Monday, 22 January 2018

पिता पर कविता संग्रह। Father poem in hindi

पिता पर कविता संग्रह। Father poem in hindi

पिता पर कविता संग्रह। Father poem in hindi

Father poem in hindi

मेरा अभिमान पिता 
मेरा साहस मेरी इज्जत मेरा सम्मान है पिता। 
मेरी ताकत मेरी पूँजी मेरी पहचान है पिता। 
घर की इक-इक ईट में शामिल उनका खून पसीना।  
सारे घर की रौनक उनसे सारे घर की शान पिता। 
मेरी शोहरत मेरा रूतबा मेरा है मान पिता। 
मुझको हिम्मत देने वाले मेरा हैं अभिमान पिता। 
सारे रिश्ते उनके दम से सारे नाते उनसे हैं। 
सारे घर के दिल की धड़कन सारे घर की जान पित। 
शायद रब ने देकर भेजा फल ये अच्छे कर्मों का। 
उसकी रहमत उसकी नेमत उसका है वरदान पिता। 

बचपन की यादें 
आज भी वो प्यारी मुस्कान याद आती है। 
जो मेरी शरारतों से पापा के चेहरे पर खिल जाती थी। 
अपने कन्धों पर बैठाकर वो मुझे दुनिया की सैर कराते थे। 
जहां भी जाते मेरे लिए ढेर सारे तोहफे लाते थे। 
मेरे हर जन्मदिन पर वो मुझे साथ मंदिर ले जाते थे। 
मेरे हर रिजल्ट का बखान पूरी दुनिया को बताते थे। 
मेरी जिंदगी के सारे सपने उनकी आँखों में पल रहे थे। 
मेरे लिए खुशियों का आशियाना वो हर पल बन रहे थे। 
मेरे सपने उनके साथ चले गए मेरे पापा मुझे छोड़ गए। 
अब आँखों में शरारत नहीं बस आंसू ही दीखते हैं। 
एक बार तो वापस आ जाओ पापा। 
हैप्पी फादर्स डे तो सुन जाओ पापा। 
(कर्णिका पाठक जी द्वारा रचित) 

पापा तुम कितने अच्छे हो
पापा तुम कितने अच्छे हो। 
बड़े हो गए इतने लम्बे। 
मगर अभी मन से बच्चे हो। 
पापा तुम कितने अच्छे हो। 
दीदी के प्यारे मास्टर जी। 
भैया के हो जिगरी दोस्त। 
घोड़ा बनकर हमें बिठाते। 
और खिलाते मक्खन टोस्ट। 
जीवन की खुशियाँ मिल जातीं। 
जब मिल जाते मम्मी-पापा। 
पिज्जा बर्गर आइसक्रीम संग। 
जब हम करते सैर सपाटा। 
मम्मी तुम कितनी अच्छी हो। 
पापा तुम कितने अच्छे हो। 
(महेश जी द्वारा रचित।)

मेरे प्यारे पिताजी 
माँ ममता का सागर है 
पर उसका किनारा है पिताजी 
माँ से ही बनता घर है 
पर घर का सहारा है पिताजी 
माँ आँखों की ज्योति है 
पर आँखों का तारा है पिताजी 
माँ से स्वर्ग है माँ से बैकुंठ 
माँ से ही है चारों धाम 
पर इन सब का द्वारा है पिताजी 
देवांश राघव जी द्वारा रचित 

प्यारे पापा सच्चे पापा 
प्यारे पापा सच्चे पापा 
बच्चों के संग बच्चे पापा 
करते हैं पूरी हर इच्छा 
मेरे सबसे अच्छे पापा 

पापा ने ही तो सिखलाया 
हर मुश्किल में बनकर साया 
जीवन जीना क्या होता है 
जब दुनिया में कोई आया 
उंगली पकड़कर सिखलाता 
जब ठीक से चलना न आता 
नन्हे प्यारे बच्चे के लिए 
पापा ही सहारा बन जाता 

प्यारे पापा सच्चे पापा 
बच्चों के संग बच्चे पापा 

पिता पर कविता 
पिता जीवन है, संबल है, शक्ति है। 
पिता सृष्टि के निर्माण की अभिव्यक्ति है। 
पिता उंगली पकडे तो बच्चे का सहारा है। 
पिता कभी कुछ खट्टा, कभी खारा है। 
पिता पालन है, पोषण है, परिवार का अनुशासन है। 
पिता धौंस से चलने वाला प्रेम का प्रशासन है। 
पिता रोटी है, कपड़ा है, मकान है। 
पिता छोटे से परिंदे का बड़ा आसमान है। 
पिता अप्रदर्शित अनंत प्यार है। 
पिता है तो बच्चों को इन्तजार है। 
पिता से ही बच्चों के ढेर सारे सपने हैं। 
पिता है तो बाजार के सब खिलौने अपने हैं। 
पिता से ही परिवार में प्रतिपल राग है। 
पिता से ही माँ की बिंदी और सुहाग है 

मेरे पापा 
मेरे पापा अच्छे हैं, हम सब उनके बच्चे हैं। 
हमको सुबह उठाते हैं पढने को बैठाते हैं। 
जब हम पढने लगते हैं तो मॉर्निंग वाक् पर जाते हैं। 
पापा के बाहर जाते ही हम सब धूम मचाते हैं। 
सुबह दूध ले आने को भी पापा डेली जाते हैं। 
ऑफिस उनका दूर हैं, साहब उनका क्रूर है। 
अगर देर हो जाती उनको तगड़ी डांट पिलाते हैं। 
देर शाम घर आते हैं, सब्जी भी ले आते हैं। 
थककर चूर हुए रहते भी पापा हमें पढ़ाते हैं। 
जब हम गलती करते हैं, नहीं किसी से डरते हैं। 
तब पापा गुर्राते हैं, जोर-जोर चिल्लाते हैं। 
पहले जो भी मिलता है उसे पीटते जाते हैं। 
जब हम पीते जाते हैं, मम्मी-पापा भिड़ जाते हैं। 
मम्मी के झगडा करने पर पापा भी डर जाते हैं। 
हम सब चिप कर देखा करते और मजाक उड़ाते हैं।  
(गिरिजेश जी द्वारा रचित)

आदर्श अध्यापक पर निबंध। Essay on ideal teacher in hindi

आदर्श अध्यापक पर निबंध। Essay on ideal teacher in hindi

आदर्श अध्यापक पर निबंध। Essay on ideal teacher in hindi
ideal teacher in hindi

प्रस्तावना : मनुष्य को गुणवान बनाने के लिए शिक्षा अत्यंत आवश्यक है। क्योंकि बिना पढ़ा मनुष्य पशु के सामान होता है। मनुष्य के कार्य और व्यवहार में सुन्दरता और शिष्टता शिक्षा के द्वारा ही आती है। शिक्षा जगत में शिक्षक का एक गौरवपूर्ण स्थान है। बच्चों की शिक्षा का पूर्ण दायित्व शिक्षक पर ही निर्भर करता है। समाज और देश के निर्माण में शिक्षक का महान योगदान होता है। यदि शिक्षक चाहे तो देश को रसातल में पहुंचा दे और चाहे तो देश को स्वर्ग बना दे। एक शिक्षक ही देश के लिए योग्य नागरिक का निर्माण करके देश के भविष्य को बनाता है। अतः शिक्षक को समाज में गौरवपूर्ण और सम्मानपूर्ण स्थान मिलना चाहिए। 

अध्यापक का महत्व : अध्यापक का महत्व सर्वविदित है। राष्ट्र का सच्चा और वास्तविक निर्माता अध्यापक ही है क्योंकि वह अपने विद्यार्थियों को शिक्षित और विद्वान् बनाकर ज्ञान की एक ऐसी अखंड ज्योति जला देता है जो देश और समाज के अन्धकार को दूर कर ज्ञान का प्रकाश फैलाती है। 
प्रत्येक देश के विद्यार्थी उस देश के भावी निर्माता होते हैं। उनका नैतिक, मानसिक और सामाजिक विकास अध्यापक पर ही निर्भर करता है। अध्यापक उस कुम्हार के सामान होता है जो शिष्य रुपी घड़े को अपने प्रयत्नों द्वारा सुन्दर और सुडौल रूप प्रदान करता है। 


