Saturday, 24 February 2018

ग्रीष्म ऋतु का वर्णन। About Summer Season in Hindi

ग्रीष्म ऋतु का वर्णन। About Summer Season in Hindi

ग्रीष्म ऋतु का वर्णन। About Summer Season in Hindi

About Summer Season in Hindi
सूर्य भगवान् की अविश्राम तप्त किरणें, सन्नाटा मारते हुए लू की लपट, नदियों का मंद होता प्रवाह यह है ग्रीष्म ऋतू का परिचय महाकवि प्रसाद के शब्दों में। वसंत के पश्चात ग्रीष्म ऋतु का आगमन होता है। भगवान् सूर्य पृथ्वी के कुछ निकट आ जाते हैं, जिससे उनकी किरणें अति उष्ण हो जाती हैं। ज्येष्ठ और आषाढ़ ग्रीष्म ऋतु के महीने होते हैं। ग्रीष्म ऋतू का प्रारम्भ होते ही वसंत ऋतु में मंद-मंद चलने वाली पवन का स्थान सांय-सांय चलने वाली लू ले लेती है। वसंत की अपेक्षा हरियाली कम होने लगती है। वसंत के चैतन्य और स्फूर्ति का स्थान आलस्य और क्लान्ति ले लेती है। 

गर्मी के दिन भी अधिक लम्बे होते हैं। भगवान् भाष्कर स्न्ध्कार को नष्ट करने के लिए जल्दी प्रकट हो जाते हैं और बहुत देर तक जाने का नाम भी नहीं लेते हैं। उदय होते ही अपनी प्रचंडता का आभाष वे अपनी पहली किरण से ही दे देते हैं। तथा दिनभर तपती धूप बरसाकर, जन-जीवन को झुलसाकर शाम को अन्धकार में विलीन हो जाते हैं। दिनभर तेजी से लू चलती है, सड़कों का तारकोल पिघलकर चिप-चिप करने लगता है। सीमेंट की सड़कें तपते अंगारे के सामान हो जाती हैं। गाँव में उबड़-खाबड़ रास्तों की मिट्टी नंगे पांवों को तप्त करती हैं और रेट में चलने वालों को तो दादी-नानी याद आ जाती है। घर से निकलने का मन ना तो मनुष्यों का करता हैं और न ही पशु-पक्षियों का। गर्मी के प्रचंड रूप को देखकर प्रसाद जी कहते हैं कि -
किरण नहीं, ये पावक के कण 
जगती धरती पर गिरते हैं। 
निराला जी का भी यही विचार है 
ग्रीष्म तापमय लू की लपटों की दोपहरी। 
झुलसाती किरणों की वर्षों की आ ठहरी।। 
मानव और पशु-पक्षी ही नहीं, ग्रीष्म की दुपहरी में तो छाया भी आश्रय मांगती है। कविवर बिहारी इस तथ्य का वर्णन करते हुए इस प्रकार लिखते हैं। 
बैठि रही अति सघन बन, पैंठि सदन तन माँह। 
देखि दोपहरी जेठ की,छाँहौ चाहति छाँह।।  
ग्रीष्म का प्रकोप प्राणियों को इतना अधिक व्याकुल कर देता है की उन्हें सुध-बुध ही नहीं रह जाती। प्राणी पारस्परिक राग-द्वेष भी भूल जाते हैं। परस्पर विरोधी स्वभाव वाले जंतु भी एक ही तालाब से पानी पीते हैं। यह दृश्य देखकर कविवर बिहारी नें कल्पना की कि ग्रीष्म ऋतू समस्त संसार को एक तपोवन बना देती है। जिस प्रकार तपोवन में रहते हुए प्राणी ईर्ष्या-द्वेष से रहित रहते हैं उसी प्रकार इस ऋतु में भी प्राणियों की ऐसी ही स्थिति हो जाती है.
कहलाने एकत वसत, अहि-मयूर मृग-बाघ ।
जगत तपोवन सों कियो, दीरघ दघ - निदाघ ।।

प्यास और पसीना गर्मी के दो अभिशाप हैं. अभी-अभी पाणी पीया है, किन्तु गला फिर भी सूखा का सूखा. प्यास से मन व्याकुल और पसीने से शरीर लथपथ. कविवर मैथिलिशरण गुप्त इसका वर्णन इस प्रकार करते हैं – 
सूखा कंठ, पसीना छूटा, मृग तृष्णा की माया।
झुलसी दृष्टि, अँधेरा दीखा, दूर गई वह छाया।

सरिता सरोवर सूख गए, नद-नदियों में जल की कमी हो गई। परिणामतः पशु-पक्षी सूखे सरोवर को देखकर प्यास से व्याकुल हैं। प्रकृति भी प्यासी है और प्यास में उदासी हैं।

गर्मी के इस प्रकोप से अपने आप को बचाने के लिए मनुष्य ने उपाय खोज निकाले हैं। साधारण आय वाले घरों में बिजली के पंखे लगे हुए हैं जो मनुष्यों की पसीने से रक्षा कर रहे हैं। अमीर लोगों के यहाँ एयर कंडीसनर लगे हुए हैं जो शीतल वायु प्रदान करते हैं। जो लोग अधिक समर्थ हैं वे गर्मी से बचने के लिए पहाड़ी स्थानों पर चले जाते हैं और ठंडी का मजा लेते हैं। इसके अतिरिक्त गर्मी से बचने के लिए और भी उपाय किये गए हैं जैसे बर्फ से बने शीतल पेय और अन्य पदार्थ जो गर्मी में किसी वरदान से कम नहीं हैं।

गर्मी की धूप से बचने के लिए जन-साधारण अपना काम सुबह और शाम के समय करने का प्रयत्न करते हैं। इस समय स्कूल और कॉलेजों में अवकाश रहता है। और यदि धूप में निकलना ही पड़े तो फिट देखिये अनोखा दृश्य। हैटधारी बाबू, हैटनुमा टोपी पहने नवयुवक या फिर सिर पर तौलिया या कपड़ा बांधे अधेड़ दिखाई देंगे। कुछ लोग ऐसे भी होते हैं जो फैशन के चलते बिना सिर में कुछ बांधे ही निकल पड़ते हैं और सड़क पर चलते-चलते बेहोश हो जाते हैं।

