Monday, 23 April 2018

विज्ञान के लाभ और हानि पर निबंध। Vigyan se Labh aur Hani par Nibandh

विज्ञान के लाभ और हानि पर निबंध। Vigyan se Labh aur Hani par Nibandh

विज्ञान के लाभ और हानि पर निबंध। Vigyan se Labh aur Hani par Nibandh

Vigyan se Labh aur Hani par Nibandh
आज का युग विज्ञान का युग है। आज जीवन के हर क्षेत्र में विज्ञान के चमत्कार दिखाई देते हैं। विज्ञान के इन अनेक आविष्कारों ने मानव जीवन को पहले से अधिक सरल बना दिया है। विज्ञान ने वायुयान, जलयान रॉकेट, कार व ट्रेन आदि यातायात के साधनों का आविष्कार करके वर्षों की यात्रा को दिनों में और दिनों की यात्रा घंटों में संभव कर दी है। तार, टेलीफोन और बेतार के तार द्वारा संवाद भेजने में बड़ी सुविधा हो गई है। इन सब के द्वारा आज संसार बहुत छोटा हो गया है।

मानव चंद्रमा पर भी पहुंच गया है और अब तो उसके कदम मंगल पर भी पड़ने वाले हैं। चिकित्सा के क्षेत्र में भी विज्ञान ने अनेक चमत्कार किए हैं। जिन रोगों को पहले असाध्य मान उनका इलाज नहीं किया जाता था, आज उन लोगों का भी इलाज किया जा सकता है। इंजेक्शन तथा शल्य चिकित्सा द्वारा आज असाध्य से असाध्य रोगों का भी आसानी से उपचार किया जा सकता है। प्लास्टिक सर्जरी द्वारा कृत्रिम अंग बखूबी लगा दिए जाते हैं, तथा अल्ट्रासाउंड द्वारा सूक्ष्म से सूक्ष्म अंगों के चित्र खींचे जा रहे हैं। आंखों का भी दूसरे के शरीर में प्रत्यारोपण संभव हो गया है। 

मनोरंजन के क्षेत्र में रेडियो, टेलीविजन तथा वीसीआर आदि विज्ञान की ही देन है। जिन पर मनोरंजक कार्यक्रम जैसे संवाद व संगीत सुनने को मिलते हैं। टेलीविजन के माध्यम से घर बैठे ही पूरी दुनिया का हाल जाना जा सकता है। मुद्रण यंत्र भी विज्ञान की ही देन है, जिससे पुस्तक व समाचार पत्रों की अनेक प्रतियां मुद्रित की जा सकती हैं। समाचार पत्रों से विश्व भर के समाचार जाने जा सकते हैं। 

विज्ञान का आज सबसे महत्वपूर्ण आविष्कार बिजली है। जिससे हमें प्रकाश, शक्ति तथा तापमान प्राप्त होता है। कारखाने इसी से चलाए जाते हैं। इन सब लाभकारी आविष्कारों के साथ-साथ विज्ञान ने हमें एक ऐसी विनाशकारी शक्ति भी दी है, जिसका हम दुरुपयोग करें तो पूरे संसार को नष्ट होने का भय बना रहता है। वह है परमाणु शक्ति। इसके अतिरिक्त बड़े-बड़े विनाशक अस्त्र-शस्त्रों का भी निर्माण किया गया है, जिससे मानवता के विनाश का भय उपस्थित हो गया है। 

अतः निष्कर्ष यह है कि विज्ञान ने हमें जो कुछ भी दिया है, हम उसका सही उपयोग करें तथा मानव हित में ही उसका उपयोग किया जाए तब तो विज्ञान वरदान है, परंतु यदि इसका उपयोग मानव के विनाश के लिए करें तो इससे बड़ा कोई अभिशाप नहीं।
सिनेमा या चलचित्र पर निबंध। Essay on Cinema in Hindi

सिनेमा या चलचित्र पर निबंध। Essay on Cinema in Hindi

सिनेमा या चलचित्र पर निबंध। Essay on Cinema in Hindi

सिनेमा या चलचित्र पर निबंध
मनोरंजन के अनेक साधनों जैसे रेडियो, टेलीविजन, फोटोग्राफी, साहित्य, चित्रकला तथा खेलकूद आदि में सबसे अधिक लोकप्रिय साधन चलचित्र अथवा सिनेमा है। आज चलचित्र का सर्वत्र स्वागत होता है। यह भरपूर मनोरंजन करने वाला सस्ता साधन है। चलचित्र जहां एक और मनोरंजन का अच्छा साधन है, वहीं दूसरी ओर इसके अनेक अन्य लाभ भी हैं। इस में प्रयुक्त अच्छी सी कहानी, सुंदर गीत या कविता, कर्णप्रिय संगीत और छाया चित्रों के माध्यम से प्रकृति के सुंदर से सुंदर दृश्य देखने को मिलते हैं। 

ठाठें मारता समुद्र, बर्फ से ढकी पहाड़ों की चोटियों, लहलहाते हुए हरे-भरे खेत, कल-कल करती हुई नदियां, वन-उपवन में पशु-पक्षियों की अठखेलियां आदि दृश्य सिनेमा के पर्दे पर साकार हो उठते हैं। सस्ते मनोरंजन के साथ साथ सिनेमा से ज्ञान भी बढ़ता है। हमें भूगोल-इतिहास जैसे विषयों का ज्ञान भी सिनेमा से मिलता है। जिन कुरीतियों को दूर करने में बड़े-बड़े उपदेशक, प्रचारक और शिक्षक असफल हो जाते हैं, उनको दूर करने में शिक्षाप्रद फिल्में बड़ी सहायक सिद्ध हुई हैं। 

सिनेमा द्वारा विज्ञापन देकर व्यापार में आशातीत सफलता प्राप्त की जा सकती है। भारत सरकार के विभाग द्वारा वृत्तचित्र इस दिशा में अच्छा योगदान कर रहे हैं। चलचित्र जीवन सुधार का साधन है तो जीवन के पतन का कारण भी है। पैसा कमाने के लोग हमें फिल्मी निर्माता ऐसी फिल्में बनाते हैं जिन्हें देखकर देश के नौजवानों का चारित्रिक पतन हो रहा है। 

जब विद्यार्थियों को सिनेमा देखने की लत पड़ जाती है, तो वह विद्यालय से भागकर और घर से पैसे चुराकर सिनेमा देखने जाते हैं। वह वहां पर चोरी, डकैती, अपहरण और कत्ल आदि के दृश्य देखकर उनका अनुकरण करने का प्रयास करते हैं। अतः फिल्म निर्माताओं को चाहिए कि ऐसे चलचित्रों का निर्माण करें जिससे जीवन का भरपूर मनोरंजन भी होता जीवन के लिए आशाजनक संदेश भी हो।






Sunday, 22 April 2018

मेरे जीवन का सबसे सुखद दिन पर निबंध। hindi essay on memorable day

मेरे जीवन का सबसे सुखद दिन पर निबंध। hindi essay on memorable day


मेरे जीवन का सबसे सुखद दिन पर निबंध

hindi essay on memorable day
मानव जीवन अनेक घटनाओं से परिपूर्ण है। इसमें कुछ घटनाएं खुशी देने वाली होती हैं तथा कुछ दुख पहुंचाने वाली होती है। 16 मार्च 2008 का दिन मेरे लिए सबसे दुख भरा था। उस दिन मैं रोजाना की तरह प्रातः 6:00 बजे उठा। मेरी माता जी ने मेरे लिए नाश्ता तैयार किया। जैसे ही मैंने नाश्ता प्रारंभ किया मुझे टेलीफोन से सूचना मिली कि मेरे चाचा जी के साथ अचानक गंभीर दुर्घटना हो गई। 

हम सभी घबरा गए चाय का प्याला तुरंत मेज पर छोड़कर मेरे माता-पिता तथा बड़े भाई साहब चाचा जी से मिलने चल दिए। वहां जाकर पता चला कि उन्हें गंभीर चोटें आई हैं तथा वह सोहन अस्पताल में भर्ती हो गए हैं। संयोगवश मेरा इसी दिन बारहवीं कक्षा का विज्ञान का पर्चा था। मेरी बहुत अच्छी तैयारी थी परंतु विज्ञान का पेपर कुछ कठिन आ गया और कुछ मानसिक परेशानी के कारण वह पर्चा बहुत ही खराब गया। मुझे उस में पास होने में भी संदेह है। जब मैंने अपने पिताजी को यह बात बताई तो उन्हें यह जानकर बहुत दुख हुआ। 