मेरे प्रिय अध्यापक : हमारे विद्यालय में अंग्रेजी के अध्यापक श्री सुभाष दुबे जी मेरे प्रिय अध्यापक हैं। वे एक आदर्श अध्यापक हैं। वे सादा जीवन और उच्च विचार के समर्थक हैं। उन्होंने आगरा विश्वविद्यालय से एम.ए. के उपाधि प्राप्त की है। वे सदैव साडी वेश भूषा धारण करते हैं। वे स्वभाव से मधुर किन्तु अनुशासन प्रिय व्यक्ति हैं। वे पठन-पाठन में विशेष रूचि रखते हैं। हमारे विद्यालय के प्रत्येक सांस्कृतिक कार्यक्रम का संचालन वही करते हैं। उनके इन्ही गुणों के कारण वे सबके प्रिय हैं।

उनकी लोकप्रियता का कारण : मेरे आदर्श अध्यापक श्री सुभाष दुबे जी अपने क्षेत्र में अत्यंत लोकप्रिय हैं। वह हमारे विद्यालय की शान हैं। वह पिछले 25 वर्षों से अध्यापन का कार्य कर रहे हैं। विद्यालय में उनकी लोकप्रियता का पहला कारण तो यह है की वे सरल स्वभाव के एवं हँसमुख व्यक्ति हैं। दूसरा यह की उनमें अध्यापन में बड़े ही कुशल हैं। वे अपना विषय इस प्रकार पढ़ाते हैं की सभी छात्रों को भली-भाँती समझ में आ जाता है। इसी कारण उनका परीक्षाफल सदैव शत-प्रतिशत रहता है।
उनकी लोकप्रियता का एक कारण यह भी है कि उनमें सचरित्रता, सस्पष्टवादिता, नम्रता, संयम पालन, अनुशासन प्रियता तथा सदाचारिता जैसे गुण भी सम्मिलित हैं। वे कभी किसी छात्र को मारते-पीटते नहीं अपितु सभी को पुत्रवत समझते हैं।

उपसंहार : हम सभी को अपने आदर्श अध्यापक के जीवन से प्रेरणा लेनी चाहिए। अध्यापक के आदर और सम्मान की स्थापना से ही समाज और देश की उन्नति संभव है क्योंकि अध्यापक ही वास्तविक रूप में राष्ट्र निर्माता होता है। अतः समाज और शासन को इस ओर अविलम्ब ध्यान देकर देश की उन्नति का मार्ग प्रशस्त करना चाहिए। 

Sunday, 21 January 2018

ईद उल फितर पर निबंध। Eid ul Fitr Essay in Hindi

ईद उल फितर पर निबंध। Eid ul Fitr Essay in Hindi

ईद उल फितर पर निबंध। Eid ul Fitr Essay in Hindi
Eid ul Fitr Essay in Hindi

प्रस्तावना : भारत एक ऐसा देश है जहाँ पर अनेक धर्मों के लोग निवास करते हैं। यहाँ पर हिन्दू, मुस्लिम, सिख और इसाई आदि रहते हैं। उनके त्यौहार भी अलग-अलग मनाये जाते हैं। वे सभी एक दूसरे के त्यौहारों को बड़े प्रेम भाव से मनाते हैं और आपस में सहयोग करते हैं। यही भारत की बड़ी विशेषता है। यहाँ विभिन्नता के होते हुए भी एकता है। हिन्दुओं के होली और दीपावली की तरह ईद मुसलामानों का एक प्रसिद्ध त्यौहार है। भारत देश त्यौहारों की भूमि है यहाँ के त्यौहार मनोरंजन के मुख्य साधन बने हुए है। 

ईद मनाये जाने का समय : ईद का त्यौहार रमजान के महीने के बाद तीज को मनाया जाता है। इसके मनाये जाने की घोषणा दिल्ली के इमाम बुखारी द्वारा की जाती है। उन्ही के सन्देश के अनुसार मुस्लिम धर्म के लोग ईद का चाँद देखते हैं। ईद के त्यौहार से पहले 30 दिन का कठोर व्रत रखा जाता है। इस दिन सभी वृत्त रखने वाले ईदगाह में जाकर नमाज पढ़ते हैं और परमात्मा से दुआएं मांगते हैं। 

ईद की तैयारियां : ईद मुस्लिम धर्म का एक बड़ा त्यौहार है। इस दिन सभी लोग प्रसन्न दिखाई देते हैं। सभी नए-नए कपड़े धारण करते हैं। बच्चे अत्यंत खुश होते हैं। वे प्रसन्न होकर इधर-उधर घूमते हैं। एक दूसरे से मिलते जुलते हैं। ईद के समय ईदगाह पर इकट्ठे होते हैं। जब धर्मगुरु आदेश देता है तो वे अल्लाह की वंदना करते हैं। सफ़ेद पोशाक में जब वे पंक्तिबद्ध खड़े होते हैं उनकी कतारें मन को आकर्षित करती हैं। नमाज के बाद वे घर आकर त्यौहार मनाते हैं। बाजारों से होते हुए झांकियां निकाली जाती हैं। बैण्ड बाजों की ध्वनि के साथ प्रत्येक प्रसन्न दिखाई देता है। इस दिन वे एक-दूसरे से ईद मिलते हैं तथा उपहार भी बांटते हैं। बच्चे चमकीले वस्त्र धारण करते हैं। सभी एक-दूसरे से गले मिलकर भाई-चारे की भावना प्रकट करते हैं। 

ईद का वर्णन : घर-घर में पकवान बनाए जाते हैं। दूर-दूर से लोग ईद मनाने के लिए अपने-अपने घरों पर आते हैं और एक-दूसरे के गले मिलते हैं। ईद पर मेले का भी आयोजन किया जाता है, अनेक प्रकार की दुकानें सजाई जाती हैं। बच्चे तरह-तरह के खिलौने और खाद्य वस्तुएं खरीदते हैं। गृहस्थ लोग अपनी आवश्यकता की वस्तुएं खरीदते हैं। रात को मुशायरा और कव्वाली आदि का आयोजन किया जाता है। ईद के त्यौहार को पूर्ण भाईचारे के साथ मनाये जाने के लिए हमारी सरकार पूर्ण प्रबंध करती है। पुलिस का भी प्रबंध किया जाता है। बाजारों को सजाया जाता है। 

इस प्रकार ईद का त्यौहार भारत का एक महत्वपूर्ण त्यौहार है। पूरे महीने के कठोर व्रत के बाद चन्द्र दर्शन का विशेष महत्व होता है। इस प्रकार ईद का त्यौहार असीम प्रसन्नताओं के साथ संपन्न होता है। हमारे देश के प्रमुख त्यौहार देश की अखंडता को बनाए रखने में सहायता करते हैं। कोई सम्प्रदाय एक-दूसरे के प्रति ईर्ष्या भाव प्रकट न करके एक-दूसरे के त्यौहार में सहयोग करते हैं। 

उपसंहार : भारत की अखंडता के लिए ईद जैसे त्यौहार का अपना महत्व है। हिन्दू, मुसलमान, सिख और ईसाई सभी आपस में एक-दूसरे के गले मिलकर मन की बुराइयां दो दूर कर लेते हैं और फिर से प्रेम की धारा बहने लगती है। होली, दीपावली, दशहरा, ईद और क्रिसमस जैसे त्यौहारों का मनाया जाना ही भारत की एक महिमा है। ईश्वर करे की ईद हमारे जीवन में बार-बार आये। 

Saturday, 20 January 2018

अजंता एवं ऐलोरा की गुफाएँ। Ajanta Ellora Caves in Hindi

अजंता एवं ऐलोरा की गुफाएँ। Ajanta Ellora Caves in Hindi

अजंता एवं ऐलोरा की गुफाएँ। Ajanta Ellora Caves in Hindi

Ajanta Ellora Caves in Hindi

अजंता एवं ऐलोरा की गुफाएँ केवल भारत में ही नहीं अपितु संपूर्ण संसार में प्रसिद्ध हैं। यह एक पर्यटन स्थल है जहाँ हजारों पर्यटक प्रतिदिन आते हैं । ये गुफाएँ महाराष्ट्र में औरंगाबाद जिले में हैं। यहाँ पर पहुँचने के लिए मुंबई से फ्लाइट है जो एक घण्टा लेती है। इसके अतिरिक्त बस एवं रेलगाड़ी की सुविधा भी है।

