Thursday, 23 November 2017

प्रातःकाल की सैर पर निबंध। Essay on Morning Walk in Hindi

Essay on Morning Walk in Hindi

शरीरमाद्यं खलु धर्मसाधनम् अर्थात धर्म की साधना शरीर के माध्यम से ही की जा सकती है। जाहिर है कि जीवन की सार्थकता और जीवन का लक्षण ही कर्म है और कोई भी कार्य करने के लिए शारीरिक सक्षमता और शारीरिक स्वास्थ्य आवश्यक है वैसे भी प्रचलित वाक्य है कि स्वस्थ शरीर मेंही स्वस्थ मन का निवास होता है और काम तो कोई भी हो यदि मन से किआ जाय तभी सफलता प्राप्त हो सकती है बेमन से नहीं।

शरीर को स्वस्थ रखने के लिए संतुलित भोजन शयन स्वच्छता तथा किंचित व्यायाम की भी आवश्यकता ही तो है।..... और घूमना-फिरना या कहे कि टहलना एक ऐसा व्यायाम है कि जिसके विषय में यदि कहा जाय कि हींग लगे न फिटकिरी और रंग आए चोखा तो अतिशयोक्ति नहीं होगी।

सैर की सबसे बडी खासियत है उसकी सरलता। यह इतना आसान क्रिया-कलाप है कि हर उम्र और हर वर्ग का व्यक्ति चाहे वह महिला हो या पुरूष इसे आसानी से कर सकता है और फिर यह सैर यदि सुबह किया जाये तो कहना ही क्या-सोने पे सुहागा-और क्या। क्योंकि प्रातःकाल के शांत वातावरण में स्वच्छ-शुद्ध प्राणवायु सुलभ होती है।

अँगरेजी कहावत है-अर्ली टु बेड एंड अर्ली टु राइज मेक्स अ मैन हेल्दी वेल्दी एंड वाइस। अतः सुबह उठना पहली शर्त है। इसके बाद अल्प प्रयत्न से असीम लाभ होना अवश्यंभावी है। मैं दिल्ली विश्वविद्यालय क्षेत्र में रहता हूँ। महानगरीय जीवनकी कतिपय अपनी व्यस्तताएँ और विवशताएँ हैं जिनके कारण रात को देर से ही सोना हो पाता है रात को देर से सोया व्यक्ति सुबह उस वक्त ही उठ पाता है जब प्रातःकालीन सैर का समय निकल चुका होता हैमैं रात को चाहे जिस समय भी सोऊँ सूबह चार बजे बिस्तर से उठ जाता हूँ। इसके लिए मैं घड़ी में सुबह पौने चार बजे का अलार्म लगाकर तब सोता हूँ तथा सुबह जब नियत समय पर अलार्म बजना शुरू होता है तो सुनकर फौरन उठ बैठता हूँ। इसमें प्रारंभ में तो कुछ कठिनाई हुई थी यह सहज और स्वाभाविक बन गया है-हाँ कभी यदि रात को सोने में अधिक व्यवधान होता है और नींद पूरी नहीं हो पाती तो मैं दिन में ही कुछ देर झपकी झपकी लेकर कसर पूरी कर लेता हूँ। सुबह उठकर नित्यक्रिया से निवृत्त होकर मैं सैर के लिए निकल पड़ताहूँ। मैरा सौभागय् है कि शहर का यह क्षेत्र पार्कों और खुले मैदानों से समृद्ध है। इन पार्कों और खुले मैदानों में इस समय कई लोग कदमों से चहल कदमी कर रहे होते हैं। कोई योगासन करता होता है तो कोई दौड़ लगा रहा होता है। कुछ बुजुर्ग इकट्ठे होकर कहकहे लगा रहे होते हैं। खुलकर हँसने और कहकहे लगाने से भी बहुत लाभ होता है इससे तनाव पास नही फटकता और दिल की बीमारियों से बचाव होता है।

यह सब दृश्य देखता हुआ मैं तेज कदमों से आगे बढ़ता ही जाता हूँ और नगर में अन्यत्र दुर्लभ वन क्षेत्र में प्रवेश कर जाता हूँ। थोड़ी-सी चढ़ाई चढ़ने पर एक चौराहा है जिसके बीचों बीच एक गुंबज बना हुआ है। सुबह की सैर और व्यायाम के शौकीनो की बड़ी तादाद यहाँ पहुँचती है। एक सज्जन अपने खानदानी नुस्खे से आँखों के लिए मुफीद सुरमा लिए बैठे रहते हैं और अपने पहुँचने वाले लोगों की आँखों में सुरम डालकर सेवा करतेह । कुछ कदरदान उनसे सुरमें की शीशी खरीद ले जाते हैं। कुछ लोग बैडमिंटन खेलते हैं तो कुछ दौड़ लगाते हैं तथा व्यायाम योगासन दि करते बहुत से लोग दिखलाई पड़तेहं। यहीं एक बहुत पुराना जिम भी ह जहाँ युवक वेटलिफ्टिंग तथा अन्य कसरते करते रहते हैं। यह वन-क्षेत्र कापी दूरी में पसरा हुआ है। मैंतो वन में गुसकर खूब घूमता हूँ। बाँति-भाँति के कलरव करते पक्षियों को उनके प्राकृतिक परिवेश में देख कर आनंद भी होता है और पशु-पक्षियों के विषय में ज्ञ3न भी बढ़ता है।

सूर्योदय का दृश्य लुभावना तो होता ही है पर साथ-साथ वृक्षों पर किलोल करते बंदरों को द्खना तथा पक्षियों का कलरव  सुनना मन को प्रफुल्लित कर देता है। इन्हीं दृश्यों में खोया हुआ मै जब उदित सूर्य को प्रखर होता पाता हूँ तो प्रखर होता पाता हूँ तो लौट पड़ता हूँ घर की ओर...।
मेरा परिचय निबंध। Myself Essay in Hindi

मेरा परिचय निबंध। Myself Essay in Hindi

मेरा परिचय निबंध। Myself Essay in Hindi

Myself Essay in Hindi

मैं बारह वर्ष का लड़का हूँ और आठवीं कक्षा में पढ़ता हूँ। मेरा नाम भ्रमर है हमारे पुरखों का गाँव बिहार के सीतामढ़ी जिले में है। वहाँ हमारे चाचा-चाची और चचेरे भाई-बहन रहते हैं। गाँव में हमारा बहुत बड़ा घर है। वहाँ की भाषा में ऐसे घर को चौघरा हवेली कहते हैं। चौघरा हवेली से तात्पर्य है ऐसा घर जिसमें बीचोबीच एक बड़ा-सा चौकोर आँगन हो और चारों ओर कमरे बने हों। गाँव वाले घर के बाहरी हिस्से में एक बड़ा सा दालान है तथा दालान के सामने सड़क के पार गौशाला है जिसमें चाचाजी के गाय-भैंस, आदि पालतू पशु बा बांधते हैं। गाँव के बाहर अमराई है खेत हैं। पिछली गरमीकी छुट्टियों में हम चारों भाई-बहन गाँव गए थे और अमराई तथा दालान में हमने खूब मजे किए।

मगर दिल्ली में हम किराए के मकान में रहते हैं। मेरे भैया पंद्रह वर्ष के हैं और दसवीं कक्षा में पढ़तेहैं उनका नाम नवनीत है। वे मेधावी विद्यार्थी है और मुझे बहुत प्यार करते हैं। अक्सर जब मुझे किसी विषय में कभी कोई कठिनाई महसूस होती है तो मैं उनसे सहायता प्राप्त कर लेता हूँ। मेरा छोटा भाई कारूणीक दस वर्ष का है और वह छठी कक्षा में पढ़ता है। वो बेहद शरारती तथा हँसोड़ है। वह अक्सर मुझे चिढ़ाता रहता है और चिढ़ानें में सफल हो जाता है तो किलकारियाँ मार-मारकर हँसता है।

कभी-कभी जब मेरा अपने छोटे भाई से झगड़ा हो जाता है तो बड़े भैया बीच-बचाव करते हैं और दोनों में सुलह करवाते हैं। हम तीनों भाइयों से छोटी है हमारी बहन कसतूरी। वह सात वर्ष की चंचल नटखट और बेहद बातूनी लड़की है तथा दूसरी कक्षा में पढ़ती है। उसके कारण हमारे घर में रौनक रहती है और अक्सर वह हम तीनों भाइयों में कहानियाँ सुना करती है।  हम चारों भाई-बहनों में बड़ा प्यार है।

