Friday, 9 February 2018

जब बस में मेरी जेब कटी अनुच्छेद लेखन

जब बस में मेरी जेब कटी अनुच्छेद लेखन 

jab bus mein meri jeb kati

जब मैं पहली बार 2000 में कानपुर आया तो यहां के वातावरण और रहन-सहन से बिल्कुल अनजान था। मैं रावतपुर जाने के लिए रामादेवी से २ नंबर बस में चढ़ गया। पहले तो बस खाली थी लेकिन जैसे-जैसे वह आगे चलती गई उसमें भीड़ बढ़ती चली गई और आर.टी.ओ. पहुँचते-पहुँचते उस बस में इतनी भीड़ हो गई कि उसमें तिल रखने की जगह भी नहीं बची। तभी बस में एक वृद्ध महिला चढ़ी। वह ठीक से खड़ी भी नहीं हो पा रही थी। मैंने देखा, उस पर किसी को दया नहीं आई। परंतु मुझसे रहा नहीं गया और मैं अपनी सीट से उठकर खड़ा हो गया। फिर मैंने उस वृद्धा से बैठने के लिए कहा तो वह मुझे आईर्वाद देती हुई मेरी जगह बैठ गई। मुझे लगा जैसे मुझे मेरी माँ ने आशीर्वाद दिया है। फिर कुछ देर बाद जब शाहदरा आया तो मैं बस से उतर गया। बस से उतरने के बाद जब मैंने अपनी जेब देखी तो जेब से पर्स गायब था। यह देखकर मेरे होश उड़ गए। उसमें एक सौ सत्तर रूपए थे। मुझे आभास हो गया कि बस में मेरी जेब कट चुकी है। तब तक बस भी खाली  हो चुकी थी और बस ड्राईवर एवं कंडक्टर भी चाय वगैरह पीने जा चुके थे और मैं अपने आपको लुटा-लुटा सा अनुभव कर रहा था। इस कड़वे अनुभव के बाद मैं कानपुर की बसों में बहुत संभलकर चलता हूँ।

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