Saturday, 5 January 2019

चारु चंद्र की चंचल किरणें कविता की व्याख्या (भावार्थ)

चारु चंद्र की चंचल किरणें कविता की व्याख्या (भावार्थ)

चारुचंद्र की चंचल किरणें, खेल रहीं हैं जल थल में,
स्वच्छ चाँदनी बिछी हुई है अवनि और अम्बरतल में।
पुलक प्रकट करती है धरती, हरित तृणों की नोकों से,
मानों झीम रहे हैं तरु भी, मन्द पवन के झोंकों से॥
भावार्थ — कवि कहता है कि सुंदर चंद्रमा की चंचल किरणें जल और थल सभी स्थानों पर क्रीड़ा कर रही हैं। पृथ्वी से आकाश तक सभी जगह चंद्रमा की स्वच्छ चाँदनी पैâली हुई है, जिसे देखकर ऐसा मालूम पड़ता है कि धरती और आकाश में कोई धुली हुई सफेद चादर बिछी हुई हो। पृथ्वी हरे घास के तिनकों की नोंक के माध्यम से अपनी प्रसन्नता को व्यक्त कर रही है। तिनकों के रूप में उसका रोमांचित होना दिखाई देता है; अर्थात् तिनकों की नोंक चाँदनी में चमकती है और उसी चमक से पृथ्वी की प्रसन्नता व्यक्त हो रही है। मंद सुगंधित वायु बह रही है, जिसके कारण वृक्ष धीरे-धीरे हिल रहे हैं, तब ऐसा मालूम पड़ता है मानों सुंदर वातावरण को पाकर वृक्ष भी मस्ती में झूम रहे हों। तात्पर्य यह है कि सारी प्रकृति प्रसन्न दिखाई दे रही है।

किस व्रत में है व्रती वीर यह, निद्रा का यों त्याग किये,
राजभोग्य के योग्य विपिन में, बैठा आज विराग लिये।
बना हुआ है प्रहरी जिसका, उस कुटीर में क्या धन है,
जिसकी रक्षा में रत इसका, तन है, मन है, जीवन है!
भावार्थ— लक्ष्मण को पहरा देते हुए देखकर कवि कहता है कि वीर व्रत धारण करने वाला यह युवक अपनी नींद त्यागकर किस व्रत की साधना में लीन है? देखने से तो लगता है कि यह किसी राज्य का सुख भोगने के योग्य है, पर यह तो वैराग्य धारण कर जंगल में बैठा है। आखिर इस कुटिया में ऐसा कौन-सा धन है, जिसका यह युवक बड़ी तन्मयता से पहरा दे रहा है। यह इस कुटी की रक्षा के लिए शरीर की परवाह नहीं कर रहा है अर्थात् अपने शरीर को विश्राम नहीं दे रहा है और सब प्रकार से अपने मन को इस कुटी की रक्षा में लगाए हुए है। अवश्य ही इस कुटी में ऐसा कोई अमूल्य और अनुपम धन होना चाहिए, जिसकी रक्षा में यह वीर अपने तन, मन और जीवन को ही समर्पित किए हुए है।

क्या ही स्वच्छ चाँदनी है यह, है क्या ही निस्तब्ध निशा;
है स्वच्छन्द-सुमंद गंध वह, निरानंद है कौन दिशा?
बंद नहीं, अब भी चलते हैं, नियति-नटी के कार्य-कलाप,
पर कितने एकान्त भाव से, कितने शांत और चुपचाप!
भावार्थ— पंचवटी के प्राकृतिक सौंदर्य को निहारते हुए लक्ष्मण अपने मन में सोचते हैं कि यहाँ कितनी स्वच्छ और चमकीली चाँदनी है और रात्रि भी बहुत शांत है। स्वच्छ, सुगंधित वायु मंद-मंद बह रही है। पंचवटी में किस ओर आनंद नहीं है? इस समय चारों ओर पूर्ण शांति है तथा सभी लोग सो रहे हैं, फिर भी नियतिरूपी नटी अर्थात् नर्तकी अपने कार्य- कलाप बहुत शांत भाव से और चुपचाप पूरा करने में तल्लीन है। तात्पर्य यह है कि नियति रूपी नर्तकी अपने क्रियाकलापों को बहुत ही शांति से संपन्न कर रही है और वह अकेले ही अपने कर्तव्यों का निर्वाह किए जा रही है।

सरल तरल जिन तुहिन कणों से, हँसती हर्षित होती है,
अति आत्मीया प्रकृति हमारे, साथ उन्हींसे रोती है!
अनजानी भूलों पर भी वह, अदय दण्ड तो देती है,
पर बूढों को भी बच्चों-सा, सदय भाव से सेती है॥
भावार्थ— लक्ष्मण अपने मन में विचार करते हैं कि जो सुंदर और चंचल ओस की बूँदे प्रकृति की प्रसन्नता और शोभा की प्रतीक हैं, उन्हीं ओस की बूँदों से वह आत्मीय प्रकृति दु:ख की घड़ी में हमारे साथ रोती हुई-सी प्रतीत होती है, जबकि सुख के क्षणों में इन्हीं ओस की बूँदों के माध्यम से वह अपना हर्ष प्रकट करती है। यह प्रकृति हमारी अनजाने में की गई भूलों पर कठोरतापूर्वक दंड देती है, किंतु कभी-कभी बड़ी दयालु होकर बूढ़ों की भी बच्चों के समान सेवा करती है। इस प्रकार प्रकृति के कठोर और कोमल दोनों रूप हमारे सम्मुख प्रकट होते हैं। यहाँ प्रकृति में आत्मीयता और संरक्षण का भाव व्यक्त हुआ है।

और आर्य को, राज्य-भार तो, वे प्रजार्थ ही धारेंगे,
व्यस्त रहेंगे, हम सब को भी, मानो विवश विसारेंगे।
कर विचार लोकोपकार का, हमें न इससे होगा शोक;
पर अपना हित आप नहीं क्या, कर सकता है यह नरलोक!
भावार्थ— वनवास की अवधि पूरी करके जब हम लोग अयोध्या लौटेंगे तो बड़े भाई राम को क्या मिलेगा? लक्ष्मण स्वयं उत्तर देते हुए कहते हैं कि वे राज्यभार सँभाल लेंगे, किंतु यह भार तो वह प्रजा के हित के लिए ही धारण करेंगे। तब वे राज्य के कार्य में इतने व्यस्त रहेंगे कि विवश होकर हम लोगों को भी भूल जाएँगे, किंतु यह सोचकर कि वे लोगों के उपकार में लगे हैं, हमें दु:ख नहीं होगा। लक्ष्मण के मन में यह प्रश्न उठता है कि इस दुनिया के लोग अपना हित स्वयं क्यों नहीं कर सकते? वे अपनी सुख-सुविधा के लिए राजा पर ही निर्भर क्यों रहते हैं? यदि लोग अपना तथा दूसरों का भला स्वयं ही करने लगें और इसके लिए दूसरों का मँुह न देखें तो यह संसार कितना सुंदर और सुखद हो जाएगा।

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