मेरे पिता एक लेखक हैं और विभिन्न विधाओं में लिखने में सक्षम तथा सिद्धहस्त हैं।  अक्सर नके लेख पत्र-पत्रिकाओं में प्रकाशित होते रहते हैं जिससे कम से कम इतना पारिश्रमिक अवश्य मिल जाता है कि किसी तरह हम सबका खर्च चल जाए।

हम चारों भाई-बहनों में कई समानताएँ हैं तो कई असमानताएँ भी पर एक विशेष समानता यह है कि हम सभी भाई-बहन हमेशा अपनी-अपनी कक्षा में अव्वल ते हैं तथा पढ़ई के अलावा निबंध-लेखन बाषण खेल तथा कला और विज्ञान की प्रतियोगिताओं में भी सफलतापूर्वक हिस्सा लेते हैं
मेरा एक मित्र मनीष है जो मुझे अतिप्रिय है। प्राथमिक कक्षाओं से ही हम साथ-साथ पढ़ते आ रहे हैं। बहुत प्यार होने के बावजूद पढ़ी और प्रति योगिताओं में हम प्रतिद्वंद्वी है और हम दोनों में अव्वल आने की होड़ लगी रहती है।

कहावत है कि चिराग तले अँधेरा सो सबकुछ होते हुए भी एक कमी है जो अब से कुछ अरसा पहले तक नहीं थी। कोई चार बरस पहले मेरी मम्मी बीमार पड़ी। पापा नको अस्पताल ले गए और डॉक्टरों ने उन्हें भर्ती कर लिया। अस्पताल में नकी हालत सुधरती और बिगड़ती रही। कमजोर आर्थिक स्थिति के बावजूद इलाज में कोताही नहीं की गई। पापा तन-मन-धन से नकी सेवा में जुटे रहे किंतु अंत में उन्हें (मम्मी को) इनफेक्शन हो गया। डॉक्टरों ने कहा कि सेप्टिसेमिक शॉक है और तीन महीनों तक इलाज के बाद अंततः वह चल बसीं।

मम्मी के गुजर जाने के बाद हम सबने बड़ी मुश्किलों से खुद को सँभाला। अब अपने घर के काम-काज हम सब भाई-बहन आपस में मिल-जुलकर करते हैं और आपस में प्यार करते हैं। मैने ठान लिया है कि बड़ा होकर मैं एक बड़ा डॉक्टर बनूँगा और प्राणपन से मरीजों की सेवा और इलाज कूँगा। शायद इससे मैं बहुत से बच्चों की मम्मियों को बचा सकूँ।

इस दुःख-भरी उदासी की बात से अपनी आत्मकथा समाप्त करते हुए मुझे कुछ अच्छा-सा नहीं लग रहा है अतः एक बात और बता दूँ कि जो भी हम सबसे पहली बार परिचित होता है वह मुझसे यह जरूर पूछता है कि हम चारो भाई-बहनों में मेरा नाम सबसे अलग क्यों है। तो यही सवाल जब मैंने एक बार अपनी मम्मी से पूछा तो उन्होंने मुझे बताया कि मेरे जन्म के समय सब लोग लड़का होने की खुशी से स्वाभाविक ही आनंदित थे और पापा को मेरे रोने की आवाज में भौरे की गुन-गुन जैसी ध्वनि आती महसूस हुई। भ्रमर का अर्थ होता है भौरा अतः उन्होंने मेरा नाम रख दिया। 

Wednesday, 22 November 2017

मेरा प्रिय शौक पर निबंध। My hobby Essay in Hindi

मेरा प्रिय शौक पर निबंध। My hobby Essay in Hindi

मेरा प्रिय शौक पर निबंध। My hobby Essay in Hindi

My hobby Essay in Hindi

किसी व्यक्ति द्वारा मन बहलाने या मनोरंजन हेतु उत्साहपूर्वक किए जाने वाले किसी कार्य विशेष को ही शौक या चस्का कहते हैं। अंगरेजी मे  इसी को हॉबी कहते हैं। पुरूष हो या महिला युवा हो प्रौढ़ हो या फिर वृद्ध या बालक ही क्यों नहीं हो प्रायः सबकी कोई न कोई प्रमुख जिम्मेदारी होती है। सब कोई न की काम करते ही है और प्रतिदिन नियमित रूप से किए जाने वाले काम थकाऊ भी हो जाता है तो कभी-कभी उबाऊ तथा नीरस भी। इस स्थिति से उबरने के लिए व्यक्ति जब की अन्य ऐसे काम में संलग्न हो जाता है जिसमें उसका मन लगता हो तो वह उसका शौक कहलाता है।

शौक अच्छे या बुरे दोनों किस्म के हो सकते हैं जैसे किसी को सत्साहित्य पड़ने का शौक होता है तो किसी को अश्लील साहित्य का आनंद लेने का चस्का। जुए या लॉचरी की बुरी लत भी बहुतों को होती है।

डाक टुकटों या सिक्कों का संग्रह करना तथा बागवानी करना आदि शौक भी बहुतो को होत है। मुझे फोटोग्राफी का शौक है। मेरे पास बाबा आदम के जमाने का क बॉक्स कैमरा है जिसमें 620 की फिल्म लगती है। एक फिल्म से बारह श्वेत-श्याम तस्वीरे खीची जा सकती है।

जब कभी पढ़ते-पढ़ते मेरा जी-उचाट हो जाता है तो मैं अपना कैमरा लेकर छत पर चढ़ जाता हूँ और वहाँ से चारों ओर कुछ खास दृश्य की टोह लेने में लग जाता हूँ। अक्सर मुजे कुछ अच्छे स्नैप मिल जाते हैं। एक बार एक बाज को चिड़िया पर झपटते और फिर चिड़िया को चंगुल में लेकर सीना ताने हुए कैमरे में कैद करने का मौका मिला। कई बार आकाश में भी बादलों और पक्षोयों की आकर्षक अठकेलियों को मैंने अपने घर की छत से कैमरे में कैद किया है।

जब कभी किसी भी बहाने से मुझे प्रवास का मौका मिलता है तो यात्रा पर जाते हुए मैं अपने दादाजी का यह बॉक्स कैमरा साथ ले जाना नहीं भूलता तथा अक्सर कई यादगार सत्वीरें अपने कैमरे में कैद करने में सफल रहता हूँ। अपने घर में ही एक ओर छोटा-सा डार्करूम बी बनवा रखा है। समें एक कांटेक्ट प्रिंटर और एक इनरार्र तथा तीन-चार टी-बड़ी डिशें मुझे मम्मी-डैडी ने मेरे फोटोग्राफी के शौक को देखते हुए लगवा दी है।

फोटोग्राफी की पुस्तकें पढ़पढ़कर मै फोटोग्राफी के कई करतब सीख चुका हूँ। अपने इस शौक के लिए फोटो की डेवलपिंग हेतु आवश्यक ब्रोमाइड पेपर तथा डेवलपर बनाने के लिए जरूरी रसायन आदि मैं अपनी जेब-खर्छ से खरीदता रहता हूँ पर कभी-कभी जब पैसे कम पड़ते हैं तो मम्मी से माँगता हूँ और वे मेरी मदमद करतीहैं।

घर में सबको मेरा यह शौक अच्छा लगता है। मेरे द्वारा खींचे हुए चित्रों का अलबम मम्मी बड़े चाव से देखती और दिखाती हैं। उनकी इस सराहना से मेरा उत्साह बढ़ता है। मेंने कभी कहा तो नहीं पर इस निबंध के माध्यम सेकहना चाहता हूँ- थैंक यू मम्मी। 
Essay on My Family in Hindi for Class 1 2 3 4 5 6 7

Essay on My Family in Hindi for Class 1 2 3 4 5 6 7

Essay on My Family in Hindi for Class 1 2 3 4 5 6 7

Essay on My Family in Hindi for Class 1 2 3 4 5 6 7

घर परिवार-जैसा कोई दूसरा स्थान नहीं है। यह संसार में सुमधुरतम स्थान है। घर-परिवार का अर्थ है स्नेह एवं सुमधुर संबंध।

मकान एवं घर-परिवार में अन्तर होता है। मकान केवल ईंट-रेत और सीमेंट से निर्मित बेजान ढाँचा होता है। घर-परिवार एक ऐसा स्थान होता है जिसमें सुमधुर संबंधों रूपी आत्मा होती है। बहुधा लोग ईंट-गारो से बने घरों में रहते हैं। उनके पास घर-परिवार नहीं होते घर में रहने वालों में कोई प्यार लगाव नहीं होता।

