Thursday, 6 December 2018

जमशेदजी टाटा की जीवनी - Jamsetji Tata Biography in Hindi

जमशेदजी टाटा की जीवनी - Jamsetji Tata Biography in Hindi

Jamsetji Tata Biography
स्काटलैण्ड के प्रसिद्ध लेखक कारलाइल ने अपने एक भाषण में कहा था-’’जिस देश का लोहे पर नियंत्रण हो जाता है उसका शीघ्र ही सोने पर नियंत्रण हो जाता है।’’ मैनचेस्टर (लंदन) में दिये उनके इस भाषण को सुनकर एक नवयुवक बहुत प्रभावित हुआ। उसने अपने व्यापार को एक नयी दिषा दी और आगे चलकर भारत के औद्योगिक विकास की एक महत्त्वपूर्ण कड़ी बन गया। इस नवयुवक का नाम जमशेद जी नसरवान जी टाटा था।

नाम
जमशेदजी टाटा
जन्म
3 मार्च 1839
जन्म स्थान
नवसेरी, गुजरात
पिता
नुसीरवानजी
माता
जीवनबाई टाटा
पत्नी
हीरा बाई दबू
पुत्र
दोराबजी टाटा, रतनजी टाटा
मृत्यु
19 मई 1904, जर्मनी

जमशेद जी नसरवान जी टाटा का जन्म गुजरात के एक पारसी परिवार में 3 मार्च 1839 ई0 को हुआ था। उनके पिता का नाम नुसीरवानजी तथा माता का नाम जीवनबाई टाटा था। उनकी प्रारम्भिक शिक्षा घर पर हुई। बाद में इनके पिता इन्हें मुम्बई ले गए। उस समय उनकी आयु 13 वर्ष की थी। वहाँ उन्होंने पहले स्थानीय पुरोहितों से पढ़ा। आगे की पढ़ाई ’एल्फिस्टन कालेज’ से पूरी की। कालेज मेें अध्ययन के दौरान ही इनका विवाह ’हीराबाई’ से कर दिया गया। सन् 1856 ई0 मेें उनके पुत्र दोराब जी का जन्म हुआ।

जमशेद जी ने शिक्षा पूरी करने के बाद एक वकील के साथ काम करना आरम्भ किया किन्तु उसमें उनका मन नहीं लगा। उन्होंने वकील का दफ्तर छोड़कर अपने पिता के व्यवसाय में हाथ बँटाना उचित समझा। व्यवसाय में उन्हें बहुत रुचि थी। अतः वे सफल व्यवसायी बनने के गुर शीघ्र ही सीख गए। उन्होंने व्यापार की बारीकियों को समझा। व्यापार के प्रति बेटे की लगन और कर्मठता देखकर नसरवान जी बहुत प्रसन्न थे। अब वे अपना व्यवसाय भारत से बाहर विदेशों में भी फैलाना चाहते थे। इस उद्देष्य की पूर्ति के लिए उन्होंने जमशेद जी को चीन भेजा।जमशेद जी ने हांग कांग और शंघाई जैसे बड़े नगरों में अपने व्यापार की शाखाएँ खोलीं। उन्होंने चीन में रहकर वहाँ की अर्थ और व्यापार व्यवस्था का भी अध्ययन किया।

अपने व्यापार को विस्तार देने की कड़ी में वे लन्दन भी गए। उस समय उनकी उम्र केवल 25 वर्ष थी। उन्होंने लंदन में सूती वस्त्र उद्योग पर अधिक ध्यान दिया। इस सम्बंध में उन्होंने लंकाशायर और मैनचेस्टर नगरों की यात्राएँ कीं। यह नगर वस्त्र उद्योग के लिए प्रसिद्ध है। यहाँ वे चार वर्ष तक वस्त्र उद्योग से सम्बन्धित समस्याओं का अध्ययन करते रहे।