उन्हें मुझसे बहुत आशाएं थी, दुर्भाग्य से वह दिन मेरे लिए बड़ा मनहूस रहा। उस दिन एक और दुख भरी घटना घटित हुई। हमारा अपने पड़ोसी से छोटी सी बात पर झगड़ा हो गया जिसने इतना तूल पकड़ा कि पुलिस केस बन गया। पड़ोसी ने पुलिस को बुला लिया और हमारे विरुद्ध एक झूठा मुकदमा खड़ा कर दिया। इसी मुकदमे में मेरे पिताजी को पुलिस पकड़ कर ले गई। कई दिनों तक पुलिस घर के चक्कर लगाती रही तथा मेरे परिवार वालों को परेशान करती रही। दो दिन बाद उनकी जमानत हुई तब जाकर कुछ राहत मिली।

इतने से ही छुटकारा नहीं मिला। रात को 8:00 बजे तार द्वारा सूचना मिली कि हमारी नानी जो काफी समय से बीमार चल रही थी, उनका अचानक पर स्वर्गवास हो गया। थोड़ा आराम मिला था कि अचानक फिर भागादौड़ी शुरू हो गई। मतलब यह कि यह दिन हमारे लिए बड़ा ही दुखदाई रहा। उस दिन किसी तरह ना तो मन को शांति मिली और ना ही शरीर को आराम मिला। मेरे जीवन का यह दुखद दिन था, जो मुझे कभी नहीं भूलेगा।


मेरे जीवन का सबसे दुखदायी दिन। The worst day of my life essay in hindi

मेरे जीवन का सबसे दुखदायी दिन। The worst day of my life essay in hindi

मेरे जीवन का सबसे दुखदायी दिन पर निबंध 

मेरे जीवन का सबसे दुखदायी दिन
मानव जीवन सुख दुख का मिश्रण है। यह अनेक प्रकार की घटनाओं से भरा पड़ा है। इसमें कुछ घटनाएं खुशी वाली होती हैं, तो कुछ घटनाएं दुख भरी होती हैं। 16 जून 2013 का दिन मेरे जीवन का सबसे खुशी वाला दिन था। इस दिन मेरे जीवन में अनेक प्रकार की खुशी देने वाली घटनाएं एक साथ घटी थी। जिन्हें मैं कभी नहीं भुला सकता। 

मेरा बड़ा भाई काफी समय से बेरोजगार था। इसी कारण से घर-परिवार का खर्चा चलाना मुश्किल हो रहा था। हमारे परिवार के सभी सदस्य उसके बेरोजगारी के कारण दुखी थे। उसी दिन अचानक उसकी नौकरी के लिए नियुक्ति पत्र डाक द्वारा प्राप्त हुआ। पत्र को पाते ही हम सब की खुशी का ठिकाना नहीं रहा। मेरे भाई की नियुक्ति आयकर अधिकारी के पद पर हुई थी। इसे जानकर तो हमारी खुशी और भी अधिक हो गई। 

यह खुशी की लहर बड़ी तेजी से सारे परिवार तथा मोहल्ले में फैल गई। तभी एक और खुशी की सूचना टेलीफोन के माध्यम से प्राप्त हुई। अचानक टेलीफोन की घंटी बजी जैसे ही मैंने टेलीफोन सुना तो पता लगा कि मेरी बड़ी बहन के यहां एक पुत्र ने जन्म लिया है। यह सुनकर तो हम खुशी से फूले न समाए। इसका विशेष कारण था कि मेरी बहन को यह पुत्र 15 वर्ष के अंतराल में हुआ था। इस खुशी का हम पूरी तरह आनंद भी नहीं उठा पाए थे कि तभी मेरे एक मित्र का टेलीफोन आया। उसने मुझे बताया कि मेरी 12वीं कक्षा का परिणाम घोषित हो गया था। जिसमें मैं पास तो हुआ ही साथ ही मुझे प्रथम श्रेणी प्राप्त हुई तथा मैं अपने विद्यालय में प्रथम रहा। जब यह समाचार मिला तो हम सब की खुशी का ठिकाना नहीं रहा। 

इतनी सारी खुशियां एक साथ प्राप्त हुई। इन सब खुशियों के कारण हमने एक शानदार पार्टी का आयोजन किया जिसमें अपने सभी मित्रों व पड़ोसियों को बुलाया। वह सभी हमारी खुशी में सम्मिलित हुए। सभी ने हमको एक साथ बधाइयां ही बधाइयां दे डाली। सचमुच यह मेरे जीवन का सर्वाधिक खुशी वाला दिन था ऐसा संयोग जीवन में बार-बार नहीं होता।

Saturday, 21 April 2018

संगति का प्रभाव पर निबंध। Satsangati ka Prabhav

संगति का प्रभाव पर निबंध। Satsangati ka Prabhav

संगति का प्रभाव पर निबंध। Satsangati ka Prabhav par Nibandh

संगति का प्रभाव
सत्संगति शब्द से अभिप्राय है अच्छे लोगों की संगति में रहना। उनके अच्छे विचारों को अपने जीवन में उतारना तथा उनकी अच्छी आदतों को अपनाना। प्रत्येक मनुष्य अपने जीवन को सुखी बनाने के लिए अन्य मनुष्यों का संग ढूंढता है। यह संगति जो उसे मिलती है, वह अच्छी भी हो सकती है तथा बुरी भी। यदि उसे अच्छी संगति मिल गई तो उसका जीवन सुखपूर्वक बीतता है। यदि संगति बुरी हुई तो जीवन दुखदाई हो जाता है। अतः मनुष्य जैसी संगति में रहता है, उस पर वैसा ही प्रभाव पड़ता है। 

एक ही स्वाति बूंद केले के गर्भ में पड़कर कपूर बन जाती है, सीप में पड़कर मोती बन जाती है और अगर सांप के मुंह में पड़ पड़ जाए तो विष बन जाती है। पारस के छूने से लोहा सोना बन जाता है, पुष्प की संगति में रहने से कीड़ा भी देवताओं के मस्तक पर चढ़ जाता है। महर्षि वाल्मीकि नामक एक ब्राह्मण थे, किंतु भीलों की संगति में रहकर वह डाकू बन गए। बाद में वही डाकू महर्षि नारद की संगति से तपस्वी बनकर महर्षि वाल्मीकि नाम से प्रसिद्ध हुए। इसी प्रकार अंगुलीमाल नामक भयंकर डाकू भगवान बुद्ध की संगति पाकर महात्मा बन गया। उत्तम व्यक्तियों के संपर्क में आने से सदगुण स्वयं ही आ जाते हैं। गंदे जल का नाला भी पवित्र पावन भागीरथी में मिलकर गंगाजल बन जाता है। किसी कवि ने ठीक ही कहा है – जैसी संगति बैठिए तैसी ही फल दीन 

उन्नति करने वाले व्यक्ति को अपने इर्द-गिर्द के समाज के साथ बड़े सोच-विचारकर संपर्क स्थापित करना चाहिए, क्योंकि मानव मन तथा जल का स्वभाव एक जैसा होता है। यह दोनों जब गिरते हैं, तो तेजी से गिरते हैं, परंतु इन्हें ऊपर उठाने में बड़ा प्रयत्न करना पड़ता है। बुरे व्यक्ति का समाज में बिल्कुल भी आदर नहीं होता। कुसंगति काम, क्रोध, मोह और मद पैदा करने वाली होती है। अतः प्रत्येक मानव को कुसंगति से दूर रहना चाहिए क्योंकि उन्नति की एकमात्र सीढ़ी सत्संगति है। बुद्धिमान व्यक्ति को सत्संगति की पतवार से अपने जीवनरूपी नौका को भवसागर पार लगाने का प्रयत्न करना चाहिए तभी वह ऊंचे से ऊंचे पहुंच सकता है और समाज में सम्मान प्राप्त कर सकता है।