घर –परिवार के सदस्य एक दूसरे का ख्याल रखते हैं उनमें आपस में स्नेह और संबंधों में घनिष्टता होती है। सौभाग्य से यह सभी कुछ हमारे घर-परिवार में है। मैं अपने घर-परिवार को अपने जीवन से भी प्रेम करता हूँ। जब मैं घर से दूर होता हूँ तो मुझे इसकी कमी खलती है। यही वह समय है- जब हम अपने घर-परिवार के महत्व को समझते हैं।

मेरे परिवार में मैं, मेरे माता-पिता एवं एक छोटी –सी सुन्दर-सी एवं प्यारी-सी छोटी बहिन है। मेरी दादी जी की मृत्यु पिछले वर्ष ही हुई थी। हम सभी उनको बहुत याद करते हैं। वह हमें हमेशा अच्छी-अच्छी कहानियाँ सुनाया करती थी। वह एक धार्मिक महिला थीं।
मेरे माता-पिता एक आदर्श दम्पती हैं उनके बीच बहुत गहरा प्यार है। वे हम दोनों  भी बहुत सनेह करते हैं। उनका यह प्रेम हमारे ले प्रसन्नता एवं आनंद का स्त्रोत है।

मेरी छोटी बहन बहुत ही प्यारी सुंदर एवं मधुर स्वभाव की है। वह मुझसे छह साल छोटी है। मैं उसके साथ खेलता हूँ और उसको अच्छी-अच्छी कहानियाँ सुनाता हूँ। वह बहुत-ही बुद्धमान है और सभी बातों को शीघ्र ही समझ लेती है। उसे कुछ नया सीखने की तीव्र लालसा रहती है। मैं अपने परिवार को लेकर गौरव व संतोष का अनुभव करता ह

Tuesday, 21 November 2017

सूखा और अकाल पर निबंध। Essay on Drought in Hindi

सूखा और अकाल पर निबंध। Essay on Drought in Hindi

सूखा और अकाल पर निबंध। Essay on Drought in Hindi

Essay on Drought in Hindi

अकाल से तात्पर्य खाने-पीने की वस्तुओं की पूर्ण कमी से है। यह वह समय होता है जब लोग खाने की कमी से मरने लगते हैं। सन 1943 में बंगाल में ऐसा ही एक अकाल पडा था जिसमें हजारों पुरुषों, महिलाओं और बच्चों की मृत्यु हो गयी थी। आज भारत में अकाल नहीं है लेकिन भारत के किसी भाग में कभी-कभी अकाल जैसी स्थिति बन जाती है। संसार में अनेक देशों ने अकाल जैसे गंभीर अथिति का सामना किया है। 

भारत में अकाल : भारत को प्राचीन काल में दूध और मधु की भूमि कहा गया है लेकिन आज यह अकाल, बाढ़ और निर्धनता का देश बनकर रह गया है। हमारे देश में अकाल के अनेक कारण हैं। भारतीय कृषि का पिछड़ापन उनमें से ही एक है। कृषकों को अनेक समस्याओं का सामना करना पड़ता है। अधिकाँश किसानों के अशिक्षित होने के कारण उन्हें आधुनिक कृषि के साधनों का ज्ञान नहीं है। इसके अतिरिक्त उनके खेत अनेक छोटी-छोटी जोतों में बंटे हैं जिससे अधिक पैदावार नहीं हो पाती। उनके पशु कमजोर होते हैं। इसके अतिरिक्त भारतीय किसान सिंचाई के लिए कृषि पर पूरी तरह से निर्भर रहते हैं। अगर समय से वर्षा नहीं होती है तो फसल बेकार हो जाती है। 

जनसंख्या की समस्या : भारत की जनसंख्या में बहुत तेजी से वृद्धि हो रही है लेकिन खाद्य सामग्री के उत्पादन में उतनी तेजी से वृद्धि नहीं हो रही है। इसलिए यहाँ खाद्य की कमी हो जाती है। आज भी बिहार और उत्तर प्रदेश में खाद्यानों की कमी है। सरकार को चाहिए की परिवार नियोजन के विषय में गंभीरता से कदम उठाए जाए जिससे जनसंख्या नियंत्रित हो सके और खाद्यानों के उत्पादन को बढाने के लिए तकनीक उपलब्ध कराये। 

निर्भरता से छुटकारा : हमें अकाल को जांचने की कोशिश करनी चाहिए। हमें अकाल के समय अन्य देशों से सहायता लेनी चाहिए। लेकिन हर समय खाद्यान पर निर्भर रहना मूर्खता है। ऐसे स्थिति न आये इसके लिए हमें पहने से ही अनाज का पहले से ही भंडारण करना चाहिए। हम आशा करते हैं की परिवार नियोजन भी सफलता से लागू हो जिससे जनसंख्या नियंत्रित हो सके। कृषकों को वैज्ञानिक प्रणालियों के बारे में बताना चाहिए और उन्हें कुशल प्रशिक्षण प्रदान किया जाना चाहिए। सिंचाई की सुविधा भी उन्हें उपलब्ध कराई जानी चाहिए जिससे मानसून पर उनकी निर्भरता में कमी लायी जा सके। अगर यह सभी पद्धितियां पनायी जाएँ तो अकाल पर विजय पायी जा सकती है। 

अकाल का प्रभाव : अकाल और सूखा साधारण मनुष्य के लिए एक बहुत बड़ी समस्या है। इस संकट में हजारों की संख्या में लोग एक वक़्त की रोटी के लिए तरस जाते हैं। अनेक लोग छप्परों, और वृक्षों के नीचे रहते हैं। कुपोषण समस्या इस दौरान अपना सर उठाती है। लोग घरों के बर्तन, गहने व अन्य आवश्यक सामान बेचकर खाना खरीदते हैं। हजारों पशु भूख के कारण मर जाते हैं। लोगों को पानी पीने के लिए कई मील तक चलना पड़ता है। 

समाज विरोधी तत्त्व इस परिस्थिति का पूर्ण लाभ उठाते हैं। वे पहले से ही बड़े पैमाने पर अनाज इकठ्ठा कर लेते हैं और मनमाने दाम पर बेचकर लाभ कमाते हैं। कोई भी बच्चों, वृद्धों की पीड़ा का वर्णन नहीं कर सकता है। वह जिसे दूध और औषधि नहीं मिली, या फिर वे जिनकी भूख से बिलखते हुए मौत हो गयी, ऐसे नज़ारे अकाल और सूखे के दौरान आम हो जाते हैं। 

सरकात की सहायता : इस अकाल से छुटकारा दिलाने के लिए सरकार अपनी तरफ से पूरी मदद करती है। प्रशासन बड़ी मात्रा में पडोसी राज्यों से खाद्यान मंगाकर पीड़ित लोगों में बांटे हैं। पीड़ितों की जांच के लिए डोक्टरों की टीम भेजी जाती हैं। सरकार यह सभी सुविधाएं निशुल्क प्रदान करती है। इस प्रकार अनेक लोगों का जीवन बचा लिया जाता है और पीड़ितों की भी कुछ हद तक मदद हो पाती है। 

उपसंहार : कई बार देश के राज्यों में अकाल पड़ जाते हैं और सरकार अपना सर्वश्रेष्ठ कार्य करती है। परन्तु अब हमें चाहिए की देश के किसान कृषि के आधुनिक तरीकों को अपनाए जिससे ज्यादा पैदावार हो सके। सिंचाई की व्यवस्था प्रत्येक गाँव में होनी चाइये जिससे वर्षा पर निर्भरता कम की जा सके। अगर उपरोक्त काम हो जाएँ तो अकाल तो दूर होगा ही साथ ही अनाज का भंडारण भी संभव हो सकेगा। 
मेरे प्रिय लेखक रबिन्द्रनाथ टैगोर पर निबंध। Mere Priya Lekhak Rabindranath Tagore

मेरे प्रिय लेखक रबिन्द्रनाथ टैगोर पर निबंध। Mere Priya Lekhak Rabindranath Tagore

मेरे प्रिय लेखक रबिन्द्रनाथ टैगोर पर निबंध। Mere Priya Lekhak Rabindranath Tagore
Mere Priya Lekhak Rabindranath Tagore