स्वदेश लौटने पर उन्होंने पाया कि उनके पिता का व्यवसाय अच्छी स्थिति में नहीं है। उनकी फर्म पर बाजार के कर्ज बढ़ते जा रहे थे। बाजार में उनकी साख गिर रही थी। इस कठिन समय में पिता और पुत्र ने अपनी योग्यता और सूझबूझ का परिचय देते हुए एक कठिन परन्तु सही निर्णय लिया। उन्होंने अपना मकान व कुछ निजी सम्पत्ति बेचकर कर्जों की अदायगी कर दी। इससे एक तो व्यापारियों का विश्वास उनकी फर्म में बढ़ गया दूसरे भावी प्रगति के द्वार भी खुल गए। उन दिनों अपने देश में कपड़े की मिलें कम थीं। जो मिलें थीं भी उनमें मोटे कपड़े तैयार होते थे।

जमशेद जी भारत में लंकाशायर और मैनचेस्टर जैसी उन्नत किस्म की मिलें स्थापित करना चाहते थे। उन्होंने इंग्लैण्ड जाकर भारत द्वारा निर्यात की जाने वाली कपास की सफाई, कताई, बुनाई का कार्य देखा। उन्होंने पाया कि सस्ते दर पर खरीदी गयी भारतीय कपास से बने इन मिलों के कपड़े भारत में बहुत ऊँचे दामों पर बेचे जाते हैं। इस बात से इन्हें बहुत दुःख हुआ। जमशेद जी ने दृढ निश्चय किया कि वे ऐसी मिलें भारत में भी खोलेंगे।

जनवरी 1877 ई0 में इन्होंने नागपुर में ’इम्प्रेस मिल’ नाम की सूती मिल खोली। आरम्भ में जमशेद जी को अनेक कठिनाइयों का सामना करना पड़ा। वे बिना घबराये, धैर्य व निष्ठा के साथ अपने कार्य में लगे रहे। उन्होंने अपने कारखानों में नई तकनीकों और नई मशीनों का प्रयोग किया। उद्योग स्थापना के मूल में स्वदेशी वस्तुओं के अधिक से अधिक प्रयोग की भावना काम कर रही थी। जमशेद जी भारतीय खनिज सम्पदा और पूँजी का उपयोग भारत में ही करने के पक्षधर थे। 'स्वदेशी मिल लिमिटेड' नामक मिल की स्थापना के पीछे भी यही देश प्रेम की भावना काम कर रही थी। वे भारतीय उद्योग को विष्व व्यापार में सम्मानित स्थान दिलाना चाहते थे।

नागपुर कपड़ा मिल की स्थापना के मात्र तीन वर्ष बाद ही सन् 1880 ई0 में जमशेद जी के मन में इस्पात उद्योग शुरू करने की अभिलाषा उत्पन्न हुयी परन्तु अंग्रेज सरकार से इतने बड़े उद्योग की स्वीकृति मिलना आसान नहीं था। इसके लिए उन्हें काफी संघर्ष करना पड़ा। अन्ततः कई वर्षों बाद उन्हें सरकार की तरफ से अनुमति मिल गई। अभी भूगर्भ विषेषज्ञों द्वारा खनिज सर्वेक्षण का कार्य चल ही रहा था कि 19 मई 1904, जर्मनी में जमशेद जी का देहान्त हो गया।

जमशेद जी के बाद उनके पुत्र दोराब जी टाटा व रतन जी टाटा ने अपने पिता के अधूरे सपनों को पूरा किया। सन् 1911 ई0 में लोहा और इस्पात के कारखाने की स्थापना के साथ ही टाटा का महान स्वप्न पूर्ण हुआ। बिहार में साकची गाँव के घने जंगलों को साफ करके यह कारखाना ’टाटा आयरन एण्ड स्टील मिल्स’ स्थापित किया गया। अब यह क्षेत्र एक महानगर के रूप में बदल गया है। इसका नाम उन्हीं के नाम पर जमशेदपुर रखा गया है।

SHARE THIS

Author:

I am writing to express my concern over the Hindi Language. I have iven my views and thoughts about Hindi Language. Hindivyakran.com contains a large number of hindi litracy articles.

0 comments: