Wednesday, 20 June 2018

हिंदी कहानी - तेरा मेरा हिस्सा

हिंदी कहानी - तेरा मेरा हिस्सा

हिंदी कहानी - तेरा मेरा हिस्सा 

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राम और श्याम दो भाई थे। एक दिन श्याम ने कहा हमारे पिताजी की जोड़ी हुई तीन चीजें हैं। एक गाय, एक कंबल और एक आम का पेड़। क्यों ना हम इन्हें बराबर बांट लें ? राम ने श्याम की बात मान ली। श्याम चालाक था। बोला गाय का आगे का हिस्सा तेरा और पीछे का हिस्सा मेरा। आम के पेड़ का नीचे वाला भाग तेरा और ऊपर का भाग मेरा। कंबल दिन में तेरे पास रहेगा और रात में मेरे पास। भोले-भाले राम ने कहा ठीक है, ऐसा ही करेंगे। 


राम रोज गाय को भूसा खिलाता। श्याम सुबह शाम दूध पीता और उसे बेचकर पैसे कमाता। राम रोज आम के पेड़ को पानी देता, श्याम आम के फल ले लेता। राम दिन में कंबल को काम में नहीं ले पाता। रात में श्याम कंबल ओढ़ कर आराम से सो जाता। बेचारा राम रात ठंड में काटता रहता। राम और श्याम कि इस दिनचर्या को एक वृद्ध बहुत ध्यान से देख रहा था। एक दिन उसने राम को बुलाकर उसके कान में कुछ कहा। 



राम मुस्कुराते हुए घर वापस लौट आया। अगले दिन सुबह उठते ही राम ने कंबल को पानी में भिगो दिया। कम्बल गीला होने के कारण श्याम उसे रात में ओढ़ नहीं पाया। रातभर वह ठंड में कांपता रहा। वह राम के ऊपर गुस्से में चिल्लाया तुमने ऐसा क्यों किया ?  राम बोला सुबह के समय कंबल मेरा है, उसका मैं कुछ भी कर सकता हूं। श्याम कुछ ना कह पाया, उसके मुंह पर जैसे ताला लग गया हो। 



सुबह हुई श्याम दूध दुहने लगा। राम ने गाय के गले में बंधी रस्सी को खींचा, गाय भड़क गई। गाय ने एक लात मारी जो श्याम को लग गई श्याम एक ओर गिर पड़ा और दूध का बर्तन दूसरी ओर। श्याम चिल्ला उठा, "तुम पागल हो गए हो क्या ?" राम ने जवाब दिया, "गाय का आगे का हिस्सा मेरा है ना। मैं उसे खींच रहा हूं तो तुम्हें गुस्सा क्यों आ रहा है।" बस श्याम की बोलती बंद हो गई वह चुपचाप पेड़ के नीचे सो गया। कुछ ही समय बीता कि पेड़ काटने की टक-टक की आवाज आई। श्याम ने घबरा कर आंखें खोली, सामने राम पेड़ को काट रहा था। अरे अरे ! यह क्या कर रहे हो? श्याम चीखने लगा। राम ने कहा पेड़ का निचला हिस्सा मेरा भी है ना उसी को काट रहा हूं। 



श्याम समझ गया कि अब राम को बेवकूफ बनाना आसान नहीं। उस दिन से दूध और आम बेच कर दो पैसे मिलते उन्हें दोनों भाई बराबर बराबर बांट लेते। कंबल को भी बारी-बारी से ओढने लगे। एक दिन राम और का और दूसरे दिन श्याम। 






Tuesday, 19 June 2018

हिंदी कहानी - सबसे बड़ा धन

हिंदी कहानी - सबसे बड़ा धन

हिंदी कहानी - सबसे बड़ा धन 

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एक गांव में तीन भाई रहते थे। वह बहुत बुद्धिमान थे। एक दिन उनके बूढ़े पिताजी ने उन्हें बुलाया और कहा, "बच्चों तुम्हें देने के लिए मेरे पास कुछ नहीं है। ना जेवर, ना जमीन और ना ही भेड़-बकरी। मगर मैंने तुम्हें सबसे कीमती दौलत दे दी है।" तुम्हारा चातुर्य ! अब मैं निश्चिंत होकर मर सकता हूं। 


पिताजी की मौत के बाद तीनों भाइयों ने अपना ज्ञान बढ़ाने की सोची। वह एक लंबी यात्रा पर निकल पड़े। कई देश घूमे। एक दिन उन्हें एक सिपाही नजर आया। वह कुछ ढूंढ रहा था। तीनो भाई उस सिपाही से बात करने के लिए रुक गए। 



पहला भाई : भाई साहब आप क्या किसी ऊंट को ढूढ़ रहे हो? 

सिपाही : हां। 
दूसरा भाई : उसे क्या बाई आंख से दिखाई नहीं देता ?
तीसरा भाई : क्या उस पर एक महिला सवारी कर रही थी ?
सिपाही : बिल्कुल ! तो आपको मेरा ऊंट मिल गया है ? कहां है वो ? 
पहला भाई : पर हमने तो आपके ऊंट को देखा ही नहीं। 
सिपाही : क्या ? फिर आपको मेरे ऊंट के बारे में इतना सब कैसे पता चला ? जरूर आप कुछ छुपा रहे हैं। 
यह कहकर सिपाही उन्हें अपने राजा के पास ले गया और सारी बात बताई। तब तीनों भाइयों ने राजा से कहा कि उन्होंने ऊंट को कभी नहीं देखा। राजा चकित रह गए। 
राजा : मेरे सिपाही ने आपको कुछ नहीं बताया स्वयं आपने उसके बारे में सब कुछ बता दिया। यह कैसे संभव है?
तीनो भाई : हमने अपनी चतुराई से समझ लिया। 
राजा : जिसे देखा ही नहीं उसके बारे में आप कैसे अंदाजा लगा सकते हैं। चलो हम आपकी बुद्धि की परीक्षा लेते हैं। 
राजा ने अपने सेवकों के कान में कुछ फुसफुसाया। सेवक बाहर जाकर एक पेटी लेकर आए। तीनो भाई सेवकों के हर कदम को बहुत ध्यान से देख रहे थे। 
राजा : क्या तुम बता सकते हो इस पेटी में क्या है? 
पहला भाई : इसमें कोई हल्की सी चीज है। 
दूसरा भाई : वह गोलाकार है। 
तीसरा भाई : वह अनार है। 
राजा ने बेटी खुलवाई। आश्चर्य कि पेटी के अंदर सचमुच एक अनार था। 
राजा : शाबाश ! आपको कैसे पता चला कि पेटी के अंदर अनार ही है ? 
पहला भाई : आपके सेवक पेटी को जिस तरीके से ला रहे थे, हमने उसे गौर से देखा। मुझे ऐसे लगा की पेटी के अंदर कोई भारी चीज नहीं हो सकती। हमारी परीक्षा लेने के लिए सिर्फ एक चीज रखी गई है। 
दूसरा भाई : पेटी में एक वस्तु लुढ़क रही थी। उससे मैंने अनुमान लगाया कि वह चीज गोलाकार है। 
तीसरा भाई : मैंने आप के बगीचे में अनार लगे हुए देखे। पेटी में एक ही चीज रखी गई थी और वह गोल थी। मैंने अंदाजा लगाया कि वह अनार की होगा। 