परन्तु गर्मी में सब कुछ प्रतिकूल जी नहीं होता इसके अपने फायदे भी हैं। अगर गर्मी न हो तो आम भी नहीं होगा। खरबूजे और तरबूज की तो बात ही छोड़ दीजिये। ककड़ी, खीरा, फालसे और आलूबुखारा भी गर्मी में ही आता है। वस्तुतः गर्मी अनाज को पकाती हैं। आम, तरबूज और खरबूजे जैसे फलों में मिठास लाती है। वर्षा ऋतू का आधार भी गर्नी ही है, ग्रीष्ण ऋतू के अभाव में न नी वर्षा होगी, न ही धरती फलेगी और न खेती होगी जिससे जनता अकाल का ग्रास बन जायेगी।

ग्रीष्म ऋतु उग्रता और भयंकरता का प्रतीक है। यह हमें सन्देश भी देती है की हमें आवश्यकता पड़ने पर उग्र रूप धारण करने में संकोच नहीं करना चाहिए। इसके अतिरिक्त ग्रीष्म ऋतु हमें कष्ट सहन करने की शक्ति भी प्रदान करती है। ग्रीष्म के बाद वर्षा ऋतु का आगमन इस बात का संकेत है कि दुःख के बाद सुख की प्राप्ति अवश्य होती है कठोर संगर्ष के बाद ही शांति और उल्लास का आगमन होता है। अतः हमें धरती के सामान ही ग्रीष्म की उग्रता को झेलना चाहिए। रहीम के शब्दों में –
जैसी परी सो सहि रहे, कह रहीम यह देह।
धरती पर ही परत है, सीत घाम अरु मेह।।


Friday, 23 February 2018

होली पर बाल कविता संग्रह। Funny Holi Poems in Hindi

होली पर बाल कविता संग्रह। Funny Holi Poems in Hindi

होली पर बाल कविता संग्रह। Funny Holi Poems in Hindi

Funny Holi Poems in Hindi

(1) धूम मचाती होली आई, ले सतरंगी रंग 
धूम मचाती होली आई, ले सतरंगी रंग 
रामू शामू शीला आओ चलो करें हुडदंग 
फागुन की अल्हड मस्ती में, हँस-हँस भरे गुलाल
टेसू घोले सबको घेरे, करदे मुखड़े लाल ।।

दादा जी की पगड़ी रंग दे, मामा जी के बाल 
चाचा जी का धोती कुर्ता, भाभी जी के गाल 
जो भी घर में छुपकर बैठे, खूब करेंगे तंग 
धूम मचाती होली आई, ले सतरंगी रंग ।।

(2) होली आई होली आई 
होली आई होली आई 
रंग-बिरंगी होली आई 
धूम मचाती होली आई 
बच्चों की यह टोली आई ।।

हाथ में पिचकारी लाई 
अबीर गुलाल उडाती आई 
शोर मचाती टोली आई 
होली आई होली आई ।।

होली है भाई होली है 
हम बच्चों की टोली है 
खेलेंगे हम खेलेंगे 
प्रेम से होली खेलेंगे ।।

(3) होली की मस्ती 
नोमू का मुंह पुता लाल से
सोमू की पीली गुलाल से
कुर्ता भीगा राम रतन का,
रम्मी के हैं गीले बाल।
मुट्ठी में है लाल गुलाल।।

चुनियां को मुनियां ने पकड़ा
नीला रंग गालों पर चुपड़ा
इतना रगड़ा जोर-जोर से,
फूल गए हैं दोनों गाल।
मुट्ठी में है लाल गुलाल।।

लल्लू पीला रंग ले आया
कल्लू ने भी हरा रंग उड़ाया
रंग लगाया एक-दूजे को, 
लड़े-भिड़े थे परकी साल। 
मुट्ठी में है लाल गुलाल।।

कुछ के हाथों में पिचकारी
गुब्बारों की मारा-मारी।
रंग-बिरंगे सबके कपड़े,
रंग-रंगीले सबके भाल।
मुट्ठी में है लाल गुलाल।।

इन्द्रधनुष धरती पर उतरा
रंगा, रंग से कतरा-कतरा
नाच रहे हैं सब मस्ती में,
बहुत मजा आया इस साल।

मुट्ठी में है लाल गुलाल।।


Thursday, 22 February 2018

वसंत ऋतु पर निबंध / Essay on Spring Season in Hindi

वसंत ऋतु पर निबंध / Essay on Spring Season in Hindi

वसंत ऋतु पर निबंध / Essay on Spring Season in Hindi

Essay on Spring Season in Hindi

वसंत की व्याख्या है ‘वसन्त्यस्मिन् सुखानि।’ अर्थात् जिस ऋतु में प्राणियों को ही नहीं अपितु वृक्ष¸ लता आदि को भी आह्वादित करने वाला मधुरम प्रकृति से प्राप्त होता है उसको ‘वसन्त’ कहते हैं। वसन्त समस्त चराचर को प्रेमाविष्ट करके समूची धरती को पुष्पाभरण से अलंकृत करके मानव-चित्त की कोमल वृत्तियों को जागरित करता है। इसलिए 'सर्वप्रिये चारूतरं वसन्ते' कहकर कालिदास ने वसन्त का अभिनन्दन किया है।
भू-मध्यरेखा का सूर्य के ठीक-ठीक सामने आ-जाने के आस-पास का कालखण्ड है वसन्त। इसलिए वसन्त में न केवल भारत अपितु समूचा विश्व पुलकित हो उठता है। अवनी से अम्बर तक समस्त वातावरण उल्लासपूर्ण हो जाता है।