मनोरंजन के आधुनिक साधन पर निबंध

मनोरंजन के आधुनिक साधन पर निबंध

मनोरंजन के आधुनिक साधन पर निबंध 

manoranjan ke adhunik sadhan in hindi
सुबह से शाम तक किए गए श्रम से थका हुआ मानव शारीरिक विश्राम के साथ-साथ मानसिक विश्राम भी चाहता है जिससे उसका थका-मांदा मन किसी तरह बदल जाए और वह फिर से प्रफुल्लित हो उठे। मनोरंजन के पीछे मनुष्य की यही प्रवृत्ति है, अतः वह अपनी रुचि के अनुसार मनोरंजन के साधन खोजता रहता है। प्राचीन युग में मानव और उसके यापन के साधन बहुत सरल थे। तब उसे मनोरंजन के इतने साधनों की आवश्यकता नहीं थी, परंतु आज के अस्त-व्यस्त एवं संघर्षमय जीवन में उसे मनोविनोद के साधनों की परम आवश्यकता है। 
प्राचीन काल में मनोरंजन के साधन केवल खेलकूद होते थे इसके अतिरिक्त कठपुतलियों के खेल, तमाशे, नौटंकी या रामलीला और रासलीला आदि से भी मनोरंजन किया जाता था। आधुनिक युग में तो अनेक प्रकार के मनोरंजन के साधन हैं। इनमें से अनेक तो विज्ञान की प्रगति की देन है, जिनमें से रेडियो, दूरदर्शन तथा सिनेमा प्रमुख है। इनमें इतना आकर्षण है कि बच्चे से लेकर बूढ़े तक सभी इनकी तरफ आकर्षित हो गए हैं। रेडियो के द्वारा जिन कार्यक्रमों को सुनकर आनंद दिया जाता है, वहीं दूरदर्शन द्वारा उन्हीं कार्यक्रमों में भाग लेने वालों को देखकर अधिक आनंद लिया जाता है। 

इन कार्यक्रमों में गाने, नाटक, कवि सम्मेलन, हास्य परिहास आदि है। सिनेमा को देखने के लिए हमें सिनेमाघरों तक जाना पड़ता है, परंतु इनके संगीत और अभिनय को चित्रपट पर देखकर अधिक मनोरंजन हो जाता है। क्रिकेट, हॉकी, फुटबॉल, बास्केटबॉल, टेनिस और कबड्डी आदि मैदान में खेले जाने वाले खेलों से खिलाड़ी और दर्शकों का अच्छा मनोरंजन हो जाता है। छात्रों के लिए यह अत्यंत लाभकारी भी हैं। शतरंज, चौपड़ का खेल, सांप-सीढ़ी, कैरम तथा लूडो आदि खेलों से घर पर बैठकर मनोरंजन किया जा सकता है। इनमें शतरंज तो ऐसा खेल है कि इसके खिलाड़ी खाना पीना भी भूल जाते हैं। 

भ्रमण करना भी मनोरंजन का एक सुंदर साधन है। मेले, प्रदर्शनियां, सर्कस, चिड़ियाघर और अजायबघर भी मनोरंजन में सहायक होते हैं। शिक्षित वर्ग अपना मनोरंजन पुस्तकालयों में जाकर कविता, कहानी, नाटक तथा उपन्यासों को पढ़कर भी किया करते हैं। कुछ संगीतप्रेमी लोग वाद्यों को बजा कर तथा उनकी मधुर धुनों को सुनकर ही आनंद प्राप्त कर लेते हैं। चित्रकारी तथा शिल्पकारी भी अमूल्य आनंद देने में पीछे नहीं है। 

सारांश यह है कि मनोरंजन आधुनिक जीवन में अत्यंत आवश्यक है। इसके बिना जीवन नीरस रहता है परंतु हमें चाहिए कि अपनी रुचि के अनुसार उत्तम कोटि के साधनों का प्रयोग करें यह। हमारे जीवन को सुकून तथा आनंद प्रदान करते हैं।


Friday, 20 April 2018

व्यायाम के लाभ पर छोटा निबंध। Short Essay on Benefits of Exercise in Hindi

व्यायाम के लाभ पर छोटा निबंध। Short Essay on Benefits of Exercise in Hindi

व्यायाम के लाभ पर छोटा निबंध। Short Essay on Benefits of Exercise in Hindi

व्यायाम के लाभ पर छोटा निबंध
पहला सुख निरोगी काया के अनुसार शरीर का निरोग तथा स्वस्थ रहना ही सबसे बड़ा सुख है। क्योंकि अस्वस्थ व्यक्ति ना कोई काम कर सकता है, और ना ही संसार के सुखों को भोग सकता है। स्वस्थ शरीर के लिए व्यायाम अत्यंत आवश्यक है। जो व्यक्ति नित्य व्यायाम करते हैं वह सदैव स्वस्थ रहते हैं। व्यायाम से अभिप्राय है की शरीर के अंगों का समुचित विकास। अतः व्यायाम करने से हाथ-पैर और शरीर के अन्य अंग बलिष्ठ हो जाते हैं। शरीर में स्फूर्ति उत्पन्न हो जाती है। 

व्यायाम करने से पाचन क्रिया भी ठीक रहती है। भूख समय पर लगती है। इससे शरीर में रक्त का निर्माण भली-भांति होने लगता है तथा रक्त का संचार तीव्र गति से होता है काया हष्ट-पुष्ट होती है तथा मन प्रसन्न रहता है। व्यायाम अनेक प्रकार से किए जा सकते हैं जैसे दंड-बैठक लगाना, कुश्ती-करना, दौड़ लगाना, रस्सी कूदना, घुड़सवारी करना इत्यादि। यहां तक की तैरना भी एक अच्छा व्यायाम है। आसन और प्राणायाम करना भी उत्तम प्रकार के व्यायाम हैं। खेल खेलने से भी व्यायाम हो जाता है। मस्तिष्क से काम करने वालों के लिए प्रातः घूमना, सूर्य नमस्कार आदि लाभकारी व्यायाम है। 

शरीर का प्रभाव मन पर भी पड़ता है। स्वस्थ शरीर की ही स्वस्थ मन निवास करता है। साउंड माइंड इन ए साउंड बॉडी वाली कहावत प्रसिद्ध है अतः समय निकालकर हमें नित्यप्रति थोड़ा-बहुत व्यायाम अवश्य करना चाहिए। प्रातः काल खुले वातावरण में सैर करना भी व्यायाम का एक रुप है। इससे हमें प्रातः काल जल्दी उठने की आदत पढ़ती है तथा हमारी दिनचर्या नियमित रूप से चलती है। सैर करना बिना मूल्य का अनमोल व्यायाम है।
दहेज प्रथा पर 300 शब्द का निबंध। Essay on Dowry System in Hindi

दहेज प्रथा पर 300 शब्द का निबंध। Essay on Dowry System in Hindi

दहेज प्रथा पर 300 शब्द का निबंध। Essay on Dowry System in Hindi

Essay on Dowry System in Hindi
दहेज प्रथा से अभिप्राय उस धन सामग्री और संपत्ति आदि से होता है जो कि विवाह में कन्या पक्ष की ओर से वर पक्ष को दी जाती है। इसके अतिरिक्त यह धनराशि विवाह से पूर्व भी तय करके कन्या पक्ष वाले वर पक्ष वालों को दे दिया करते हैं। प्राचीन काल में तो इस दहेज प्रथा का प्रचलन केवल ऊंचे कुलों में ही होता था परंतु वर्तमान युग में तो यह प्रायः प्रत्येक परिवार में ही प्रारंभ हो गई है। 

इस दहेज प्रथा के कारण विवाह एक व्यापार प्रणाली बन गया है। यह हिंदू समाज का शत्रु तथा उस पर एक कलंक के समान है। इसमें ना जाने कितने घर बर्बाद कर दिए हैं। कितनों को भुखमरी की कगार पर लाकर खड़ा कर दिया है तथा कितनी ही कुमारियों को अल्प आयु में ही घुट-घुट कर मरने को विवश कर दिया है। इस प्रथा के कारण समाज में बाल विवाह, अनमेल विवाह तथा विवाह-विच्छेद जैसी अनेक कुरीतियों ने जन्म ले लिया है। इससे समाज की प्रगति रुक गई है। इसी दहेज प्रथा के कारण कितनी ही नारियां विवाह के उपरांत जलाकर मार दी जाती हैं। इसके कारण बहुत से परिवार तो लड़की के जन्म लेते ही दुखी हो जाते हैं। 