राजा : आप लोग सचमुच बहुत चतुर हैं। अब आप यह भी बता दीजिए कि ऊंट के बारे में आपने कैसे पता लगाया ?
पहला भाई : ऊंट के पैरों के निशान से मैंने समझ लिया कि वह उसी रास्ते से गया होगा। 
दूसरा भाई : सड़क पर दांये ओर घास और पौधे रौंदे हुए थे। बांयी ओर के पौधे वैसे के वैसे थे। इससे मैंने अंदाजा लगाया कि उसको बांयी आँख से नहीं दिखता। 
तीसरा भाई : सड़क पर एक ही स्थान पर ऊंट के पैर मोड़कर बैठने के निशान थे। पास में एक महिला की चप्पल के निशान भी  थे। इससे मैंने अंदाजा लगाया कि उसके साथ में एक महिला भी थी। 
राजा : वाह भाई !आपकी होशियारी तो सच में तारीफ के काबिल है। आप लोगों ने ऊंट की चोरी नहीं की है। वह कहीं और गया होगा। मुझे बहुत खुशी होगी अगर आज से आप इसी प्रदेश में रहें और बेहतर शासन करने में मेरी मदद करें। 

Monday, 18 June 2018

मछुआरा और जिन्न हिंदी कहानी

मछुआरा और जिन्न हिंदी कहानी

मछुआरा और जिन्न हिंदी कहानी 

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समुद्र तट पर एक गांव बसा था। वहां एक मछुआरा रहता था। वह दिन में तीन बार समुद्र में जाल देखता था। जाल में फंसी हुई मछलियों को बेच कर अपना गुजारा करता था। एक दिन उसने हमेशा की तरह मछली पकड़ने के लिए जाल फेंका। जब उसने जाल को बाहर खींचने की कोशिश की तो उसे भारी पाया। उसमें एक जानवर का मृत शरीर था। 

मछुआरे ने उसे बाहर निकालकर दोबारा जाल फेंका। कम से कम इस बार तो अच्छी मछलियां जाल में फंस जाए, वह मन ही मन प्रार्थना करने लगा। इस बार भी उसने बड़ी मुश्किल से जाल बाहर खींचा। जाल में एक बड़ा घड़ा फंसा हुआ था। उसमें पत्थर, मिट्टी और कांच के टुकड़े भरे हुए थे। हाय ! यह कैसी परीक्षा, एक भी मछली हाथ नहीं आई। मछुआरा निराश हो गया। 

अब उसने आखरी बार जाल फेंका। तीसरी बार भी जाल भारी था। अरे यह क्या, जाल में एक पीतल की सुराही थी। कम से कम इसे बेच कर आज के खाने का इंतजाम तो कर ही लूंगा, यह सोचते हुए मछुआरे ने सुराही को खोला। उसके अंदर कुछ भी नहीं था। अचानक उसमें से काला धुआं निकलने लगा। धुआं धीरे-धीरे फैल कर आसमान तक पहुंच गया। अब उसमें से एक आकार उभरा। वह एक जिन्न था। देखते ही देखते जिन्न का सिर आसमान को छूने लगा। उसकी आंखें हीरे जैसी चमक रही थी। मुंह गुफा की तरह था। 

उसे देखते ही मछुआरे के होश उड़ गए। डर के मारे उसके हाथ-पैर कांपने लगे। मुंह सूख गया। वह मूर्ति के समान जड़ हो गया। जिन्न बोला, ”अब मैं तुमको मार डालूंगा।” मछुआरे ने साहस करके कहा, “मैंने ही तो तुम्हें समुद्र से बाहर निकाला है, फिर तुम मुझे क्यों मारना चाहते हो।” 

जिन्न ने कहा कि मैं कई सदियों से सुराही में बंद पड़ा था। शुरू में मैंने सोचा कि जो भी मुझे आजाद करेगा, उसे बहुत सारी संपत्ति दूंगा। लेकिन कोई भी नहीं आया। मछुआरे ने पूछा फिर क्या हुआ ? जिन्न ने कहा, “इस तरह 400 साल बीत गए, तब मैंने सोचा कि जो भी मुझे मुक्त करेगा उसे मैं 3 वरदान दूंगा।” तब भी कोई नहीं आया। फिर मैंने निश्चय किया कि जो भी मुझे आजाद करेगा उसे मैं मार डालूंगा। दुर्भाग्यवश अब तुमने मुझे आजाद कर दिया है। यह कैसा इंसाफ है, मदद करने पर भला कोई दंड देता है - मछुआरे ने हिम्मत जुटाकर कहा। 

हां ! अब मेरा समय और बर्बाद मत करो, “ कहते हुए जिन्न मछुआरे के करीब आने लगा। इस जिन्न से कैसे बचूं? मछुआरा सोचने लगा।

फिर उसने जिन्न को बातों में लगाया, “ठीक है, मगर मेरी एक शंका है। तुम तो इतने बड़े हो कि आकाश को छू सकते हो। तुम्हारे पैर के नाखून भी इस सुराही के अन्दर नहीं घुश सकते। फिर तुम इसके अन्दर इतने साल कैसे रहे होगे? कहीं तुम झूठ तो नहीं बोल रहे हो? मछुआरा जिन्न का मजाक उड़ाने लगा।

जिन्न ने तुरंत कहा, “ अरे ! तुम्हे मेरी बात पर विश्वास नहीं। यह लो! मैं अभी इसके अन्दर घुसकर दिखाता हूँ।” वह अपने शरीर को सिकोड़ते हुए सुराही के अन्दर घुस गया।

बस! मौक़ा पाते ही मछुआरे ने झट से सुराही का ढक्कन बंद कर दिया। “हजार साल और इसी तरह पड़े रहो” कहते हुए मछुआरे ने सुराही को समुद्र में वापिस फेंक दिया।  

Sunday, 17 June 2018

हिंदी कहानी चमत्कारी पत्थर और नन्हा भालू

हिंदी कहानी चमत्कारी पत्थर और नन्हा भालू

हिंदी कहानी चमत्कारी पत्थर और नन्हा भालू 

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नन्हा भालू रोज नदी के किनारे टहलने जाता। रास्ते में पड़े सुंदर-सुंदर कंकड़ों को इकट्ठा करता। उसके घर में जहां देखो वहीं कंकड़ पत्थर का ढेर नजर आता। एक दिन उसे लाल रंग वाला एक पत्थर मिला। नन्हा भालू उस खूबसूरत पत्थर को देख कर बहुत खुश हुआ और उसका मजा लेते हुए चल रहा था। 

अचानक बारिश शुरू हुई। अगर बारिश रुक जाती तो कितना अच्छा लगता, नन्हे भालू ने सोचा। हैरानी की बात तो यह हुई कि बारिश तुरंत रुक गई। अरे वाह यह तो कोई चमत्कारी पत्थर लगता है। इसे हाथ में रखकर जैसा सोचते हैं, वैसा ही होता है। मैं इसे मां और पिताजी को दिखाऊंगा। 