प्रकृति की विचित्र देन है कि वसन्त में बिना वृष्टि के ही वृक्ष¸ लता आदि पुष्पित होते हैं। फरथई¸ काँकर¸ कबड़¸ कचनार¸ महुआ¸ आम और अत्रे के फूल अवनि-अंचल को ढक लेते हैं। पलाश तो ऐसा फूलता है मानों पृथ्वी माता के चरणों में कोटि-कोटि सुमनांजलि अर्पित करना चाहता हो। सरसों वासन्ती रंग के फूलों से लदकर मानों वासन्ती परिधान धारण कर लेती है। घने रूप में उगने वाला कमल-पुष्प जब वसंत ऋतु में अपने पूर्ण यौवन के साथ खिलता है तब जलाशय के जल को छिपाकर वसन्त के कुसुमाकर स्थलकमल कुन्द नेवारी करौंदों के खेत ऐसे लहरा उठते हैं मानों किसी ने हरी और पीली मखमल बिछा दी हो। वसन्त के सौन्दर्य को देखकर कविवर बिहारी का ह्रदय नाच उठा-
छवि रसाल सौरभ सने मधुर माधवी गन्ध।
ठौर-ठौर झूमत झपत झाँर झाँर मधु अन्ध।।
वसंत का नाम ही उत्कंठा है। ‘मादक महकती वासंती बयार’ में ‘मोहक रस पगे फूलों की बहार’ में भौरों की गुंजार और कोयल की कूक में मानव-ह्रदय जब उल्लसित होता है तो उसे कंकणों का रणन¸ नूपुर की रूनझुन¸ किंकणियों का मादक क्वणन सुनाई देता है। प्राणियों के मनों में मदन-विकार का प्रादुर्भाव होता है। जरठ स्त्री भी अद्भुत श्रृंगार-सज्जा में आनन्द-पुलकित जान पड़ती है। इसे देखकर पद्माकर का मदमस्त ह्रदय गा उठता है
औरे रस औरे रीति औरे राग औरे रंग।
औरे तन औरे मन औरे वन ह्वै गए।।
वसन्त मधु का दाता है। पता नहीं कितने फूलों से मधु इकट्ठा करता है वसंत¸ आम से¸ महुआ से¸ अशोक से¸ कचनार से¸ कुरबक से¸ बेला से¸ चमेली से¸ नीम से¸ तमाल से¸ नींबू से¸ मुसम्मी से¸ कमल से¸ मालती से माधवी से।
वसन्त स्वास्थ्यप्रद ऋतु है। इसके शीतल-मन्द-सुगंध समीर में प्रातः भ्रमण शरीर को नीरोग कर देता है। थोड़ा-सा व्यायाम और योग के आसन मानव को चिरायु का वरदान देते हैं। इसीलिए आयुर्वेद-शास्त्र में वसन्त की स्वास्थयप्रद ऋतु विशेषण से अलंकृत किया है।

कालिदास ने वसन्त के उत्सव को ऋतुत्सव माना है। माघ शुक्ल पंचमी (वसन्त पंचमी) से आरम्भ होकर फाल्गुन-पूर्णिमा (होली) तक पूरे चालीस दिन ये वसन्त उत्सव चलते हैं। आचार्य हजारीप्रसाद द्विवेदी इसे मादक-उत्सवों का काल कहते हैं। उनका कहना है कि ‘कभी अशोक-दोहद के रूप में¸ कभी मदन देवता की पूजा के रूप में¸ कभी कामदेवायन-यात्रा के रूप में¸ कभी आम्र-तरू और माधवी लता के विवाह के रूप में¸ कभी होली के हुड़दंग के रूप में¸ कभी होलाका (होला) अभ्यूप खादनिका (भुने हुए कच्चे गेहूँ के पिकनिक) कभी नवाम्र खादनिका (नये आम के टिकोरों की पिकनिक) आदि के रूप में समूचा वसन्त काल नाच गान और काव्यालाप से मुखर हो उठता है।’

वसन्त ऋतु का प्रथम उत्सव वसन्त-पँचमी विद्या और कला की अधिष्ठात्री देवी सरस्वती का पूजन-दिन भी है। इसलिए विद्याभ्यास के श्रीगणेश का मंगल-दिवस है।
वसन्त-पंचमी के दिन ही धर्मवीर बालक हकीकतराय का यवन धर्म स्वीकार न करने के कारण बलिदान हुआ था। इसलिए इस दिन ‘हिन्दू तन मन¸ हिन्दू जीवन। रग-रग हिन्दू¸मेरा परिचय’ के दर्शन को जीवन में चरितार्थ करने वाले शहीद हकीकतराय की याद में मेले लगते हैं।

वसन्त के मेलों का विशेष आकर्षण होता है-नृत्य-संगीत खेलकूद प्रतियोगिताएँ तथा पतंगबाजी। हुचका, ठुमका, खेंच और ढील के चतुर्नियमों से जब पेंच बढ़ाए जाते हैं तो दर्शक सुध-बुध खो बैठता है। अकबर इलाहाबादी के शब्दों में ‘करता है याद दिल को उड़ाना पतंग का।’
वसन्त पंचमी के दिन पीले वस्त्र पहनकर ह्रदय का उल्लास ही प्रकट किया जाता है। वसन्ती हलुआ¸ पीले चावल तथा केसरिया खीर का आनन्द लिया जाता है।

वसन्त मादक उमंगों और कामदेव के पुष्पतीरों का ही पर्व नहीं वीरता का त्यौहार भी है। फाँसी पर चढ़ने वाले आजादी के मतवालों ने ’मेरा रंग दे वसन्ती चोला’ की कामना की, तो सुभद्राकुमारी चौहान देश-भक्तों से पूछ ही बैठी-
वीरों का कैसा हो वसन्त?/ फूली सरसों ने दिया रंग
मधु लेकर आ पहुँचा अनंग / वधु-वसुधा पुलकित अंग-अंग
है वीर वेश में किंतु कंत / वीरों का कैसा हो वसन्त?

भगवान् कृष्ण का ‘ऋतूनां कुसुमाकरः’ कालिदास का ‘सर्वप्रिये चारूतरं वसन्ते’ और वात्सयायन का ‘सुवसंतक’ बनकर वसन्त मधुऋतु और ऋतुराज कहलाया। यह नवजीवन¸ नवोत्साह¸ नव उन्माद मादकता¸ प्रदान कर चराचर को यौवन की अनुभूति कराता हुआ स्वदेश और स्वधर्म के प्रति वासन्ती परिधान पहनने का आह्वान भी करता है। 