परिचय : मैंने विभिन्न लेखकों की अनेक पुस्तकें पढ़ी हैं। अंग्रेजी लेखकों में विलियम शेक्सपियर और सर आर्थर कोनन डायल मेरे प्रिय लेखक हैं। हिंदी लेखकों में रविन्द्र नाथ टैगोर और मुंशी प्रेमचंद मेरे प्रिय लेखक हैं लेकिन रविन्द्रनाथ टैगोर जी को मैं अधिक पसंद करता हूँ। वह इस संसार के महान कवियों में से एक हैं।

टैगोर जी का जन्म और जीवन परिचय : रविन्द्रनाथ टैगोर बंगाल के बहुत आदरणीय परिवार से हैं। टैगोर जी का जन्म 7 मई 1861 ई को कोलकाता के जोरसान्को में हुआ था। इनके पिता का नाम श्री देवेन्द्रनाथ टैगोर था। रविन्द्रनाथ जी ने प्रारम्भिक शिक्षा कोलकाता के दो प्रसिद्द विद्यालयों से प्राप्त की जो थे ओरिएण्टल अकादमी और कलकत्ता नार्मल। सन 1871 में टैगोर जी उच्च शिक्षा के लिए इंग्लॅण्ड चले गए। उन्होंने लन्दन विश्वविद्यालय से शिक्षा ग्रहण की।

रवीन्द्रनाथ टैगोर जी का पारिवारिक जीवन दुखों से भरा था। उनका विवाह 1888 में हुआ लेकिन सन 1902 में इनकी पत्नी की मृत्यु हो गयी। कुछ वर्षों के पश्चात सन 1907 में इनके पिता की भी मृत्यु हो गयी। इन सबके बीच सन 1904 में इनकी पुत्री की भी मृत्यु हो गयी। इन दुखद घटनाओं के चलते टैगोर जी अत्यंत धार्मिक प्रवृत्ति के हो गए। 

एक महान लेखक : रविन्द्रनाथ टैगोर एक महान लेखक थे। वे अनेक पत्र-पत्रिकाओं के सम्पादक भी रहे। टैगोर जी की गीतांजली उनके द्वारा रचीं सर्वश्रेष्ट पुस्तकों में से एक है।कुछ अंग्रेजी कवियों जैसे डब्लू। बी। यीट्स और स्त्रोफोर्ड ब्रुक ने भी गीतांजली की बहुत प्रशंसा की। इनकी कविताओं में दयालुता, मानवता और धार्मिकता का सम्मिश्रण होता है। इन्हें साहित्य में योगदान के लिए नोबेल पुरष्कार से भी सम्मानित किया गया। बालका और पूरबी इनकी महान रचनाएं हैं। इन्होने कुछ सुन्दर कहानियां भी लिखीं हैं।

भारत के महान प्रेमी : रविन्द्रनाथ टैगोर भारत से गहरा लगाव था। उन्होंने अंग्रेजों के विरुद्ध अपनी आवाज उठाई। उन्होंने अपनी रचनाओं के द्वारा स्वतंत्रता सेनानियों में देशभक्ति की लहर दौडाई। उन्होंने सन 1901 में विश्वभारती की स्थापना की। वह भारत को शिक्षा और संस्कृति का घर बनाना चाहते थे। 7 अगस्त 1941 को रवीन्द्रनाथ टैगोर जी की मृत्यु हो गयी। वह एक लेखक, देशभक्त और महान समाज सुधारक थे।

भविष्यदृष्टा के रूप में : रविन्द्रनाथ जी एक भविष्य दृष्टा थे। वह मनुष्यों के हृदय पर शासन करते थे। वे एक ऐसे व्यक्ति थे जो लोगों को अँधेरे से उजाले की ओर ले गए। रवीन्द्रनाथ टैगोर न केवल भारत पर बल्कि भारत देश की सुन्दरता पर भी गर्व करते थे। उन्होंने अपनी मात्रभूमि के बारे में कहा भी है की मेरा देश जो इ भारत है, मेरे पिता और मेरी संतानों का देश है, मेरे देश ने मुझे जीवन और शक्ति दी है। मैं फिर से भारत में जन्म लेना चाहूँगा, उसी निर्धनता और कष्टों के अभागेपन के साथ। उनका विश्वास था की सिर्फ देशभक्ति ही काफी नहीं है। उन्होंने देशवासियों को संकुचित स्थानीय देशभक्ति न करने का सन्देश दिया। उन्होंने कहा की हमें अपने स्थान से प्रेम से अधिक मानवता से प्रेम करना चाहिए। मनुष्य को मनुष्य से प्रेम करना चाहिए, फिर चाहे वो कहीं का भी हो। उन्होंने विश्वभारती की नींव डाली और इसे अंतर्राष्ट्रीय अध्ययन का केंद्र बनाया।

बच्चों के प्रति उनका प्रेम : रविन्द्रनाथ टैगोर बच्चों से अत्यधिक प्रेम करते थे। जब वह छोटे बच्चों को पढ़ते थे तो वह आनंद में खो जाते थे। वह सच में गुरुदेव थे, अर्थात इस धरती पर एक महान अध्यापक जिसने भारत के लोगों को कविता की कला सिखाई।उन्होंने प्रकृति की सुन्दरता को उस प्रकार से बे=ताया जिस प्रकार से पहले किसी ने न बताया था।

Monday, 20 November 2017

परिश्रम का महत्व पर निबंध। Parishram ka Mahatva Essay in Hindi

परिश्रम का महत्व पर निबंध। Parishram ka Mahatva Essay in Hindi

परिश्रम का महत्व पर निबंध। Parishram ka Mahatva Essay in Hindi

परिश्रम का महत्व पर निबंध। Parishram ka Mahatva Essay in Hindi

विश्व में कोई भी कार्य बिना परिश्रम के सफल या संपन्न नहीं हो सकता। वस्तुतः परिश्रम की सफलता की कुंजी है। जिस प्रकार सूरज अपने प्रकाश से अंधकार को दूर भगा दैता है ठीक उसी प्रकार परिश्रम से मानव-जीवन सुखमय हो जाता है और परिश्रमी व्यक्ति का भविष्य उच्चवल हो जाता है।

कठिन परिश्रम किए बिना किसी की उन्नति नहीं हो सकती और न किसी को सुख-समृद्धि ही प्राप्त हो सकती है। यदि सामने भजन हो तो भी उसे ग्रहण करने का परिश्रम किए बिना हम उसका स्वाद भला कैसे ले कतेहैं। परिश्रम के द्वारा कठिन से कठिन कार्य संपन्न करना संभव हो जाता है। सभ्यता के विकास की कथा का निचोड़ भी यही है कि आज की विकसित मानव-सभ्यता प्राचीन पूर्जों के परिश्रम का फल है। संसार के सब विकसित देशों की विकास-यात्रा उनके देशवासियों के कठिन परिश्रम से संपन्न हुई है। विश्व के सफलतम वय्कतियों की जीवन-कथा का यही संदेश है कि उन्होंने जीवन में हर चुनौती का डटकर सामना रतहुए अथक परि8म किया। आलस्य उनके पास भी नहीं फटकने पाता था। वे कभी किसी के भरोसे नहीं बैठे और अपने परिश्रम के द्वारा उन्होंने असंभव को भी संभव कर दिखाया।

खम ठोक ठेलता है जब नर पर्वत के जाते पाँव उखड़-राष्ट्रकवि की ये पंक्ति सचमुच यथार्थ का वर्णन करती है। श्रमशील मनुष्य के आगे पहाड़ भी नहीं ठहर पाते। कठिन से कठिन झंजावातों से गुजरता हुआ 8मशील मानव अपना रास्ता ढूँढं लेता है। जिस व्यक्ति में कुछ विशेष प्रतिभा नहीं होती है वह भी केवल धैर्यपूर्वक कठिन परश्रम करता हुआ अपने लश्र्य को पा लेता है।

परिश्रमी हमेसा जीवन-युद्ध में विजयी होता है। परिश्रमी विद्यार्थी परीक्षा में उत्तीर्ण होते हैं और इसी प्रकार कठिन परिश्रम तथा लगन से कार्य करने .वाला हर व्यक्ति चाहे वह मजदूर  हो नौकरी पेशा हो या व्यापारी ही क्यों नहीं हो अवस्य ही उद्देश्य में सफल होता है। संसार के और देश के बड़े-बड़े उद्योगपतियों की जीवन-कथा से ज्ञात होता है कि उनका औद्योगिक साम्राज्य खाक से लाख और फिर अरब और खरब में केवल उनके लगन और परिश्रम के चलते पहुँचा। अपने देश में टाटा बिड़ला या धीरूभाई अंबानी सब परिश्रम से ही बड़े बने।
सच्ची लगन और निरंतर परिश्रम से सफलता बी अवश्य मिलती है। भाग्य के भरोसे बैटने वाले जीवन की हर दौड़ में पिछड़ जाते हैं और परिश्रमी अपना जीवन धन्य करते तथा सफलता का आनंद प्राप्त करते हैं। काहिल का जीवन सुख-सुविधाओं के अभाव में ही बीत जाता है  और वे अपनी काहिली के चलते तरक्की का हर अवसर गँवा देते हैं।