नन्हा भालू खुशी-खुशी घर की ओर चल पड़ा। चलते-चलते अचानक नन्हे भालू के पैर रुक गए। बाप रे ! सामने एक शेर खड़ा था। नन्हा भालू काँप उठा। तभी उसे पत्थर की याद आई। उसने सोचा अगर मैं चट्टान बन जाता तो तुरंत ही नन्हा भालू एक चट्टान बन गया। उसके हाथ में जो लाल पत्थर था, वह नीचे गिर गया। अच्छा हुआ कि शेर के पंजों से नन्हा भालू बच गया। लेकिन नन्हा भालू अब फिर से पत्थर से भालू कैसे बने? पत्थर तो हाथ से छूटकर नीचे गिर गया था। 

उधर भालू के माता-पिता चिंता में पड़ गए। अंधेरा हो चुका था और भालू अभी तक घर नहीं लौटा था। उन्होंने पास पड़ोस में पूछताछ की मगर नन्हे भालू का अता-पता किसी को ना मिला। इस तरह कई दिन बीत गए। नन्हे भालू के माता-पिता उसकी तलाश में भटकने लगे। एक दिन वे घूमते-घूमते थक कर चट्टान पर जा बैठे। नन्हे भालू की माँ ने पास में पड़ा हुआ लाल पत्थर उठाया और कहा हमारे नन्हे को कंकड़-पत्थर बहुत पसंद हैं सोचते हुए उसने पत्थर को चट्टान पर रख दिया। चट्टान बने हुए नन्हे भालू ने सोचा काश मैं फिर से भालू बन जाऊं तो कितना अच्छा हो। पत्थर को तो माँ ने चट्टान पर रख दिया था, तुरंत भालू फिर से चट्टान से भालू बन गया। उसे देख उसके माता पिता बहुत खुश हुए और गोद में उठा लिया। खुशी के मारे उसे हवा में उछालने लगे।

Saturday, 16 June 2018

हिंदी कहानी एक दाना चावल

हिंदी कहानी एक दाना चावल

हिंदी कहानी एक दाना चावल 

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बहुत समय पहले की बात है। एक देश में जनता अपने खेत में उगे धान का अधिकांश हिस्सा सरकार को दे देती थी। यह क्रम कई सालों तक चलता रहा। एक बार देश में घोर अकाल पड़ा। लोगों के पास खाने के लिए चावल भी नहीं बचा। मंत्रियों ने राजा को सलाह दी -" सरकार ! भंडार खोल दीजिए। लोगों के बीच चावल बांट दीजिए।"

अकाल कितने दिन तक बना रहेगा, हमें पता नहीं है। राजमहल में हमेशा चावल होना चाहिए। हमें अक्सर दावत भी देनी पड़ती है, कहकर राजा ने चावल देने से इंकार कर दिया। 

एक दिन राजमहल में दावत के लिए गोदाम से चावल के बोरे निकाले गए। बोरों को हाथियों पर लाद कर राजमहल की ओर ले जाया जा रहा था। एक बोरे में छेद से चावल जमीन पर गिरने लगे। इसे सीमा नाम की बच्ची ने देख लिया। वह गिरते हुए चावलों को अपने लहंगे में इकट्ठा करके हाथी के साथ-साथ चल पड़ी। 

राजमहल के द्वार पर पहुंचते ही सिपाहियों ने उससे पूछताछ की। सीमा ने कहा बोरे से चावल जमीन पर गिर रहे थे। मैं उन्हें इकट्ठा करके राजा को देना चाहती हूं। सीमा की ईमानदारी के बारे में सुनकर राजा ने उसे बुलाया और कहा मैं तुम्हें कुछ इनाम देना चाहता हूं। तुम्हें जो चाहिए मांग लो। सीमा ने कहा मुझे कोई इनाम नहीं चाहिए। फिर भी आप चाहें तो मुझे एक दाना चावल दे दीजिए इतना काफी है। 

राजा आश्चर्यचकित रह गया बोला, "मैं राजा हूं। अपनी हैसियत के अनुसार इनाम देता देता हूं। तुम कुछ और मांगो। " सीमा ने सोच कर कहा ठीक है ! आज मुझे एक दाना चावल दे दीजिए। कल दो दाने, परसों चार दाने, इस तरह हर रोज पहले दिन दिए हुए चावल से दुगना चावल दीजिए। ऐसे 30 दिन तक दीजिए। 

राजा को सीमा की यह मांग बहुत ज्यादा नहीं लगी। उसने सीमा की बात तुरंत मान ली। सीमा को उस दिन एक दाना चावल दिया गया। दूसरे दिन 2 दाने चावल, तीसरे दिन चार दाने, दसवे दिन 512 दाने चावल दिए गए। यह एक मुट्ठी भर के बराबर थे। 

16वें दिन उसे दो टोकरी चावल दिए गए। उनमें 32768 चावल के दाने थे। राजा ने सोचा इस दोगुना वाले तरीके से तो जो मैंने सोचा था उससे कहीं ज्यादा चावल देने पड़ रहे हैं। फिर भी कोई बात नहीं। 

24वें दिन सीमा को आठ टोकरियों में 8388608 दाने चावल दिए गए। 27वें दिन 64 टोकरियों 32 हाथियों पर लादकर सीमा के घर भेजी गयी जिनमे 67108864 दाने चावल थे। एक दाना चावल से शुरू होकर चावल की मात्रा इतनी बढ़ गई अब राजा परेशान होने लगा। तीसवें दिन राजा का गोदाम खाली हो गया। 256 हाथियों पर चावल के 536870912 दाने चावल सीमा के घर भेजे गए। राजा ने बच्ची से पूछा, "तुम इतने चावल लेकर क्या करोगी?" 

मैं भूख से पीड़ित लोगों में इन्हें बांट दूंगी। आपको भी एक टोकरी चावल दूंगी। क्या आप मुझसे वादा करेंगे कि भविष्य में आप केवल जरूरत भर के ही चावल रखेंगे? सीमा ने पूछा। राजा ने हामी भर दी, "ठीक है। मैं वैसा ही करूंगा। "

Friday, 15 June 2018

लोमड़ी और शेर की कहानी। lion and fox story in hindi

लोमड़ी और शेर की कहानी। lion and fox story in hindi

लोमड़ी और शेर की कहानी। lion and fox story in hindi

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एक दिन जंगल का राजा शेर भूख से परेशान हो रहा था , तो वह जंगल में आहार ढूंढ़ने निकला । संयोग से उसने एक लोमड़ी पकड़ी और उसे खाकर पेट भरने को तैयार हो गया । लेकिन इसी वक्त लोमड़ी ने उससे कहा कि शेर रे शेर , तुम मुझे नहीं खा सकते हो , क्योंकि मुझे भगवान ने यहां भेजा है , उसने मुझे जानवरों का राजा नियुक्त किया है , अगर तुम ने मुझे खा डाला , भगवान तुझे सजा देगा ।

लोमड़ी की बातों पर शेर को आशंका हुई , उसे पता नहीं कि लोमड़ी की बातों पर विश्वास करना चाहिए अथवा नहीं । वह भूख से भी मरा जा रहा था , इसलिए बड़ी दुविधा में वह पड़ गया। शेर की दुविधा देख कर लोमड़ी ने फिर कहा कि तुम मेरी बातें झूठी समझते हो , तो आओ , मैं आगे आगे चलूँगा, तुम मेरे पीछे आओगे।  तो तुम देख सकते हो कि जंगल के जानवर मुझ से डरते हो या नहीं । अगर वे मुझे देख कर दूर-दूर भाग नहीं गए , तो तुम मुझे खा लेना।

