पर्यावरण और विकास निबंध / विकास बनाम पर्यावरण पर निबंध

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पर्यावरण और विकास निबंध / विकास बनाम पर्यावरण पर निबंध 

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विकास उस सोने के हिरन के समान हैं जिसके पीछे-पीछे  भागते हुए हम उस हालात पर पहुँच चुके हैं जहां सांस लेना दूभर हो रहा है। आज प्रकृति द्वारा प्रदत्त संसाधनों का इतना अधिक दोहन किया जा रहा है की उसने पारिस्थितिकी को ही तबाह कर दिया है। ऐसे में हमें जरुरत हैं आदर्श विकास की। ऐसा विकास जिससे हमारी जरूरतें भी पूरी हो जाए और पर्यावरण को नुकसान भी न हो। 

विकास और राजनीति : अमेरिका जैसे संपन्न देश हमेशा चीन व भारत जैसे विकासशील देशों को सुझाव देते हैं की वे अपने उद्योग-धंधों पर लगाम लगा लें। वे यह भूल जाते हैं की दुनिया में सबसे अधिक प्रदूषण तो उन्होंने ही फैलाया है। वहीँ विकासशील देशों का यह मत है कि उनको भी विकास का उतना ही अवसर मिलना चाहिए जितना कि विकसित देशों को मिला। इसलिए प्रदूषण के स्तर में कमी लाने कि जिम्मेदारी विकसित देशों की है। इस प्रकार यह एक गहरी राजनीति है। स्पष्ट है कि कोई भी पक्ष पर्यावरण को बचाने के लिए आगे नहीं आना चाहता। 

विकास के दुष्परिणाम : विकास के दुष्परिणाम दिखने शुरू हो गए हैं। इस बात से इनकार नहीं किया जा सकता कि लोगों के कल्याण के लिए विकास जरूरी है। किन्तु हमें इस बात को भी स्वीकारना होगा कि तमाम मुश्किलों का स्रोत बन रहा तथाकथित विकास अर्थहीन है। ऐसे में हमें कुछ ऐसे कदम उठाने होंगे जिससे पर्यावरण और विकास के बेच समन्वय स्थापित हो सके। 

(1) जहरीले होती वायु : हर साल लगभग 12 लाख लोग जहरीली हवा से मरते हैं। विश्व बैंक कि रिपोर्ट के अनुसार विश्व के 15 सबसे प्रदूषित शहरों में 14 शहर भारतीय हैं। साल दर साल सड़कों पर बढ़ते वाहनों, फैक्ट्रियों आदि से निकलने वाली जहरीली गैसें वायुमंडल में इतनी अधिक मात्रा में मिल गयी हैं कि अब तो सांस लेना भी दूभर हो गया है। इसी कारण सांस की बीमारियां भी कई गुना तेजी से बढ़ रही हैं। 

(2) जल को तरसते लोग : हमारे देश की 6 प्रतिशत आबादी को स्वच्छ पानी नसीब नहीं है। कारखानों टेनरियों और नालों का पानी नदियों में प्रवाहित कर दिया जाता है, जिससे पीने का पानी शुद्ध नहीं रहा। पानी में तेजी से आर्सेनिक और लेड जैसे जहरीले तत्व बढ़ रहे हैं। जो जब पीने के पानी के साथ हमारे शरीर में जाते हैं तो साथ में लाते हैं कई तरह की बीमारियां। 

(3) अनाज की गिरती पौष्टिकता : यद्यपि आधुनिक कृषि तकनीकों के प्रयोग से हमारे देश में अनाज की पैदावार बढ़ रही है, लेकिन जलवायु परिवर्तन के कारण अनाज के पोषक तत्व कम हो रहे हैं। विश्व स्वास्थ्य संगठन के अनुसार भारत में सर्वाधिक कुपोषित लोग रहते हैं। 

(4) जैव विविधता को खतरा : जीव-जंतुओं की कुल प्रजाति का 8 प्रतिशत भारत में पाए जाते हैं। लेकिन मानवीय और मौसमी कारकों के चलते कई प्रजातियां आज विलुप्त होने की कगार पर हैं। यद्यपि हमारी सरकार इन प्रजातियों के संरक्षण का प्रयास कर रही है, परन्तु यदि हम पर्यावरण को ताक पर रखकर इसी प्रकार अंधे विकास की ओर भागेंगे तो  क्या हम इन प्रजातियों का संरक्षण कर पाएंगे ?

विकास और पर्यावरण के मध्य समन्वय : पर्यावरण और विकास के मध्य समन्वय स्थापित करने के लिए अन्य विकल्पों को तलाशना होगा। जैसे फ्रिज का बेहतर विकल्प है मटका या सुराही।  ये न तो बिजली की खपत करते हैं और न ही हानिकारक गैसों का उत्सर्जन। गर्मियों में तपते घरों की छतों पर रिफ्लेक्ट शीट और सोलर पैनल लगाकर गर्मी तो की ही जा सकती है साथ ही पंखों के लिए जरुरी बिजली का उत्पादन भी किया जा सकता है। इसी प्रकार वाहनों में भी कारों को इलेक्ट्रिक कारों और छोटी दूरी के लिए साइकिल से बदला जा सकता है। 

निष्कर्ष : जिस तरह से पर्यावरण में तेजी से बदलाव आ रहे हैं उसको देखते हुए हमें अपने ऊर्जा के संसाधनों के साथ समझौता करना ही पड़ेगा। अब समय आ गया है की विकास बनाम पर्यावरण की इस बहस पर विराम लगाया जाए और बीच का रास्ता निकाला जाए जिससे एक इकोफ्रैंडली अर्थव्यवस्था का उदय हो। 

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