औरंगाबाद में प्रसिद्ध मुगल सम्राट औरंगजेब का अंतिम गढ़ भी है इसकी संगमरमर की वास्तुशिल्प कला लोगों को आज भी अपनी ओर आकर्षित करती है। वहाँ पर बाबा शाह मुजफ्फर की दरगाह भी है। जब कोई पर्यटक अजंता-ऐलोरा की की गुफाएँ देखने जाता है तो वह बाबा की दरगाह देखना नहीं भूलता। वे औरंगजेब के धार्मिक गुरू थे। उस दरगाह के अंदर एक मस्जिद, एक मदरसा एक कचहरी एक जनानखाना और एक सराय भी है। इसके अलावा वहाँ पर बीबी का मकबरा भी है जिसकी तुलना ताजमहल से की जाती है।
bibi ka maqbara
ऐलोरा की गुफाएँ केवल भारत की ही नहीं अपितु पूरे विश्व की धरोहर हैं। ये गुफाएँ बौद्ध, हिन्दू और जैन धर्म के मंदिरों के लिए मशहूर हैं। ऐलोरा स्मारक हर मंगलवार को बन्द रहता है। यहाँ 12 बुद्ध की गुफाएँ हैं जो सातवीं एवं आठवीं शताब्दी में बनी थीं। 17 हिन्दू गुफाएँ हैं जो छठवीं तथा नौवीं सदी में बनी थीं और 5 जैन गुफाएँ हैं जो नौवीं सदी में बनी थीं। यहाँ सोलहवीं गुफा अत्यंत लोकप्रिय है। इसमें भगवान शिव की प्रतिमा है जो एक ही चट्टान को काटकर बनाई गई है। यह विश्व की सबसे बड़ी एक ही पत्थर को काटकर बनाई गई प्रतिमा है। कहा जाता है कि इसे बनाने में 150 वर्ष और 7 हजार मजदूर लगे थे जिन्होंने रात-दिन कार्य किया था। यहाँ एक 32 नंबर की गुफा है जिसमें महावीर स्वामी विराजमान हैं। ऐलोरा की गुफाओं के स्तंभों पर बने सुन्दर कमल शिल्पकला के सर्वोत्कृष्ट उदाहरण हैं।
अजंता की गुफाएँ ऐलोरा की गुफाओं से 100 कि.मी. की दूरी पर हैं। ये गुफाएँ प्रत्येक सोमवार को बन्द रहती हैं। यह गुफाएँ अपनी मूर्तिकला और चित्रकलाओं के लिए प्रसिद्ध हैं। अजंता की गुफाओं के मंदिर चट्टानों को काटकर अर्द्धचंद्राकर आकृति में बनाए गए हैं। यहाँ गहनों से सजी-धजी मूर्तियाँ हैं जो विश्व में मूर्तिकला का उत्कृष्ट नमूना हैं। यहाँ पर्यटक 29 गुफाओं का अवलोकन कर सकते हैं जिनका निर्माण प्रथम सदी से पाँचवीं शताब्दी के मध्य हुआ था।
ajanta caves in hindi
ये सभी गुफाएँ चट्टानों को काटकर बनाई गई हैं। सन् 1983 में अजन्ता की गुफाओं को युनेस्को वर्ल्ड हैरीटेज साइट घोषित कर दिया गया था। अजंता की गुफाएँ जलगाँव से 60 कि.मी. और भुसावल से 70 कि.मी. दूरी पर हैं। 9¸10¸¸12¸13 और 15 नंबर गुफाओं की 1956 ई. में पुनः खोज हुई थी। अजंता की गुफाओं के प्रथम चरण को हीनयान और द्वितीय चरण को महायान कहा जाता है। इन गुफाओं में मूर्तिकला एवं चित्रकला द्वारा गौतम बुद्ध के जीवन उनकी शिक्षा वं उपदेशों को दर्शाया गया है। इन गुफाओं में फर्श को छोड़कर हर ओर उत्कृष्ट चित्रकलाएँ हैं।

ये गुफाएँ विश्व के उत्कृष्ट उदाहरण हैं जिन्हें प्रतिदिन हजारों पर्यटक देखने आते हैं। 

Friday, 19 January 2018

गणतंत्र दिवस पर छोटा निबंध। Short Essay on Republic Day in Hindi

गणतंत्र दिवस पर छोटा निबंध। Short Essay on Republic Day in Hindi

गणतंत्र दिवस पर छोटा निबंध। Short Essay on Republic Day in Hindi

Short Essay on Republic Day in Hindi

कुटिल अंग्रेजों की दासता के कड़वे घूँट पीने और अपमानित होते रहने के बाद आजादी के दीवानों के बलिदान, लोकमान्य तिलक सावरकर सुभाष चंद्र बोस लाला लाजपत राय चंद्रशेखर आजाद जैसे आजादी के दीवानों की तपस्या तथा महामना मालवीय, गाँधी एवं पं0 नेहरू जैसे अहिंसक आंदोलनकारियों के संघर्ष के कारण अंग्रेज 15 अगस्त 1947 को भारत के शान की बागडोर भारतीय नेताओं के हाथ सौंपकर स्वदेश वापिस चले गए। पं0 जवाहरलाल नेहरू स्वतंत्र भारत के प्रथम प्रधान मंत्री बने एवं डा0 राजेन्द्रप्रसाद प्रथम राष्ट्रपति बनाए गए। लौह पुरूष सरदार वल्लभभाई पटेल के कुशल एवं दृढ़ नेतृत्व ने भारत की सात सौ रियासतों को तिरंगे झंडे के नीचे ला दिया। इसके पशचात् स्वतंत्र भारत का संविधान 26 जनवरी 1950 को लागू हुआ था। इस संविधान में भारत को सर्वसत्ता संपन्न गणराज्य कहा गया है। अतः प्रतिवर्ष 26 जनवरी को समस्त भारत में गणतंत्र दिवस बड़ी धूम-झाम से मना जाता है।

इस दिन दिल्ली में समारोहों की छटा निराली होती है। विजय चौक से प्रारंभ हो कर लालकिले तक जाने वाली परेड इस पर्व का विशेष आकर्षण होता है। इस समारोह को देखने के लिए लोग सुबह से ही राजपथ के दोनो ओर इकट्ठे होना शुरू हो जाते हैं। सुबह आठ बजे के लगभग प्रधानमंत्री एवं सभी गणमान्य लोग यहाँ एकत्र होते हैं। राष्ट्रपति की सवारी सबसे अंत में यहाँ पहुचती है प्रधानमंत्री एवं अन्य गणमान्य लोग राष्टपति की अगवानी करते हैं और राष्टपति को सलामी मंच तक पहुँचाकर अपना-अपना स्थान ग्रहण करते हैं। इसके पश्चात् तोपों की सलामी के बाद परेड प्रारंभ होती है। सर्वप्रथम सेना के तीनों अंगो की टुकड़ियाँ राष्ट्रपति को सलामी देती हुई आगे निकल जाती है। पुलिस तथा पैरा मिलिट्री बलों के जवान भी मार्च पास्ट करते हुए मंच के सामने से गुजरते हैं। एन0 सी0 सी0 के युवक बच्चों की कदम-ताल भी देखने योग्य होती है। राजधानी एवं दूसरे प्रदेशों से आए बच्चों की टोलियाँ अपनेःअपने करतब दिखाती हुई मंच के सामने से गुजरती हैं जो कि सभी को बहुत आकर्षित करती है। सभी प्रदेशों एवं केंद्र शासित राज्यों की झाँकियँ बहुत ही मनोरम दृश्य प्रस्तुत करती हैं.

हमारा कर्तव्य है कि भारतीय गणतंत्र की वर्षगाँठ के साथ हम प्रण करे कि भारत की स्वतंत्रता तथा संविधान की मर्यादा बनाए रखने के लिए हम हर संभव प्रयास करेंगे। जय हिंद। 

Thursday, 18 January 2018

छत्रपति शिवाजी महाराज भाषण। Chatrapati Shivaji Maharaj Speech

छत्रपति शिवाजी महाराज भाषण। Chatrapati Shivaji Maharaj Speech

छत्रपति शिवाजी महाराज भाषण। Chatrapati Shivaji Maharaj Speech 

Chatrapati Shivaji Maharaj Speech

छत्रपति शिवाजी एक प्रखर राष्ट्रभक्त थे। उन्होंने विदेशी आक्रांताओं के विरूद्ध हथियार उठाकर भारतमाता को उनसे मुक्त कराने का संकल्प लिया था। वे अपने चरित्र-बल¸ दृढ़¸ इच्छाशक्ति और प्रखर राष्ट्रभक्ति के कारण ही महानता के चरम उत्कर्ष तक पहुँच पाए थे।

हिन्दू साम्राज्य के संस्थापक छत्रपति शिवाजी का जन्म 16 अप्रैल 1627 को शिवनेरी दुर्ग में हुआ था। उनके पिता का नाम शाहजी भोंसले और माँ का नाम जीजाबाई था। शिवाजी के पिता शाहजी ने बचपन में ही पुत्र शिवाजी और पत्नी जीजाबाई को दादाजी कोंडदेव को लालन-पालन के लिए सैंप दिया था।