लोमड़ी की बातें उचित समझ कर शेर उसके साथ जंगल में चल दिया , लोमड़ी आगे आगे चल रही था , तो शेर उस के पीछे पीछे चला जा रहा था । सचमुच ही जंगल के सभी जानवर उन दोनों को देख कर दूर-दूर भाग गए थे । शेर को मालूम नहीं था कि असल में जानवर उसे देख कर भय के मारे भाग रहे थे। वह समझता था कि जानवर लोमड़ी से डर रहे हैं। इसलिए वह भी लोमड़ी से डर कर भाग गया ।

Thursday, 14 June 2018

वीर रस की परिभाषा उदाहरण सहित

वीर रस की परिभाषा उदाहरण सहित

वीर रस की परिभाषा उदाहरण सहित

veer ras ki paribhasha udaharan sahit

वीर रस की परिभाषा : शत्रु के उत्कर्ष को मिटाने, दीनों की दुर्दशा देख उनका उद्धार करने और धर्म का उद्धार करने आदि में जो उत्साह मन में उमड़ता है वही वीर रस का स्थाई भाव है। जिसकी पुष्टि होने पर वीर रस की सिद्धि होती है।
अवयव :
स्थाई भाव            :           उत्साह।
आलंबन (विभाव)  :          अत्याचारी शत्रु।
उद्दीपन (विभाव)   :          शत्रु का अहंकार, रणवाद्य, यश की इच्छा आदि।
अनुभाव               :          गर्वपूर्ण उक्ति, प्रहार करना, रोमांच आदि।
संचारी भाव          :          आवेग, उग्रता, गर्व, औत्सुक्य, चपलता आदि।

उदाहरण (1) 
मैं सत्य कहता हूँ सखे, सुकुमार मत जानो मुझे
यमराज से भी युद्ध में, प्रस्तुत सदा मानो मुझे
है और कि तो बात क्या, गर्व मैं करता नहीं
मामा तथा निज तात से भी युद्ध में डरता नहीं

स्पष्टीकरण : अभिमन्यु का ये कथन अपने साथी के प्रति है। इसमें कौरव- आलंबन, अभिमन्यु-आश्रय, चक्रव्यूह की रचना-उद्दीपन तथा अभिमन्यु के वाक्य- अनुभाव है। गर्व, औत्सुक्य, हर्ष आदि संचारी भाव हैं। इन सभी के संयोग से वीर रस के निष्पत्ति हुई है।

उदाहरण 2 
साजि चतुरंग सैन अंग में उमंग धारि,
सरजा सिवाजी जंग जीतन चलत हैं।
भूषन भनत नाद बिहद नगारन के,
नदी नाद मद गैबरन के रलत हैं।।

स्पष्टीकरण : प्रस्तुत पद में शिवाजी कि चतुरंगिणी सेना के प्रयाण का चित्रण है। इसमें शिवाजी के ह्रदय का उत्साह स्थाई भाव है। युद्ध को जीतने कि इच्छा आलंबन है। नगाड़ों का बजना उद्दीपन है। हाथियों के मद का बहना अनुभाव है तथा उग्रता संचारी भाव है। इनमें सबसे पुष्ट उत्साह नामक स्थाई भाव वीर रस की दशा को प्राप्त हुआ है।

Wednesday, 13 June 2018

हिन्दी शिक्षक की नौकरी के लिए आवेदन पत्र

हिन्दी शिक्षक की नौकरी के लिए आवेदन पत्र

सेवा में,
शिक्षा निदेशक,
लखनऊ।

विषय : सहायक अध्यापक पद के लिए आवेदन पत्र।

hindi shikshak ke liye aavedan patra
महोदय,
      दिनांक 11 मार्च 2018 के हिंदुस्तान टाइम्स में प्रकाशित आपके विज्ञापन के उत्तर में मैं हिंदी में सहायक अध्यापक पद के लिए आवेदन कर रहा हूं। मेरी शैक्षणिक योग्यताओं एवं अन्य जानकारियों का विवरण इस प्रकार है। 

नाम                       राजेश सिंह
पिता का नाम               मुन्नालाल सिंह
जन्मतिथि                  4-10-1988
स्थाई पता                  9/18 श्यामनगर, मेरठ।

शैक्षणिक योग्यताएं :
परीक्षा
वर्ष
अंक
प्राप्तांक प्रतिशत
विषय
बोर्ड
हाईस्कूल
2003
325/500
65%
हिंदी, संस्कृत,सामाजिक विषय, गणित, कला
यू.पी. बोर्ड
इंटरमीडिएट
2005
350/500
70%
हिंदी, संस्कृत, समाजशास्त्र, शिक्षाशास्त्र, कला
यू.पी. बोर्ड
बी.ए.
2008
496/800
62%
हिंदी, संस्कृत, समाजशास्त्र, शिक्षाशास्त्र
झांसी विश्वविद्यालय
बी.एड
2009
500/700
71.4%
संस्कृत, नागरिकशास्त्र
झांसी विश्वविद्यालय

अन्य गतिविधियाँ : विद्यालय तथा महाविद्यालय स्तर पर हुई वाद-विवाद प्रतियोगिता में पुरष्कार विजेता, कुछ सांस्कृतिक कार्यक्रमों में सफल संचालन का अनुभव। 

स्थाई पता : 9/18 श्यामनगर, मेरठ।

मेरी अध्यापन में अत्यधिक रुचि है। यदि आपने इस पद का उत्तरदायित्व मुझे सौंपा तो मैं पूर्ण निष्ठा से उसका निर्वाह करूंगा तथा कभी शिकायत का अवसर नहीं दूंगा।
सेवा का अवसर प्रदान कर कृतार्थ करें.
धन्यवाद !
भवदीय 
राजेश सिंह
संलग्न प्रमाणपत्र : (1) हाईस्कूल                  (2) इंटरमीडिएट
                          (3) बी.ए.                      (4) बी.एड 
                          (5) चरित्र प्रमाण 

Tuesday, 12 June 2018

छुट्टी के लिए संस्कृत प्रार्थना पत्र। Leave Application in Sanskrit

छुट्टी के लिए संस्कृत प्रार्थना पत्र। Leave Application in Sanskrit

छुट्टी के लिए संस्कृत प्रार्थना पत्र। Leave Application in Sanskrit

सेवायाम्,
श्रीमन्तः प्रधानाचार्यमहोदयाः 
राजकीयः आदर्श-उच्चमाध्यमिक-विद्यालयः 
कानपुरम्
विषयः - दिनद्वयस्य रूग्णतावकाशार्थं प्रार्थनापत्रम्।
Leave Application in Sanskrit
महोदयाः !
उपर्युक्तविषयान्तर्ग़ते निवेदनम् अस्ति यत् अहम् गतदिवसात् अतीव रूग्णोSस्मि। अतः अहं विद्यालयम् आगन्तुं नास्मि। 
प्रार्थना अस्ति यत् ११-०६-२०१८ तः १२-०६-२०१८ दिनांकपर्यन्तं दिनद्वयस्य अवकाशम् स्वीकृत्य माम् अनुग्रहीष्यन्ति। 
भवताम् आज्ञाकारी शिष्यः 
जितेन्द्रः 
कक्षा-दशमी 
दिनांक 
११-०६-२०१८