Wednesday, 21 February 2018

विद्या पर संस्कृत निबंध। Essay on Vidya in Sanskrit

विद्या पर संस्कृत निबंध। Essay on Vidya in Sanskrit

विद्या पर संस्कृत निबंध। Essay on Vidya in Sanskrit

Essay on Vidya in Sanskrit

विद्या धनं सर्वधनं प्रधानम् इति सर्वैः स्वीक्रियते, यतोहि विद्यया एव सर्वे जनाः सर्वाणि कार्याणि साधयितुं समर्थाः भवन्ति। विद्यां प्राप्य उन्नतिं, कीर्तिं, सुखसमृद्धिं च लभन्ते विद्वांसः। यदुक्तं केनचित् - 
मातेव रक्षति पितेव हिते नियुक्ते 
कान्तेव चाभिरमयत्यपनीयखेदम्। 
लक्ष्मीं तनोति वितनोति च दिक्षु कीर्तिं  
किं किं न साधयति कल्पलतेव विद्या।। 
विद्याधनं व्ये कृते वर्धते, संचायत् च क्षयम् आप्नोति, एतस्माद् इदं अपूर्वम् एव धनं। अत एवोक्तम् - 
अपूर्वः कोअपि कोषो Sयं  विद्यते तव भारति। 
व्यतो वृद्धिमायाति क्षयमायाति संचयात्।। 
नृपाः, राष्ट्र-पतयः, मुख्यमंत्रिणः, प्रधानमंत्रिणो अपि विविधविषयविशेषज्ञानां, कवीनां, वैज्ञानिकानां मतिमतां विदुषां समादरं कुर्वाणाः तेषां उत्साहवर्धनं कुवन्ति पुरस्कारैः। अत अस्माभिरपि विद्या पूर्णमनोयोगेन पठनीया, ग्रहणीया विद्याविहीना पशु इति निर्विवादेन सिध्यति। 
विद्या नाम नरस्य रूपमधिकं प्रच्छन्नगुप्तं धनम्
विद्या भोगकरी यशः सुखकरी विद्या गुरूणां गुरुः ।
विद्या बन्धुजनो विदेशगमने विद्या परं दैवतम्
विद्या राजसु पूज्यते न हि धनं विद्याविहीनः पशुः ॥ 
विद्या अधुना युगे अत्यावश्यकं अस्ति। विद्याविहीन: पशुभि: समान:। विद्यया एव मनुष्या: संसारस्य सर्वश्रेष्ठा: प्राणिन: भवन्ति। विद्या अध्ययनेन मनुष्यस्य बुद्धि: तीव्रा भवति। विद्या विनयं ददाति। विद्या परं दैवतं,परं मित्रं च अस्ति। विदेशेषु अपि विद्या एव बन्धु: अस्ति। विद्यया पात्रतां याति। विद्यया मनुष्य: धनं आप्नोति। धनात् सर्वाणि सुखानि लभते

Tuesday, 20 February 2018

यदि मैं पक्षी होता पर निबंध। If i were a bird essay in hindi

यदि मैं पक्षी होता पर निबंध। If i were a bird essay in hindi

यदि मैं पक्षी होता पर निबंध। If i were a bird essay in hindi

If i were a bird essay in hindi

यदि मैं पक्षी होता तो खुले आकाश में विचरण करताभूमंडल में विचरण करताइच्छानुसार भोजन करता और वृक्षों की शाखाएं मेरी शय्या होती। मेरा जीवन स्वतंत्र और स्वच्छंद होता। मानव देश-विदेश के भ्रमण के लिए तरसता है। पासपोर्ट बनवाने के लिए और वीजा के लिए रात-दिन एक कर देता हैं फिर भी वह भ्रमण का पूरा आनंद नहीं ले पाता है और न ही वह संसार की विविधता को पूरी तरह से देख पाता है। यदि मैं पक्षी होता तो मैं देशों की सीमाओं से न बंधा होता। बिना किसी पासपोर्ट और वीजा के ही मैं दुनिया घूमता।

होती सीमा हीन क्षितिज सेइन पंखों की होड़ा-होड़ी
या तो क्षितिज मिलन बन जाताया तनती साँसों की डोरी।

यदि मानव पर कोई विपत्ति आ जाए तो आज उसके दुःख दर्द में कोई शामिल नहीं होता परन्तु यदि मैं पक्षी होता तो मेरी एक आवाज पर सैकड़ों पक्षी एकत्र होकर मेरे सुर में सुर मिलाकर इतना शोर मचा देते की मेरा दुःख-दर्द और मुसीबतें सब उड़न छू हो जातीं। यदि मैं पक्षी होता तो मनुष्य मेरे रंग-बिरंगे शरीर की आकृतियाँ अपने वस्त्रों पर बनाते मेरी मिट्टीप्लास्टिक आदि की मूर्तियाँ बनाते और अपने घरों में सजाते। बच्चे मेरे जैसे दिखने वाले खिलौने से खेलते और मुझे बहुत ही ख़ुशी होती।

अगर मैं भी पक्षी होता तो मैं भी पेड़ों पर बैठकर चिल्लाता और अपने मधुर गान से हर किसी को मोहित कर देता।एक इंसान सिर्फ चल सकता है दौड़ सकता है लेकिन वह उड़ नहीं सकता क्योंकि भगवान ने उसे उड़ने के लिए पंख नहीं दिए हैं पक्षी उड़ कर कहीं भी आ जा सकते हैं अगर मैं पक्षी होता तो किसी भी अपने करीबी रिश्तेदार से आसानी से मिल सकता था।

जिस प्रकार काव्य तथा साहित्य में मोर की सुन्दरता तथा मीठी वाणी वाले को कोकिला की उपमा दी जाती है। लोभी को गिद्धढोंगी को बगुला भगतनीलकंठ को शिवकबूतर को शान्ति काबाज को वीरता तथा शौर्य का प्रतीक माना जाता हैं उसी प्रकार प्रकार मेरे लिए भी किसी न किसी उपमा का प्रयोग किया जाता और निश्चित ही यह मेरे लिए गर्व की बात होती।

यदि मैं पक्षी होता तो मैं मानव से मित्रता स्थापित कर उसका हित करता। छोटे-मोटे कीड़े-मकोड़ों को खाकर फसल की रक्षा करता। परन्तु मैं पिंजड़े की कैद में कभी न आता। मुझे आजादी अत्यंत प्रिय है और सभी को होती है इसलिए मैं मनुष्यों को समझाता की किसी को भी कैद रखना गलत है। पक्षी बनने के पीछे एक प्रमुख वजह यह भी है की कुछ पक्षियों को देवताओं के वाहन होने का गौरव भी प्राप्त है। कितनी प्रसन्नता होती मुझे गरुड़ बनकर भगवान् विष्णु काउल्लू बनकर देवी लक्ष्मी कामोर बनकर कुमार कार्तिकेय का या फिर हँस बनकर ज्ञान की देवी माता सरस्वती का वाहन बनने में।