यह हमारे समाज के लिए एक अभिशाप सा है। इससे छुटकारा पाने के लिए हमें भरसक प्रयत्न करने चाहिए। इसके लिए हम नवयुवकों को अंतर्जातीय विवाह के लिए प्रोत्साहित कर सकते हैं क्योंकि इससे वर ढूंढने का क्षेत्र विस्तृत हो जाता है। इसके अतिरिक्त सरकार को समाज सुधारको, कवियों, उपन्यासकारों, पत्रकारों तथा चलचित्र निर्माताओं आदि की सहायता से समाज में दहेज के विरुद्ध प्रचार करना चाहिए। स्त्री शिक्षा पर जोर दिया जाना चाहिए ताकि वे इस प्रथा का डटकर सामना कर सकें। यह दहेज प्रथा हमारे समाज में अनेकों अबलाओं को नित्यप्रति काल के ग्रास में पहुंचा रही है। यह प्रथा दिन प्रतिदिन विकराल रूप धारण कर रही है। धीरे-धीरे सारा समाज इसकी चपेट में आता जा रहा है। अतः हम सब को मिलकर इस प्रथा की जड़ को ही समाप्त कर देना चाहिए तभी हमारा समाज प्रगति के पथ पर आगे बढ़ सकता है।
स्वच्छ भारत अभियान पर भाषण। Speech on Swachh Bharat Abhiyan in Hindi

स्वच्छ भारत अभियान पर भाषण। Speech on Swachh Bharat Abhiyan in Hindi

स्वच्छ भारत अभियान पर भाषण। Speech on Swachh Bharat Abhiyan in Hindi

स्वच्छ भारत अभियान पर भाषण
प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने 2 अक्टूबर 2014 को राष्ट्रीय स्वच्छता अभियान की घोषणा की। यह सही है अर्थों में महात्मा गांधी को सच्ची श्रद्धांजलि थी क्योंकि बापू सदा ही स्वच्छता पर जोर देते थे। प्रधानमंत्री ने छोटे बड़े सभी नागरिकों से इस अभियान से जुड़ने का आवाहन किया है। उन्होंने स्वयं सड़क पर झाडू लगाकर इस अभियान का शुभारंभ किया है। उनके अनुसार देश को स्वच्छ रखना ना केवल सरकार का बल्कि प्रत्येक नागरिक का कर्तव्य होता है। स्वच्छ वातावरण भला किसे अच्छा नहीं लगता है। 
"गांधीजी के सपनों का भारत बनायेंगे, चारो तरफ स्वच्छता फैलायेंगे"

हम सभी जानते हैं कि गंदगी से कितनी बीमारियां फैलती हैं। मक्खी-मच्छर व कीट-पतंगे जन्म लेते हैं जो चेचक हैजा डेंगू और मलेरिया जैसी बीमारियां फैलाते हैं। यदि हम अपने आसपास स्वच्छता का ध्यान रखेंगे तो इन सभी प्रकार की बीमारियों से बचा जा सकता है। सरकार अपनी ओर से इस अभियान में पूरा जोर लगा रही है। सफाई कर्मचारियों को नियमित रूप से सड़कों का गलियों की सफाई करने के निर्देश दिए गए हैं। गांवों शहरों में सार्वजनिक शौचालय का निर्माण किया जा रहा है। नदी-तालाबों में कूड़ा-कचरा फेंकने पर रोक लगा दी गई है, जगह जगह जमा कूड़े-कचरे का सही निस्तारण किया जा रहा है।
"गंदगी को दूर भगाओ, भारत को स्वच्छ बनाओ"

हम सभी बच्चों और बड़ों का भी यह कर्तव्य है कि हम सबके हित में इस अभियान में सरकार का पूरा सहयोग दें। हमें अपने घरों दफ्तरों स्कूलों में वातावरण को स्वच्छ रखना चाहिए उनके अंदर या बाहर कहीं भी गंदगी कूड़ा गंदा पानी इत्यादि एकत्र नहीं होने देना चाहिए। यहां-वहां थूकना और मल मूत्र त्याग नहीं करना चाहिए। इनके लिए निर्धारित स्थानों पर ही यह करना चाहिए। याद रखें जब हम स्वच्छ रहेंगे तभी हम स्वस्थ रहेंगे और आगे बढ़ेंगे। और अंत में मैं अपनी वाणी को बस इसी नारे के साथ अपनी वाणी को विराम दूंगा की - 
"कदम से कदम मिलाना है भारत को स्वच्छ बनाना है"

Wednesday, 18 April 2018

भारतीय त्योहारों का महत्व पर निबंध

भारतीय त्योहारों का महत्व पर निबंध

भारतीय त्योहारों का महत्व पर निबंध

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भारतीय पर्व और त्योहार भारतीय सभ्यता और संस्कृति के दर्पण हैं, जीवन के श्रृंगार हैं, राष्ट्रीय उल्लास, उमंग और उत्साह के प्राण हैं; विभिन्नता की इंद्रधनुषी आभा में एकरूपता और अखंडता के प्रतीक हैं और जीवन के अमृत उत्सव हैं।

भारतीय पर्व और त्यौहार गहन सांस्कृतिक अध्ययन, पौराणिक आख्यान, लोकरंजनात्मक वैज्ञानिक दृष्टिकोण, राजनीतिक पुनर्जागरण, आर्थिक संवर्धन एवं उत्साह पूर्ण सामाजिक जीवन के अभिराम अभिव्यंजक हैं। -डॉक्टर सीताराम झा ‘श्याम’ के अनुसार 

भारतीय संस्कृति आनंदवाहिनी है, उल्लास-सलिला है, अतः हमारे सारे पर्व मंगल माधुर्य से ओतप्रोत हैं। इसलिए यहां प्रत्येक दिन पर्व है, पूजा-अर्चना का प्रसंग है। भारत को त्योहारों का देश है। पंचांग खोलकर देखिए हर दिन कोई ना कोई त्यौहार है, मेला है। इनमें प्रमुख पर्व चार हैं। होली रक्षाबंधन दशहरा और दिवाली।  होली आपसी मेल मिलाप का पर्व है। रक्षाबंधन वस्तुतः भाई बहन के पावन प्रेम की रक्षा का त्योहार है। दशहरा असत्य और आसुरी प्रवृत्ति पर सत्य और देवत्व की विजय का साक्षी है। शक्ति की आराधना का पर्व है। दीपावली एक ओर अंधकार पर ज्योति की विजय का संदेश देता है, तो दूसरी ओर भगवती लक्ष्मी की आराधना और स्वागत का पर्व है। समाज की भौतिक समृद्धि लक्ष्मी पर ही आश्रित है। 

ऋतु-परिवर्तन के संदेशवाहक दिवस भी पर्व रूप में प्रसिद्ध हुए। इनमें इनमें मकर संक्रांति, वैशाखी, गंगा-दशहरा यह तीन प्रमुख पर्व हैं। पर्व के दिन पावन तीर्थों और नदियों में स्नान करने के महत्व पर बल दिया गया है। कृषि-प्रधान भारत के ऋतु-पर्व कृषि के प्रसंग से आलोकित है। 

तमिलनाडु का पोंगल (मकर) कि संक्रांति पर लहलहाती फसल के घर आने पर प्रभु को भोग लगाने और गाय-बैलों की पूजा का पर्व है। केरल की शस्यश्यामला पुष्प आच्छादित भूमि पर श्रावण मास में आनंदोपभोग का त्यौहार है ओणम। अश्विन शुक्ला सप्तमी से दशमी (विजयादशमी) तक बंगाल के ही नहीं अपितु पूर्ण भारत के नर-नारी महिषासुर मर्दिनी ‘दुर्गा-पूजा’ में मस्त हो जाते हैं। वैशाख मास में उड़ीसा में जगन्नाथ जी की रथयात्रा भारत का सर्वप्रथम और विश्व प्रसिद्ध समारोह बना।