Monday, 11 June 2018

मोहल्ले की सफाई के लिए नगर निगम को पत्र

मोहल्ले की सफाई के लिए नगर निगम को पत्र

मोहल्ले की सफाई के लिए नगर निगम को पत्र

safai ki liye nagar nigam adhikari ko patra
सेवा में,
स्वास्थ्य अधिकारी,
दिल्ली नगर निगम,
दिल्ली।
विषय : मोहल्ले की सफाई के लिए नगर निगम को पत्र
श्रीमान,
     हम आपका ध्यान मोहल्ले की सफाई संबंधी दुर्व्यवस्था की ओर खींचना चाहते हैं। आपको यह जानकर आश्चर्य होगा कि हमारे मोहल्ले में सफाई हेतु नगर निगम का कोई सफाई-कर्मचारी पिछले 10 दिनों से काम पर नहीं आ रहा है। घरों की सफाई करने वाले कर्मचारियों ने भी मोहल्ले में स्थान स्थान पर गंदगी और कूड़े-कर्कट के ढेर लगा दिए हैं। इसका कारण संभवतः यह भी है कि आसपास कूड़ा-कर्कट तथा गंदगी डालने के लिए कोई निश्चित स्थान नहीं है। 
     आज स्थिति यह है कि मोहल्ले का वातावरण अत्यंत दूषित और दुर्गंधपूर्ण हो गया है। मोहल्ले से गुजरते हुए नाक बंद कर लेनी पड़ती है। चारों ओर मक्खियों की भिनभिनाहट है। रोगों के कीटाणु प्रतिदिन बढ़ रहे हैं। नालियों की सफाई ना होने के कारण मच्छरों का प्रकोप इस सीमा तक बढ़ गया है कि दिन का चैन और रात की नींद हराम हो गई है। 
      वर्षा पांच-सात दिनों में प्रारंभ हो जायेगी। यथासमय मोहल्ले की सफाई ना होने पर मोहल्ले की दुर्व्यवस्था का अनुमान लगाना कठिन है। अतः आपसे हम मोहल्ले वालों का निवेदन है कि आप यथाशीघ्र मोहल्ले का निरीक्षण करें तथा सफाई का नियमित प्रबंध करवाएं, अन्यथा मोहल्लावासियों के स्वास्थ्य पर उसका कुप्रभाव पड़ने की आशंका है। 
      आप की ओर से उचित कार्यवाही के लिए हम प्रतीक्षारत हैं। 
प्रार्थी 
बेस्ट नगर 
ब्लॉक-डी के निवासी 
दिनांक 5 जून 2018

Sunday, 10 June 2018

दैव दैव आलसी पुकारा पर निबंध। Dev Dev Alsi Pukara Par Nibandh

दैव दैव आलसी पुकारा पर निबंध। Dev Dev Alsi Pukara Par Nibandh

दैव दैव आलसी पुकारा पर निबंध। Dev Dev Alsi Pukara Par Nibandh

Dev Dev Alsi Pukara Par Nibandh

प्रस्तावना : जीवन के उत्थान में परिश्रम का महत्वपूर्ण स्थान होता है। जीवन में आगे बढ़ने के लिए, ऊंचा उठने के लिए और यश प्राप्त करने के लिए श्रम ही आधार है। श्रम से कठिन से कठिन कार्य संपन्न किए जा सकते हैं। जो श्रम करता है, भाग्य भी उसका ही साथ देता है। जो निष्क्रिय रहता है, उसका भाग्य भी साथ नहीं देता। श्रम के बल पर लोगों ने उफनती जलधाराओं को रोककर बड़े-बड़े बांधों का निर्माण कर दिया। इन्होंने श्रम के बल पर ही अगम्य पर्वत चोटियों पर अपनी विजय का ध्वज ठहरा दिया। श्रम के बल पर मनुष्य चंद्रमा पर पहुंच गया। श्रम के द्वारा ही मानव समुद्र को लांघ गया। खाइयों को पाट दिया तथा कोयले की खदानों से बहुमूल्य हीरे खोज निकाले। मानव सभ्यता और उन्नति का एकमात्र आधार स्वयं ही तो है। अतः परिश्रम ही मानव का सच्चा आभूषण है। क्योंकि परिश्रम के द्वारा ही मनुष्य अपने को पूर्ण बना सकता है। परिश्रम ही उसके जीवन में सौभाग्य, उत्कर्ष और महानता लाने वाला है। जयशंकर प्रसाद जी ने कहा है कि - 

जितने कष्ट कंटकों में हैं, जिनका जीवन सुमन खिला,
गौरव-गंध उन्हें उतना ही,  यत्र तत्र सर्वत्र मिला।

भाग्यवाद : अकर्मण्यता का सूचक : जिन लोगों ने परिश्रम का महत्व नहीं समझा; वह अभाव, गरीबी और दरिद्रता का दुख भोगते रहे। जो लोग मात्र भाग्य को ही विकास का सहारा मानते हैं, वह भ्रम में हैं। आलसी और अकर्मण्य व्यक्ति संत मलूकदास का यह दोहा उद्धृत करते हैं -

अजगर करे ना चाकरी, पंछी करे न काम।
दास मलूका कह गए, सबके दाता राम।।

मेहनत से जी चुराने वाले दास मलूका के स्वर में स्वर मिलाकर भाग्य की दुहाई के गीत गा सकते हैं। लेकिन यह नहीं सोचते कि जो चलता है, वही आगे बढ़ता है और मंजिल को प्राप्त करता है। कहा भी गया है –
उद्यमेन ही सिद्धयन्ति, कार्याणि न मनोरथैः।
ना की सुप्तस्य सिंहस्य, प्रविशंति मुखे मृगाः।

अर्थात परिश्रम से सभी कार्य सफल होते हैं। केवल कल्पना के महल बनाने से व्यक्ति अपने मनोरथ को पूर्ण नहीं कर सकता। शक्ति और स्फूर्ति से संपन्न गुफा में सोया हुआ वनराज शिकार प्राप्ति के ख्याली पुलाव पका रहे तो उसके पेट की अग्नि कभी भी शांत नहीं हो सकती। सोया पुरुषार्थ फलता नहीं है। ऐसे में अकर्मण्य व आलसी व्यक्ति के लिए कहा गया है कि –

सकल पदारथ एहि जग माहीं, कर्महीन नर पावत नाहीं।।

अर्थात संसार में सुख के सकल पदार्थ होते हुए भी कर्महीन लोग उसका उपभोग नहीं कर पाते। जो कर्म करता है, फल उसे ही प्राप्त होता है और जीवन भी उसी का जगमगाता है। उसके जीवन उद्यान में रंग-बिरंगे सफलता के सुमन खिलते हैं।

परिश्रम से जी चुराना, आलस्य और प्रमोद में जीवन बिताने के समान बड़ा कोई पाप नहीं है। गांधी जी का कहना है कि जो लोग अपने हिस्से का काम किए बिना ही भोजन पाते हैं, वह चोर हैं। वास्तव में काहिली कायरों और दुर्बल जनों की शरण है। ऐसे आलसी मनुष्य में ना तो आत्मविश्वास ही होता है और ना ही अपनी शक्ति पर भरोसा। किसी कार्य को करने में ना तो उसे कोई उमंग होती है ना ही स्फूर्ति परिणाम स्वरुप पग-पग पर असफलता और निराशा के कांटे उसके पैरों में चुभते हैं।

