Thursday, 28 June 2018

बातूनी कछुए की कहानी। Batuni Kachua ki Kahani in Hindi

बातूनी कछुए की कहानी। Batuni Kachua ki Kahani in Hindi

Batuni Kachua ki Kahani
कछुए को बात करने का रोग था। जब तक वह किसी से बात नहीं कर लेता था, उसके मन को शांति नहीं मिलती थी। जब वह बात करने लगता तो करता ही जाता था। वह सोचता नहीं था कि उसकी बात सुनने वाले को अच्छी लग रही है या नहीं। तालाब के किनारे दो बगुले भी रहा करते थे। कछुए ने बगलों से मित्रता कर ली थी। वह प्रतिदिन बगुलों से देर तक बात किया करता था। बात करने में वह दूर की हांका करता था।

बगुले कछुए से बात तो करते थे पर कभी-कभी उसकी बातों से ऊब भी जाते थे, क्योंकि वह दूर की हांकने में बड़ा तेज था। बगुले कुछ कहते तो नहीं थे पर अपने मन में वह यह अवश्य ही समझते थे कि कछुए को बात करने की बीमारी है।

संयोग की बात है, पानी ना बरसने के कारण जोरों का अकाल पड़ा। तालाब का पानी सूख गया, पेड़-पौधे भी सूख गए। खेत-खलिहान बर्बाद हो गए। चारों ओर हाहाकार मचने लगा। तालाब का पानी सूख जाने के कारण बगुलों का जीवन संकट में पड़ गया। उन्होंने उस तालाब को छोड़कर दूसरी जगह जाने का निश्चय किया।

तालाब का पानी सूख जाने के कारण कछुआ भी संकट में पड़ गया था, पर उसमें बगुलों की तरह उड़ने की शक्ति नहीं थी। फिर भी वह दूसरी जगह जाने को विवश था। बगुले जब दूसरी जगह जाने लगे तो वह विदा मांगने के लिए कछुए के पास आए। कछुआ बगुलों की बात सुनकर बड़ा दुखी हुआ। वह रुआसा होकर बोला, “तुम दोनों तो जा रहे हो, मुझे यहां किसके सहारे छोड़े जा रहे हो?” बगुलों ने उत्तर दिया, “क्या किया जाए भाई, तालाब का पानी सूख गया है। अब यहां निर्वाह करना कठिन है। हमें भी तुम्हें छोड़ते हुए दुख हो रहा है, पर हम विवश है।

कछुआ बोला, “हां, बात तो ठीक है पर क्या तुम दोनों भी मुझे भी अपने साथ नहीं ले चल सकते?” बगुलों ने उत्तर दिया, “तुम हमारे साथ कैसे चल सकते हो? हमारी तरह तुम उड़ तो सकते नहीं।” कछुए ने सोचते हुए कहा, “तुम्हारी तरह उड़ तो नहीं सकता पर एक उपाय है। यदि तुम दोनों चाहो तो एक उपाय के द्वारा मुझे अपने साथ ले चल सकते हो।”

बगुलों ने पूछा, “वह कौन सा उपाय है?” कछुए ने कहा, “कहीं से ढूंढ कर एक लंबी पतली सी लकड़ी ले आओ, तुम दोनों अपने अपने मुख से एक-एक किनारे को पकड़ लेना, मैं लकड़ी को बीच में मुख से पकड़कर लटक जाऊंगा।” इस तरह तुम दोनों मुझे अपने साथ ले चल सकते हो। बगुलों ने कहा कि उपाय तो अच्छा है, पर कठिनाई यह है कि तुम्हें बोलने की बीमारी है। यदि उड़ते समय तुम्हें बात करने की धुन सवार हो गई तो हमारा कुछ नहीं बिगड़ेगा पर तुम व्यर्थ में अपनी जान गवा बैठोगे।

कछुआ बोल उठा, “वाह ! तुम दोनों क्या बात कर रहे हो, मैं ऐसी मूर्खता क्यों करूंगा? क्या मुझे अपने प्राणों का मुंह नहीं? फिर तो बगुलों ने कछुओं की बात मान ली। बगुले ढूंढकर एक लंबी पतली लकड़ी ले आए। दोनों ने एक-एक किनारे को मुख से पकड़ लिया। कछुआ बीच से मुख से लकड़ी को कसकर पकड़ कर लटक गया। बगुले मुख में लकड़ी को पकड़े हुए सावधानी से उड़ चले।

बगुले जब उड़ते हुए नगर के ऊपर से आगे बढ़ने लगे तो नगर के लोगों की दृष्टि उन पर पड़ी। उन्होंने आज तक ऐसा दृश्य नहीं देखा था। बगुले लकड़ी के एक-एक किनारे को पकड़कर उड़े जा रहे थे। कछुआ बीच से लकड़ी को मुंह से दबाए लटका हुआ था। लोग तालियां बजा-बजा कर हंसने लगे। जोर-जोर से कहने लगे कि देखो कैसा अद्भुत दृश्य है, दो बगुले कछुए को लेकर उड़ जा रहे हैं।

लोगों के हंसने की आवाज बगुले और कछुए के कानों में भी पड़ी। बगुले तो चुप रहे पर कछुए को तो बात करने का रोग था। लोगों की हंसी सुनते ही उसका रोग उमड़ आया। कछुए के मन में लोगों को डांटने की बात पैदा हो गई। ज्यों ही कछुए ने अपना मुंह खोला, लकड़ी उसके मुंह से छूट गई। वह नीचे गिर गया और मर गया। कछुए के मरने पर बगुलों को बड़ा दुख हुआ। वह आपस में एक दूसरे से कहने लगे, “अगर कछुए में अधिक बात करने का रोग ना होता तो उस बेचारे की जान इस तरह ना जाती।”

अधिक बात नहीं करनी चाहिए। बात करने से पहले सोच लेना चाहिए कि किस बात का क्या फल होगा। अधिक बात करने वाले को पछताना पड़ता है, हानी उठानी पड़ती है।

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