कार्तिक पूर्णिमा को गुरु नानक का जन्म दिवस सिखों का महान पर्व है, तो इसी दिन हरियाणा और उत्तर प्रदेश का प्रसिद्ध पर्व है- ‘नहान’। जिसमें गंगा और यमुना पर जन समाज उमड़ा पड़ता है’ पांचवे गुरु अर्जुन देव तथा नवे गुरु तेगबहादुर के बलिदान-दिवस सिक्खों के पवित्र त्यौहार बने। जैन मत के पवित्र पर्वों में ‘महावीर जयंती’ तथा ‘पर्युषण पर्व’ विशेष उल्लेखनीय है। महावीर जयंती जैन मत में अंतिम तीर्थंकर महावीर स्वामी के जन्मदिवस के उपलक्ष्य में चैत्र शुक्ल त्रयोदशी को मनाया जाता है।

समवेत रूप में देखें तो प्रतिपदा का संबंध नववर्ष से है। दूज ‘भैया दूज’ से जुड़ी है। तीज को ‘हरतालिका’ और ‘हरियाली तीज’ है। चौथ का दिन ‘करवा चौथ’ और ‘गणेश चतुर्थी’ को समर्पित है। पंचमी को ‘नाग पंचमी’ और ‘बसंत पंचमी’ मनाई जाती है। षष्ठी का संबंध कृष्ण अग्रज बलराम की जन्मतिथि ‘हलषष्ठी’ से है। सप्तमी ‘रथसप्तमी’ और ‘संतान-सप्तमी’ को अर्पित है। नवमी भगवान राम की पावन जन्म तिथि है। दशमी ‘विजयादशमी’ तथा ‘गंगा-दशहरा’ का स्मरण करवाती है। एकादशी ‘निर्जला-एकादशी’, देवशयनी एकादशी तथा देवोत्थानी एकादशी के कारण प्रसिद्ध है। द्वादशी को वामन द्वादशी पड़ती है। केरल में ओणम भी श्रावण द्वादशी को को मनाया जाता है। त्रयोदशी का संबंध धनत्रयोदशी तथा धन्वंतरि जयंती से है। नरक चतुर्दशी वैकुंठ चतुर्दशी तथा अनंत चतुर्दशी, चतुर्दशी को आलोकित करते हैं। पंद्रहवीं तिथि समर्पित है पूर्णिमा तथा अमावस को। पूर्णिमा गौरवान्वित करती है होली, व्यास पूर्णिमा, रक्षाबंधन, शरद पूर्णिमा और बुद्ध पूर्णिमा से तो अमावस्या को अलंकृत करते हैं दीपावली और सर्व पितृ अमावस्या। 

भारत के अनेक पर्व और त्यौहार का एक दिन नहीं, दो  दिन नहीं अनेक दिन तक निरंतर चलकर हिंदू जन-जीवन को अमृतमय बना देते हैं, वासंतिक नवरात्र यदि 9 दिन तक धर्म की ध्वजा फहराते हैं तो शारदीय नवरात्र प्रतिपदा से दसवीं तक उत्तर-भारत में रामलीला से पूर्व भारत में पूजा द्वारा जीवन को उल्लास और उमंग प्रदान करते हैं। 

भारत भगवान के अनेक रूपों, देवी-देवताओं तथा महापुरुषों का लीला स्थल है। तथा विविधता और रंगों से परिपूर्ण है। जयंती या पुण्यतिथिया, स्मृतियां सब हमारे यहां पर पर्व हो गई। दशावतार, 24 तीर्थंकर 33 करोड़ देवी देवता, 64 जोगनिया, 56 भैरव, 56 करोड़ महापुरुष सब की जयंती और पुण्यतिथि स्थान स्थान पर पर्व के रुप में मनाए जाते हैं।

Tuesday, 17 April 2018

त्योहारों का महत्व हिंदी निबंध। Essay on the Importance of Festivals in Hindi

त्योहारों का महत्व हिंदी निबंध। Essay on the Importance of Festivals in Hindi

त्योहारों का महत्व हिंदी निबंध। Hindi Essay on the Importance of Festivals

त्योहारों का महत्व हिंदी निबंध
त्योहार सांस्कृतिक और सामाजिक चेतना के प्रतीक हैं। जन-जीवन में जागृति लाने वाले और उनके श्रृंगार हैं। समष्टिगत जीवन में जाति की आशा-आकांक्षा के चिन्ह है, उत्साह और उमंग के प्रदाता हैं। राष्ट्रीय एकता एवं अखंडता के द्योतक हैं। 

जीवन की एक-रसता से ऊबे समाज के लिए त्यौहार वर्ष की गति के पड़ाव हैं। वह भिन्न-भिन्न प्रकार के मनोरंजन, उल्लास और आनंद प्रदान कर जीवन चक्र को सरस बनाते हैं। पर्व युगों से चली आ रही सांस्कृतिक परंपराओं, प्रथाओं, मान्यताओं, विश्वासों, आदर्शों, नैतिक, धार्मिक तथा सामाजिक मूल्यों का वह मूर्त प्रतिबिंब है जो जन-जन के किसी एक वर्ग अथवा स्तर-विशेष की झांकी ही प्रस्तुत नहीं करते, अपितु असंख्य जनता की अदम्य जिजीविषा और जीवन के प्रति उत्साह का साक्षात एवं अन्तः स्पर्शी आत्म दर्शन भी कराते हैं।

त्यौहार सामाजिक सांस्कृतिक की आत्मा को अभिव्यक्त देते हैं तो सामाजिक सामूहिकता का बोध कराते हैं और अगर विद्वेषकारी मतभेद कहीं है तो उनके विस्मरण की प्रतीति कराते हैं। इसलिए त्योहारों की व्यवस्था समाज कल्याण और सुख-समृद्धि के उत्पादों के रूप में हुई है। भारतीय समाज में ज्ञान का प्रसार करने के लिए श्रावण की पूर्णिमा को श्रावणी उपाकर्म के रूप में ज्ञान की साधना का पर्व मनाया जाता है। समाज में शौर्य की परंपरा बनाए रखने के लिए और भीतरी चुनौतियों का सामना करने के लिए शक्ति अनिवार्य है अतः शक्ति साधना के लिए विजयदशमी पर्व को मनाने की व्यवस्था हुई। समाज को सुख और समृद्धि की ओर ले जाने के लिए संपदा की जरूरत होती है उसके लिए दीपावली को लक्ष्मी पूजन का पर्व शुरू हुआ। विविध पुरुषार्थों को साधते समय समाज में एक या दूसरी तरह की विषमता उत्पन्न हो जाती है। इस विषमता की भावना को लुप्त करने के लिए और सभी प्रकार का मनोमालिन्य मिटाने के लिए स्नेहभाव की वृद्धि के लिए होली पर्व की प्रतिष्ठा हुई।

जब जब प्रकृति ने सोलह-श्रृंगार सजाकर अपना रूप निखारा, रंग बिरंगे फूलों की चुनर ओढ़ी। खेत-खलिहानों की हरीतिमा से अपना आवरण रंगा या चांद तारों की बिंदिया सजाई तब-तब प्रकृति के इस बदलते सौंदर्य से मानव मन में उमड़ती उमंग उल्लास के रूप में प्रकट होकर त्योहार का सृजन किया। प्रकृति की सजीवता से मानव उल्लासित हो उठा। प्रकृति ने संगिनी बनकर उसे सहारा दिया और सखी बनकर जीवन। प्रसन्न मानव ने धरती में बीज डाला। वर्षा ने उसे सीचा, सूर्य की गर्मी ने उसे पकाया, जल और सूर्य मानव के आराध्य बन गए। श्रम के पुरस्कार में जब खेती लहलहाई तो मानव का हृदय खिल उठा, उसके चरण थिरक उठे, वाणी मुखर हो गई, संगीत स्रोत फूट पड़े। वाणी ने उस आराध्य की वंदना की जिसने उसे सहारा दिया था। सभ्यता के विकास में मानव की उमंग और प्रभु की प्रति आभार प्रकट करने के लिए अभ्यर्थना और नृत्य संगीत ही उसका माध्यम बने। यह वही परंपरा तो है जो त्योहारों के रूप में आज भी जीवंत है।