प्रकृति भी परिश्रम का पाठ पढ़ाती है : प्रकृति के प्रांगण में झांक कर देखें तो चीटियां रात-दिन अथक परिश्रम करती हुई नजर आती हैं। पक्षी दाने की खोज में अनंत आकाश में उड़ते दिखाई देते हैं। हिरण आहार की खोज में वन-उपवन में कुलांचे भरते रहते हैं। समस्त सृष्टि में श्रम का चक्र निरंतर चलता ही रहता है। जो लोग श्रम को त्याग कर आलस्य का आश्रय लेते हैं, वह जीवन में कभी भी सफल नहीं होते हैं क्योंकि ईश्वर भी उनकी सहायता नहीं करता।

कर्मवीर के आगे पथ का, हर पत्थर साधक बनता है।
दीवारें भी दिशा बतातीं, जब वह आगे को बढ़ता है।।

वस्तुतः परिश्रम द्वारा प्राप्त हुई उपलब्धि से जो मानसिक संतोष व आत्मिक तृप्ति मिलती है, वह निष्क्रिय व्यक्ति को कदापि प्राप्त नहीं हो सकती। प्रकृति ने यह विधान बनाया है कि बिना परिश्रम के खाए हुए अन्न का पाचन भी संभव नहीं। मनुष्य को विश्राम का आनंद भी तभी प्राप्त होता है, जब उसने भरपूर परिश्रम किया हो। वस्तुत श्रम, उन्नति, उत्साह, स्वास्थ्य, सफलता, शांति व आनंद का मूल आधार है।

शारीरिक और मानसिक श्रम : परिश्रम चाहे शारीरिक हो या मानसिक दोनों ही श्रेष्ठ है। सत्य तो यह है कि मानसिक श्रम की अपेक्षा शारीरिक श्रम कहीं अधिक श्रेयस्कर है। गांधी जी की मान्यता है कि स्वस्थ, सुखी और उन्नत जीवन जीने के लिए शारीरिक श्रम अनिवार्य है। शारीरिक श्रम प्रकृति का नियम है और इसकी अवहेलना निश्चय ही हमारे जीवन के लिए बहुत ही दुखदाई सिद्ध होगी। परंतु यह बड़ी शर्म की बात है कि आज मानसिक श्रम की अपेक्षा शारीरिक श्रम को नीची निगाहों से देखा जाता है। लोग अपना काम अपने हाथों से करने में शर्म का अनुभव करते हैं।

भाग्य और पुरुषार्थ : भाग्य और पुरुषार्थ जीवन के दो पहिए हैं। भाग्यवादी बनकर हाथ पर हाथ रखकर बैठना मौत की निशानी है। परिश्रम के बल पर ही मनुष्य अपने बिगड़े भाग्य को बदल सकता है। परिश्रम ने महा मरुस्थलों को हरे-भरे उद्यानों में बदल दिया और मुरझाए जीवन में यौवन का वसंत खिला दिया। कवि ने इन भावों को कितनी सुंदर अभिव्यक्ति दी है—

प्रकृति नहीं डरकर झुकती कभी भाग्य के बल से।
सदा हारती वह मनुष्य के उद्यम से श्रम जल से ।।

सफलता का रहस्य परिश्रम : महापुरुष बनने का प्रथम सोपान परिश्रम ही है। संसार में जितने भी महापुरुष हुए हैं सभी कष्ट, सहिष्णुता और श्रम के कारण श्रद्धा, गौरव और यश के पात्र बने। वाल्मीकि, कालिदास, तुलसीदास आदि जन्म से महाकवि नहीं थे। उन्हें ठोकर लगी, ज्ञान-नेत्र खुले और अनवरत परिश्रम से महाकवि बने। गांधीजी का सम्मान उनके परिश्रम एवं कष्ट-सहिष्णुता के कारण ही है। इन सब ने अपने जीवन का प्रत्येक क्षण श्रमरत रहकर बिताया। उसी का परिणाम था कि वह सफलता के उच्च शिखर तक पहुंच सके। महान राजनेताओं, वैज्ञानिकों, कवियों, साहित्यकारों और ऋषि-मुनियों की सफलता का एकमात्र रहस्य परिश्रम ही है।

इतिहास साक्षी है कि भाग्य का आश्रय छोड़कर कर्म में तत्पर होने वाले लोगों ने इतिहास का निर्माण किया है। समय-समय पर शासन किया है। कृष्ण यदि भाग्य के सहारे बैठे रहते, तो एक ग्वाले का जीवन बिताकर ही काल-कवलित हो गए होते। नादिरशाह ईरान में जीवन पर्यंत भेड़ों को ही चराता हुआ मर जाता। स्टालिन अपने वंश परंपरागत व्यवसाय (जूते बनाने) को करता हुआ एक कुशल मोची बनता। गोर्की कूड़े-कचरे के खेत से चीथड़े ही बीनता रहता। बाबर समरकन्द से भागकर हिंदूकुश पर्वत श्रेणियों में ही खो जाता। शेरशाह सूरी बिहार के गांव में किसी किसान का हलवाहा होता हैदर अली सेना का एक सामान्य सिपाही बनता। प्रेमचंद एक प्राथमिक पाठशाला के अध्यापक के रूप में अज्ञात रह जाते और लाल बहादुर शास्त्री के लिए प्रधानमंत्री का पद एक सुहावना सपना ही बना रहता।

निश्चय ही उन्होंने जो कुछ पाया वह सब-कुछ दृढ़ संकल्प शक्ति, साहस, धैर्य, अपने में विश्वास और शौर्य के कारण ही पाया। उनकी सफलता के पीछे किसी भाग्य अथवा संयोग का हाथ न था। दुष्यंत कुमार ने कहा भी है कि –

कौन कहता है कि आसमां में सुराख नहीं होता।
एक पत्थर तो तबीयत से उछालो यारो।।

उपसंहार : परिश्रमी व्यक्ति राष्ट्र की बहुमूल्य पूंजी है। श्रम वह महान गुण है जिससे व्यक्ति का विकास और राष्ट्र की उन्नति होती है। संसार में महान बनने और अमर होने के लिए परिश्रमशीलता अनिवार्य है। श्रम से अपार आनंद मिलता है। महात्मा गांधी ने हमें श्रम कि पूजा का पाठ पढ़ाया है। उन्होंने कहा – “श्रम से स्वावलंबी बनने का सौभाग्य मिलता है। हम देश को श्रम और स्वाबलंबन से ही ऊंचा उठा सकते हैं।” श्रम की अद्भुत शक्ति को देखकर ही नेपोलियन ने कहा था कि संसार में असंभव कोई काम नहीं असंभव शब्द को तो केवल मूर्खों के शब्दकोष में ही ढूंढा जा सकता है।
आधुनिक युग विज्ञान का युग है। प्रत्येक बात को तर्क की कसौटी पर कसा जा सकता है। भाग्य जैसी काल्पनिक वस्तुओं से अब जनता का विश्वास उठता जा रहा है। वास्तव में भाग्य, श्रम से अधिक कुछ भी नहीं। श्रम का ही दूसरा नाम भाग्य है। हमें इस बात का ध्यान रखना चाहिए कि अपने भाग्य के विधाता हम स्वयं हैं। जब हम कर्म करेंगे तो समय आने पर हमें उसका फल अवश्य ही मिलेगा। उसमें प्रकृति के नियमानुसार कुछ समय लगना स्वाभाविक ही है। कबीरदास ने ठीक ही कहा है कि –
धीरे-धीरे रे मना, धीरे सब कुछ होय।