दादाजी कोंडदेव के सान्निध्य में शिवाजी का बचपन बीता। दादजी ने पुणे के पास रहने वाले मावलों पर आधिपत्य स्थापित किया था। शिवाजी मावले युवकों के साथ पर्वतों में¸ घने जंगलों में तथा भयावनी गुफाओं में घूमते थे तथा अस्त्र-शस्त्र चलाना सीखते थे। उन्होंने मावले युवकों को संगठित करके एक सेना बनाई और मुगलों के आधीन भारत को मुक्त करके स्वतंत्र  राज्य स्थापित करने का देखने लगे।

सन् 1646 में उन्होंने बीजापुर के दुर्गपति से तोरण के दुर्ग पर अधिकार कर लिया । फिर उन्होंने बीजापुर के चाकन¸ कोंडाना तथा पुन्दर दुर्गों पर भी सहज रूप से अधिकार कर लिया। तत्पश्चात् बीजापुर के सुल्तान ने शिवाजी को आगे बढ़ने से रोकने के लिए उनके पिता शाहजी भोंसले को बंदी बना लिया। फिर शिवाजी ने अपने पिता को मुक्त कराने के लिए बीजापुर के सुल्तान को बंगलौर और कोंडाना के दुर्ग वापस देकर संधि कर ली। इस संधि के बाद भी शिवाजी के राज्य का विस्तार निरंतर होता रहा और उन्होंने अपने पराक्रम तथा शौर्य के बल पर हिन्दू साम्राज्य की स्थापना का संकल्प पूरा किया।

सन् 1674 में शिवाजी का राज्याभिषेक किया गया तथा उन्हें छत्रपति की उपाधि से सम्मानित किया गया। शिवाजी न केवल प्रशासक थे अपितु वे कूटनीतिज्ञ एवं राजनीतिज्ञ भी थे। उन्होंने अपनी छापामार युद्धनीति के कारण ही मुगल साम्राज्य के छक्के छुड़ा दिए थे और बैरम खाँ को भागने पर विवश कर दिया था तथा अफजल खाँ को मौत के घाट उतार दिया था।

सर्वविदित है कि जब औरंगजेब ने शिवाजी को बड़ी चालाकी से अपने दरबार में आमंत्रित करके कैद कर लिया तो शिवाजी बड़ी होशियारी से टोकरी में बैठकर पुत्र सहित वहाँ से भाग निकले थे।

छत्रपति शिवाजी की धार्मिक नीति बड़ी उदार थी। जहाँ भी वह युद्ध करने गए वहाँ न तो किसी मस्जिद को उन्होंने क्षति पहुँचाई और ऩ ही कभी किसी नारी का अपमान किया। विशाल साम्राज्य के संस्थापक होने के बावजूद शिवाजी को रत्ती भर भी मोह नहीं था।

3 अप्रैल 1680 को यह महान देशभक्त स्वर्गवासी हो गया। उनकी वीरता¸उदारता¸राजनीति और कूटनीति से हम सदैव प्रेरणा लेते रहेंगे। 
चाचा नेहरू पर निबंध। Chacha Nehru par Nibandh

चाचा नेहरू पर निबंध। Chacha Nehru par Nibandh

चाचा नेहरू पर निबंध। Chacha Nehru par Nibandh

Chacha Nehru par Nibandh

जवाहरलाल नेहरू वह महान विभूति हैं जिन्हें संपूर्ण विश्व जानता है। गाँधी जी की शहादत के 16 वर्ष बाद तक जीवित रहकर उन्होंने राष्ट्रीय और अंतर्राष्ट्रीय दोनों ही मंचों पर गाँधी जी की भाषा में बात की। पं. जवाहरलाला नेहरू का जन्म 14 नवंबर 1889 को इलाहाबाद में एक कश्मीरी ब्राह्मण परिवार में हुआ था। उनके पूर्वज कौल थे परंतु बाद में कौल छूट गया और यह परिवार केवल नेहरू नाम से जाना जाने लगा। उनके पिता पं. मोतीलाल नेहरू थे। जवाहरलाल¸मोतीलाल के तीसरे पुत्र थे। मोतीलाल नेहरू इलाहाबाद के विख्यात वकील थे। इलाहाबाद में आनंद भवन मोतीलाल नेहरू ने ही खरीदा था जब जवाहरलाल नेहरू दस वर्ष के थे।

पं. जाहरलाल नेहरू की शिक्षा घर पर ही हुई बाद में उन्हें वकालत करने इंग्लैण्ड भेजा गया। सन् 1912 में वे वकालत करने भारत लौट आए। फिर उन्होंने इलाहाबाद उच्च न्यायालय में वकालत शुरू की। बाद में वे राजनीतिक गतिविधियों की ओर आकर्षित हुए और 1916 में उन्होंने कांग्रेस के लखनऊ अधिवेशन में भाग लिया जहाँ पहली बार उनकी मुलाकात महात्मा गाँधी से हुई। पं. नेहरू उनसे अत्यंत प्रभावित हुए।

पं. जवाहरलाल नेहरू का विवाह कमला कौल से हुआ था। 1917 में उन्होंने इंदिरा गाँधी को जन्म दिया। तभी 13 अप्रैल को अमृतसर में जलियाँवाला बाग कांड हुआ जिसमें जनरल डायर ने निहत्थे लोगों पर गोलियाँ चलाने का आदेश देकर सैकड़ों लोगों को मरवा दिया था। इस हत्याकांड की जांच के लिए एक समिति बनाई गई जिसमें जवाहरलाल नेहरू भी शामिल थे। हालांकि डाय्रर को इस कांड के लिए जिम्मेदार पाया गया किन्तु हाउस ऑफ लार्डस ने उसे दोष-मुक्त कर दिया।

सन् 1921 के असहयोग आंदोलन में जवाहरलाल नेहरू को गिरफ्तार कर लिया गया। इसके बाद से उनकी गिरफ्तारी का सिलसिला शुरू हो गया तो वे देश आजाद होने तक नौ बार जेल गए और नौ वर्ष से अधिक समय उन्होंने जेल में बिताया। जेल में ही उन्होंने अपनी आत्मकथा-‘डिस्कवरी ऑफ इंडिया’ भारत एक खोज लिखी जो बहुत चर्चित हुई। जेल में ही उन्होंने ‘ग्लिम्प्सेज ऑफ वर्ल्ड हिस्ट्री’ की रचा की।

सन् 1927 में उन्होंने साईमन कमीशन के खिलाफ प्रदर्शनों में हिस्सा लिया और पुलिस की लाठियों के प्रहार सहन किए। 1929 में लाहौर अधिवेशन में पं. जवाहरलाल नेहरू को प्रथम बार कांग्रेस का अध्यक्ष चुना गया। इस अधिवेशन के दौरान ही उन्होंने ‘पूर्ण स्वराज’ का प्रस्ताव पेश किया। फिर जब गाँधी जी ने नमक कानून तोड़ने के लिए सविनय अवज्ञा आंदोलन शुरू किया तो उन्हें गाँधीजी और मोतीलाल नेहरू के साथ जेल जाना पड़ा। इसी आंदोलन के चलते 6 फरवरी 1931 को मोतीलाल नेहरू की मत्यु होगई। परंतु पं. नेहरू ने देश की स्वतंत्रता प्राप्त के लिए अपने कदम पीछे नहीं हटाए। इन्हीं कष्टों से जूझते हुए 28 फरवरी 1936 को नेहरू जी की पत्नी का भी देहांत हो गया।

फिर 1936 में पं. नेहरू को दूसरी बार कांग्रे का अध्यक्ष चुना गया। सारी विफलताओं के बाद भारत छोड़ो आंदोलन शुरू हुआ और 15 अगस्त 1947 को भारत स्वतंत्र हो गया। पं. जवाहरलाल नेहरू स्वतंत्र भारत के प्रथम प्रधानमंत्री बने र भारत माता की सेवा करते हुए 27 मई 1964 को उनका स्वर्गवास हो गया। उनका नाम इतिहास में स्वर्णाक्षरों में सदैव अंकित रहेगा।   