Monday, 19 February 2018

Paragraph on My favourite teacher in hindi - मेरे प्रिय अध्यापक पर अनुछेद

Paragraph on My favourite teacher in hindi - मेरे प्रिय अध्यापक पर अनुछेद

Paragraph on My favourite teacher in hindi - मेरे प्रिय अध्यापक पर अनुछेद 

Paragraph on My favourite teacher in hindi

सभी अध्यापकों का व्यवहार मेरे प्रति अच्छा होते हुए भी मुझे अंग्रेजी के अध्यापक सुभाष दुबे जी सबसे अच्छे और प्रिय लगते हैं। इसका एक कारण तो यह हो सकता है कि उनका बाहरी व्यक्तित्व जितना सुन्दर और आकर्षक है उनकी बोलचाल¸ व्यवहार और अध्यापन का ढंग भी उतना ही सुन्दर है। वह जो भी पढ़ाते हैं उसका एक चित्र-सा खड़ा कर विषय को साकार कर देते हैं। उनका पढ़ाया और समझाया गया पाठ छात्र कभी नहीं भूलते। मेरे इन अध्यापक का चेहरा हमेशा एक निर्मल मुस्कान से खिला रहता है। मैंने उन्हें कभी भी कक्षा के बाहर या अंदर बेकार की बातें करते हुए सुना है¸ न देखा है। उनकी वेशभूषा भी उनके व्यक्तित्व के अनुरूप फबने वाली होती है-एकदम उनके विचारों की तरह सीधी-सादी। हमारी प्रातःकालीन¸ साप्ताहिक या मासिक सभाओं में जब कभी वह कुछ बोलने या भाषण देने आते हैं बाकि सब छोड़कर छात्र सिर्फ उन्हीं को सुनते हैं। सचमुच यदि सभी अध्यापक उनके जैसे आदर्श वाले हो जाएँ तो सभी छात्रों का बहुत भला हो सकता है। और आजकल अध्यापक वर्ग पर जो कई प्रकार के लांछन लगाए जाते रहते हैं उनका निवारण भी सरलता से संभव हो सकता है। 
Paragraph on Ramcharitmanas in hindi - रामचरितमानस महाकाव्य पर अनुच्छेद

Paragraph on Ramcharitmanas in hindi - रामचरितमानस महाकाव्य पर अनुच्छेद

रामचरितमानस महाकाव्य पर अनुच्छेद 

Paragraph on Ramcharitmanas in hindi
रामचरितमानस’ महाकवि गोस्वामी तुलसीदास का अमर महाकाव्य है। तुलसीदास जी ने भगवान श्री राम के जीवन की कथा को आधार बनाकर इसमें वेदशास्त्रों का सार तत्व संचित कर दिया है। सबसे मुख्य बात है कि अपने इस महाकाव्य में महाकवि ने पुरूषोत्तम राम का अत्यंत सुन्दर एवं  सजीव वर्णन किया है। बाल काण्ड¸ अयोध्या काण्ड¸ अरण्य काण्ड¸ किष्किंधा काण्ड¸ सुन्दर काण्ड¸ लंका काण्ड और उत्तर काण्ड-‘रामचिरतमानस’ में इस प्रकार सात काण्ड हैं और राम के जन्म से लेकर राज्यारोहण तक की उनकी शील¸ शक्ति और सौन्दर्य की भी कथा इन सात काण्डों में कही गई है। इन काण्डों में श्री राम को गुरू¸ माता-पिता का आज्ञापालक¸ प्रजा-वत्सल¸ कुशल राजनीतिज्ञ¸ सत्यव्रत का पालक¸ शरणागत का रक्षक¸ अन्याय का घोर शत्रु और सभी उदात्त मानवीय गुणों से युक्त बताया गया है। इन्हीं गुणों के कारण श्रीराम मर्यादा पुरूषोत्तम भी हैं और लोकनायक भी। ‘रामचरितमानस’ मात्र आध्यात्मिक ग्रंथ ही नहीं बल्कि जन-कल्याणकारी काव्य है। इसी कारण प्रत्येक भारतीय ‘रामचरितमानसֹ’ को अपने घर में रखना तो पसंद करता ही है इसका अध्ययन-परायण करना भी अपना सौभाग्य मानता है।

Sunday, 18 February 2018

मेरे प्रिय शिक्षक हिंदी निबंध। my favourite teacher essay in hindi

मेरे प्रिय शिक्षक हिंदी निबंध। my favourite teacher essay in hindi

मेरे प्रिय शिक्षक हिंदी निबंध। my favourite teacher essay in hindi

my favourite teacher essay in hindi

एक अध्यापक अनंत कालीन प्रभाव डालता है। वह कभी नहीं बता सकता कि उसका प्रभाव कहां और कब रुकेगा। सभी क्षेत्रों में शिक्षा के क्षेत्र को श्रेष्ठ एवं महत्वपूर्ण माना जाता है। भारत में तो गुरु का स्थान ईश्वर से भी बड़ा बताया गया है। विद्यार्थी का विकास उसकी भावी दिशा तथा समाज के भावी स्वरुप को निश्चित करने में शिक्षक का अमूल्य योगदान रहता है। इस दृष्टि से प्रत्येक विद्यालय में आदर्श शिक्षक होते हैं। विद्यार्थी जीवन को बनाने व सँवारने में अध्यापक की भूमिका होती है। जैसे कुम्हार नहीं चाहता है कि उसके हाथ के बनाए बर्तन टूट-फूट जाए ठीक उसी प्रकार अध्यापक नहीं चाहता कि उसके शिष्य जीवन में असफल हो जाएं और जैसे कुम्हार ऊपर से चोट करता है किंतु बर्तनों को आकार प्रदान करने हेतु अंदर हाथ का सहारा देता है ठीक उसी प्रकार अपने शिष्यों को उन्नति के पथ पर देखने के लिए वह उनको दंड भी देता है, डांटता भी है। कबीर दास ने भी लिखा है

गुरु कुम्हार शिष्य कुंभ है गढ़ी-गढ़ी काढ़ खोट
अंतर हाथ सहार दे बाहर-बाहर चोट।

अध्यापक यद्यपि छात्र के साथ कठोर रहता है। लेकिन उसका हृदय छात्र के कल्याण की कामना से भरा होता है गुरू के द्वारा ही ईश्वर के ज्ञान का और ईश्वर का दर्शन कराया जाता है। गुरु ईश्वर से पहले पूजनीय है। इस तथ्य को सुस्पष्ट शब्दों में कबीर दास ने इस प्रकार व्यक्त किया है

