Thursday, 5 July 2018

बैसाखी का इतिहास व महत्व पर निबंध

बैसाखी का इतिहास व महत्व पर निबंध

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भारत में कालगणना चांद्र मासों और सौर मासों के आधार पर होती है। जिस प्रकार चांद्र गणना के आधार पर चैत्र शुक्ल प्रतिपदा वर्ष का प्रथम दिन है उसी प्रकार वैसाखी, मेष संक्रांति अथवा विषुवत संक्रांति सौर नव वर्ष का प्रथम दिवस है। पंजाब, सीमा प्रांत, हिमाचल, जम्मू प्रांतों में, उत्तर प्रदेश के गढ़वाल, कुमायूं तथा नेपाल में यह दिन नव वर्ष के रूप में मनाया जाता है।

बैसाखी पंजाब और पंजाबियों का महान पर्व है। खेत में खड़ी फसल पर हर्षोल्लास प्रकट करने का दिन है। धार्मिक चेतना और राष्ट्रीय जागरण का स्मृति दिवस है। खालसा पंथ का स्थापना दिन भी है।

वैसाखी मुख्यतः कृषि पर्व है। पंजाब की भूमि में जब रवि की फसल पक कर तैयार हो जाती है और वहां का ‘बाँका छैल-जवान’ उस अन्न-धन रूपी लक्ष्मी को संग्रहित करने के लिए लालायित होता है, तो वह प्रसन्नता से मस्ती में नाच उठता है।

ऐतिहासिक दृष्टि से वैशाखी का दिन महत्वपूर्ण है। औरंगजेब के अत्याचारों से भारत भूमि को मुक्त कराने एवं हिंदू धर्म की रक्षा के लिए सिखों के दसवें किन्तु अंतिम गुरु गोविंद सिंह ने 1699 में खालसा पंथ की स्थापना इसी (बैसाखी पर) शुभ दिन पर की थी।

13 अप्रैल 1919 को बैसाखी के पावन पर्व पर भारत में ‘रोलेट एक्ट’ तथा अमृतसर में ‘मार्शल लॉ‘ लागू करने के विरोध में अमृतसर के स्वर्ण मंदिर के समीप जलियांवाला बाग में एक महति सभा हुई थी। इस बाग के एकमात्र द्वार पर जनरल डायर ने अधिकार करके बिना कोई चेतावनी दिए सभा पर गोली बरसाना आरंभ कर दिया, इससे हत्याकांड में 1500 व्यक्ति या तो मारे गए या मरणासन्न हो गए। अनेक लोग अपनी जान बचाने के लिए कुएं में कूद गए। चार-पाँच सौ  व्यक्ति ही जीवित बच पाए। शहीदों की स्मृति में ‘जलियांवाला बाग समिति’ ने लाल पत्थरों का सुंदर स्मारक बनवाया है।

भारत में महीनों के नाम नक्षत्रों के आधार पर रखे गए हैं। बैसाखी के समय आकाश में विशाखा नक्षत्र होता है। विशाखा नक्षत्र युता पूर्णिमा मास में होने के कारण इस मास को वैशाख कहते हैं। इसी कारण वैशाख मास के प्रथम दिन को वैशाखी नाम दिया गया है और पर्व के रूप में स्वीकार किया गया।

वैशाखी के दिन सूर्य मेष राशि में संक्रमण करता है अतः इसे ‘मेष संक्रांति’ भी कहते हैं। रात दिन एक समान होने के कारण इस दिन को ‘संवत्हार’ भी कहा जाता है। पद्मपुराण में वैशाख मास को भागवत्प्रिय होने के कारण माधवमास कहा गया है। अतः इस मास में तीर्थों पर कुंभ का आयोजन करने की परंपरा है।