वयक्ति अपनी सुविधा साम्रर्थ्य तथा रूचि के अनुसार साहित्य संगीत कला विज्ञान व्यवसाय आदि कोई भी क्षेत्र चुने परन्तु सफलता के लिए लगन और कठिन परिश्रम आवश्यक है। कहावत है कि मेहनत का फल मीठा होता है।आज सचिन हो चाहे सानिया मिर्जा या फिर राष्ट्रपति अब्दुल कलाम ही क्यों न हों सबने अपना-अपना स्थान कटिन परिश्रम करके बनाया है।परिश्रम के महत्व पर जितना भी लिखा जाए थोड़ा ही होगा।

धरती सब कागद करौं लेखनि सब बनराई।
सात समद की मसि करौं हरिगुण लिखा न जाई।

स्वयं भगवान् कृष्ण ने गीता में कर्म का उपदेश दिया है। गंगावतरण की पौराणिक कथा के नायक भगीरथ के श्रम की तासीर ऐसी है कि कठिन परिश्रम से संपन्न हुए या होने वाले किसी महान् कार्य के लिए भगीरथ प्रयत्न शब्दों का विशेषण प्रयुक्त किया जाता है। हमें याद रखना चाहिए- श्रमएव जयते।

भ्रष्टाचार पर निबंध | Essay on Corruption in Hindi

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भ्रष्टाचार पर निबंध | Essay on Corruption in Hindi

Essay on Corruption in Hindi

भृष्टाचार का शाब्दिक अर्थ है भृष्ट आचरणपरन्तु आज यह शब्द रिश्वत खोरी के अर्थ में प्रयोग किया जाता है आज का युग भृष्टाचार का युग है प्रत्येक देश भृष्टाचार में लिप्त है यहाँ तक की हमारा देश भारत जो की सत्य और अहिंसा का उदाहरण है भी भृष्टाचार में पूरी तरह से लिप्त है आज के युग में राजनीतिज्ञअधिकारीशिक्षकसरकारी कर्मचारी और यहाँ तक की देश की जनता भी भृष्टाचार में लिप्त है इसने व्यक्ति और समाज दोनों का भारी नुक्सान किया है और देश को भारी क्षति पहुंचाई है अतः इस विकराल समस्या पर गंभीरता से विचार किया जाना आवश्यक है

भृष्टाचार की समस्या : इसमें कोई संदेह नहीं है की भृष्टाचार ने हमारे सामाजिक मूल्यों का गला घोंट दिया है। भृष्टाचार के कारण समाज से नैतिकता समाप्त हो गई है। इसने हमारे रोजमर्रा के जीवन को नष्ट करना शुरू कर दिया है। स्विस बैंकों में भारत के नेताओं, उद्योगपतियों और अभिनेताओं का अरबों-करोड़ों रुपया जमा है जोकि भृष्टाचार से अर्जित किया गया है। यदि यही धन हमारे देश में वापस लाया जा सके तो हमारे देश से महंगाई की समस्या दूर हो सकती है। हमारे देश में योजनायें तो बनती हैं पर उसका करोड़ों रुपया विकास कार्य में न लगकर राजनेताओं, सरकारी अफसरों और ठेकेदारों की जेब में चला जाता है। भृष्टाचार के कारण ही हमारा देश आज वर्ल्ड बैंक के कर्जतले दबता चला जा रहा है।

भृष्टाचार की व्यापकता : स्वंतंत्रता प्राप्ति के समय देश की जनता नें यह सोचा था की अब हमारी सरकार होगी और भृष्टाचार से मुक्ति मिलेगी किन्तु हुआ उसका उलटा जितना रुपया अंग्रेज लूटकर नहीं ले गए उससे कहीं ज्यादा अपने ही देश के नेताओं ने लूटा। अब तो हालात इतने बुरे हो गए हैं की इस भृष्टाचार रुपी दानव ने समाज को पूरी तरह अपने गिरफ्त में ले लिया है। सरकारी कार्यालयों में बिना घूस, रिश्वत और पेट-पूजा के कोई कार्य करवा लेना असंभव हो गया है। क्लर्क के रूप में जो व्यक्ति कुर्सी पर बैठा है वाही असली भाग्य-विधाता है। यदि क्लर्क ना चाहे तो एड़ियां रगड़ते रहिये पर आपकी फ़ाइल पर फोर्वार्डिंग नोट नहीं लगेगा और भला किस अफसर की मजाल है की क्लर्क की टिपण्णी के बिना फ़ाइल पास कर दे, असल में सब मिले होते हैं इस खेल में। कहावत है की राज्य में दो ही व्यक्ति शक्तिशाली होते हैं राज्यपाल और लेखपाल। लेखपाल के लिखे को तो जिलाधीश भी नहीं काट सकता।

राजनैतिक भृष्टाचार : राजनेताओं का कार्य देश और देश की जनता का कल्याण करना होता है। लेकिन सबसे अधिक भृष्टाचार तो इसी क्षेत्र में है। किसी भी देश की उन्नति देश के नेताओं पर ही निर्भर होती है। यदि देश के नेता ईमानदार है तो देश की उन्नति को कोई नहीं रोक सकता। आज के नेता कुर्सी पाने के लिए गलत से गलत काम तक कर देते हैं। चुनाव जीतने के लिए बूथों पर कब्जा करना, गुंडागर्दी करना, घोटाले करना, जनता से झूठे वादे करना और न जाने क्या-क्या। चुनाव जीतकर ये नेता जनता से किये वादों को भूल जाए है और बस अपनी जेब भरना शुरू कर देते हैं। जिन उद्योंपतियों ने चुनाव के लिए पैसा दिया होता है उन्हें नियमों को टाक पे रखकर मनमाने ढंग से जनता को लूटने की छूट दे दी जाती है।

आयकर की चोरी : भृष्टाचार के ही कारण आज लाखों रुपये कमाने वाले डॉक्टर, वकील, आर्किटेक्ट आदि विभिन्न तरीकों से कर की चोरी करते हैं। बड़े-बड़े उद्योंपतियों ने तो इसी काम के लिए चार्टेड अकाउंटेंट तक रखे हुए हैं जिनका काम ये बताना है की कर कैसे बचाया जाए और सरकार की आँखों में धुल झोंकी जाए। यदि सभी लोग अपने-अपने हिस्से का कर सही ढंग से चुकाने लगें तो देश से निर्धनता समाप्त की जा सकती है।

सरकारी अधिकारी जिन्हें जनता का सेवक माना जाता है, दोनों हाथ से जनता को लूट रहे हैं।पुलिस का मामूली दरोगा भी चार-पांच सालों में ही गाडी, बँगला जैसी सभी सुविधाएं जुटा लेता है।क्या सरकार उससे कभी पूछती है की उसने इतनी बचत कैसे कर ली की लाखों की संपत्ति अर्जित कर ली ? यह सब भृष्ट आचरण से अर्जित काला धन है जो यह जनता से लूटते हैं।

उपसंहार : इसमें कोई संदेह नहीं है की भृष्टाचार एक गंभीर समस्या है जो पूरे देश को खोखला कर रही है। इस पर अंकुश लगाना अत्यंत आवश्यक है। भृष्टाचार को समाप्त करने के लिए सबसे पहले राजनीति को शुद्ध करना होगा क्योंकि जब देश के नीता ईमानदार होंगे तो किसी के लिए भृष्टाचार करना आसान नहीं होगा। इसीलिए कहा भी गया है की जैसा राजा वैसी प्रजा, यानी अगर नेता ईमानदार होगा तो बाकियों से भी ईमानदारी की उम्मीद की जा सकती है।