गुरु गोविंद दोऊ खड़े¸ काके लागू पायँ।
बलिहारी गुरु आपने¸ गोविंद दियो बताए।

मैं न्यू मॉर्डन पब्लिक स्कूल की कक्षा आठ का विद्यार्थी हूँ। मेरे प्रिय अध्यापक का नाम योगेश चतुर्वेदी है। वे मेरी कक्षा को अंग्रेजी पढ़ाते हैं। वे सादा जीवन और उच्च विचार में आस्था रखने वाले अध्यापक हैं। साहित्य लेखन और अंग्रेजी की किताब लिखने का कार्य भी करते हैं। उनके व्यक्तित्व का मेरे मन-मस्तिष्क पर इतना गहरा प्रभाव पड़ा कि मैंने उन्हें अपना प्रिय अध्यापक बना लिया। वे अंग्रेजी से एम.ए. व पी. एच. डी. हैं। कॉलेज में स्वच्छ वस्त्र पहन कर आते हैं। सादा वेशभूषा का विद्यार्थियों पर सकारात्मक प्रभाव पड़ता है। दूसरों के प्रति दया¸ प्रेम¸ सहानुभूति का भाव रखना¸ गरीबों की सहायता करना¸ नियमितता¸ समयबद्धता¸ परिश्रम पूर्वक अध्यापन करना एवं अपने काम के प्रति निष्ठा आदि अनेक गुण उनमें विद्यमान हैं। उन्हें कभी क्रोध करते नहीं देखा। गलत बात पर भी वे छात्रों को प्रेम के साथ समझाते हैं उनकी आंखों का स्नेह हैं और गंभीरता ही छात्र के लिए डांट का पर्याय बन जाती है आदरणीय योगेश चतुर्वेदी विद्यालय के कार्यों को पूर्ण निष्ठा व ईमानदारी से संपन्न करते हैं। वाद-विवाद प्रतियोगिताओं के लिए छात्रों को तैयार करते हैं। छात्रों  में लेखन की प्रतिभा को विकसित करते हैं यदि उनके छात्र कक्षा में ठीक से काम नहीं कर पा रहे हैं तो उन्हें अतिरिक्त समय देकर पढ़ाते हैं। वह उन शिक्षकों में से नहीं जो अपनी कक्षा नहीं लेते तथा घर पर ट्यूशन पढ़ाते हैं। मुझे भी उन्होंने कई बार अतिरिक्त समय देकर पढ़ाया है। विद्यालय की पत्रिका का सम्पादन उनकी ही जिम्मेदारी है। उनकी कक्षा का अनुशासन बहुत अच्छा होता है। सभी विद्यार्थी उन्हें पसन्द करते हैं। वे एक आदर्श शिक्षक हैं। वे समय के बहुत पाबन्द हैं। समय से पहले कॉलेज में आ जाते हैं। हमने उन्हें देर से आते हुए नहीं देखा। वे विद्यार्थी की व्यक्तिगत व मानसिक समस्याओं का भी समाधान करते हैं। शारीरिक दंड देना आवश्यक नहीं समझते।

एक आदर्श शिक्षक के सभी गुण उनमें विद्यमान हैं। वे छात्रों की मानसिक क्षमताओं से उन्हें परिचित कराते हैं। वे छात्रों को प्रेरणा देते हैं। मेरे प्रिय अध्यापक सर्वश्रेष्ठ अध्यापकों में से एक हैं। उनके कार्य और गुण ना केवल मुझे ही प्रभावित करते हैं बल्कि कई लोग भी प्रभावित हैं। हमें उन पर गर्व है। वे अपने विद्यालय के बाहर भी एक आदर्श व सम्मानित व्यक्ति के रूप में जाने जाते हैं। जो भी व्यक्ति उनके संपर्क में आता है वह उनसे प्रभावित हुए बगैर नहीं रह पाता है। उनकी मधुर वाणी¸ शांत स्वभाव¸ आचरण और शिक्षा के प्रति आस्था व कर्मठता के भाव मुझे प्रेरणा देते हैं और जीवन भर प्रेरित करते रहेंगे। 

Saturday, 17 February 2018

अवकाश के लिए संस्कृत प्रार्थना पत्र। Leave Application in Sanskrit

अवकाश के लिए संस्कृत प्रार्थना पत्र। Leave Application in Sanskrit

अवकाश के लिए संस्कृत प्रार्थना पत्र। Leave Application in Sanskrit

Leave Application in Sanskrit
सेवायाम्
श्रीमान् प्राचार्यः महोदयः
राजकीय विद्यालयः
कानपुरम्

विषयः - अवकाशस्य हेतोः प्रार्थना पत्रम्। 

मान्यवर !
विनम्र निवेदनम् अस्ति यत् ज्येष्ठमासस्य पञ्चम्यां तिथौ मम मातुलस्य विवाहः संपत्स्यते। विवाहतिथेः एकदिन-पूर्वमेव मया तत्र प्राप्तव्यम्।

अतः 06/03/2018 दिनांकात् 08/03/2018 दिनांकपर्यन्तं दिनत्रयस्य अवकाशं प्रदाय अनुगृहणातु भावान् इति।

दिनांक  05/03/2018
भवतः आज्ञाकारिणी शिष्या 
नाम - सुषमा स्वराज 
कक्षा - दशम 
राजकीय विद्यालय, कानपुरम्
संस्कृत में स्थानान्तरण प्रमाण पत्र। Sthanantaran Patra in Sanskrit

संस्कृत में स्थानान्तरण प्रमाण पत्र। Sthanantaran Patra in Sanskrit

संस्कृत में स्थानान्तरण प्रमाण पत्र। Sthanantaran Patra in Sanskrit

Sthanantaran Patra in Sanskrit
सेवायाम् 
श्रीमान् प्राचार्यः महोदयः
राजकीय विद्यालयः
जबलपुरम् मध्यप्रदेशम्

विषयः - स्थानान्तरण प्रमाणपत्रं प्राप्तुम् आवेदनपत्रम्। 

मान्यवर !
विनम्र निवेदनम् अस्ति यत् मम पिता मध्यप्रदेशस्य सर्वकारे एकः शिक्षकः अस्ति। तस्य स्थानान्तरणं जबलपुरात् शान्तिनगरमभवत्। तस्मात् अहमपि शांतिनगरं गत्वा अध्ययनं कर्तुम् इच्छामि।

अतः अहम् भवन्तं निवेदयामि यत् मह्यं स्थानान्तरणं प्रमाणपत्रं प्रदाय कृपां करोतु।

दिनांक 05/02/2018
भवतः आज्ञाकारिणी शिष्या 
नाम - सुषमा स्वराज 
कक्षा - दशम 
राजकीय विद्यालय, जबलपुरम्

Friday, 16 February 2018

संस्कृत में प्रार्थना पत्र फीस माफी के लिए। Shulk Mukti Prarthna Patra in Sanskrit

संस्कृत में प्रार्थना पत्र फीस माफी के लिए। Shulk Mukti Prarthna Patra in Sanskrit