वैशाखी के दिन समस्त उत्तर भारत में पवित्र नदियों एवं सरोवर में स्नान करने का महात्म्य है। अतः सभी नर नारी चाहे खालसा पंथ के अनुयायी हों अथवा वैष्णव धर्म के, प्रातः काल पवित्र सरोवर अथवा नदी में स्नान करना पुण्य समझते हैं। इस दिन गुरुद्वारों और मंदिरों में विशिष्ट उत्सव मनाया जाता है।

सौर नववर्ष या मेष संक्रांति के कारण पर्वतीय अंचल में इस त्यौहार का बहुत महत्वपूर्ण स्थान है। गढ़वाल, कुमाऊं, हिमाचल प्रदेश आदि सभी पर्वतीय प्रदेशों में और नेपाल में इस दिन अनेक स्थानों पर मेले लगते हैं। यह मेले अधिकांश उन स्थानों पर लगते हैं जहां दुर्गा देवी के मंदिर हैं या गंगा आदि पवित्र नदियां हैं। लोग इस दिन श्रद्धा पूर्वक देवी की पूजा करते हैं और नए नए वस्त्र धारण कर उल्लास के साथ मेला देखने जाते हैं। ना केवल उत्तर भारत में अपितु उत्तर पूर्वी सीमा के असम प्रदेश में भी मेष संक्रांति आने पर ‘बिहू’ पर्व मनाया जाता है।

बैसाख मास में बसंत ऋतु अपने पूर्ण यौवन पर होती है। अतः बैसाखी का त्यौहार प्राकृतिक शोभा और वातावरण की मधुरता के कारण भी महत्वपूर्ण स्थान रखता है। इस वातावरण में जीवन में उल्लास एवं उत्साह का संचार होना स्वाभाविक ही है।

आमोद-प्रमोद की दृष्टि से पंजाब में ढोल की आवाज और भांगड़ा की धुन पर पाँव थिरकते हैं। नृत्य में उछलना, कूदना-फांदना, एक दूसरे को कंधे पर उठाकर नाच करना भांगड़ा की विशिष्ट पद्धतियां है। तुर्रेदार रंग बिरंगी पगड़ी, रंगीन कसीदा की हुई बास्केट नृत्य के विशिष्ट और प्रिय परिधान हैं।

बैसाखी पर पंजाबियों का आत्मगौरव दर्शनीय होता है। ‘देश मेरा पंजाबी नी, होर बस्से कुल जहान में’ उसका पंजाब के प्रति गर्व टपकता है। ‘गबरू मेरे देश में दा बांका छैल जवान’ में उसके पुरुषों का पौरूष झलकता है। ‘मेहनत ऐसे जवान दी, सोना दये पसार’ में पंजाब का परिश्रम और पुरुषार्थ प्रकट होता है। ‘नड्डी देश पंजाब दीं, हीरा बिघों हीर’ में पंजाब की नारी का अनिन्द्य सौंदर्य दमकता है।

वैसाखी हर साल अंग्रेजी कैलेंडर के अनुसार 13 अप्रैल को आती है। (कभी 12-13 वर्ष में 14 तारीख भी हो जाती है) और पंजाब की आत्मा को झकझोरती है पर दुर्भाग्य से आज वह आत्मा विभक्त है। आज वहां की शस्य श्यामला भूमि अन्न के साथ फूल के कांटे भी पैदा करती है। आज बैसाखी पर नाचने वाले भांगड़े में शिव के तांडव का विध्वंस प्रकट होता है। इसलिए आज वैशाखी आकर पंजाब के तरुण वर्ग को याद दिलाती है उस खालसा पंथ की जो हिंदू संरक्षण की प्राचीर थी। वह याद दिलाती है उस भाईचारे की जहां माता 10 गुरुओं के ऋण को उतारने के लिए अपने जयेष्ठ पुत्र को गुरु के चरणों में समर्पित कर सिख बनाती थी। पंजाब की धरती मां वैशाखी के पावन पर्व पर दोनों बंधुओं से अभ्यर्थना करती है ‘हे मेरे पुत्रों! तुसी एक होकर रहो। त्वाडी एकता विच ही देश की आन बान शान है।‘


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