Sunday, 19 November 2017

दहेज प्रथा पर निबंध। Essay on Dowry System in Hindi

दहेज प्रथा पर निबंध। Essay on Dowry System in Hindi

दहेज प्रथा पर निबंध। Essay on Dowry System in Hindi

Essay on Dowry System in Hindi

विवाह एक सामाजिक कार्य है। इसके द्वारा युवक और युवती पवित्र वैवाहिक बंधन में बँधकर पति और पत्नी का दर्जा प्राप्त करते है। तथा सृष्टि के रचियता परमात्मा को उसके रचनाकर्म में सहयोग प्रदान करने हेतु सन्नद्ध होकर परिवार बनाते और देश तथा समाज के लिए भावी पीढ़ी के निर्माण में जुट जाते हैं। 

हमारे देश में विवाह में कन्या दान की जाती है और विवाह के बाद पति का घर ही उसका अपना घर हो जाता है तथा मायके में वह मेहमान हो जाती है। इसके बावजूद माता-पिता और भाई-बंधु का वात्सलन्य तो ज्यों का त्यों रहता ही है। इसलिए पुरातन काल से देश में दहेज की प्रथा चली  रही है और वात्सल्य-रस में डूब दुलहन के परिजन उपहार-स्वरूप उसको इतना कुछ देकर विदा करना चाहेत हैं जितना यदि वह घर की बेटी न होकर बेटा होती तो उसके हिस्से में आता। स्वेच्छा से तथा प्रेंम से अपनी-अपनी हैसियत से दिए जाने वाले इन उपहारों को देने की इस पुरातन प्रथा को ही दहेज-प्रथा कहते हैं।

परिजनों के प्रेम का प्रतीक दहेज आज लड़के वोलों के लालच के कारण अबिशाप बन चुका है। माँ-बाप अपनी प्यारी बिटिया को बड़े अरमान से सजाकर दुलहन बनाकर ससुराल भेजते हैं और दहेज के लालची ससुराल वाले उसे तहर-तहर की यातनाएँ देकर आतंकित किया करते हैं तथा दुल्हेराजाज किंकर्तव्यविमूढ़ बने चुपचाप सबकुछ देखते रहते हैं।

लड़के माता-पिता पने बेटे की पढ़ाई-लिखाई और पाल-पोषण का सारा खर्च लड़की वालो से ब्योज समेत वसूल कर लेना चाहते हैं। इस नाजायज वसूली के लिए लड़के वाले तरह-तरह के हथकंडे अपनाते हैं। शादी के वक्त यदि दहेज में जरा-सी भी कमी रह जाती ह तो लड़की को उसका खामियाजा भुगतना पड़ता है। उस पर भाँति-भाँति के लांछन लगाए जाते हैं। हर समय खरी-खोटी सुनाई जाती है और हर अपमान उसे चुप होकर सहना पड़ता है। वह दिन-भर नौकररानियों की तरह घर का सारा काम-काज सँभालती रहती है पर कोई उससे प्रसन्न नहीं होता। वह प्यार से दो मीठे बोलों के लिए तरसकर रह जाती है। जिन लड़के वालो की स्वयं की बेटियाँ होती हैं वे भी दुलहन का दर्द नहीं समझते क्योंकि वह पराई बेटी होती अपनी नहीं। और सास जो स्वयं भी कभी घर में बहू बनकर आई थी वह-भी दुलहन का दर्द नहीं समझती और बहू पर जुन्म करने में सबसे आगे रहती है।  अधिकांश घरों में होने वाले सास-बहू के झगड़ो का यही रहस्य है।

चाहे लड़की वाले लाख कर्ज के दलदल में फँसे पड़े हों पर इससे ससुराल वालों को कुछ लेना-देना नहीं होता। दहेज के मामनें में हमदर्दी दिखाना वे मुर्खता समझते हैं और नई-नई फरमाइशें कर-कर के बहू की नाक में दम कर देते हैं। नतीजा यह होता है कि निराश होकर या तो लड़की आत्महत्या कर लेती है या फिर ससुराल वाले दुलहन को मिट्टी का तेल जलाकर जिंदा जला देते हैं। कभी जहर देकर किस्सा खत्म कर देते हैं तो कभी मार-पीटकर घर सेनिकाल देते हैं। ऐसी सूरत में जब दुलहन माता-पिता की छाती का बोझ बनने के लिए तैयार नहीं हो पाती तो विवश होकर उसे  आत्महत्या का रास्ता अपनाना पड़ता है। सर्वगुणसंपन्न अति सुंदर युवतियाँ घर की चारदीवारी में निरंतर अपमानित और प्रताड़ित दहेज प्रथा का अभिशाप झेलती रहती हैं और कुरूप चरित्रहीन तथा अयोग्य युवकों को आदर-सम्मान प्राप्त होता है। लड़की के माँ-बाप को भी लड़के वाले अक्सर अपमानित करते हैं और बेचारे लड़की वाले बेटी के सु की खातिर चुपचाप सिर झुकाकर सब अपमान पी जाते हैं। दहेज प्रथा के इस वीभत्स और भयानक रूप के पीछे हमारे समाज में कन्य की उपेक्षा एक प्रमुख कारण है। माता-पिता पुत्री से अधिक पुत्र को चाहते हैं तथा अधिकांश परिवारों में कन्य उपेक्षिता ही होती है। दहेजरूपी दानव का आतंक दिन पर दिन बढ़ता ही जा रहा है। धन्नासेठों ने इस कुप्रथा को और बढ़ावा दिया है। वे अपनी अथाह संपत्ति के बूते वर को मानो खरीद ही लेते हैं। जिसे बिना परिश्रम किये धन प्राप्त हो वह और मिलने की आशा रखने लगता है और यह लोभ बढ़ता ही जाता है। कुछ माता-पिता भी अपनी सीमा से अधिक खर्च करके लड़के वालो की इस लोभवृत्ति को प्र्रोत्साहन देते हैं। इससे कितनी ही गरीब ललनाओं का जीवन दोजख बन जाता है। 

हमारी शिक्षा में दोष है या संस्कारों में पर अच्छे-अच्छे पढ़े-लिखे परवार भी दहेज के मामले में नैतिकता को ताक पर रख देते हैं। दहेज-अपरारध में ज्यादातर पढ़े-लिख लोग ही संलिप्त पाए जाते हैं। गरीब और अनपढ़ तो संतोष कर लेते है। पर इन तथाकथित पढ़े-लिखे संभ्रंतों की दहेज-लिप्सा खत्म नहीं होती। वकील डॉक्र इंजीनियर अध्यापक कोई किसी से कम नहीं है। जिस बेटी के पिता के पास पर्याप्त पैसा नही होता वे अयोग्य युवकों के हाथ में बेटी का हाथ सौंप देते हैं तथा बेटी जीवन-भर आठ-आठ आँसू रोने के लिए मजबूर होती है। 

जो युवतियाँ अत्याचारों का डटकर मुकाबला करती है उन्हें या तो तलाक लेकर पिता के घर लौटना होता है या फिर अविवाहित रहकर आजीवन एकाकी रहना होता है। हालाँकि इस कुप्रथा से निपटने के लिए कड़े कानून बनाए गए हैं जिनके अनुसार दहेज लेना व देना दोनों ही जुर्म करारा दिए गए हैं लेकिन लोग सरेआम इस कानून की धज्जियाँ उड़ाते हैं। शायद ही कभी कोई दहेज-लोभी कानून के शिकंजे में फँसता है। अधिकारी दहेज-लोभी कानून के शिकंजे से बचने की कोई न कोई राह निकाल ही लेते हैं।
इस कुप्रथा के विरूद्ध आंदोलन खड़ा करना जरूरी है। इसके लिए प्रगतिशील युवक-युवतियों का संगठन बनाना चाहिए तथा विजातीय विवाद को प्रोत्साहन देना चाहिए।

Saturday, 18 November 2017

क्रिसमस पर निबंध। Christmas Essay in Hindi

क्रिसमस पर निबंध। Christmas Essay in Hindi

क्रिसमस पर निबंध। Christmas Essay in Hindi 

Christmas Essay in Hindi

क्रिसमस डे ईसाइयों का प्रमुख त्योहार है। यह हर वर्ष 25 दिसंबर को मनाया जाता है। इस दिन यीशु मसीह का जन्म हुआ था। इसे बड़ा दिन भी कहते हैं। ऐसा माना जाता है कि 25 दिसंबर से दिन बड़ा होना आरंभ हो जाता है और रात छोटी होने लगती है।