संस्कृत में प्रार्थना पत्र फीस माफी के लिए। Shulk Mukti Prarthna Patra in Sanskrit

सेवायाम्
 श्रीमान् प्राचार्यमहोदयः
 शासकीय उच्चतर-माध्यमिक-विद्यालयः
 नागपुरम्

विषयः - शुल्कमुक्तये प्रार्थना पत्रम्

Shulk Mukti Prarthna Patra in Sanskrit

महोदय !
सविनयं निवेदनम् अस्ति यदहं भवतः विद्यालये दशमकक्षायाः छात्रा अस्मि। मम पिता एकः लिपिकः अस्ति। तस्य मासिकं वेतनं पञ्चसहस्ररुप्यकाणि मात्रमेव अस्ति। मम एकः भ्राता अष्टमकक्षायां भगिनी च पञ्चम्यां कक्षायां पठति। अस्माकं कुटुम्बस्य निर्वाहः अतीव कठिन्येन भवति।
अतः शुल्कक्षमापनार्थं प्रार्थयेSहम्। आशासे अत्र भवान् मम एतां प्रार्थनां स्वीकृत्य अनुग्रहीष्यति।

 दिनांक 15/02/2018
भवतः आज्ञाकारी शिष्या
दिशा त्रिपाठी
कक्षा दशम
Leave Application to Principal in Sanskrit - संस्कृत में अवकाश प्रार्थना पत्र

Leave Application to Principal in Sanskrit - संस्कृत में अवकाश प्रार्थना पत्र

Leave Application to Principal in Sanskrit - संस्कृत में अवकाश प्रार्थना पत्र 

सेवायाम्
 श्रीमान् प्राचार्यमहोदयः
 शासकीय उच्चतर-माध्यमिक-विद्यालयः
 नागपुरम्

विषयः - अवकाशाय प्रार्थना पत्रम्

Leave Application to Principal in Sanskrit

महोदय !
सविनयं निवेद्यते यत् अहम् अतिदिवसात् ज्वरग्रस्तो अस्मि, बलवती शिरोवेदना च मां व्यथयति। ज्वरकृततापेन कार्श्यम् उपगतो अस्मि। अतो अद्य विद्यालयं आगन्तुम् असमर्थो अस्मि।
अतः कृपया 16/02/2018 दिनांकात् 19/02/2018 दिनांकपर्यन्तं चतुर्-दिनानाम् अवकाशं स्वीकृत्य माम् अनुग्रहीष्यति।

दिनांक 15/02/2018
भवतः आज्ञाकारी शिष्यः
जय सैनी
कक्षा सप्तम

Thursday, 15 February 2018

कार्यालय पत्र का उदाहरण। karyalaya patra ka prarup

कार्यालय पत्र का उदाहरण। karyalaya patra ka prarup

कार्यालय पत्र का उदाहरण। karyalaya patra ka prarup

भारत सरकार
मानव संसाधन विकास मंत्रालय 
संख्या 938/10/2017 
नई दिल्ली¸ दिनांक 4 जनवरी 2017 
कार्यालय ज्ञापन

विषय- राष्ट्रीय एवं अंतर्राष्ट्रीय सम्मेलनों/संगोष्ठियों में राष्ट्रभाषा हिंदी का प्रयोग। 

karyalaya patra ka prarup

    अधोहस्ताक्षरकर्ता को यह कहने का निर्देश हुआ है कि प्रधानमंत्री को इस बात से दुख है कि भारत सरकार के विभिन्न मंत्रालयों द्वारा पत्र व्यवहार में अभी भी हिंदी का प्रयोग वांछित मात्रा में नहीं हो रहा है।
    राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय सम्मेलनों और संगोष्ठियों में हिंदी की उपेक्षा और भी शोध का विषय है। अन्य देशों के प्रतिनिधियों की उपस्थिति में भारत के प्रतिनिधियों का अपनी राष्ट्रभाषा में ना बोल कर विदेशी भाषा का प्रयोग करना राष्ट्रीय प्रतिष्ठा के प्रतिकूल है और हमारी आलोचना का कारण बनती है। इस विषय में अत्यंत सावधान रहने की आवश्यकता है। राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय सम्मेलनों¸संगोष्ठियों में राष्ट्रभाषा हिंदी को उचित स्थान और महत्व देना चाहिए।
(ह0) श्रीमती अनुराधा मिश्र
सचिव¸मानव संसाधन
विकास मंत्रालय
भारत सरकार

प्रतिलिप सूचनार्थ एवं आवश्यक कार्यवाही हेतु प्रेषित-
  1. भारत सरकार के सभी मंत्रालय
  2. राज्यों के मुख्य सचिव
  3. प्रधानमंत्री कार्यालय (पत्र सं0 4145/ह/823/2017 दिनांक 18 दिसंबर 2017 के संदर्भ में) +
अर्ध सरकारी पत्र का उदाहरण। Ardh Sarkari Patra

अर्ध सरकारी पत्र का उदाहरण। Ardh Sarkari Patra

अर्ध सरकारी पत्र का उदाहरण। Ardh Sarkari Patra

राजीव टंडन¸ IAS
कार्यालय¸जिलाधिकारी
इलाहाबाद¸ दिनांक 15 सितंबर 2017

विषय- नकली नोटों का चलन।

Ardh Sarkari Patra

प्रिय तिवारी जी¸
            आगामी माघ मेले के संबंध में हम प्रायः बात करते हैं। माघ मेले में जुटने वाली अपार भीड़ को दृष्टि में रखते हुए समाज विरोधी तत्व अपनी गतिविधियां तेज कर सकते हैं। विध्वंसक कार्यों के अतिरिक्त वे जनता को धोखा देने वाले कई अन्य कार्य भी कर सकते हैं। सूत्रों से पता चला है कि एक गिरोह 1000 और 500 रुपए के नकली नोट बड़ी मात्रा में लेकर नगर में घुस आया है। रिजर्व बैंक की ओर से दूरदर्शन पर विज्ञापन देकर सही नोट की पहचान का गुर जनता को समझाने की कोशिश की गई है पर नकली नोट असली से इस कदर मिलते-जुलते हैं कि अनपढ़ जनता प्रायः धोखे में आ जाती है इसलिए जरूरी है कि आप नकली नोटों का प्रदर्शन करके जनता को इस बारे में सावधान करें। इस संबंध में मैं आपसे फिर परामर्श करूंगा। 