त्योहारों का महत्व पारिवारिक बोध की जागृति में है, अपनत्व के विराट रूप दर्शन में है। होली तथा दीपावली पर परिवारजनों को तथा दीपावली पर इष्ट मित्रों को भी बधाई पत्र तथा मिष्ठान आदि भेजना अपनत्व की पहचान ही तो है। त्योहार कर्तव्य बोध के संदेशवाहक के नाते भी महत्वपूर्ण हैं। राखी ने भाई को बहन की रक्षा का संदेश दिया। होली ने बैर-भाव भूलकर एकता का संदेश दिया। दशहरे ने पाप के विनाश के प्रति कर्तव्य का बोध कराया। दीपावली ने अंधकार में भी ज्योति का संदेश दिया। 

त्योहार राष्ट्रीय एकता के उद्घोषक हैं, राष्ट्र की एकात्मता के परिचायक हैं। कश्मीर से कन्याकुमारी और कच्छ से कामरूप तक विस्तृत इस पुण्य भूमि भारत का जन-जन जब होली, दशहरा और दीपावली मनाता है, होली का हुड़दंग मचाता है, दशहरे के दिन रावण को जलाता है और दीपावली की दीप पंक्तियों से घर आंगन द्वार को ज्योतिर्मय करता है तब भारत की जनता राजनीति निर्मित उत्तर तथा दक्षिण का अंतर समाप्त कर एक सांस्कृतिक गंगा धारा में डुबकी लगाकर एकता का परिचय दे रही होती है।

दक्षिण का ओडम, उत्तर का दशहरा, पूर्व की दुर्गा-पूजा और पश्चिम का महारास जिस समय एक दूसरे से गले मिलते हैं तब भारतीयों तो अलग, परदेशियों तक के ह्रदय-शतदल एक ही झोंके में खिल खिल जाते हैं। इसमें अगर कहीं से बैसाखी के भंगड़े का स्वर मिल जाए या राजस्थान की पनिहारी की रौनक घुल जाए तो कहना ही क्या? भीलों का भगेरिया और गुजरात का गरबा अपने आप में लाख-लाख इंद्रधनुष अल्हड़ता के साथ होड़ लेने की क्षमता रखते हैं। 

कवि इकबाल की जिज्ञासा,’ कुछ बात है कि हस्ती मिटती नहीं हमारी’ का समाधान हमारे पर्व और त्यौहार ही हैं। सतयुग से चली आती त्योहार-परंपरा, द्वापर और त्रेता युग को पार कर कलयुग में भी भारतीय संस्कृति और सभ्यता की ध्वजा फहरा रही है। प्रत्येक आने वाले युग ने बीते युग को अपनाया और त्योहार की माला में गूंथकर रख दिया। इस माला के फूल कभी सुखे नहीं क्योंकि हर आने वाली पीढ़ी ने ना सिर्फ उन फूलों को सहेज कर रखा वरन उनमें नए फूलों की वृद्धि भी की। और यह त्योहार भारतीय सभ्यता और संस्कृति के दर्पण बन गये।

Monday, 16 April 2018

बरसात का एक दिन पर निबंध। Barsat ka ek din essay in hindi

बरसात का एक दिन पर निबंध। Barsat ka ek din essay in hindi

बरसात का एक दिन पर निबंध। Barsat ka ek din essay in hindi

Barsat ka ek din
21 अप्रैल का आनंदपूर्ण दिन 2 महीने के ग्रीष्म अवकाश की घोषणा का दिन। सहपाठियों मित्रों और अध्यापकों से 60 दिन तक ना मिल पाने की कसक, बिछड़ने का दुख और छुट्टियों की हार्दिक खुशी मन में लिए कक्षा से बाहर निकलकर में साइकिल स्टैंड की ओर चला साइकिल ली और कल्पनालोक में खोया घर की ओर चल दिया।

सूर्य देव इस अवकाश घोषणा से संभवता प्रसन्न नहीं थे। अतः अपनी तेज किरणों से अपना क्रोध प्रकट कर रहे थे। वातावरण तप रहा था। साइकिल पर सवार गर्मी से परेशान मैं चींटी की चाल से चल रहा था कि अचानक प्रकृति ने पलटा खाया। सूर्यदेव के क्रोध को बादलों ने ढक लिया। आकाश में बादल छा गए धीमी-धीमी शीतल हवा चलने लगी। मेरा मन प्रसन्न हुआ मन की प्रसन्नता पैरों से प्रकट हुई पैर पैडलों को तेजी से घुमाने लगे।

अभी 10-20 पैडल ही मारे होंगे कि वरुण देवता ने अपना रुप प्रकट कर दिया वर्षा की तीव्र बोने धरती की मार करने लगे। मैं संभल भी ना पाया था कि उनका वेग बढ़ गया। मैं तेज बौछारों से घबरा उठा अपने से ज्यादा चिंता थी अपनी प्यारी पुस्तकों की। उनका तन मुझसे अधिक कोमल था। मुड़ कर पीछे देखा पुस्तकें अभी सुरक्षित थी। बस्ते की वर्षा ने ढाल के वार को रोक रखा था।

वर्षा का जल सिर से चू-चूकर चेहरे तथा नयनों से क्रीडा कर रहा है। वस्त्रों में प्रवेश कर शरीर का प्रक्षालन कर रहा है। जुराबों में घुसकर गुदगुदी मचा रहा है। बार-बार चेहरा पोंछते हुए रुमाल भी जवाब दे गया। वस्त्रों से पानी ऐसे झड़ रहा है मानो नाइलोन का वस्त्र सुखाने के लिए टांग दिया हो। मार्ग में आश्रय नहीं है सिर छुपाने की जगह भी नहीं है अतः रुकने का कोई लाभ नहीं। मन ने साहस की रज्जू नहीं छोड़ी। अकबर इलाहाबादी का शेर एक स्मरण हो आया और मेरी हिम्मत बढ़ गई।

जिंदगी जिंदादिली का नाम है अकबर

मुर्दा दिल क्या खाक जिया करते हैं

 कष्ट या दुख की अनुभूति मन से होती है। जिस भावना से कार्य किया जाता है वैसा ही आनंद प्राप्त होता है। वर्षा में पिकनिक का आनंद समझकर साइकिल चला रहा हूं। सड़क पर पानी तेजी से बह रहा है। पानी की परत ने सड़क के चेहरे को ऐसे ढक दिया है मानो किसी युवती ने महीन चुनरी अपने मुख पर लपेट ली हो। पानी में साइकिल चलाते हुए जोर लगाना पड़ रहा है। इधर कार, मोटरसाइकिल, ऑटो रिक्शा जो गुजरता वह तेजी से पानी की बौछार मार जाता। होली सी खेल जाता बस्ते तथा साइकिल सहित मेरे शरीर को पुनः स्नान करा जाता। एक क्षण क्रोध आता दूसरे चरण साइकिल चलाने में ध्यानस्थ हो जाता है।

साहस सफलता की सीढ़ी है सौभाग्य का साथी है। आगे बस स्टैंड का शेड आ गया यहां पर अनेक नर नारी और स्कूली बच्चे पहले से ही स्थान को घेरे हुए थे। लेकिन सेट के नीचे पहुंचना भंवर में से नाम निकालना था। पटरी के नीचे 5:00 से 6:00 इंच की तेज धार बह रही थी। मैंने साइकिल को पानी में खड़ा किया बस्ते को साइकिल से उतारा और शेर के नीचे पहुंच गया।

शेड के नीचे सुरक्षित खड़ा मैं अपने को धन्य समझ रहा था। किंतु साहब, तीव्र गति वाले वाहन होली खेलने को भूले ना थे। वह जिस गली से गुजरते, उस गति से जल के छींटे हमारे ऊपर आकर डाल जाते। उस समय शेड के शरणार्थियों के मधुर वचन सुनने योग्य थे।

