Wednesday, 11 July 2018

करवा चौथ पर निबंध। Essay on Karwa Chauth in Hindi

करवा चौथ पर निबंध। Essay on Karwa Chauth in Hindi

पति की दीर्घायु और मंगल कामना हेतु हिंदू सुहागिन नारियों का यह पावन पावन पर्व है। करवा (जलपात्र) द्वारा कार्तिक मास के कृष्ण पक्ष की चतुर्थी को चंद्रमा को अर्ध्य देकर पारण (उपवास के बाद का पहला भोजन) करने का विधान होने से इसका नाम करवा चौथ है। करवा चौथ और करक चतुर्थी पर्यायवाची हैं। चंद्रोदय तक निर्जल उपवास रखकर पुण्य संयय करना इस पर्व की विधि है। चंद्र दर्शनोपरांत सास या परिवार में ज्येष्ठ श्रद्धेय नारी को (बायना) दान देकर सदा सौभाग्यवती भव का आशीर्वाद लेना व्रत साफल्य का सूचक है।

Essay on Karwa Chauth in Hindi

सुहागिन नारी का पर्व होने के नाते यथासंभव और यथाशक्ति न्यूनाधिक सोलह सिंगार से अलंकृत होकर सुहागिन अपने अंतःकरण के उल्लास को प्रकट करती है। पति चाहे गूंगा हो, बहरा हो, अपाहिज हो, क्षय़ या असाध्य रोग से ग्रस्त हो, क्रूर-अत्याचारी-अनाचारी या व्याभिचारी हो उससे हर प्रकार का संवाद और संबंध शिथिल पड़ चुके हैं फिर भी हिंदू नारी इस पर्व को कुंठित मन से नहीं मनाएगी अवश्य। पत्नी का पति के प्रति यह मूक समर्पण किसी भी दूसरे धर्म या संस्कृति में कहां? 

पुण्य प्राप्ति के लिए किसी पुण्यतिथि में उपवास करने या किसी उपवास के द्वारा कर्मानुष्छान द्वारा पुण्य संचय करने के संकल्प को व्रत कहते हैं। व्रत और उपवास द्वारा शरीर को तपाना तप है। व्रत धारण कर, उपवास रखकर पति की मंगल कामना सुहागिन का तप है। तप द्वारा सिद्धि प्राप्त करना पुण्य का मार्ग है। अतः सुहागन करवा चौथ का व्रत धारण कर उपवास रखती है। 

समय, सुविधा और स्वास्थ्य के अनुकूल उपवास करने में ही व्रत का आनंद है। उपवास तीन प्रकार के होते हैं- (क) ब्रह्म मुहूर्त से चंद्रोदय तक जल तक भी ग्रहण न करना। 
(ख) ब्रह्म मुहूर्त में सर्गी मिष्ठान, चाय आदि द्वारा जलपान कर लेना। 
(ग) दिन में चाय या फल स्वीकार कर लेना, किंतु अन्न ग्रहण नहीं करना। 

भारतीय पर्वों में विविधता का इंद्रधनुषीय सौंदर्य है। इस पर्व के मनाने, व्रत करने, उपवास करने में मायके से खाद्य पदार्थ भेजने-न भेजने, रूढ़ि परंपरा से चली कथा सुनने-न सुनने, बायना देने-न देने, करवे का आदान-प्रदान करने-न करने, श्रद्धेय प्रौढ़ा से आशीर्वाद लेने-न लेने की विविध शैलियाँ हैं। इन सब विविधता में एक ही उद्देश्य निहित है ‘पति का मंगल’।

पश्चिमी सभ्यता में निष्ठा रखने वाली सुहागिन, पुरुष मित्रों में प्रिय, विवाहित नारी तथा बॉस की प्रसन्नता में अपना उज्जवल भविष्य सोचने वाली पति के प्रति पूर्ण निष्ठा का भी करवा चौथ के दिन सब ओर से ध्यान हटा कर व्रत के प्रति निष्ठा और पति के प्रति समर्पण करवा चौथ की महिमा है। 

हिंदू धर्म विरोधी, ‘खाओ पियो मौज उड़ाओ’ की सभ्यता में सरोबार तथाकथित प्रगतिशील तथा पुरुष नारी समानता के पक्षपाती एक प्रश्न खड़ा करते हैं कि करवा चौथ का व्रत नारी के लिए ही क्यों? हिंदू धर्म में पुरुष के लिए पत्नी व्रत का पर्व क्यों नहीं? 

भारतीय समाज पुरुष प्रधान है। 19.9 प्रतिशत परिवारों का संचालन दायित्व पुरुषों पर है। पुरुष अर्थात पति। ऐसे स्वामी, परम पुरुष, परम आत्मा जिससे समस्त परिवार का जीवन चलता है, सांसारिक कष्टों और आपदाओं में अपने पौरूष का परिचय देता है, परिवार के उज्जवल भविष्य की ओर अग्रसर करने में जो अपना जीवन समर्पित करता है उसके दीर्घ जीवन की मंगल कामना करना कौन सा अपराध है? 

यह एक कटु सत्य है कि पति की मृत्यु के बाद परिवार पर जो दुख और कष्ट आते हैं, विपदाओं का जो पहाड़ टूटता है उससे नारी का जीवन नर्क तुल्य बन जाता है। निराला जी ने सच ही कहा है कि 
वह क्रूर काल तांडव की स्मृति रेखा-सी 
 वह टूटे तारों की छुटी लता सी दीन 
दलित भारत की विधवा है। 
रही पत्नी व्रत की बात पति चाहे कितना भी कामुक हो, लंपट हो, नारी मित्र का पक्षधर हो, अपवाद स्वरुप संख्या में नगण्य-सम पतियों को छोड़कर सभी पति परिवार पोषण के संकल्प से आबद्ध रहते हैं। अपना पेट काटकर, अपनी आकांक्षाओं को कुचलकर, अपने दुख सुख की परवाह छोड़कर इस व्रत का नित्य पालन करते हैं। अपने परिवार का भरण पोषण सुख सुविधा और उज्जवल भविष्य मेरा दायित्व है, मेरा व्रत है। वह इस व्रत पालन में जीवन की सिद्धि मानता है-
व्रतेन दीक्षामाप्नोति, दीक्षयाप्नोति दक्षिणाम्।
दक्षिणा श्रद्धामाप्नोति, श्रद्धया सत्यमाप्यते।
व्रत से दीक्षा प्राप्त होती है। दीक्षा से दक्षिणा प्राप्त होती है। दक्षिणा से श्रद्धा प्राप्त होती है। श्रद्धा से सत्य की प्राप्ति होती है।

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