Wednesday, 17 January 2018

Shikshak Diwas Essay in Hindi - शिक्षक दिवस पर निबंध

Shikshak Diwas Essay in Hindi - शिक्षक दिवस पर निबंध

Shikshak Diwas Essay in Hindi - शिक्षक दिवस पर निबंध

Shikshak Diwas Essay in Hindi

शिक्षक दिवस (टीचर्स डे) भारत में हर वर्ष 5 सितंबर को डॉ. सर्वपल्ली राधाकृष्णन के जन्म-दिवस के अवसर पर मनाया जाता है। परंतु यह दिवस केवल भारत में ही नहीं मनाया जाता है अपितु शिक्षक के प्रति आदर-भाव को प्रकट करने के लिए दुनिया के लगभग सभी देशों में अलग-अलग तिथि को मनाया जाता है। अमेरिका में मई के पहले मंगलवार को ‘नेशनल टीचर्स डे’ मनाया जाता है। इसलिए वहाँ शिक्षक दिवस के लिए कोई निश्चित तारीख नहीं है। इसी प्रकार चीन में शिक्षक दिवस एक दिंसंबर को मनाया जाता है। वेनेजुएला में 15 जनवरी को¸ कोरिया में 15 मई को और ताइवान में 28 सितंबर को शिक्षक दिवस मनाया जाता है।

हम जानते हैं कि 5 सितंबर को शिक्षक दिवस सर्वपल्ली राधाकृष्णन की शिक्षा मर्मज्ञता एवं शिक्षा-प्रेम के कारण मनाया जाता है। इस दिन विद्यालय का कार्यभार बच्चों के सुपुर्द कर दिया जाता है और बच्चे शिक्षक बनकर एक शिक्षक का कार्य निर्वाह करते हैं।

सादा जीवन बिताने वाले डॉ. राधाकृष्णन का जन्म 5 सितंबर 1888 को मद्रास के तिरूतणी नामक गाँव में हुआ था उन्होंने छात्र जीवन में आर्थिक संकटों का सामना करते हुए कभी हिम्मत नहीं हारी थी। डॉ. राधाकृष्णन भाग्य् से अधिक कर्म में विश्वास करते थे। वह दर्शनशास्त्र के अध्यापक थे। उन्होंन ऑक्सफोर्ड विश्वविद्यालय में अध्यापन कार्य किया था। सन 1952 में वे देश के उपराष्ट्रपति चुने गए और दस वर्ष तक उपराष्ट्रपति क पद पर रहे। फिर 12 मई 1962 में वे भारत के राष्ट्रपति चुने गए।

इसी दौरान चीन के आक्रमण के समय उन्होंने अद्भुत धैर्य और साहस का परिचय देते हुए कटकालीन परिस्थिति की घोषणा की शिक्षक¸ दार्शनिक¸ नेता और एक विचारक के रूप में समान रूप से सफल होने वाले डॉ. राधाकृष्णन मूलतः शिक्षक थे। अपने जीवन के 40 वर्ष उन्होंने अध्यापन कार्य में व्यतीत किए।

सादा जीवन जीने वाले डॉ. राधाकृष्णन को बच्चे विशेष प्रिय थे। बच्चे चाहे शोर करें या चीजें तोड़े-फोड़ें वे उन्हें कुछ नहीं कहते थे परंतु उनकी पुस्तकें कोई छेड़े या फाड़े यह उन्हें सख्त नापसंद था।

स्वाधीन भारत के सामने जब उच्च शिक्षा की नवीन व्यवस्था की स्थापना का प्रश्न उठा तब तत्कालीन शिक्षा मंत्री मौलाना आजाद ने शिक्षा आयोग की नियुक्ति की योजना बनाई। उस समय शिक्षा आयोग का अध्यक्ष डॉ. राधाकृष्णन को ही बनाया गया। इस पद हेतु सबसे उपयुक्त वही व्यक्ति थे।

भारत के अलावा पश्चिमी देशों तक में भारतीय ज्ञान का प्रभूत्व स्थापित करने वाले डॉ. राधाकृष्णन का नाम उद्भट शिक्षाशास्त्री के रूप में सदैव अमर रहेगा। 
बाल दिवस पर निबंध। Bal Diwas par nibandh

बाल दिवस पर निबंध। Bal Diwas par nibandh

बाल दिवस पर निबंध। Bal Diwas par nibandh 

Bal Diwas par nibandh

यह सर्वविदित है कि बाल दिवस प्रत्येक वर्ष 14 नवंबर को मनाया जाता है। यह दिवस स्वतंत्र भारत के प्रथम प्रधानमंत्री के जन्म दिवस के दिन मनाया जाता है। पं. जवाहरलाल नेहरू को बच्चे चाचा नेहरू कहकर पुकराते थे क्योंकि वह बच्चों से बहुत प्यार करते थे।

पं. जवाहरलाल नेहरू का जन्म 14 नवंबर 1889 को इलाहाबाद में एक कश्मीरी ब्राह्मण परिवार में हुआ था। जवाहरलाल नेहरू¸ मोतीलाल नेहरू के पुत्र थे। वह इलाहाबाद के जाने-माने वकील थे। इसलिए उन्होंने अपने पुत्र जाहरलाल नेहरू को उच्च शिक्षा के लिए इंग्लैण्ड भेजा। वहाँ उन्होंने वकालत की और सन् 1912 ई0 में वे भारत लौट आए।

भारत आकर वे गाँधीजी से मिले और उनसे अत्यंत प्रभावित हुए। बाद में वे तिलक और श्रीमती ऐनी बेसेन्ट के नेतृत्व वाली दो होमरूल लीग के सदस्य भी बने। फिर उनका कमला कौल के साथ विवाह हुआ जो बाद में कमला नेहरू कहलाईं। उनसे 1917 में इंदिरा गाँधी का जन्म हुआ।

सन् 1919 में कांग्रेस के अमृतसर अधिवेशन में गाँधी जी प्रमुख नेता और जवाहरलाल नेहरू उनके प्रमुख सहभागी के रूप में उभरे। फिर गाँधीजी ने सन् 1921 में असहयोग आंदोलन आरंभ किया और पं. जवाहरलाल नेहरू को गिरफ्तार कर लिया गया। इस प्रकार भारत की स्वतंत्रता के लिए पं. नेहरू नौ बार जेल गए और नौ वर्ष से अधिक जेल में बिताए। जेल में ही उन्होंने अपनी आत्मकथा ‘डिस्कवरी ऑफ इंडिया’ (भारत एक खोज) और ‘ग्लिम्प्सेज वर्ल्ड ऑफ हिस्ट्री’ की रचना की।

सन् 1929 में कांग्रेस के लाहौर अधिवेशन में पं. जवाहर लाल नेहरू इसके अध्यक्ष चुने गए। अधिवेशन के दौरान 31 दिसंबर 1929 की मध्यरात्रि के समय पं. जवाहरलाल नेहरू ने पूर्ण स्वराज की मांग का प्रस्ताव पेश किया।

इस प्रकार पं. नेहरू भारत की आजादी के लिए कर्मठता से जूझते रहे। उनके साथ उनकी धर्मपत्नी कमला नेहरू भी थीं जिनका 28 फरवरी 1936 को स्विट्जरलैण्ड में देहान्त होगया। उस समय वे केवल 37 वर्ष की थीं। तत्पश्चात इलाहाबाद में उनकी माँ का भी स्व्रर्गवास हो गया। इंदिरा गाँधी उस समय ऑक्सफोर्ड में पढ़ रही थीं। अब वे अकेले थे और फिर वे अनवरत देश की सेवा में लग गए। सन् 1936 में पं. जवाहरलाल नेहरू को दूसरी बार कांग्रेस का अध्यक्ष चुना गया। फिर गाँधीजी ने सत्याग्रह शुरू कर दिया और बाद में ‘भारत छोड़ो आंदोलन’ शुरू हुआ। इसके बाद देश आजाद हो गया लेकिन इसका विभाजन दो स्वतंत्र राष्ट्रों में कर दिया गया-भारत और पाकिस्तान। पं. जवाहरलाल नेहरू स्वतंत्र भारत के प्रथम प्रधानमंत्री बने विदेश मंत्रालय भी उन्हीं के पास था।

प्रधानमंत्री के रूप में उनका प्रथम कार्य विस्थापित लोगों का पुर्नवास करना था। तब पाकिस्तान में हिंदू-मुस्लिम दंगे भड़क उठे थे। फिर गाँधीजी लोगों को शांत करने के लिए बंगाल गए। पं. जवाहरलाल नेहरू की एक विशेषता यह थी कि वह किसी भी कार्य को दृढ़ता से करते थे। इसी दृढ़ता के बल पर उन्होंने स्वतंत्रता हासिल करने के पश्चात देशी राज्यों को संगठित किया और औद्योगिक क्षेत्रों को प्रगतिशील बनाया।