माली सींचै सौ घड़ा, ऋतु आए फल होय।।

Saturday, 9 June 2018

वनों की उपयोगिता पर निबंध। Importance of trees essay in Hindi

वनों की उपयोगिता पर निबंध। Importance of trees essay in Hindi

वनों की उपयोगिता पर निबंध। Importance of trees essay in Hindi
वनों की उपयोगिता पर निबंध

प्रस्तावना : वन मानव जीवन के लिए बहुत उपयोगी है, किंतु सामान्य व्यक्ति इसके महत्व को नहीं समझ पा रहा है। जो व्यक्ति वनों में रहते हैं या जिनकी जीविका वनों पर आश्रित है, वह तो वनों के महत्व को समझते हैं। लेकिन जो लोग वनों में नहीं रह रहे हैं वे तो इन्हें प्राकृतिक शोभा का साधन ही मानते हैं। पर वनों का मनुष्यों के जीवन से कितना गहरा संबंध है, इसके लिए विभिन्न क्षेत्रों में उसका योगदान क्रमिक रूप से देखना पड़ेगा।

वनों का प्रत्यक्ष योगदान

मनोरंजन का साधन : वन मानव को सैर-सपाटे के लिए रमणीय क्षेत्र प्रस्तुत कराते हैं। वनों के अभाव में पर्यावरण शुष्क हो जाता है और सौंदर्य नष्ट हो जाता है। वृक्ष स्वयं सौंदर्य का सृजन करते हैं। ग्रीष्मकाल में बहुत बड़ी संख्या में लोग पर्वतीय क्षेत्रों की यात्रा करके इस प्राकृतिक सौंदर्य का आनंद लेते हैं।

लकड़ी की प्राप्ति : वनों से हमें अनेक प्रकार की बहुमूल्य लकड़ियां प्राप्त होती हैं। यह लकड़ियां हमारे अनेक प्रयोगों में आती हैं। इन्हें ईंधन के रूप में प्रयोग किया जाता है। यह लकड़ियां व्यापारिक दृष्टिकोण से भी बहुत उपयोगी होती हैं, जिनमें साल, सागौन देवदार, चीड़, शीशम, चंदन आदि की लकड़ियां प्रमुख हैं। इनका प्रयोग फर्नीचर, कीमती सामान, माचिस, रेल के डिब्बे, स्लीपर, जहाज आदि बनाने के लिए किया जाता है।

विभिन्न उद्योगों के लिए कच्चे माल की पूर्ति : वनों से लकड़ी के अतिरिक्त अनेक उपयोगी सहायक वस्तुओं की प्राप्ति होती है, जिनका अनेक उद्योगों में कच्चे माल के रूप में उपयोग किया जाता है। इनमें गोंद, शहद, जड़ी-बूटियां, कत्था, लाख, चमड़ा, जानवरों के सींग आदि मुख्य हैं। इनका कागज उद्योग, चमड़ा उद्योग, फर्नीचर उद्योग, दियासलाई उद्योग, औषधि उद्योग आदि में कच्चे माल के रूप में उपयोग किया जाता है।

प्रचुर फलों की प्राप्ति : वन प्रचुर मात्रा में फलों को प्रदान करके मानव का पोषण करते हैं। यह फल अनेक बहुमूल्य खनिज-लवणों व विटामिनों का स्रोत है।

जीवन उपयोगी जड़ी बूटियां : वन जीवन उपयोगी जड़ी बूटियों का भंडार है। वनों में ऐसी अनेक वनस्पतियां पाई जाती हैं, जिनसे अनेक असाध्य रोगों का निदान संभव हो सका है। विजयसार की लकड़ी मधुमेह में अचूक औषधि है। लगभग सभी आयुर्वेदिक औषधियां वृक्षों से ही विभिन्न तत्वों को एकत्र कर बनाई जाती है।

वन्य पशु-पक्षियों को संरक्षण : वन्य पशु-पक्षियों की सौंदर्य की दृष्टि से अपनी उपयोगिता है। वन अनेक पशु-पक्षियों को आवास प्रदान करते हैं। वे हिरण, नीलगाय, गीदड़, रीछ, शेर, चीता और हाथी आदि वन्य पशुओं की क्रीड़ास्थली है। यह पशु वनों में स्वतंत्र विचरण करते हैं, भोजन प्राप्त करते हैं और संरक्षण पाते हैं। गाय, भैंस, बकरी और भेड़ आदि पालतू पशुओं के लिए भी वन विशाल चारागाह प्रदान करते हैं।

बहुमूल्य वस्तुओं की प्राप्ति : वनों से हमें अनेक बहुमूल्य वस्तुएं प्राप्त होती हैं। हाथीदांत, मृग-कस्तूरी, मृग-छाल, शेर की खाल, गेंडे के सींग आदि बहुमूल्य वस्तुएं वनों की ही देन है। वनों से प्राप्त कुछ वनस्पतियों से तो सोना और चांदी भी निकाले जाते हैं। तेलियाकंद नामक वनस्पति से प्रचुर मात्रा में सोना प्राप्त होता है।

आध्यात्मिक लाभ : भौतिक जीवन के अतिरिक्त मानसिक एवं आध्यात्मिक पक्ष में भी वनों का महत्व कुछ कम नहीं है। सांसारिक जीवन से क्लांत मनुष्य यदि वनों में कुछ समय निवास करते हैं, तो उन्हें संतोष तथा मानसिक शांति प्राप्त होती है। इसलिए हमारी प्राचीन संस्कृति में ऋषि-मुनि वनों में ही निवास करते थे।

इस प्रकार हमें वनों का प्रत्यक्ष योगदान देखने को मिलता है, जिनसे सरकार को राजस्व और वनों के ठेकों के रूप में करोड़ों रुपए की आय होती है। साथ ही सरकार चंदन के तेल, उसकी लकड़ी से बनी कलात्मक वस्तुओं, हाथी दांत की बनी वस्तुओं, फर्नीचर, लाख, तारपीन के तेल आदि के निर्यात से प्रतिवर्ष करोड़ों रुपए की बहुमूल्य विदेशी मुद्रा अर्जित करती है।

वनों का अप्रत्यक्ष योगदान

वर्षा : भारत एक कृषि प्रधान देश है। सिंचाई के अपर्याप्त साधनों के कारण अधिकांशतः मानसून पर निर्भर रहता है। कृषि की मानसून पर निर्भरता की दृष्टि से वनों का बहुत महत्व है। वन, वर्षा में सहायता करते हैं। इन्हें वर्षा का संचालक भी कहा जाता है। इस प्रकार वनों से वर्षा होती है और वर्षा से वन बढ़ते हैं।

पर्यावरण संतुलन : वन-वृक्ष वातावरण से दूषित वायु ग्रहण करके अपना भोजन बनाते हैं और ऑक्सीजन छोड़कर पर्यावरण को शुद्ध बनाए रखने में सहायक होते हैं। इस प्रकार वन पर्यावरण में संतुलन बनाए रखने में सहायक होते हैं।