       इस पत्र का उद्देश्य यह है कि आप अपने अधीनस्थ पुलिसकर्मियों को सावधान कर दें कि वह नकली नोटों का धंधा करने वाले समाज विरोधी तत्वों पर कड़ी नजर रखें। इस संबंध में हमारी कार्यविधि क्या होगी इसका निर्णय आप स्वयं अपने अधीनस्थ अधिकारियों के सहयोग से कर सकते हैं। 
आपका सद्भावी
राजीव टंडन
प्रमोद कुमार तिवारी¸ IPS                                                      
वरिष्ठ पुलिस अधीक्षक¸ इलाहाबाद closed

Wednesday, 14 February 2018

संपादक के नाम आरक्षण पर पत्र। Sampadak ko letter in hindi

संपादक के नाम आरक्षण पर पत्र। Sampadak ko letter in hindi

संपादक के नाम आरक्षण पर पत्र। Sampadak ko letter in hindi

Sampadak ko letter in hindi
सेवा में,
संपादक महोदय
हिन्दुस्तान टाइम्स
नई दिल्ली

विषय : आरक्षण की समीक्षा 

महोदय,
      हम मंडल आयोग की स्थापना का कि पिछड़े वर्गों के लिए नौकरियों में आरक्षण आधार जाति को माना जाए कड़े शब्दों में विरोध करते हैं। हमें आश्चर्य तथा दुःख है कि आयोग ने पिछड़ेपन को परिभाषित करते समय आर्थिक आधार की उपेक्षा कर दी तथा इसके स्थान पर सामाजिक और शैक्षणिक पिछड़ेपन के बहाने जाति और सरकारी नौकरियों में समुचित स्थान के अभाव को ही कसौटी के रूप में स्वीकार किया है। हमारा मानना है कि आर्थिक रुप से संपन्न जातियां आयोग की कसौटियों पर खरी उतरने के बावजूद पिछड़ी नहीं कही जा सकती। निसंदेह इस तथ्य को किसी के समर्थन की आवश्यकता नहीं है की संपन्नता और प्रभुता एक-दूसरे की बहनें हैं। इसलिए हमारा यह विश्वास स्वाभाविक ही है कि संपन्न व्यक्ति जाति अथवा वर्ग अनाथ अथवा पिछड़ा हुआ नहीं होता बल्कि समर्थ तथा समाज में अपनी बात मनवाने की क्षमता से संपन्न होता है। इसके ठीक विपरीत स्थिति आर्थिक रूप से पिछड़े व्यक्ति की होती है¸ यह अपने आप से स्पष्ट है।

       मंडल आयोग ने पिछड़ेपन को परिभाषित करने के लिए आर्थिक आधार का सहारा लेने के स्थान पर जाति को आधार बनाकर एक घातक भूल की है। हमें डर है कि इससे जातिवाद की व्यतीत धारणा को नया जीवन मिलेगा तथा देश और समाज में विघटन का नया दौर शुरू हो जाएगा।

       देश को लोकतांत्रिक समाजवादी धर्मनिरपेक्ष वर्गहीन तथा जातिहीन समाज में परिवर्तित करना हम सबका संवैधानिक कर्तव्य है। इन आदर्शों को भारतीय पुनर्जागरण काल से लेकर स्वतंत्रता संग्राम के विभिन्न चरणों में अनुभूत तथा अर्जित किया गया है। भारत की जाति व्यवस्था को देश के पतन का एक प्रमुख कारण मानते हुए ‘जाति छोड़ो’ आंदोलन भी हुए हैं। राजा राममोहन राय¸ स्वामी दयानंद¸ गुरुदेव रवींद्रनाथ टैगोर¸ स्वामी विवेकानंद¸ महात्मा गांधी¸ फूले¸ बाबा साहब अंबेडकर जैसे राष्ट्रीय नेताओं ने एक स्वर में जाति प्रथा की भर्त्सना की है। हमारा विश्वास है कि जाति प्रथा को प्रत्यक्ष अथवा परोक्ष रूप में बढ़ावा देना इन महान आत्माओं का अपमान तथा राष्ट्रीय और संवैधानिक आदर्शों की खुलेआम अवहेलना है।

हमें दुख भी है और आश्चर्य भी कि सरकार पिछड़ेपन को आर्थिक आधार पर परिभाषित कर सकने की संभावना को मानते हुए भी मंडल आयोग के संदर्भ में उस पर विचार नहीं करना चाहती। इस मामले में हम सवर्णों के लिए आरक्षण के सिलसिले में सरकार की घोषणा की तरफ ध्यान खींचना चाहेंगे। सरकार से हमारा अनुरोध है कि पिछड़ेपन के निर्धारण के लिए आर्थिक स्थिति को ही एकमात्र मानदंड के रूप में स्वीकार करके वह इस विवाद को विवेकसम्मत ढंग से अंतिम परिणति प्रदान करे।

      हम इस दुर्भाग्यपूर्ण तथ्य से पूरी तरह अवगत हैं कि देश में रोजगार के अवसर अपर्याप्त होने के कारण युवा शक्ति का पूरा लाभ नहीं उठाया जा रहा है लेकिन यह स्थिति रोजगार के अवसर बढ़ाने की मांग करती है¸ ना कि सीमित अवसरों के राजनीतिकरण की। कहने की आवश्यकता नहीं है परंतु वास्तविक लोकप्रियता देश में समृद्धि के व्यापक विस्तार का ही परिणाम हो सकती है¸ मौजूदा साधनों के बंदरबांट की नहीं और दुख यही है कि चुनावी गणित को ऐतिहासिक आवश्यकता की संज्ञा देकर सरकार ने अपने संवैधानिक दायित्व को ताक पर रख दिया है।

     फिर भी हमारा यह विश्वास है कि अगर सरकार अपने क्षुद्र राजनीतिक स्वार्थों को त्यागने के लिए तैयार हो जाए तो मंडल आयोग की सिफारिशों से उत्पन्न विवादों को आम राय से हल किया जा सकता है। हमारा प्रस्ताव है कि 1991 की जनसंख्या गणना के आधार पर आयोग की सिफारिशों का फिर से आकलन किया जाए ना कि 1930 के आधार पर माना जाए। रोजगार के अवसर बढ़ाने के लिए विकास की गति तेज करनी होगी और इसके लिए भूमि सुधारों को अविलंब लागू किया जाना बहुत जरूरी है और आरक्षण के संदर्भ में लिंग भेद के आधार पर सदियों से शोषित नारी के लिए भी आरक्षण के लिए विचार किया जाना चाहिए।

भवदीय
(अ0ब0स0)