इस प्रकार अपनी भारत माता की सेवा और देश के बच्चों को अथाह प्यार करते-करते 27 मई 1964 को उन्हें दिल का दौरा पड़ा जिसमें वे बच नहीं पाए। उनकी मृत्यु के बाद हम सभी भारतवासी उनका जन्म-दिन हर वर्ष 14 नवंबर को बाल दिवस के रूप में मनाते हैं। 

Tuesday, 16 January 2018

नैनीताल का इतिहास। History of Nainital in Hindi

नैनीताल का इतिहास। History of Nainital in Hindi

नैनीताल का इतिहास। History of Nainital in Hindi

History of Nainital in Hindi

नैनीताल एक रमणीय पर्यटन स्थल है। स्कंद पुराण के मानस खण्ड में नैनीताल एक ताल है जिसे त्रि-ऋषि सरोवर कहा जाता था। यहाँ तीन ऋषियों की एक प्रसिद्ध कथा है। ये ऋषि थे-अत्रि, पुलस्त्य और पुलह। जब उन्हें नैनीताल में कहीं जल नहीं मिला तो उन्होंने एक गडढा खोदा और उसे तिब्बत की मानसरोवर झील के जल से भरा। जनश्रुति के अनुसार जो भी मनुय नैनीताल की इस झील में डुबकी लगाता है उसे मानसरोवर के बराबर पुण्य लाभ मिलता है।

ऐसा माना जाता है कि नैनीताल 64 शक्तिफीठों में से एक है। यह वह स्थान है जहाँ सती की आँख गिरी थी जब भगवान शिव उनको जली हुई अवस्था में ले जा रहे थे। इसलिए इस स्थान का नाम नैन-ताल पड़ गया। बाद में इसे नैनीताल कहा जाने लगा। आज नैना देवी के मंदिर में देवी शक्ति की पूजा होती है।

सन् 1814 से 1816 के मध्य ऐंग्लो-नेपाली युद्ध के पश्चात् कुमाऊँ का पहाड़ी क्षेत्र अंग्रेजों के शासनाधीन हो गया था तब उन्होंने 1841 में नैनीताल में हिल स्टेशन बनवाया। यहाँ पर अक्सर भू-स्खलन होते रहते हैं। सन् 1879 में आमला हिल में एक भयंकर भूस्खलन हुआ था जिसमें सैकड़ों लोग मरे थे।

नैनीताल उत्तराखंड में है। यहाँ हम भीम ताल देख सकते हैं जो नैनीताल से 2 कि.मी. की दूरी पर है। यहाँ हम प्रकृति का अनुपम सौंदर्य देख सकत हैं। यहाँ से 23 कि.मी. की दूरी पर सात ताल है 12 कि.मी. की दूरी पर खुरपा ताल है और नकुचिया ताल भी है। यहाँ बहुत ही सुंदर-सुंदर चिड़ियाँ देखने को मिल जाती हैं।

नैनीताल से 120 कि.मी. की दूरी पर कौसानी गाँव है। इसे भारत का स्विट्जरलैंड भी कहा जाता है। यहाँ देवदार वृक्षों के घने जंगल हैं। इसके अलावा मध्यम श्रेणी की पहाड़ियाँ भी देखने को मिलती हैं। इन पहाड़ियों की सुंदरता दर्शकों का मन मोह लेती है। यहाँ से सूर्योदय और सूर्यास्त भी देखा जा सकता है। यह दृश्य भी अत्यंत सुंदर तथा मनमोहक होता है।

नैनीताल से 100 कि.मी. की दूरी पर जागेश्वर है यह 12 वाँ ज्योर्तिलिंग है। यहाँ भी प्राकृतिक सौन्दर्य हमारा मन मोह लेता है। इस प्रकार ऩैनीताल और उसेक आसपास का क्षेत्र अति मनोरम एवं सुन्दर है। नैनीताल का भ्रमण करने सैकड़ों पर्यटक प्रतिदिन आते हैं और वहाँ की पहाड़ियों तथा घने जंगलों को अपने कैमरे में कैद करके ले जाते हैं ताकि वे वहाँ की सुंदरता का बार-बार अवलोकन कर सके।

Monday, 15 January 2018

नेताजी सुभाष चंद्र बोस एस्से इन हिंदी। Subhash Chandra Bose Essay in Hindi

नेताजी सुभाष चंद्र बोस एस्से इन हिंदी। Subhash Chandra Bose Essay in Hindi

नेताजी सुभाष चंद्र बोस एस्से इन हिंदी

subhash chandra bose essay in hindi

सुभाषचन्द्र बोस का जन्म 23 जनवरी 1897 ई0 में कटक,उड़ीसा में हुआ था। उनके पिता रायबहादुर जानकीदास बोस नगरपालिका और जिला बोर्ड के प्रधान होने के साथ-साथ एक योग्य वकील भी थे। उनकी माता प्रभावती बोस धार्मिक विचारों वाली महिला थीं।

सुभाषचन्द्र बोस बचपन से ही बड़े मेधावी और स्वाभिमानी थे। एन्ट्रेंस की परीक्षा में प्रथम श्रेणी में उत्तीर्म करने के पश्चात् वह कलकत्ता के प्रेसीडेंसी कॉलेज में पढ़ने लगे। इस कॉलेज में भारतीय विद्यार्थियों को अंग्रेज अध्यापक और अंग्रेज विद्यार्थी तिरस्कार की दृष्टि से देखते थे। यह बात सुभाषचन्द्र बोस सहन नहीं कर सके। जब उन्होंने इसका विरोध किया तो उन्हें कॉलेज से निकाल दिया गया। बाद में उन्हें कोलकाता विश्वविद्यालय में प्रवेश मिला। वहां से उन्होंने प्रथम श्रेणी में बी.ए. की परीक्षा उत्तीर्ण की।

उन दिनों जब देश में क्रांति की आग सुलग रही थी और गाँधी जी अंग्रेजो की दमन नीति का विरोध कर रहे थे तब सुभाषचन्द्र के मन में देश-प्रेम हिलोरें ले रहा था। उनके पिता चाहते थे कि उनका पुत्र आई.सी.एस. होकर सरकारी नौकरी में उच्च पद प्राप्त करे। अपने पिता कीइच्छा का सम्मान करते हुए नेताजी इंग्लैण्ड गए और उन्होंने आई.सी.एस. की परीक्षा उत्तीर्ण कर ली। इसके बाद उन्होंने अंग्रेंजों की नौकरी करना स्वीकार नहीं किया और भारत वापस लौट आए।

सुभाषचन्द्र बोस ने चितरंजनदास को अपना राजनैतिक गुरू बनाया। सुभाष में अदभुत संगठन-शक्ति थी। उनकी इस संगठन-शक्ति को देखकर अंग्रेज सरकार हिल गई। प्रिंस ऑफ वेल्स के भारत आने का विरोध करने के कारण उन्हें गिरफ्तार करके छः महीने के लिए जेल में जाल दिया गया। 1938 में वे कांग्रेस के अध्यक्ष चुने गए। कुछ समय बाद वे कांग्रेस से अलग हो गए और फॉरवर्ड ब्लॉक नामक दल का गठन कर लिया।

द्वितीय विश्व युद्ध आरंभ हो चुका था। सुभाषचन्द्र बोस जेल में बंद होकर नहीं रहना चाहते थे। इसलिए वह अंग्रेजों की आँखों में धूल झोंककर जेल से निकल भागे। वहाँ से जर्मनी गए और हिटलर से मिले। फिर वे एक पनडुब्बी में बैठकर सिंगापुर पहूँचे। वहाँ उन्होंने आजाद हिन्द फौज बनाई और उसका नेतृत्व किया।। यहीं से वह नेताजी के नाम से प्रसिद्ध हुए। उनका नारा था- ‘तुम मुझे खून दो मैं तुम्हें आजादी दूँगा।’ आजाद हिन्द फौज ने ब्रिटिश सेना को कड़ी टक्कर दी। सन् 1945 में युद्ध का पासा पलटने लगा और आजाद हिन्द फौ जगह पीछे हटना पड़ा। ऐसा माना जाता है कि 18 अगस्त 1945 को एक हवाई दुर्घटना में नेताजी की मृत्यु हो गई लेकिन अधिकांश लोग इस बात को सच नहीं मानते।

नेताजी का स्वप्न 15 अगस्त 1947 को साकार हुआ जब भारत को अंग्रेजों से आजादी मिली। सभी भारतीयों को नेताजी सुभाषचन्द्र बोस पर गर्व है। 
सरदार वल्लभ भाई पटेल पर भाषण। Speech on Sardar Vallabhbhai Patel in Hindi

