Sunday, 15 April 2018

बैसाखी पर्व का महत्व पर निबंध । Essay on Baisakhi in Hindi


बैसाखी पर्व का महत्व पर निबंध । Essay on Baisakhi in Hindi

Essay on Baisakhi in Hindi
बैसाखी का त्यौहार वैशाख के महीने का सक्रांति को मनाया जाता है। यह प्रत्येक वर्ष 13 या 14 अप्रैल को मनाया जाता है। बैसाखी का त्यौहार फसल का त्यौहार है। खेतों में फसल पक कर तैयार होने से बड़ी खुशी किसानों के लिए और कुछ भी नहीं है। उनकी महीनों की कड़ी मेहनत रंग लाती है। किसान केवल बीज ही नहीं बोते हैं बल्कि वह एक एक बीज के साथ भविष्य के सपने भी बोते हैं। धरती में जब बीज से अंकुर फूटते हैं तो किसान के मन की जमीन लहलहा उठती है। सदियों से इस देश के किसानों ने संकट के ना जाने कितने अध्याय देखे हैं। फसल बढ़ती है तो उनकी आशंकाएं भी बढ़ने लगती हैं। दिसंबर जनवरी की सर्द रातों में भी जाग कर वह खेत की रखवाली करते हैं साथ ही वह यह प्रार्थना भी दोहराते हैं कि हे ईश्वर मेरे खेत में इतना अन्न उपजे की धरती का दामन सोने जैसा प्रतीत होने लगे। फिर जब मार्च आता है तो फसल सुनहरी होने लगती लगती है। खेत में बहाया गया पसीना सोने में बदलने लगता है, उम्मीदें भी आसमान छूने के लिए बेताब होने लगती हैं। दुआओं के मौन में मानो कोई आकर कह जाता है चल भांगड़ा पाते हैं, तेरा खेत सुनहरी होया सी

बैसाखी मनाने का तरीका : जब फसल कटने लगती है तो देह भी उत्सव के रंग में लगने लगती है कहीं ढोल बजने लगते हैं तो कहीं गिद्दा तो कहीं भांगड़ा मचल उठता है। सारा आलम कह उठता है जट्टा आई बैसाखी। गुरुद्वारे में होती अरदास, कड़ाह प्रसाद पाते हाथ, लंगर चखती संगत और पंथ की स्थापना को पूजती आत्मा" आदि सच जुगादि सच कहती वाणी के साथ कहती है -कि अब मेहनत का फल पक गया है जाओ रात में अग्नि को अन्न की आहुति देकर पूरी दुनिया के पेट की आग को बुझाने के कारण बन जाओ यही तुम्हारे जीवन की सार्थकता है।

बैसाखी का महत्व : गांव का जीवन सरल नहीं होता है और ना ही किसान के भाग्य में अनुकूलता के ग्रह डेरा डालते हैं तब भी इस देश का चिंतन कहता है कि उत्तम कृषि मध्यम व्यापार तो यहां यह सवाल लाजिमी है कि इस देश में कठिन और अनिश्चित कृषि को उत्तम कर्म कैसे मान लिया गया। इसका उत्तर भी हमारी मनीषा ही देती है जो कहती है कि सब तो अपना अपना पेट भरने के लिए कर्म करते हैं, लेकिन सब का पेट भरने के लिए किसान ही दिन रात एक करते हैं। मौसम की मार झेल कर, कर्ज के बोझ से दबा जीवन जीकर साधनविहीन गांवों में वह में पूरी जिंदगी गुजार कर भी किसान का कर्ज उत्तम है। क्योंकि वह अमूल्य अन्नदाता है। वैशाखी से पहले ज्यादातर खेतों में गेहूं पक जाता है और वैशाखी की रात नए अन्न को जब अग्नि को समर्पित किया जाता है तो भावना यही रहती है कि हे अग्नि देवता हम अपना अन्न जगत की भूख की अग्नि को शांत करने के लिए अर्पित कर सकें यही हमारे जीवन का लक्ष्य हो। यही दाता भाव अन्नदाता के जीवन में वैशाखी के उत्सव का आरंभ करता है और गांव गांव में मेले सज उठते हैं ढोल बजे उठते हैं। अन्नदाता का आनंद सारी सृष्टि का आनंद बनकर इस तरह नाच उठता है मानो धरती का कण कण कह रहा है श्री वाहे गुरु जी का खालसा, श्री वाहेगुरु जी की फतेह।

बैसाखी का इतिहास : वैशाखी के पर्व से ही खालसा पंथ की स्थापना का इतिहास जुड़ा हुआ है। गुरु गोविंद सिंह जी ने इसी दिन शहादत के लिए आगे आने को कहा और जो 5 वीर बलिदान के लिए तैयार हुए वह पंज प्यारे कहलाए। गुरु गोविंद सिंह ने उनसे बलिदान नहीं लिया वरन उन्हें अमृतसर चखाकर यह आदर्श रखा कि जो धर्मपथ के लिए अपने प्राणों की भी परवाह नहीं करते वही अमृत के अधिकारी बनते हैं। यही वैशाखी जलियांवाला बाग की निर्मम हत्या कांड की भी गवाह बनी। जब क्रूर जनरल डायर ने निहत्थे लोगों पर गोलियां चलवाकर अनगिनत जानें ले ली। यह शहादत भी व्यर्थ नहीं गई और इस घटना ने ब्रिटिश राज्य के भारत से खात्मे की भूमिका लिखी। 

उपसंहार : वैशाखी केवल पंजाब-हरियाणा का पर्व नहीं है बल्कि यह भिन्न-भिन्न रूप में पूरे देश में मनाया जाता है। अब जब देश का स्वरुप बदल रहा है तो उत्सव और पर्व भी अपना रंग ढंग बदल रहे हैं। आधुनिक शैली अब गांवों में भी सिर चढ़कर बोल रही है, रिश्तो की भी फीकी पड़ती रंगत और विदा ले रहा साझा जीवन कड़वी सच्चाई है। सब कुछ खत्म होने की आहट अब भी इसलिए दबे पांव आ रही है क्योंकि उसे भी पता है इस देश की परंपराओं का अस्तित्व सदियों पुराना है। जब-जब इसे चुनौती मिली है तब तब यह नए सिरे से अमृत चक्कर चिरंजीवी हो उठा है। वैशाखी प्रकृति का आनंदोत्सव तो है ही साथ ही यह कर्म की सार्थकता का भी पर्व है और धर्म की स्थापना का भी उद्घोष है। पंजाब से बड़ी तादाद में लोग दुनिया के अलग-अलग हिस्सों में जाकर बसे हैं वहां फसल नहीं पकती लेकिन वैशाखी का उत्सव वहां भी अद्भुत रहता है। हो भी क्यों ना हम भारतीय जहां कहीं भी जाते हैं हमारी कर्म धर्म प्रकृति प्रियता हमें जब भी वैशाखी से जोड़ती है।

इस लेख के रचयिता श्री अशोक जमनानी जी हैं जो की एक प्रसिद्द आध्यात्मिक चिन्तक और विचारक हैं। आपके द्वारा लिखे गए लेख को निबंध स्वरुप में यहाँ प्रस्तुत किया जा रहा है। 


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