तस्वीर कहानी की मूल संवेदना - Tasveer Kahani ki Mool Samvedna

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तस्वीर कहानी की मूल संवेदना - Tasveer Kahani ki Mool Samvedna

तस्वीर कहानी की मूल संवेदना - 'तस्वीर' कहानी एक ऐसी नारी की विडम्बनापूर्ण करूणा को उजागर करती है जो पति के देहान्त के पश्चात् ससुर की झिडकियों एवं उपेक्षा की शिकार होती है। उसके खुद के बच्चे भी उसकी उपेक्षा करते हैं। अर्थ के अभाव में पारिवारिक जीवन टूटने लगता है। एक ही छत के नीचे रहते हुए भी घर के लोग एक-दूसरे से कोसों दूर हो जाते हैं। पति की मृत्यु के तेरह दिन बाद जब घर खाली हो गया तो इस विधवा की तकलीफें और बढ़ती गई। वह इस सन्दर्भ में कहती है कि "उसके मरने के बाद मैं और भी त्रस्त हो उठी थी। निराश्रय और त्रस्त छोटे से कद का मेरा ससुर दुबला-पतला, घुटनों तक लम्बा कोट पहने और सिर पर बड़ी सी पगड़ी रखे आगे-आगे चल रहा होता, बगल में कागज़ों की फाइल दबाए, और मैं पीछे घिसटती जाती। मेरा ससुर बड़ी बेरुखी से बोलता था ... उसे विश्वास था कि मैं उसके बेटे की मौत का कारण बनी हूँ।" पति की मृत्यु के पश्चात् ससुर को चाहिए था कि वह बहू के प्रति सहानुभूति के भाव रखे। लेकिन वह आए दिन बहू पर दबाव बनाता रहता। कभी वह मकान को बेचने की बात करता, कभी घर की चीज़ों को बेचने की बात करता रहता है। ससुर बहु का सहारा बनने के बजाए उसका मानसिक शोषण करता रहता। वह हमेशा उसके साथ तीखे शब्दों में बात करता है। दिन भर की कड़वी बातों से बहू डरी-सहमी रहती है। वह पहले से भी और अधिक भयभीत रहती। वह इस कहानी में अपनी विवशता को प्रस्तुत करती है - "मेरी जिंदगी की बागड़ोर, जो पहले मेरे पति के हाथ में थी, अब ससुर मुझे हांकने लगा था, जिस भांति उसके जीते जी मैं उसका मुँह ताका करती थी, उसके चले जाने के बाद ससुर का ताकने लगी थी।” इससे स्पष्ट होता है, भारतीय विवाहिता नारी किस विवशता में जीती है, और कैसे सारी स्थितियों के साथ समझौता करते हुए जीवन व्यतीत करती है, लेकिन उसके प्रति सहानुभूति कोई नहीं रखता है।

ससुर द्वारा उपेक्षित व्यवहार को सहन करने वाली की अधिक पीड़ादायक तब बनती है जब पिता की तस्वीर के समक्ष उसके स्वयं के बच्चे शिकायत करते हैं। आर्थिक विवेचना से भरी घर की स्थिति, बच्चों की परेशानी, ऊपर से ससुर की यातना इन सबसे जूझते - जूझते यह स्त्री यही सोचने लगती है, "उधर उसकी जगह मैं चली जाती तो अच्छा था।" विधवा नारी का इस तरह सोचना स्वभाविक हो जाता है जब वह परिवार एवं समाजमें उपेक्षित महसूस करती है।

कहानी का सबसे मार्मिक दृश्य तब उभरता है जब बच्चों का माँ के प्रति दृष्टिकोण बदलता है। वह माँ को गलत समझते रहते और घर में पिता की तस्वीर के समक्ष शिकायत लगाते जाते और माँ को दोषी करार देते जाते। लेकिन जब वह ससुर और माँ के विवाद को अपने कान से सुनते हैं तब पिता की तस्वीर के आगे माँ की दयनीय दशा का वर्णन अपनी भाषा में करते हैं- "पापा माँ कुर्सियां - मेज़ नहीं बेचेगी। माँ ने कह दिया तुम्हारी चीजें घर में ही रहेंगी। पापा, दादा जी ने माँ को बहुत डांटा, माँ नहीं मानी।" बच्चे यथार्थ स्थिति का वर्णन करते हुए कहते हैं। कि तुम पैसे देकर नहीं गये, वह इतनी गरीब है......। बच्चों का स्नेह देखकर माँ की ममता फूट पड़ती है। एक स्त्री को अपने बच्चे के हृदय में अपने प्रति अपार स्नेह के अलावा और क्या चाहिए, लेखक ने नारी की सहनशक्ति का परिचय प्रस्तुत कहानी की नायिका के चरित्र चित्रण के द्वारा दिया है। लेखक ने नारी की भीतरी पीड़ा को तथा पुरुष प्रधान समाज में हो रही नारी की उपेक्षा को कलात्मक ढंग से व्यक्त किया है। तस्वीर से कहानी का आरम्भ होता है और तस्वीर की मुस्कुराहट के साथ ही कहानी का अन्त होता है। पतिहीन नारी की दयनीय परिस्थिति का चित्रण कहानी में सशक्त रूप से हुआ है।

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