सरदार वल्लभ भाई पटेल पर भाषण। Speech on Sardar Vallabhbhai Patel in Hindi

सरदार वल्लभ भाई पटेल पर भाषण

Speech on Sardar Vallabhbhai Patel in Hindi

सरदार वल्लभभाई पटेल का व्यक्तित्व बड़ा ही प्रभावशाली था - सुदृढ़ विशाल शरीर, कठोर मुख-मद्रा और शत्रु के प्रति ललकार भरी आँखें। वल्लभभाई उचित अवसर का सदुपयोग करना भली- भाँति जानते थे। वल्लभभाई ऊपर से जितने रूखे, निष्ठुर और कठोर प्रतीत होते थे अंदर से वे उतने ही सरल, कोमल तथा निराभिमानी थे। उनमें वे सभी गुण थे जो महान् राष्ट्र के नेता में होने आवश्यक हैं।
वल्लभभाई पटेल का जन्म 31 अक्टूबर 1875 को गुजरात के नाडियाड नामक जिले में हुआ था। उनके पिता श्री झवेरी भाई पटेल एक किसान थे। उनके पिता ने 1857 के प्रथम स्वाधीनता संग्राम में बुंदेलों के साथ मिलकर अंग्रेजों के विरूद्ध लड़ाई लड़ी थी। वल्लभभाई के जीवन पर अपने माता-पिता की वीरता एवं देश-प्रेम की अमिट छाप पड़ी थी।

वल्लभभाई के घर की आर्थिक स्थिति अच्छी नहीं थी। इसलिए वह दसवीं के बाद उच्च शिक्षा के लिए कॉलेज में प्रवेश न पा सके। वह ‘मुख्तारी’ की परीक्षा उत्तीर्ण करके सन् 1900 में गोधरा में फौजदारी के मुकदमों की वकालत करने लगे। उन्हें इस कार्य मे काफी सफलता और प्रसिद्धि मिली।

जब एक बार गोधरा में प्लेग फैला तो उसमें उनकी पत्नी की मृत्यु हो गई तब उनकी उम्र मात्र 33 वर्ष थी। फिर आजीवन उन्होंने दूसरा विवाह नहीं किया। फिर 1910 ई0 में वल्लभभाई बैरिस्टरी करने विलायत गए। तीन वर्ष बाद बैरिस्टरी की परीक्षा उत्तीर्ण करके वह भारत आ गए और मुंबई में प्रैक्टिस आरंभ कर दी। फिर वह महात्मा गाँधी के सम्पर्क में आए और देश-सेवा के रंग में पूरी तरह से रंग गए।

सन् 1916-17 के खेड़ा सत्याग्रह की सफलता ने उन्हें एक सच्चे नेता के रूप में उभारकर जनता के सामने प्रस्तुत कर दिया। गाँधीजी भी उनकी संगठन-शक्ति और कार्य-कुशलता का सिक्का मान गए। वल्लभभाई को सर्वाधिक प्रसिद्धि बारडोली सत्याग्रह से मिली। इसके पश्चात् वे केवल गुजरात के ही नहीं बल्कि पूरे देश के सरदार बन गए। इसी सत्याग्रह मे उन्होंने किसानों को संघर्ष करने की प्रेरणा दी थी।

15 अगस्त 1947 को भारत को स्वतंत्रता मिलने पर उन्हें गृह-विभाग और उप-प्रधानमंत्री बनाया गया। उन्हें गृह विभाग और रियासती विभाग सौंपे गए। उन्होंने अपनी कुशलता से थोड़े ही दिनों में भारत की लगभग 600 रियासतों का एकीकरण कर दिया और 219 छोटी रियासतों को विभन्न प्रदेशों में मिला दिया। हैदराबाद के निजाम ने जब इसमें आनाकानी की तो उन्होंने कठोर कदम उठाकर उसे भारत में मिलाने के लिए विवश कर दिया।

भारत का यह अमर सेनानी 15 सितंबर 1950 को ये दुनिया छोड़कर चला गया। भारत के इतिहास में उनका नाम सदा स्वर्ण अक्षरों में लिखा रहेगा। वे सचमुच लौह पूरूष थे और सरदार कहलाने के योग्य थे। 

Sunday, 14 January 2018

बसंत पंचमी पर निबंध। Basant Panchmi Essay in Hindi

बसंत पंचमी पर निबंध। Basant Panchmi Essay in Hindi

बसंत पंचमी पर निबंध। Basant Panchmi Essay in Hindi

Basant Panchmi Essay in Hindi

हमारे देश में बसंत पंचमी का त्योहार बड़ी धूमधाम से मनाया जाता है। बसंत पंचमी के दिन ज्ञान की अधिष्ठात्री देवी सरस्वती देवी का जन्म हुआ था इसलिए इस दिन देवी सरस्वती की पूजा-अर्चना की जाती है। पुरातन युग में इस दिन राजा सामंतो के साथ हाथी पर बैठकर नगर का भ्रमण करते हुए देवालय पहुँचते थे। वहाँ विधिपूर्वक कामदेव की पूजा की जाती थी और देवताओं पर अन्न की बालियाँ चढ़ाई जाती थीं।

बसंत पंचमी पर हमारी फसलें-गेहूँ¸चना¸जौ आदि तैयार हो जाती हैं इसलिए इसकी खुशी में हम बसंत पंचमी का त्योहार मनाते हैं। संध्या के समय बसंत का मेला लगता है जिसमें लोग परस्पर एक-दूसरे के गले से लगकर आपस में स्नेह¸मेल-जोल तथा आनंद का प्रदर्शन करते हैं। कहीं-कहीं पर बसंती रंग की पतंगें उड़ाने का कार्यक्रम बड़ा ही रोचक होता है। इस पर्व पर लोग बसंती कपड़े पहनते हैं और बसंती रंग का भोजन करते हैं तथा मिठाइयाँ बाँटते हं।

ऋतुराज बसंत का बड़ा महत्व है। इसकी छटा निहारकर जड़-चेतन सभी में नव-जीवन का संचार होता है सभी में अपूर्व उत्साह और आनंद की तरंगे दौड़ने लगती है। स्वास्थ्य की दृष्टि से यह ऋतु बड़ी ही उपयुक्त है। इस ऋतु में प्रातःकाल भ्रमण करने से मन में प्रसन्नता और देह में स्फूर्ति आती है। स्वस्था और स्फूर्तिदायक मन में अच्छे विचार आते हैं। यही कारण है कि इस ऋतु पर सभी कवियों ने अपनी लेखनी चलाई है।

हमारे देश में छः ऋतुएँ होती हैं जो अपने क्रम से आकर अपना पृथक-पृथक रंग दिखाती हं। परंतु बसंत ऋतु का अपना अलग वं विशिष्ट महत्व है। इसीलिए बसंत ऋतुओं का राजा कहलाता है। इसमें प्रकृति का सौन्दर्य सभी ऋतुओं से बढ़कर होता है। वन-उपवन भांति-भांति के पुष्पों से जगमगा उठते हैं। गुलमोहर¸ चंपा¸ सूरजमुखी और गुलाब के पुष्पों के सौन्दर्य से आकर्षित रंग-बिरंगी तितलियों और मधुमक्खियों के मधुरस पान की होड़-सी लगी रहती है। इसकी सुंदरता देखकर मनुष्य भी खुशी से झूम उठता है। विद्यार्थियों के लिए भी यह त्योहार बहुत आनंददायक होता है।

इस पर्व पर विद्यालयों में सरस्वती पूजा होती है और शिक्षक विद्यार्थियों को विद्या का मह्त्व बताते हैं तथा पूरे उल्लास के साथ पढ़ने की प्रेरणा देते हैं। 
चन्द्रशेखर आजाद पर निबंध। Chandra Shekhar Azad Essay in Hindi

चन्द्रशेखर आजाद पर निबंध। Chandra Shekhar Azad Essay in Hindi

चन्द्रशेखर आजाद पर निबंध

Chandra Shekhar Azad Essay in Hindi

चन्द्रशेखर आजाद एक सच्चे क्रांतिकारी देशभक्त थे। उन्होंने भारत-माता की स्वतंत्रता के लिए अपने प्राण न्यौछावर कर दिए। सन् 1920 की बात है जब गाँधी जी द्वारा चलाए गए असहयोग आंदोलन में सैकड़ों देशभक्तों में च्द्रसेखर आजाद भी थे। जब मजिस्ट्रेट ने बुलाकर उनसे उनका नाम पिता का नाम और निवासस्थान पूछा तो उन्होंने बड़ी ही निडरता से उत्तर दिया- मेरा नाम है-आजाद पिता का नाम है-स्वतंत्रता और मेरा निवास है-जेल। इससे मजिस्ट्रेट आगबबूला हो गया और उसने 14 वर्षीय चन्द्रशेखर आजाद को 15 कोड़े लगाए जाने का आदेश दिया।

