Tuesday, 10 July 2018

बसंत पंचमी पर निबंध व लेख हिंदी में

बसंत पंचमी पर निबंध व लेख हिंदी में

vasant panchami lekh aur nibandh
माघ शुक्ल पंचमी को ‘बसंत पंचमी’ के नाम से जाना जाता है। कोशकार रामचंद्र वर्मा के अनुसार ‘बसंत पंचमी बसंत ऋतु के आगमन का सूचक है।’ 
ऋतु गणना में चैत्र और वैसाख दो मास वसन्त के हैं। फिर उसका पदार्पण 40 दिन पूर्व कैसे? कहते हैं कि ऋतुराज बसंत के अभिषेक और अभिनंदन के लिए शीर्ष पांच ऋतुओं ने अपनी आयु के आठ आठ दिन बसंत को समर्पित कर दिए। इसलिए बसंत पंचमी 40 दिन पूर्व प्रकट हुई थी। यह तिथि चैत्र कृष्णा प्रतिपदा से 40 दिन पूर्व माघ शुक्ल पंचमी को आती है। 

भूमध्य रेखा का सूर्य के ठीक-ठाक सामने आ जाने के आसपास का कालखंड है बसंत। अतः बसंत भारत का ही नहीं विश्व वातावरण के परिवर्तन का धोतक है। संभव है कभी वृहत्तर भारत में माह की शुक्ल पक्ष में बसंतागमन होता हो और माघ शुक्ल पंचमी को बसंत आगमन के उपलक्ष में ‘अभिनंदन पर्व’ रूप में स्थापित किया हो। वस्तुतः बसंत पंचमी, बसंत आगमन की पूर्व सूचिका ही है इसी कारण इसे ‘श्रीपंचमी’ भी कहते हैं।

बसंत पंचमी विद्या की अधिष्ठात्री देवी भगवती सरस्वती का जन्म दिवस भी है। इसलिए इस दिन सरस्वती पूजन का विधान है। ज्ञान की गहनता और उच्चता का सम्यक् परिचय इसी से प्राप्त होता है। पुस्तकधारिणी वीणावादिनी मां सरस्वती की यह देन है कि वे जीवन के रहस्यों को समझने की सूक्ष्म दृष्टि प्रदान कर ज्ञान लोक से संपूर्ण विश्व को आलोकित करती हैं। अतः सरस्वती पूजा ‘तमसो मा ज्योतिर्गमय’ के आदर्शों पर चलने की प्रेरणा देती है- ‘महो अर्णः सरस्वती प्रचेतयति केतुना। धियो विश्वा विराजति।‘ 

प्राचीन काल में वेद अध्ययन का सत्र श्रावणी पूर्णिमा से लेकर आरंभ होकर इसी तिथि को समाप्त होता था
गत बीसवीं शताब्दी में बसंत पंचमी को ना तो विद्या का सत्र समाप्त होता था ना विद्या अभ्यास के लिए मंगल दिन मानकर विद्या ज्ञान का आरंभ होता था। हां मां शारदा की कृपा एवं आशीर्वाद के लिए सरस्वती पूजन अवश्य होता रहा है। 

पौराणिक कोश के अनुसार बसंत पंचमी रति और कामदेव की पूजा का दिन है। मादक महकती बसंती बयार में, मकर राशि फूलों की बहार में, भंवरों की गुंजार और कोयल की कूक में, मानव ह्रदय जब उल्लसित होता है तो उसे कंकणों का रणन नूपुरों की रूनझुन, किंकणियों का मादक क्वणन सुनाई देता है। मदन विकार का प्रादुर्भाव होता है तो कामिनी और कानन में अपने आप यौवन फूट पड़ता है। (जरठ) वृद्ध स्त्री की अद्भुत श्रृंगार सज्जा से आनंद पुलकित जान पड़ती है। दांपत्य और पारिवारिक जीवन की सुख समृद्धि के लिए रति और कामदेव की कृपा चाहिए। अतः रति-कामदेव पूजन का दिन माना जाता है।

बसंत पंचमी किशोर हकीकत राय का बलिदान दिवस भी है। सियालकोट (अब पाकिस्तान) का किशोर हकीकत मुस्लिम पाठशाला में पढ़ता था। 1 दिन साथियों से झगड़ा होने पर उसने ‘कसम दुर्गा भवानी’ की शपथ लेकर झगड़ा समाप्त करना चाहा, मुस्लिम छात्रों ने जो झगड़ा करने पर उतारू  थे, दुर्गा भवानी को गाली दी। हकीकत स्वाभिमानी था, बलवान भी था। प्रत्युत्तर में फातिमा को गाली दी। ’फातिमा’ को गाली देने के अपराध में उसे मृत्युदंड या मुस्लिम धर्म स्वीकार करने का विकल्प रखा गया। किशोर हकीकत ने मुस्लिम धर्म स्वीकार नहीं किया। उसने हंसते हुए मृत्यु का वरण किया। 

उस दिन भी बसंत पंचमी थी। लाहौर में रावी का तट था सहस्त्रों हिंदू जमा थे। सबके सामने मुस्लिम शासक की आज्ञा से उस किशोर का सिर तलवार से काट दिया गया। 
रावी नदी के तट पर खोजेशाह के कोटक्षेत्र मैं धर्मवीर हकीकत की समाधि बनाई गई। स्वतंत्रता पूर्व हजारों लाहौर वासी बसंत के दिन वीर हकीकत की समाधि पर इकट्ठे होते थे। मेला लगता था। अपने श्रद्धा सुमन चढ़ाते थे। 

बसंत पंचमी के दिन पीले वस्त्र पहनने की प्रथा थी। वह आज नगरों में लुप्त हो गई है। गांव में अवश्य अभी उसका कुछ प्रभाव दिखाई देता है। हां बसंती हलवा, पीले चावल तथा केसरिया खीर खाकर आज भी बसंत पंचमी पर उल्लास उमंग प्रकट होता है। परिवार में प्रसन्नता का वातावरण बनता है। 

बसंत ह्रदय के उल्लास, उमंग, उत्साह और मधुर जीवन का द्योतक है। इसलिए बसंत पंचमी के दिन संगीत, खेलकूद प्रतियोगिताएं तथा पतंगबाजी का आयोजन होता है। बसंत मेले लगते हैं। बसंत पंचमी प्रतिवर्ष आती है। जीवन में बसंत (आनंद) ही यशस्वी जीवन जीने का रहस्य है, यह रहस्योद्घाटन कर जाती है।


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