किंतु मेरी साइकिल तो पानी के मध्य ध्यानस्थ थी। जल की धारा उसके चरणों का चुंबन ले आगे बढ़ रही थी। कभी-कभी तो जल की कोई तरंग मस्ती के क्षणों में साइकिल का आलिंगन करने को उतावली की हो उठती थी। भगवान वरुण का क्रोध शांत होने लगा बादलों कि झूली जल कणों से खाली हो रही थी। फलता वर्षा की बौछार बहुत धीमी हो गई थी। जनता शेड से इस प्रकार निकल पड़ी मानो किसी सिनेमा का शो छूटा हो।

मैंने भी शेर का आश्रय छोड़ा। पटरी से सड़क पर उतरा। जूता पानी में डूब गया था, जुराबे पैरों पर चिपक गई थी। मैंने साइकिल स्टैंड से उतारी और चल दिया घर की ओर। वर्षा शांत थी सड़क पर चहल-पहल थी। पैंट को ऊपर मोड़े, पजामे को ऊपर उठाएं, धोती को हाथ में पकड़े नर-नारी चल रहे थे। सोचा था दोपहर बाद होली डालना देखना खेलना बंद हो जाता है। पर मेरी यह भूल सिद्ध हुई। क्षिप्र गति वाहन जल के छींटे डालकर होली का आनंद भी ले रहे थे सड़क पर पानी जो खड़ा था।

घर पहुंचा। मां प्रतीक्षा कर रही थी। फटाफट कपड़े उतारे। बस्ते को खोलकर देखा। वाटर प्रूफ थैले की अभेद्य भेज दिया वस्त्र प्राचीर में भी वर्षा की 24 शूरवीर बूंदों ने आक्रमण कर ही दिया। वर्षा में भीगने का अनुभव भी विचित्र और स्मरणीय था।

Sunday, 15 April 2018

बैसाखी पर्व का महत्व पर निबंध । Essay on Baisakhi in Hindi

बैसाखी पर्व का महत्व पर निबंध । Essay on Baisakhi in Hindi


बैसाखी पर्व का महत्व पर निबंध । Essay on Baisakhi in Hindi

Essay on Baisakhi in Hindi
बैसाखी का त्यौहार वैशाख के महीने का सक्रांति को मनाया जाता है। यह प्रत्येक वर्ष 13 या 14 अप्रैल को मनाया जाता है। बैसाखी का त्यौहार फसल का त्यौहार है। खेतों में फसल पक कर तैयार होने से बड़ी खुशी किसानों के लिए और कुछ भी नहीं है। उनकी महीनों की कड़ी मेहनत रंग लाती है। किसान केवल बीज ही नहीं बोते हैं बल्कि वह एक एक बीज के साथ भविष्य के सपने भी बोते हैं। धरती में जब बीज से अंकुर फूटते हैं तो किसान के मन की जमीन लहलहा उठती है। सदियों से इस देश के किसानों ने संकट के ना जाने कितने अध्याय देखे हैं। फसल बढ़ती है तो उनकी आशंकाएं भी बढ़ने लगती हैं। दिसंबर जनवरी की सर्द रातों में भी जाग कर वह खेत की रखवाली करते हैं साथ ही वह यह प्रार्थना भी दोहराते हैं कि हे ईश्वर मेरे खेत में इतना अन्न उपजे की धरती का दामन सोने जैसा प्रतीत होने लगे। फिर जब मार्च आता है तो फसल सुनहरी होने लगती लगती है। खेत में बहाया गया पसीना सोने में बदलने लगता है, उम्मीदें भी आसमान छूने के लिए बेताब होने लगती हैं। दुआओं के मौन में मानो कोई आकर कह जाता है चल भांगड़ा पाते हैं, तेरा खेत सुनहरी होया सी

बैसाखी मनाने का तरीका : जब फसल कटने लगती है तो देह भी उत्सव के रंग में लगने लगती है कहीं ढोल बजने लगते हैं तो कहीं गिद्दा तो कहीं भांगड़ा मचल उठता है। सारा आलम कह उठता है जट्टा आई बैसाखी। गुरुद्वारे में होती अरदास, कड़ाह प्रसाद पाते हाथ, लंगर चखती संगत और पंथ की स्थापना को पूजती आत्मा" आदि सच जुगादि सच कहती वाणी के साथ कहती है -कि अब मेहनत का फल पक गया है जाओ रात में अग्नि को अन्न की आहुति देकर पूरी दुनिया के पेट की आग को बुझाने के कारण बन जाओ यही तुम्हारे जीवन की सार्थकता है।

बैसाखी का महत्व : गांव का जीवन सरल नहीं होता है और ना ही किसान के भाग्य में अनुकूलता के ग्रह डेरा डालते हैं तब भी इस देश का चिंतन कहता है कि उत्तम कृषि मध्यम व्यापार तो यहां यह सवाल लाजिमी है कि इस देश में कठिन और अनिश्चित कृषि को उत्तम कर्म कैसे मान लिया गया। इसका उत्तर भी हमारी मनीषा ही देती है जो कहती है कि सब तो अपना अपना पेट भरने के लिए कर्म करते हैं, लेकिन सब का पेट भरने के लिए किसान ही दिन रात एक करते हैं। मौसम की मार झेल कर, कर्ज के बोझ से दबा जीवन जीकर साधनविहीन गांवों में वह में पूरी जिंदगी गुजार कर भी किसान का कर्ज उत्तम है। क्योंकि वह अमूल्य अन्नदाता है। वैशाखी से पहले ज्यादातर खेतों में गेहूं पक जाता है और वैशाखी की रात नए अन्न को जब अग्नि को समर्पित किया जाता है तो भावना यही रहती है कि हे अग्नि देवता हम अपना अन्न जगत की भूख की अग्नि को शांत करने के लिए अर्पित कर सकें यही हमारे जीवन का लक्ष्य हो। यही दाता भाव अन्नदाता के जीवन में वैशाखी के उत्सव का आरंभ करता है और गांव गांव में मेले सज उठते हैं ढोल बजे उठते हैं। अन्नदाता का आनंद सारी सृष्टि का आनंद बनकर इस तरह नाच उठता है मानो धरती का कण कण कह रहा है श्री वाहे गुरु जी का खालसा, श्री वाहेगुरु जी की फतेह।

बैसाखी का इतिहास : वैशाखी के पर्व से ही खालसा पंथ की स्थापना का इतिहास जुड़ा हुआ है। गुरु गोविंद सिंह जी ने इसी दिन शहादत के लिए आगे आने को कहा और जो 5 वीर बलिदान के लिए तैयार हुए वह पंज प्यारे कहलाए। गुरु गोविंद सिंह ने उनसे बलिदान नहीं लिया वरन उन्हें अमृतसर चखाकर यह आदर्श रखा कि जो धर्मपथ के लिए अपने प्राणों की भी परवाह नहीं करते वही अमृत के अधिकारी बनते हैं। यही वैशाखी जलियांवाला बाग की निर्मम हत्या कांड की भी गवाह बनी। जब क्रूर जनरल डायर ने निहत्थे लोगों पर गोलियां चलवाकर अनगिनत जानें ले ली। यह शहादत भी व्यर्थ नहीं गई और इस घटना ने ब्रिटिश राज्य के भारत से खात्मे की भूमिका लिखी। 

उपसंहार : वैशाखी केवल पंजाब-हरियाणा का पर्व नहीं है बल्कि यह भिन्न-भिन्न रूप में पूरे देश में मनाया जाता है। अब जब देश का स्वरुप बदल रहा है तो उत्सव और पर्व भी अपना रंग ढंग बदल रहे हैं। आधुनिक शैली अब गांवों में भी सिर चढ़कर बोल रही है, रिश्तो की भी फीकी पड़ती रंगत और विदा ले रहा साझा जीवन कड़वी सच्चाई है। सब कुछ खत्म होने की आहट अब भी इसलिए दबे पांव आ रही है क्योंकि उसे भी पता है इस देश की परंपराओं का अस्तित्व सदियों पुराना है। जब-जब इसे चुनौती मिली है तब तब यह नए सिरे से अमृत चक्कर चिरंजीवी हो उठा है। वैशाखी प्रकृति का आनंदोत्सव तो है ही साथ ही यह कर्म की सार्थकता का भी पर्व है और धर्म की स्थापना का भी उद्घोष है। पंजाब से बड़ी तादाद में लोग दुनिया के अलग-अलग हिस्सों में जाकर बसे हैं वहां फसल नहीं पकती लेकिन वैशाखी का उत्सव वहां भी अद्भुत रहता है। हो भी क्यों ना हम भारतीय जहां कहीं भी जाते हैं हमारी कर्म धर्म प्रकृति प्रियता हमें जब भी वैशाखी से जोड़ती है।