जिस प्रकार से हिन्दू हर्षोल्लास से दीपावली और होली मनाते हैं उसी प्रकार ईसाई क्रिसमस डे मनाते हैं। दुनिया में भारत ही ऐसा धर्मनिरपेक्ष देश है जिसमें प्रत्येक धर्म जाति और भाषा के लोग रहते हैं। यहाँ पर सभी को अपने-अपने धर्म को मानने और अपनी जीवन-पद्धति के अनुसार रहने की पूरी स्वतंत्रता है। यहाँ विभिन्न प्रकार के धर्मावलंबी अपने धार्मिक रीति-रिवाजों का पालन करते हुए निडरतापूर्वक आनंदमय जीवन व्यतीत कर रहे हैं। जब मुस्लिम ताजिए निकालते हैं तो यहाँ कोई उनका विरोध नहीं करता बल्कि सरकार उनकी सुरक्षा का कड़ा प्रबंध करती है। इसी प्रकार जैन¸ सिख¸बौद्ध¸ईसाई सभी की सुरक्षा व्यवस्था सरकार करती है ताकि सभी अपने-अपने धर्म का पालन करते हुए प्रेमभाव से मिल-जुल कर रह सकें।

दुनिया के सभी त्योहार और धर्म हमें आपस में एकता¸मेल-जोल और शांति से जीने का संदेश देते हैं। क्रिसमस डे के दिन ईसा मसीह का जन्म हुआ था। उनका जन्म एक यहूदी परिवार में येरूशलेम के बैतलहेम नगर (वर्तमान फिलिस्तीन) में हुआ था। उनकी माँ का नाम मरियम था। ईसा मसीह को ईसाई धर्म का प्रवर्तक माना जाता है। ईसाई धर्म में उन्हें ईश्वर का प्रिय पुत्र बताया गया है। 13 वर्ष से 29 वर्ष की अवस्था तक ईसा मसीह अज्ञात रहे। जब वे 30 वर्ष के हुए तब उन्होंने एक नए धर्म का प्रचार करना शुरू किया जो आगे चलकर ईसाई धर्म बना। वे कर्म-कांडों और पशुबलि के खिलाफ थे। उनका मानना था की ईश्वर प्रेमस्वरूप है और प्रेम से ही ईश्वर की प्राप्ति संभव है। उन्होंने अपने शत्रुओं से भी प्रेम करने का सन्देश दिया। जब उन्हें सूली पर चढ़ाया गया तब भी उन्होंने यही कहा की हे ईश्वर इन्हे क्षमा करना क्योंकि अगर इन्हे पता होता की ये क्या कर रहे हैं तो ये ऐसा कभी नहीं करते। प्रथम शताब्दी ईसवीं उनके पैदा होने के बाद से ही प्रारंभ हुई थी। उनसे पहले के समय को ईसा पूर्व कहा जाता है और बाद के समय को ईसवी कहा गया। 
जिस प्रकार हिन्दू कृष्ण के जन्मदिवस पर जन्माष्टमी का त्योहार धूमधाम से मनाते हैं वैसे ही ईसाई ईसा मसीह के जन्मदिवस पर क्रिसमस डे हर्षोल्लास से मनाते हैं। 
भारत एक ऐसा देश है जहाँ प्रत्येक धर्म को सम्मान देते हुए उस दिन राषट्रीय अवकाश दिया जाता है। हमारे यहाँ त्योहारों पर उपहार देने की परंपरा है। क्रिसमस डे पर भी लोग आपस में एक-दूसरे को उपहार देते हैं और चर्च (गिरिजाघर) में एक साथ प्रार्थना क्रिसमस डे मनाते हैं। चर्च और अपने घरों को क्रिसमस ट्री¸ बिजली के बल्बों¸ फूलमालाओं से सजाते-संवारते हैं। चर्च में मोमबत्तियाँ जलाते हं। क्रिसमस डे पर पने घर सान्ता क्लॉज का आना बहुत शुभ माना जाता है जो फादर क्रिसमस का ही स्वरूप है। सान्ता क्लॉज अपने साथ बहुत सारे उपहार भी लाता है। 

क्रिसमस डे को अर्धरात्रि में घंटियाँ बजने लगती हैं। इस त्योहार पर लोग अपने मित्र¸ पड़ोसी एवं रिश्तेदारों को बधाई-पत्र भेजते हैं तथा अपने घरों और दफ्तर में केक काटकर क्रिसमस डे मनाते हैं। इस त्योहार पर चारों ओर प्रसन्नता का वातावरण होता है। 
क्रिसमस डे को सम्पूर्ण ईसाई समुदाय मनाता है। परंतु आजकल बहुत से गैर-ईसाई भी इस त्योहार को मनाते हैं। यह त्योहार विश्व भर में मनाया जाता है। अमेरिका में तो 96 प्रतिशत लोग इस त्योहार को मनाते हैं। 
यह त्योहार प्रेम¸ शांति और समृद्धि का प्रतीक है। 

Thursday, 16 November 2017

छात्रावास से पिताजी को पत्र। Chatravas se Pitaji ko Patra

छात्रावास से पिताजी को पत्र। Chatravas se Pitaji ko Patra

छात्रावास से पिता जी को पत्र। Chatravas se Pitaji ko Patra 

आर. के. कॉलेज छात्रावास, बनारस 
5 नवम्बर 2017 
पूज्य पिताजी 
सादर प्रणाम

विषय : छात्रावास से पिताजी को पत्र। 
Chatravas se Pitaji ko Patra


मैं यहां कुशलपूर्वक हूँ और आनंद से हूँ। हमारे छात्रावास में पढ़ाई के लिए बहुत अच्छा वातावरण है। यहां के सभी विद्यार्थी और शिक्षक बहुत अच्छे और सहयोग देने वाले हैं। मैंने अपने स्वभाव से मिलते स्वभाव वाले कई मित्र बना लिए हैं जो बहुत परिश्रमी और अध्ययन शील हैं। मुझे यहां सहज स्नेह प्राप्त है, यहां शैक्षणिक गतिविधियों के कारण बहुत व्यस्तता रहती है जिनमें भाग लेना मुझे बहुत पसंद है। गणित प्रतियोगिता और हिंदी निबंध प्रतियोगिता में मैंने प्रथम स्थान प्राप्त किया है। यहाँ हर छात्र एक-दुसरे से आगे बढ़ने के लिए सदैव प्रयत्नशील रहता है इसलिए मुझे भी आगे बने रहने के लिए कठिन परिश्रम करना पड़ता है। मैं आपको विश्वास दिलाता हूँ की वार्षिक परीक्षा में भी प्रथम आकर आपको गौरवान्वित करने का पूरा प्रयत्न करूँगा। आप सबकी बहुत याद आती है, माँ को मेरा प्रणाम कहियेगा और छोटी बहन को मेरा स्नेह दीजियेगा। 
आपका प्रिय पुत्र 
राहुल गांधी 
मदिरापान एक सामाजिक कलंक पर अनुच्छेद

मदिरापान एक सामाजिक कलंक पर अनुच्छेद

मदिरापान एक सामाजिक कलंक पर अनुच्छेद 

मदिरापान एक सामाजिक कलंक

संकेत बिंदु : भूमिका, मदिरापान के दुष्परिणाम, पक्ष में तर्क, मदिरापान का विरोध 

मदिरापान सब व्यसनों की जड़ है। जब मदिरा भीतर जाती है तो हमारे सारे संस्कार, विचार, विवेक, सदभाव बाहर निकल जाते हैं। किसी ने सच ही कहा है की जहां शैतान स्वयं नहीं पहुँच पाता, वहां मदिरा को भेज देता है यानी मदिरा आदमी को शैतान बना देती है। मदिरा का सबसे पहला हमला इसको पीने वाले पर होता है। उसके फेफड़े, गुर्दे, लीवर तथा मस्तिष्क शिथिल पद जाते हैं जिससे उसे तरह-तरह की बीमारियां घेर लेती हैं। शराब पीने से घर में आर्थिक कठिनाइयां उत्पन्न होती है जिससे घर में क्लेश रहता है। पत्नी व बच्चो को भूखों रहने की नौबत आ जाती है। शराब पीने से व्यक्ति सही और गलत में फर्क नहीं कर पाता है। अनेक अपराध शराब के नशे में ही किये जाते हैं। मदिरापान करने वाले अपने पक्ष में यह तर्क देते हैं की इससे थकान दूर होती है। तनाव से मुक्ति मिलती है,ध्यान केंद्रित रहता है और काम करने में मन भी लगता है। परन्तु यह सभी बातें झूठी और तथ्यहीन हैं। जिस शराब को पीने से हाथ-पैर लड़खड़ाते हों भला उससे ध्यान कैसे केंद्रित रह सकता है ? मदिरापान केवल और केवल आत्म-नियंत्रण से रोका जा सकता है। 

