परोपकार पर निबंध: परोपकार दो शब्दों के मेल से बना है — 'पर' अर्थात दूसरे और 'उपकार' अर्थात भलाई। जिसका अर्थ है दूसरों की निःस्वार्थ भलाई करना।
परोपकार पर निबंध - Paropkar Essay in Hindi
परोपकार पर निबंध: परोपकार दो शब्दों के मेल से बना है — 'पर' अर्थात दूसरे और 'उपकार' अर्थात भलाई। इस प्रकार परोपकार का शाब्दिक अर्थ है दूसरों की निःस्वार्थ भलाई करना। जब कोई व्यक्ति अपने सुख, समय या संसाधनों को किसी और के कल्याण में लगाता है, तो वही परोपकार कहलाता है। वास्तव में परोपकार एक ऐसा गुण है जो मनुष्य को 'मनुष्य' बनाता है। हमारे भारतीय दर्शन में परोपकार को अत्यंत महत्व दिया गया है। संतों और महापुरुषों ने परोपकार को ही सच्ची भक्ति कहा है। तुलसीदास जी ने लिखा —
"परहित सरिस धर्म नहिं भाई, परपीड़ा सम नहिं अधमाई।"
अर्थात परोपकार से बढ़कर कोई धर्म नहीं और दूसरों को कष्ट पहुँचाने से बड़ा कोई पाप नहीं। कवि मैथिलीशरण गुप्त जी भी इसी विचार को पुष्ट करते हुए कहते हैं: "मनुष्य है वही कि जो मनुष्य के लिए मरे, यह पशु प्रवृत्ति है कि आप आप ही चरे।" ये पंक्तियाँ स्पष्ट करती हैं कि सच्चा मनुष्य वही है जो दूसरों के हित में जीता है, क्योंकि केवल अपने लिए जीना तो पशु प्रवृत्ति है।
हमारे इतिहास और पुराणों में परोपकार के अनगिनत उदाहरण मिलते हैं। भगवान शंकर ने समुद्र-मंथन से निकले विष का पान करके समस्त सृष्टि के कष्ट को स्वयं उठा लिया था। महर्षि दधीचि ने राक्षसों के नाश के लिए अपनी देह की हड्डियाँ तक दान कर दी थीं ताकि उनसे वज्र बनाकर देवताओं की सहायता की जा सके। आधुनिक काल में भी स्वामी दयानंद सरस्वती, लोकमान्य तिलक, महात्मा गांधी, सुभाष चंद्र बोस जैसे महान व्यक्तित्वों ने अपना सर्वस्व राष्ट्र और लोकहित के लिए समर्पित कर दिया।
हमें परोपकार की सबसे बड़ी शिक्षा स्वयं प्रकृति से मिलती है। सूर्य हमें निःस्वार्थ भाव से प्रकाश देता है, चंद्रमा अपनी चाँदनी बिखेरकर शीतलता प्रदान करता है, वायु निरंतर गति से बहती हुई हमें जीवन देती है, और वर्षा का जल धरती को हरा-भरा बनाकर हमारी खेती को लहलहा देता है। प्रकृति के इस शाश्वत चक्र से परोपकार की शिक्षा ग्रहण कर हमें भी अपने जीवन में इस भावना को अपनाना चाहिए। आज तक जितने भी मनुष्य महापुरुष कहलाने योग्य हुए हैं, या जिनकी हम श्रद्धापूर्वक पूजा करते हैं, वे सब मूलतः परोपकारी ही थे।
अतः, यह स्पष्ट है कि परोपकार केवल एक गुण नहीं, बल्कि मानवता का आधार है। परोपकार करने वाला व्यक्ति ही सच्चे अर्थों में संतुष्ट और शांत होता है। "जो अपने लिए जीते हैं, वे मर जाते हैं; परंतु जो औरों के लिए जीते हैं, वे अमर हो जाते हैं।" अतः हमें अपने जीवन में परोपकार को एक अनिवार्य अंग के रूप में अपनाना चाहिए, क्योंकि इसी में जीवन की सच्ची सार्थकता, आंतरिक आनंद और मानवता का सर्वोच्च गौरव निहित है।
COMMENTS