इस महान् क्रांतिकारी चन्द्रशेखर आजाद का जन्म 23 जुलाई 1906 को मध्य प्रदेश के झाबुआ जिले में भावरा गाँव में हुआ था। इसी गाँव की पाठशाला में उनकी शिक्षा प्रारंभ हुई। परंतु उनका मन खेलकूद में अधिक था। इसलिए वे बाल्यावस्था में ही कुश्ती, पेड़ पर चढ़ना तीरंदाजी आदि में पारंगत हो गए। फिर पाठशाला कि शिक्षा पूर्ण करके वे संस्कृत पढ़ाई छोड़कर स्वाधीनता आंदोलन में कूद पड़े। गाँधी जी के अहिंसक आंदोलन वापस लेने के पश्चात् 1922 में वे हिन्दुस्तान सोशलिस्ट रिपब्लिकन आर्मी में शामिल हो गए। उनकी प्रतिभा को देखते हुए 1924 में उन्हें इस सेना का कमांडर-इन-चीफ बना दिया गया।

इस एसोसिएशन की प्रत्येक सश्स्त्र कार्रवाई में चन्द्रशेखर हर मोर्चे पर आगे रहते थे। पहली सश्स्त्र कार्रवाई 9 अगस्त 1925 को की गई। इसकी पूरी योजना राम प्रसाद बिस्मिल द्वारा चन्द्रशेखर की सहायता से बनाई गई थी। इसे इतिहास में काकोरी ट्रेन कांड के नाम से जाना जाता है। इस योजना के अंतर्गत सरकारी खजाने को दस युवकों ने छीन लिया था। पुलिस को योजना का पता लग गया था। इसमें आजाद की भागीदारी पाई गई। अंगेज सरकार ने इसे डकैती मानते हुए राम प्रसाद और अशफाकउल्ला को फाँसी की सजा और अन्य लोगों को आजीवन कारावास की सजा सुनाई।

अगली कार्रवाई 1926 में की गई जिसमें वायसराय की रेलगाड़ी को बम से उडा दिया। इसकी योजना भी चन्द्रशेखर आजाद ने बनाई थी। इसके पश्चात् लाला लाजपतराय की हत्या का बदला लेने के लिए 17 दिसंबर 1928 को लाहौर में सांडर्स की ह्त्या कर दी गई। सांडर्स की हत्या का काम भगत सिंह को सौंपा गया था जिसे उसने पूरा किया और बच निकलने में सफल हुए। इस एसोसिएशन की अगली कारगुजारी सेंट्रल असेंबली में बम फेंकना और गिरफ्तारी देना था। इस योजना में भी चन्द्रशेखर आजाद की भूमिका थी। इस प्रकार वे अंग्रेज सरकार को भारत से भगाने और भारत को उनसे आजाद कराने के लिए अनेक योजनाएँ बनाते रहे और हर योजना में वे सफल होते रहे।

परंतु 27 फरवरी 191 को सुबह साढ़े नौ बजे चन्द्रशेखर आजाद निर्धारित कार्यक्रम के अनुसार ऐल्फ्रेड पार्क में एक साथी कामरेड से मिलने गए। वहाँ सादा कपड़ों में  पुलिस ने उन्हें घेर लिया। उन्होंने अंग्रेज पुलिस से खूब लोहा लिया। फिर जब उनकी छोटी-सी पिस्तौल में एक गोली बची तो उन्होंने उसे अपनी कनपट्टी पर रखकर चला दी और इस लोक को छोड़ गए। चन्द्रशेखर आजाद ने शपथ ली थी कि वे अंग्रजों की गोली से नहीं मरेंगे। इस प्रकार उन्होंने अपने आजाद नाम को सार्थक किया। जीवन के अंतिम क्षण तक वे किसी की गिरफ्त में नहीं आए। चन्द्रशेखर आजाद एक व्यक्ति नहीं वे अपने मेँ एक आंदोलन थे। आज हम उन्हें एक महान् क्रांतिकारी के रूप में याद करते हैं।

Saturday, 13 January 2018

भगत सिंह पर भाषण। speech on bhagat singh in hindi

भगत सिंह पर भाषण। speech on bhagat singh in hindi

भगत सिंह पर भाषण। speech on bhagat singh in hindi

speech on bhagat singh in hindi

सरदार भगतसिंह का नाम देशवासियों के लिए प्रेरणा-स्त्रोत रहा है। जब उनका जन्म हुआ तो उनके पिता सरादर किशन सिंह देश-प्रेम के कारण सरकारी जेल में कैद थे। उनके चाचा सरदार अजीत सिंह को पहले ही देश-निकाला दे दिया गया था।

भगत सिंह का जन्म सितंबर 1907 में लायलपुर जिले के बंगा (अब पाकिस्तान में) ग्राम में हुआ था। भगत सिंह की प्रारम्भिक शिक्षा गाँव में हुई बाद में उन्हें लाहौर पढ़ने भेजा गया था। उनके साथ पढ़ने वालों में सुखदेव भी थे जिन्हें भगत सिंह के साथ ही बमकाण्ड में फांसी पर लटकाया गया था। 
भगत सिंह के एक बड़े भाई थे- जगत सिंह। उनकी मृत्यु 11 वर्ष की अल्पायु में ही हो गई थी। भगत सिंह के माता-पिता उनका विवाह करना चाहते थे पर देश की सेवा करने हेतु उन्होंने विवाह करने से इंकार कर दिया। फिर कानपुर में भगत सिंह की भेंट बटुकेश्वर द्त्त से हुई। उन दिनों कानपुर में बाढ़ आई हुई थी तो भगत सिंह ने बाढ़ पीड़ितों की जी-जान से मदद की। यहीं उनकी मुलाकात महान् क्रांतिकारी चन्द्रशेखर आजाद से हुई।

साइमन कमीशन जब भारत आया तो सबने उसका विरोध कियाथा। भगत सिंह¸ सुखदेव और राजगुरू ने तो जमकर विरोध किया था। इस विरोध में लाला लाजपतराय पर लाठी चार्ज हुआ और वे परलोक सिधार गए जिससे भगत सिंह का रक्त उबलने लगा और उन्होंने सुखदेव एवं राजगूरू के साथ मिलकर ह्त्यारे अंग्रेज सांडर्स को गोलियों से भून डाला। फिर सरदार भगत सिंह और बटुकेश्वर द्त् ने दिल्ली में असेम्बली की दर्शकदीर्घा से बम पेंका। परंतु भगत सिंह और बटुकेश्वर दोनों पकड़े गए। तत्पश्चात् उन्हें लाहौर बमकाण्ड, सांडर्स हत्या और असेम्बली बम काण्ड में फाँसी की सजा सुनाई गई। कहा जाता है कि जेल में भगत सिंह ने 115 दिन भूख हड़ताल की जिसमें यतीन्द्रनाथ दास की भूख बर्दाश्त ने कर पाने के कारण मृत्यु हो गई थी।

फाँसी की सजा होने के बाद भगत सिंह ने कहा था- ‘राष्ट्र के लिए हम फांसी के तख्ते पर लटकने को तैयार हैं। हम अपने लहू से स्वतंत्रता के पौधे को सींच रहे हैं ताकि यह सदैव हरा-भरा बना रहे।’ कॉलेज जीवन में भगत सिंह ने नौजवान भारत सभा की लाहौर में स्थापना की थी।

जेल में सरदार भगत सिंह द्वारा लिखी डायरी में टैगोर¸ वर्ड्सवर्थ¸ टैनीसन¸विक्टर ह्यूगो¸ कार्ल मार्क्र्स¸लेनिन इत्यादि के विचार संगृहित हैं। 7 अक्टूबर 1930 को भगत सिंहसुखदेव और राजगुरू को फाँसी की सजा के अलावा अन्य सात अभियुक्तों को कालापानी की सजा हुई थी।

अंत में अंग्रेज सरकार ने भगत सिंह, सुखदेव और राजगुरू-तीनों क्रांतिकारियों को – 23 मार्च1931 को सायं 7 बजे निर्धारित तिथि से एक दिन पहले फाँसी पर लटका दिया। इस समाचार से पूरे भारतवर्ष में अंग्रेजों के प्रति घृणा और आक्रोश फैल गया। महान क्रांतिकारी सरदार भगत सिंह भारत माता के लिए अपना बलिदान देकर शहीद हो गए। उन्हें भारतवासी सदैव स्मरण करते रहेंगे।