्‍ते भी। प्राणियों के डीएनए में मनवांछित हेर-फेर के द्वारा ऐसी औषधियाँ तैयार की जा सकती हैं जो एड्स और कैंसर जैसे रोगों के लिए रामबाण औषधियाँ सिद्ध होंगी। वास्‍तव में ट्रांसजीनिक प्राणी अच्‍छे तरह के सस्‍ते प्रोटीन उपलब्‍ध करा सकने के योग्‍य होंगे। पी पी एल थेराप्‍युटिक्‍स ने तो सिस्‍टिक फाइब्रोसि‍स के उपचार के लिए ट्रांसजीनक भेड़ में एक प्रभावी औषधि का निर्माण भी कर लिया है। किंतु डॉ. तलवार की इस विषय में आशंका निर्मूल नहीं। मनचाहा क्‍लोन तैयार कर सकने में असफलतायें अधिक हाथ आती हैं। सफलता और असफलता का अनुपात 1:278 है। (डॉली के संबंध में)। क्‍या भारत जैसे देश में इस प्रकार के प्रयोगों के लिए पर्याप्‍त धन उपलब्‍ध हो सकेगा?

इंडियन इंस्‍टीट्यूट ऑफ साइंस, बेंगलूर के वैज्ञानिकों का कहना है कि प्रोटीन पैदा करने के लिए चूहों पर ऐसा अनुसंधान किया गया है, जो ऊतक अथवा कोशिका की तरह के होते हैं और यह तकनीक जानवरों का क्‍लोन तैयार करने से मात्र कुछ ही कदम दूर है। वैज्ञानिकोंका यह भी कहना है कि भारत में यदि तकनीकी जानकारी वाले अनुसंधान केंद्रोंको पर्याप्‍त आर्थिक सुविधाएं मिलीं तो यहाँ भी डाली भेड़ या टेट्रा बदंर का क्‍लोन तैयार किया जा सकता है।

नेशनल इंस्‍टीट्यूट ऑफ इम्‍यूनोलाजी, दिल्‍ली, इंडियन इंस्‍टीट्यूट ऑफ साइंस, बेंगलूर, नेशनल डेयरी रिसर्च इंस्‍टीट्यूट, करनाल और सेंटर फॉर सेल्‍यूलर एंड मॉलीक्‍यूलर बायोलॉजी, हैदराबाद में इस दिशा में अनुसंधान किए जा रहे हैं।

भारतीय वैज्ञानिक सेल-न्‍यूक्‍लियर ट्रांसफर विधि और एम्‍ब्रायो-स्‍प्लिटिंग विधि दोनों ही विधियों से भेड़ और बंदर जैसे जानवरों के क्‍लोन बनाने में सक्षम हैं, किंतु सबसे बड़ी बाधा आर्थिक अभाव है। हमें इस क्षेत्र में कोई सफलता तभी प्राप्‍त हो सकती है जब वाणिज्‍यिक और चिकित्‍सीय दृष्‍टि से जानवरों में क्‍लोन तैयार करने के लिए अर्थव्‍यवस्‍था को सुदृढ़ किया जाय।
क्‍लोनिंग के लाभ
  1. भेड़ो और गाय-भैंसों की अच्‍छी नस्‍लों को क्‍लोन करना।
  2. घरेलू पशु (पशुधन) में परिवर्तित जीन के प्रत्‍यारोपण द्वारा जैव-तकनीक में नए प्रयोग।
  3. कैंसर तथा अन्‍य आनुवांशिक रोगों से निदान का अध्‍ययन एवं बुढ़ापे को टालने के प्रयत्‍न।
  4. दवाओं का उत्‍पादन करने वाली जीनों को प्रत्‍यारोपित करके पालतू पशुओं से दवाओं का सस्‍ते में उत्‍पादन करना।
  5. बुढ़ापे का गुणसूत्रों पर प्रभाव का अध्‍ययन।
  6. इस विधि का अन्‍य स्‍तनधारी जीवों पर प्रयोग।
  7. अंगों के प्रतिरोपण में समरूपी अंगों का विकास।

मुर्दे से जीवित पैदा करना- मरे हुए आदमी की किसी कोशिका का केन्‍द्रक उसका क्‍लोन बनाने में प्रयोग किये जाने की संभावना, वैज्ञानिक इस बारे में चुप्‍पी साधे हुए हैं।
क्‍या भय काल्‍पनिक या आधाररहित है?- उसमें कुछ तकनीकी कठिनाइयां जरूर हैं। एक तो यह है कि, डीएनए अपरिवर्तित रहना चाहिए। मृत्‍यु के बाद डीएनए बहुत जल्‍दी खराब होता है। कोशिकाएं सही अवस्‍था में होना आवश्‍यक है। अत: मृत व्‍यक्‍ति से क्‍लोन करना अभी केवल कल्‍पना मात्र है।
मानव क्‍लोन- डॉली की क्‍लोनिंग के कारण मानव की क्‍लोनिंग की संभावना की उम्‍मीदें जग उठी हैं, जिसके विरोध में कई आवाजें भी बराबर उठीं हैं। ब्रिटेन, फ्रांस और अमेरिका सरकारों ने तो मानव क्‍लोनिंग पर प्रतिबंध भी घोषित किया है।