इस लेख के रचयिता श्री अशोक जमनानी जी हैं जो की एक प्रसिद्द आध्यात्मिक चिन्तक और विचारक हैं। आपके द्वारा लिखे गए लेख को निबंध स्वरुप में यहाँ प्रस्तुत किया जा रहा है। 

Friday, 13 April 2018

वृक्षारोपण पर निबंध | Essay on Afforestation in Hindi

वृक्षारोपण पर निबंध | Essay on Afforestation in Hindi

वृक्षारोपण पर निबंध | Essay on Afforestation in Hindi

Essay on Afforestation in Hindi
भारतीय संस्कृति में वृक्षों का विशेष महत्व है। इनकी देवताओं के सामान पूजा की जाती है। वृक्ष हमारी वर्षा में अधिक भूमि कटाव से, तथा ग्रीष्म ऋतू में सूरज के ताप से उसी प्रकार रक्षा करते हैं जिस प्रकार माता-पिता अपने बच्चों की रक्षा करते हैं। आज भी पीपल के वृक्ष की देवताओं की भाँती पूजा-अर्चना की जाती है। केले तथा तुलसी के पौधे की भी पूजा बहुत महत्वपूर्ण है। पेड़ों को काटना पाप माना जाता है।

औद्योगीकरण के इस नवीन युग में ये सारी परम्पराएं समाप्त सी होती जा रही हैं। जनसंख्या वृद्धि के कारण वृक्षों, जंगलों तथा बगीचों का स्थान बड़ी-बड़ी फैक्ट्रियों तथा कारखानों ने ले लिया है। वृक्षों को बड़ी तेजी से काटा जा रहा है जिससे प्रकृति का संतुलन तेजी से बिगड़ रहा है। जिन वृक्षों की शीतल और सुखद छाया में थका राही विश्राम कर लेता था आज उनकी जगन कंक्रीट की इमारतों का जंगल नजर आता है। वृक्षों की कमी होने से वायु भी अब पहले की तरह शुद्ध नहीं रही जिससे लोगों के स्वास्थ्य पर प्रतिकूल प्रभाव पडा है। अब तो हालात ये हैं की ईंधन की भी कमी होने लगी है। इन्ही सब बातों को ध्यान में रखते हुए भारत सरकार ने 1950 में वन महोत्सव नामक योजना का शुभारम्भ किया। जगह-जगह पर नए वृक्ष लगाने का कार्यक्रम शुरू किया गया।

1950 की वन महोत्सव परियोजना में धीरे-धीरे शिथिलता आने लगी। परन्तु वृक्षों के महत्व को देखते हुए अब देशभर में व्यापक स्तर पर वृक्षारोपण के अनेक कार्यक्रम चलाये जा रहे हैं। सरकार की ओर से यह कार्य स्थानीय निकायों को सौंप दिया गया है। तभी से लगभग सभी विद्यालयों में प्रतिवर्ष वृक्षारोपण का कार्यक्रम आयोजित होने लगा। 12 नवंबर 1976 को केंद्र सरकार ने सभी राज्यों को यह निर्देश भेजा की केंद्र सरकार की अनुमति के बिना किसी भी राज्य में जंगलों की कटाई नहीं की जायेगी। जंगलों की कटाई के लिए केंद्रीय कृषि व सिंचाई मंत्रालय के वन विभाग के वन-महानिरीक्षक से पूर्व अनुमति प्राप्त करनी होगी।

वृक्ष न केवल वर्षा में सहायक हैं बल्कि इनसे हमें फल तथा सब्जियां भी प्राप्त होती हैं। वृक्षारोपण करके सूखा, अकाल व बाढ़ जैसी आपदाओं को आसानी से टाला जा सकता है। वृक्षों से हमारा पर्यावरण तो सुद्ध होता ही है तथा इससे पशु-पक्षियों के लिए प्राकृतिक आवास की भी व्यवस्था होती है। वृक्ष तथा पेड़ पौधे लगाने से ग्लोबल वार्मिंग जैसे परिस्थितियों पर भी नियंत्रण शापित किया जा सकता है। इसीलिए अब भारत सरकार भी इस ओर विशेष ध्यान दे रही है। अब वह दिन दूर नहीं जा भारत देश फिर से हरा-भरा होगा।
परिश्रम ही सफलता की कुंजी है निबंध। Essay on Importance of Hard Work

परिश्रम ही सफलता की कुंजी है निबंध। Essay on Importance of Hard Work

परिश्रम सफलता की कुंजी है निबंध। Essay on Importance of Hard Work

परिश्रम सफलता की कुंजी है निबंध
परिश्रम उस प्रयत्न को कहा जाता है जो किसी व्यक्ति द्वारा अपने उद्देश्य की प्राप्ति के लिए किया जाता है। परिश्रम ही मानव की उन्नति का एकमात्र साधन है। परिश्रम के द्वारा हम वे सभी वस्तुएं प्राप्त कर सकते हैं जिनकी हमें आवश्यकता है। इसके द्वारा कठिन से कठिन कार्य को भी संभव बनाया जा सकता है। एक प्राचीन कहावत है की जो मनुष्य अपने पुरुषार्थ पर यकीन रखकर अपने लक्ष्य की प्राप्ति के लिए मन, वचन और कर्म से कठिन परिश्रम करता है, सफलता उसके कदम चूमती है। परिश्रम के द्वारा मनुष्य के सभी मनोरथ पूर्ण हो जाते हैं।

जो लोग मन लगाकर परिश्रम नहीं करते उनका जीवन सदैव दुःख तथा कष्ट से भरा रहता है। परिश्रम से हम धर्म, अर्थ, काम और यहाँ तक की मोक्ष भी प्राप्त कर सकते हैं। संसार इस बात का साक्षी है की जिस भी राष्ट्र ने आज तक तरक्की की है, उसकी उन्नति का एकमात्र रहस्य उस देश के निवासियों का परिश्रमी होना है। अमेरिका का उदाहरण हम सभी के सामने है। अमेरिका का अधिकांश भाग बंजर है परन्तु कठिन परिश्रम तथा साहस के बल पर अमेरिका आज विश्व के शिखर पर विराजमान है। यह देश स्वयं तो आत्मनिर्भर है ही तथा दुसरे देशों की भी सहायता करता है। दूसरा उदाहरण है सिंगापुर का। सिंगापूर एक छोटा सा देश है परन्तु आज इसकी गिनती विश्व के कुछ सबसे समृद्ध तथा खुशहार देशों में होती है। इन सभी देशों के निवासियों का परिश्रम ही इनकी सफलता का कारण है। 

परिश्रम चाहे शारीरिक हो या मानसिक, दोनों ही फल प्रदान करने वाले होते हैं। जिस प्रकार रस्सी की रगड़ से कुएं के मजबूत पत्थर पर भी निशान पड़ जाते हैं, उसी प्रकार कठिन परिश्रम द्वारा कठिन से कठिन कार्य भी सरल हो जाते हैं। विश्व में अनेक ऐसे महापुरुष हुए हैं जिन्होंने अपने परिश्रम से ही काम्याभी हासिल की। महात्मा गांधी, सुभाष चन्द्र बोस, तिलक जैसे क्रांतिकारियों के परिश्रम से ही भारत स्वतंत्र हुआ अतः परिश्रम ही सफलता की कुंजी है।

यह संसार अनंत सुख-संपत्ति, धन-धान्य से भरा हुआ है किन्तु इसका भोग वाही कर सकता है जिसमें परिश्रम करने की लगन हो। परिश्रम के सामने तो प्रकृति भी झुक जाती है। परिश्रम ही ईश्वर की सच्ची साधना है। इसलिए महाकवि तुलसीदास ने ठीक ही कहा है की – 
“सकल पदारथ हैं जग मांही, कर्महीन नर पावत नाहीं।”