Thursday, 6 December 2018

कबीरदास का जीवन परिचय। Kabir Das ka Jeevan Parichay

कबीरदास का जीवन परिचय। Kabir Das ka Jeevan Parichay

कबिरा हरि के रूठते, गुरु के सरने जाय,
कह कबीर गुरु रूठते, हरि नहिं होत सहाय।
भूमिका : हिन्दू, मुसलमान, ब्राह्मण, धनी, निर्धन सबका वही एक प्रभु है। सभी की बनावट में एक जैसी हवा, खून, पानी का प्रयोग हुआ है। भूख, प्यास, सर्दी, गर्मी, नींद सभी की जरूरतें एक जैसी हैं। सूरज, प्रकाष और गर्मी सभी को देता है, वर्षा का पानी सभी के लिए है, हवा सभी के लिए है। सभी एक ही आसमान के नीचे रहते हैं। इस तरह जब सभी को बनाने वाला ईष्वर, किसी के साथ भेद-भाव नहीं करता तो फिर मनुष्य-मनुष्य के बीच ऊँच-नीच, धनी-निर्धन, छुआ-छूत का भेद-भाव क्यों है ? ऐसे ही कुछ प्रष्न कबीर के मन में उठते थे जिनके आधार पर उन्होंने मानव मात्र को सही मार्ग पर चलने की प्रेरणा दी। कबीर ने अपने उपदेशों के द्वारा समाज में फैली बुराइयोें का कड़ा विरोध किया और आदर्श समाज की स्थापना पर बल दिया।

जीवन परिचय : माना जाता है कि उनका जन्म 1398 ई0 में काशी में हुआ था। कबीर का पालन-पोषण नीरू और नीमा नामक दम्पत्ति ने किया था। इनका विवाह लोई नाम की कन्या से हुआ जिससे एक पुत्र कमाल तथा पुत्री कमाली का जन्म हुआ। कबीर ने अपने पैतृक व्यवसाय (कपड़ा बुनने का काम) में हाथ बँटाना शुरू किया। धार्मिक प्रवष्त्तियों के कारण कबीर रामानन्द के शिष्य बन गए।
पूरा नाम
संत कबीरदास
जन्म
सन 1398 (लगभग)
पालक माता-पिता
नीरु और नीमा
पत्नी
लोई
संतान
कमाल (पुत्र), कमाली (पुत्री)
मृत्यु
1518 ई0
शिक्षा : कबीर पढ़े-लिखे नहीं थे इसलिए उनका ज्ञान पुस्तकीय या शास्त्रीय नहीं था। अपने जीवन में उन्होंने जो अनुभव किया, जो साधना से पाया, वही उनका अपना ज्ञान था। जो भी ज्ञानी, विद्वान उनके सम्पर्क में आते उनसे वे कहा करते थे-
‘तू कहता कागद की लेखी, मैं कहता आँखों की देखी।
सैकड़ों पोथियाँ (पुस्तकें) पढ़ने के बजाय वे प्रेम का ढाई अक्षर पढ़कर स्वयं को धन्य समझते थे।
Kabir Das ka Jeevan Parichay
कबीर को बाह्य आडम्बर, दिखावा और पाखण्ड से चिढ़ थी। मौलवियों और पण्डितों के कर्मकाण्ड उनको पसन्द नहीं थे। मस्जिदों में नमाज़ पढ़ना, मंदिरों में माला जपना, तिलक लगाना, मूर्तिपूजा करना, रोजा या उपवास रखना आदि को कबीर आडम्बर समझते थे। कबीर सादगी से रहना, सादा भोजन करना, पसन्द करते थे। बनावट उन्हें अच्छी नहीं लगती थी। अपने आस-पास के समाज को वे आडम्बरों से मुक्त बनाना चाहते थे।
साधु-संतों के साथ कबीर इधर-उधर घूमने जाते रहते थे। इसलिए उनकी भाषा में अनेेक स्थानों की बोलियों के शब्द आ गए हैं। कबीर अपने विचारों और अनुभवों को व्यक्त करने के लिए स्थानीय भाषा के शब्दों का प्रयोग करते थे। कबीर की भाषा को ‘सधुक्कड़ी’ भी कहा जाता है।
कबीर अपनी स्थानीय भाषा में लोगों को समझाते, उपदेश देते थे । जगह-जगह पर उदाहरण देकर अपनी बातों को लोगों के अन्तर्मन तक पहुँचाने का प्रयास करते थे। कबीर की वाणी को साखी, सबद और रमैनी तीन रूपों में लिखा गया जो ‘बीजक’ के नाम से प्रसिद्ध है। कबीर ग्रंथावली में भी उनकी रचनाएँ संग्रहीत हैं।
कबीर की दष्ष्टि में गुरु का स्थान भगवान से भी बढ़कर है। एक स्थान पर उन्होंने गुरु को कुम्हार बताया है, जो मिट्टी के बर्तन के समान अपने षिष्य को ठोंक-पीटकर सुघड़ पात्र में बदल देता है। सज्जनों, साधु-संतों की संगति उन्हें अच्छी लगती थी। यद्यपि कबीर की निन्दा करने वाले लोगों की संख्या कम नहीं थी लेकिन कबीर निन्दा करने वाले लोगों को अपना हितैषी समझते थे-
‘निन्दक नियरे राखिये, आँगन कुटी छवाय।
बिन पानी साबुन बिना, निर्मल करे सुभाय। 
उस समय लोगों के बीच में ऐसी धारणा फैली हुई थी कि मगहर में मरने से नरक मिलता है। इसलिए कबीर अपनी मृत्यु निकट जानकर काशी से मगहर चले गये और समाज में फैली हुई इस धारणा को तोड़ा। 1518 ई0 में उनका निधन हो गया। कबीर सत्य बोलने वाले निर्भीक व्यक्ति थे। वे कटु सत्य भी कहने में नहीं हिचकते थे। उनकी वाणी आज के भेद-भाव भरे समाज में मानवीय एकता का रास्ता दिखाने में सक्षम है।


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