क्‍या मानव क्‍लोनिंग एक आकर्षक योजना है?
  • व्‍यक्‍तित्‍व बनने के आधार : क्‍लोनिंग से आप एकांडिक जुड़वा के समान अभिन्‍न संतान पैदा कर सकते हैं। आनुवांशिक आधार के अतिरिक्‍त, महौल भी व्‍यक्‍तित्‍व के लिए महत्‍वपूर्ण होता है। आदमी का व्‍यक्‍तित्‍व, सामाजिक, आर्थिक और आसपास के माहौल से संबंध रखता है। व्‍यक्‍तित्‍व कभी आनुवांशिक नहीं होता। अत: जरूरी नहीं है कि एक विजेता कर क्‍लोन विजेता ही हो।
  • क्‍या क्‍लोन अमर कर देगा? : क्‍लोन भौतिक रूप से सर्वसम जरूर होगा पर मानसिक स्‍थिति, अनुभव, सामाजिक, राजनैतिक और नैतिक मूल्‍य तो व्‍यक्‍तिगत होते हैं। अत: क्‍लोन आपको अमर नहीं बना सकता। अमर होने का तात्‍पर्य आपकी यादों और अनुभवों की अखंडता है, जो क्‍लोनिंग से संभव न हो पाएगा।
  • अन्‍य निहित भय : जीवनकाल में पर्यावरण में म्‍यूटाजनों और विकिरणों द्वारा डीएनए में विकृतियां उत्‍पन्‍न होती रहती हैं जो विभिन्‍न कोशिकाओं में एकत्रित होती रहती हैं। अनिषेचित प्रजनन द्वारा कोशिकाओं में काफी हद तक डीएनए का सुधार होता रहता है। लैंगिक प्रजनन के दौरान, दो अभिभावकों की जीनों का संयोजन होता है जो एक-दूसरे के पूरक होतें हैं। अत: ऐसी विकृतियाँ अभिव्‍यक्‍त नहीं हो पातीं। अलैंगिक प्रजनन में ऐसी विकृतियों से कोई निदान नहीं दिखता। एकत्रित आनुवांशिक विकृतियों के अभिव्‍यक्‍त होने की संभावना मानव क्‍लोन के विकास में एक बाधा है। (पर हाँ, अंग प्रतिरोपण के लिए मानव क्‍लोन का विकास कुछ संभावना रखता है।)
  • नर की आवश्‍यकता पर प्रश्‍न चिन्‍ह? : क्‍लोनित्‍पत्ति के लिए मादा का अंडा अति आवश्‍यक है। केन्‍द्रक तो नर या मादा कहीं से भी लिया जा सकता है। इससे नर की आवश्‍यकता पर प्रश्‍न चिन्‍ह लगाता है। लैंगिक प्रजनन आनुवांशिकी के विभिन्‍न संयोजनों से विविधता उत्‍पन्‍न करता है जिससे अच्‍छी नस्‍लें बनती हैं। अलैंगिक प्रजनन को अपनाना आम्‍तहत्‍या की तरह होगा। फिर भी बांझ लोग या समलैंगिक लोग भविष्‍य में क्‍लोनिंगकी तकनीक अपना सकते हैं। हो सकता है औरतें यह जिम्‍मेदारी सिर्फ अपने ऊपर ले लें लेकिन पुरुषरहित औरतों का यह समाज बहुत ही नीरस होगा।

स्‍मरण रहे, किसी भी महत्‍वपूर्ण खोज के दो पहलू होते हैं। नाभिकीय ऊर्जा इसका एक अच्‍छा उदाहरण है, एक तरफ इसका उपयोग विद्युतत्‍पादन या भेषजज्ञान में हो रहा है, दूसरी ओर विश्‍व को नष्‍ट करने के लिए एटम बम बन रहे हैं। इसी तरह क्‍लोनिंग की उपयोगिता भी हो सकती है। इस पर प्रतिबंध लगाने से पहले इसके सभी पहलुओं पर गौर करना आवश्‍यक है।

मानव क्‍लोनिंग कं संभावित दुष्‍परिणामों को लेकर सभी चिंतित हैं। अनेक प्रकार की आशंकायें व्‍यक्‍त की जा रही हैं। किंतु मानव को छोड़कर चूंकि अन्‍य जीव प्रजातियों से अनेक प्रकार के असाध्‍य रोगों के उपचार के लिए औषधियां तैयार करने के प्रयास हो रहे हैं अतएव इस प्रकार के क्‍लोनिंग से संबंधित तो प्रयोग और अनुसंधानों को जारी रखने की आवश्‍यकता है, किंतु विवाद के घेरे में आ जाने के कारण प्रतिबंध मात्र मानव क्‍लोनिंग पर किया जाना चाहिए। आने वाली सदी पुकार-पुकार कर कह रही है कि अगली शताब्‍दी में क्‍लोनिंग पर किया जाना चाहिए। आने वाली सदी पुकार-पुकार कर कह रही है कि अगली शताब्‍दी में क्‍लोनिंग द्वारा मानव कल्‍याण के लिए एड्स और कैन्‍सर जैसे असाध्‍य रोगों की दवायें निश्‍चित रूप से ढूंढ ली जायेंगी।

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