Wednesday, 15 November 2017

रूपए मंगवाने हेतु पिताजी को पत्र। Letter to Father asking for money in Hindi

रूपए मंगवाने हेतु पिताजी को पत्र। Letter to Father asking for money in Hindi

रूपए मंगवाने हेतु पिताजी को पत्र

rupay mangwane hetu pitaji ko patra

पूज्य पिताजी,
चरण स्पर्श ,
विषय : रूपए मंगवाने हेतु पिताजी को पत्र।

मैं यहां स्वस्थ व प्रसन्न हूँ। आशा है, वहां भी सभी कुशल-मंगल होंगे। मेरी पढ़ाई भी ठीक से चल रही है। मान्यवर पिताजी अगले महीने दीपावली की छुट्टियां होने जा रहीं हैं। इन छुट्टियों में स्कूल की तरफ से सभी बच्चों को शिमला ले जाने का कार्यक्रम बन रहा है। मैं भी इस यात्रा पर जाना चाहता हूँ। आपसे निवेदन है की मुझे इस यात्रा पर जाने की अनुमति प्रदान करें। यदि आपकी अनुमति हो तो मुझे मनीआर्डर द्वारा पांच सौ रूपए भिजवाने की कृपा करें।
माता जी को चरण स्पर्श और छोटी बहन को मेरी ओर से स्नेह दे।

दिनांक : 
आपका पुत्र 
पंकज 
 छात्रवृत्ति के लिए प्रधानाचार्य को पत्र। Scholarship Letter in Hindi

छात्रवृत्ति के लिए प्रधानाचार्य को पत्र। Scholarship Letter in Hindi

सेवा में,
श्री प्रधानाध्यापक महोदय,
राजकीय इंटर कॉलेज,
गोरखपुर 


विषय : छात्रवृत्ति के लिए प्रधानाचार्य को पत्र। 
महोदय,
           सेवा में सविनय निवेदन है कि मैं आपके विद्यालय में दशवीं कक्षा का विद्यार्थी हूँ। मेरे पिताजी सरकारी दफ्तर में चपरासी थे परन्तु अब वह सेवानिवृत्त हो गए हैं। हम पांच भाई-बहन हैं अतः घर का खर्च बड़ी ही कठिनाई से चल पा रहा है। इन परिस्थितियों के कारण मेरा पढ़ाई कर पाना असंभव हो गया है। अतः आपसे अनुरोध है कि मुझे छात्रवृत्ति प्रदान करने की कृपा करें, जिससे मैं अपनी पढ़ाई जारी रख सकूं। मैं नवम कक्षा प्रथम श्रेणी में उत्तीर्ण हुआ हूँ। इसके अतिरिक्त मैं अंतर्विद्यालीय शतरंज प्रतियोगिता में भी प्रथम आया हूँ। 
आशा करता हूँ की मुझे छात्रवृत्ति प्रदान कर दी जायेगी। 

आपका आज्ञाकारी शिष्य 
हिमांशु शर्मा
 दिनांक : 16-11-2017 


पत्र संख्या : 2 
सेवा में,
प्रधानाचार्य 
के. पी. एस. इंटर कॉलेज 
इलाहाबाद। 

विषय : प्रधानाचार्य को छात्रवृति के लिए आवेदन पत्र। 
Scholarship Letter in Hindi


माननीय महोदय ,

                   सविनय निवेदन है की मैं आपके विद्यालय का कक्षा नवम 'अ' का छात्र हूँ। मैं अपनी कक्षा में प्रतिवर्ष अच्छे अंकों से उत्तीर्ण होता रहा हूँ। मैं विद्यालय की क्रिकेट टीम का सदस्य भी हूँ। इसके अतिरिक्त मैं विद्यालय की प्रमुख गतिविधियों में हमेशा भाग लेता हूँ और विद्यालय का गौरव बढ़ाने का प्रयास करता हूँ। मैं अपनी कक्षा का मॉनिटर भी हूँ। अपने अनुशासित व्यवहार के कारण मैं सभी अध्यापक-अध्यापिकाएं का प्रिय हूँ। 

मेरे पिताजी पिछले माह एक सड़क दुर्घटना में मारे गए। मेरी माँ एक विद्यालय में चतुर्थ श्रेणी की कर्मचारी हैं। वह इस आर्थिक संकट के समय में पूरी गृहस्थी का बोझ नहीं उठा पा रही हैं। मेरा एक छोटा भाई और एक बहन भी है। मेरा आपसे निवेदन है की घर की आर्थिक स्थिति ठीक न होने के कारण मुझे छात्रवृत्ति देने की कृपा करें। 

अपनी पढ़ाई को सुचारु रूप से जारी रखने के लिए मुझे छात्रवृत्ति की बहुत जरुरत है अन्यथा बिना पढ़ाई के मेरा भविष्य अंधकारमय हो जाएगा। मैं कुछ करके अपनी माँ का सहारा बनना चाहता हूँ। अतः आप मुझे छात्रवृत्ति प्रदान कर मुझे अच्छे भविष्य की ओर अग्रसर करें। मैं आपका सदा आभारी रहूँगा। 
धन्यवाद 
आपका आज्ञाकारी शिष्य 
सत्यम तिवारी 
कक्षा 9 'अ'


पुस्तक विक्रेता से पुस्तकें मँगवाने हेतु पत्र। Letter to Bookseller for ordering books in Hindi

पुस्तक विक्रेता से पुस्तकें मँगवाने हेतु पत्र। Letter to Bookseller for ordering books in Hindi

पुस्तक विक्रेता से पुस्तकें मँगवाने हेतु पत्र। 

डी ए वी गर्ल्स कॉलेज 
मेस्टन रोड 
लखनऊ कैन्ट 
सेवा में,
प्रबंधक महोदय 
नवीन प्रकाशन 
922, कूँचा रोहिल्ला खान 
नई दिल्ली - 2 

विषय : पुस्तक विक्रेता से पुस्तकें मँगवाने हेतु पत्र। 

मान्यवर !
आपसे अनुरोध है कि  निम्नलिखित पुस्तकें उपरोक्त लिखित पते पर शीघ्रातिशीघ्र भेजने का कष्ट करें। 500 रूपए अग्रिम राशि भेजी जा रही है। 
स्मरण रहे की सभी पुस्तकें ठीक स्थिति में होनी चाहिए। 

  1. राजनीति शास्त्र                               प्रथम वर्ष                    5  प्रतियां 
  2. अर्थ शास्त्र                                       प्रथम वर्ष                    10  प्रतियां
  3. भारत का इतिहास                           एस के चंद                 8  प्रतियां
  4. उपन्यास - शतरंज के खिलाड़ी        मुंशी प्रेमचंद               5  प्रतियां
  5. उपन्यास मेलुहा के मृत्युंजय            अमीश त्रिपाठी            2  प्रतियां
भवदीय 

दीपक शुक्ला 
पुस्तकाध्यक्ष 
दिनांक : 15-11-2017 



पत्र संख्या : 2 

अनिल शर्मा,
के ब्लॉक किदवई नगर 
कानपुर। 
16-नवम्बर-2017 

सेवा में,
श्रीमान प्रबंधक महोदय,
राजकमल प्रकाशन 
विजयनगर, मेरठ। 

विषय : पुस्तक विक्रेता से पुस्तकें मँगवाने हेतु पत्र। 
letter to bookseller for ordering books in hindi


महोदय कृपया निम्नलिखित पुस्तकें अविलम्ब वी.पी.सी. द्वारा उचित कमीशन काटकर उपर्युक्त पते पर भिजवाने का कष्ट करें। 
इस पत्र के साथ 100/- रूपए का ड्राफ्ट की अग्रिम राशि भिजवा रहा हूँ। पुस्तकें भेजते समय इस बात पर ध्यान दें की किताबें कहीं से फटी न हों तथा नए संस्करण की हो। पुस्तकों के नाम निम्नलिखित हैं। 

  1. हिंदी व्याकरण         कक्षा 9 - 10            5 प्रतियां 
  2. संस्कृत                    कक्षा 6  - 8             3 प्रतियां 
  3. बीजगणित               कक्षा 10                 5 प्रतियां 
धन्यवाद। 
भवदीय 
अनिलशर्मा