जलवायु पर नियंत्रण : वनों से वातावरण का तापक्रम, नमी और वायु प्रवाह नियंत्रित होता है। जिससे जलवायु में संतुलन बना रहता है। वन जलवायु की भीषणता को सामान्य बनाए रखते हैं। यह आंधी-तूफानों से हमारी रक्षा करते हैं। यह सारे देश की जलवायु को प्रभावित करते हैं तथा गर्म एवं तेज हवाओं को रोककर देश की जलवायु को समशीतोष्ण बनाए रखते हैं।

जल के स्तर में वृद्धि : वन वृक्षों की जड़ों के द्वारा वर्षा के जल को सोखकर भूमि के नीचे जल स्तर को बढ़ाते रहते हैं। इससे दूर-दूर तक के क्षेत्र हरे-भरे रहते हैं। साथ ही कुओं आदि में जल का स्तर घटने नहीं पाता है। वनों से नदियों के सतत प्रवाहित होते रहने में भी सहायता मिलती है।

भूमि कटाव पर रोक : वनों के कारण वर्षा का जल मंद गति से प्रवाहित होता है। अतः भूमि का कटाव कम हो जाता है। वर्षा के अतिरिक्त जल को  वन सोख लेते हैं और नदियों के प्रवाह को नियंत्रित करके भूमि के कटाव को रोकते हैं। जिसके फलस्वरुप भूमि उबड़-खाबड़ नहीं हो पाती तथा मिट्टी की उर्वरा शक्ति भी बनी रहती है।

रेगिस्तान के प्रसार पर रोक : वन तेज आंधियों को रोकते हैं तथा वर्षा को आकर्षित भी करते हैं। जिससे मिट्टी के कण उनकी जड़ों में बंध जाते हैं। इससे रेगिस्तान का प्रसार नहीं होने पाता।

बाढ़-नियंत्रण में सहायक : वृक्षों की जड़े वर्षा के अतिरिक्त जल को सोख लेती हैं, जिसके कारण नदियों का जल प्रवाह नियंत्रित रहता है। इससे बाढ़ की स्थिति में बचाव होता है।

वनों को हरा सोना इसलिए कहा जाता है क्योंकि इन जैसा मूल्यवान, हितैषी और शोभाकारक मनुष्य के लिए कोई और नहीं। आज भी संतप्त मनुष्य वृक्ष के नीचे पहुंचकर राहत का अनुभव करता है। सात्विक भावनाओं के यह संदेशवाहक, प्रकृति का सर्वाधिक प्रेमपूर्ण उपहार हैं। स्वार्थी मनुष्य ने इनसे निरंतर दुर्व्यवहार किया है। जिसका प्रतिफल है भयंकर उष्णता, श्वास संबंधी रोग। हिंसात्मक वृत्तियों का विस्फोट आदि।

भारतीय वन-संपदा के लिए उत्पन्न समस्याएं : वनों के योगदान से स्पष्ट है कि वह हमारे जीवन में प्रत्यक्ष और अप्रत्यक्ष दोनों रूप से बहुत उपयोगी है। वनों में अपार संपदा पाई जाती है। किंतु जैसे-जैसे जनसंख्या बढ़ती गई, वनों को मनुष्य के प्रयोग के लिए काटा जाने लगा। अनेक अद्भुत और घने वन आज समाप्त हो गए हैं और हमारी वन संपदा का एक बहुत बड़ा भाग नष्ट हो गया है। वन संपदा के इस संकट ने व्यक्ति और सरकार को वन संरक्षण की ओर सोचने पर विवश कर दिया है। यह निश्चित है कि वनों के संरक्षण के बिना मानव जीवन दूभर हो जाएगा। आज हमारे देश में वनों का क्षेत्रफल केवल 227 प्रतिशत ही रह गया है, जो कम से कम एक तिहाई तो होना ही चाहिए। वनों के असमान वितरण, वनों के पर्याप्त दोहन, नगरीकरण से वनों की समाप्ति, ईंधन व इमारती सामान के लिए वनों की अंधाधुंध कटाई ने भारतीय वन संपदा के लिए अनेक समस्याएं उत्पन्न कर दी हैं।

वनों के विकास के लिए सरकार द्वारा किए जा रहे प्रयास : सरकार ने वनों के महत्व को दृष्टिगत रखते हुए समय-समय पर वनों के संरक्षण और विकास के लिए अनेक कदम उठाए हैं जिसका विवरण निम्नलिखित है:

1) सन 1956 में वन महोत्सव का आयोजन किया गया। जिसका प्रमुख नारा था "अधिक वृक्ष लगाओ।” तभी से यह उत्सव प्रतिवर्ष 1 से 7 जुलाई तक मनाया जाता है।
2)  सन 1965 में सरकार ने केंद्रीय वन आयोग की स्थापना की। जो वनों से संबंधित आंकड़े और सूचना एकत्रित करके वनों के विकास में लगी हुई संस्थाओं के कार्य में तालमेल बैठाता है।
3) वनों के विकास के लिए देहरादून में वन अनुसंधान संस्थान की स्थापना की गई, जिनमें वनों के संबंध में अनुसंधान किए जाते हैं और वन अधिकारियों को प्रशिक्षित किया जाता है।
4) विभिन्न राज्यों में वन निगमों कि स्थापना की गई है, जिससे वनों की अनियंत्रित कटाई को रोका जा सके।

व्यक्तिगत स्तर पर भी अनेक जन आंदोलनों का संचालन करके समाजसेवियों द्वारा समय-समय पर सरकार को वनों के संरक्षण और विकास के लिए सचेत किया जाता रहा है। इसमें चिपको आंदोलन प्रमुख रहा, जिसका श्री सुंदरलाल बहुगुणा ने सफल नेतृत्व किया।


उपसंहार : वन निसंदेह हमारे जीवन के लिए बहुत उपयोगी है। इसलिए वनों का संरक्षण और संवर्धन बहुत आवश्यक है। इसके लिए जनता और सरकार का सहयोग अपेक्षित है। बड़े खेद का विषय है कि एक ओर तो सरकार वनों के संवर्धन के लिए विभिन्न आयोगों और निगमों की स्थापना कर रही है तो दूसरी ओर वह कुछ स्वार्थी तत्वों के हाथों में खिलौना बनकर केवल धन के लाभ की आशा से अमूल्य वनों को नष्ट भी कराती जा रही है। आज मध्य प्रदेश में केवल 18% रह गए हैं, जो कि पहले एक तिहाई से अधिक हुआ करते थे। इसलिए आवश्यकता है कि सरकार वन संरक्षण नियमों का कड़ाई से पालन कराये ताकि भावी प्राकृतिक विपदाओं से रक्षा हो सके। इसके लिए सरकार के साथ-साथ सामान्य का सहयोग भी अपेक्षित है। यदि हर व्यक्ति वर्ष में एक बार एक वृक्ष लगाने और उसका भली प्रकार संरक्षण करने का संकल्प लेकर उसे क्रियान्वित भी करें तो यह राष्ट्र के लिए आगे आने वाले कुछ एक  वर्षों में अमूल्य योगदान हो सकता है।