Wednesday, 18 April 2018

भारतीय त्योहारों का महत्व पर निबंध

भारतीय त्योहारों का महत्व पर निबंध

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भारतीय पर्व और त्योहार भारतीय सभ्यता और संस्कृति के दर्पण हैं, जीवन के श्रृंगार हैं, राष्ट्रीय उल्लास, उमंग और उत्साह के प्राण हैं; विभिन्नता की इंद्रधनुषी आभा में एकरूपता और अखंडता के प्रतीक हैं और जीवन के अमृत उत्सव हैं।

भारतीय पर्व और त्यौहार गहन सांस्कृतिक अध्ययन, पौराणिक आख्यान, लोकरंजनात्मक वैज्ञानिक दृष्टिकोण, राजनीतिक पुनर्जागरण, आर्थिक संवर्धन एवं उत्साह पूर्ण सामाजिक जीवन के अभिराम अभिव्यंजक हैं। -डॉक्टर सीताराम झा ‘श्याम’ के अनुसार 

भारतीय संस्कृति आनंदवाहिनी है, उल्लास-सलिला है, अतः हमारे सारे पर्व मंगल माधुर्य से ओतप्रोत हैं। इसलिए यहां प्रत्येक दिन पर्व है, पूजा-अर्चना का प्रसंग है। भारत को त्योहारों का देश है। पंचांग खोलकर देखिए हर दिन कोई ना कोई त्यौहार है, मेला है। इनमें प्रमुख पर्व चार हैं। होली रक्षाबंधन दशहरा और दिवाली।  होली आपसी मेल मिलाप का पर्व है। रक्षाबंधन वस्तुतः भाई बहन के पावन प्रेम की रक्षा का त्योहार है। दशहरा असत्य और आसुरी प्रवृत्ति पर सत्य और देवत्व की विजय का साक्षी है। शक्ति की आराधना का पर्व है। दीपावली एक ओर अंधकार पर ज्योति की विजय का संदेश देता है, तो दूसरी ओर भगवती लक्ष्मी की आराधना और स्वागत का पर्व है। समाज की भौतिक समृद्धि लक्ष्मी पर ही आश्रित है। 

ऋतु-परिवर्तन के संदेशवाहक दिवस भी पर्व रूप में प्रसिद्ध हुए। इनमें इनमें मकर संक्रांति, वैशाखी, गंगा-दशहरा यह तीन प्रमुख पर्व हैं। पर्व के दिन पावन तीर्थों और नदियों में स्नान करने के महत्व पर बल दिया गया है। कृषि-प्रधान भारत के ऋतु-पर्व कृषि के प्रसंग से आलोकित है। 

तमिलनाडु का पोंगल (मकर) कि संक्रांति पर लहलहाती फसल के घर आने पर प्रभु को भोग लगाने और गाय-बैलों की पूजा का पर्व है। केरल की शस्यश्यामला पुष्प आच्छादित भूमि पर श्रावण मास में आनंदोपभोग का त्यौहार है ओणम। अश्विन शुक्ला सप्तमी से दशमी (विजयादशमी) तक बंगाल के ही नहीं अपितु पूर्ण भारत के नर-नारी महिषासुर मर्दिनी ‘दुर्गा-पूजा’ में मस्त हो जाते हैं। वैशाख मास में उड़ीसा में जगन्नाथ जी की रथयात्रा भारत का सर्वप्रथम और विश्व प्रसिद्ध समारोह बना।

कार्तिक पूर्णिमा को गुरु नानक का जन्म दिवस सिखों का महान पर्व है, तो इसी दिन हरियाणा और उत्तर प्रदेश का प्रसिद्ध पर्व है- ‘नहान’। जिसमें गंगा और यमुना पर जन समाज उमड़ा पड़ता है’ पांचवे गुरु अर्जुन देव तथा नवे गुरु तेगबहादुर के बलिदान-दिवस सिक्खों के पवित्र त्यौहार बने। जैन मत के पवित्र पर्वों में ‘महावीर जयंती’ तथा ‘पर्युषण पर्व’ विशेष उल्लेखनीय है। महावीर जयंती जैन मत में अंतिम तीर्थंकर महावीर स्वामी के जन्मदिवस के उपलक्ष्य में चैत्र शुक्ल त्रयोदशी को मनाया जाता है।

समवेत रूप में देखें तो प्रतिपदा का संबंध नववर्ष से है। दूज ‘भैया दूज’ से जुड़ी है। तीज को ‘हरतालिका’ और ‘हरियाली तीज’ है। चौथ का दिन ‘करवा चौथ’ और ‘गणेश चतुर्थी’ को समर्पित है। पंचमी को ‘नाग पंचमी’ और ‘बसंत पंचमी’ मनाई जाती है। षष्ठी का संबंध कृष्ण अग्रज बलराम की जन्मतिथि ‘हलषष्ठी’ से है। सप्तमी ‘रथसप्तमी’ और ‘संतान-सप्तमी’ को अर्पित है। नवमी भगवान राम की पावन जन्म तिथि है। दशमी ‘विजयादशमी’ तथा ‘गंगा-दशहरा’ का स्मरण करवाती है। एकादशी ‘निर्जला-एकादशी’, देवशयनी एकादशी तथा देवोत्थानी एकादशी के कारण प्रसिद्ध है। द्वादशी को वामन द्वादशी पड़ती है। केरल में ओणम भी श्रावण द्वादशी को को मनाया जाता है। त्रयोदशी का संबंध धनत्रयोदशी तथा धन्वंतरि जयंती से है। नरक चतुर्दशी वैकुंठ चतुर्दशी तथा अनंत चतुर्दशी, चतुर्दशी को आलोकित करते हैं। पंद्रहवीं तिथि समर्पित है पूर्णिमा तथा अमावस को। पूर्णिमा गौरवान्वित करती है होली, व्यास पूर्णिमा, रक्षाबंधन, शरद पूर्णिमा और बुद्ध पूर्णिमा से तो अमावस्या को अलंकृत करते हैं दीपावली और सर्व पितृ अमावस्या। 

भारत के अनेक पर्व और त्यौहार का एक दिन नहीं, दो  दिन नहीं अनेक दिन तक निरंतर चलकर हिंदू जन-जीवन को अमृतमय बना देते हैं, वासंतिक नवरात्र यदि 9 दिन तक धर्म की ध्वजा फहराते हैं तो शारदीय नवरात्र प्रतिपदा से दसवीं तक उत्तर-भारत में रामलीला से पूर्व भारत में पूजा द्वारा जीवन को उल्लास और उमंग प्रदान करते हैं। 

भारत भगवान के अनेक रूपों, देवी-देवताओं तथा महापुरुषों का लीला स्थल है। तथा विविधता और रंगों से परिपूर्ण है। जयंती या पुण्यतिथिया, स्मृतियां सब हमारे यहां पर पर्व हो गई। दशावतार, 24 तीर्थंकर 33 करोड़ देवी देवता, 64 जोगनिया, 56 भैरव, 56 करोड़ महापुरुष सब की जयंती और पुण्यतिथि स्थान स्थान पर पर्व के रुप में मनाए जाते हैं।


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