Monday, 12 March 2018

नई शिक्षा नीति पर निबंध। Essay on New Education Policy in Hindi


नई शिक्षा नीति पर निबंध। Essay on New Education Policy in Hindi

New Education Policy in Hindi

भारतीय संसद ने मई 1986 में शिक्षा पर राष्ट्रीय नीति के प्रारूप को अनुमोदन करना प्रदान कर दिया। तत्कालीन मानव संसाधन मंत्री श्री पी वी नरसिंह राव ने संसद को आश्वासन दिया कि वित्तीय कमी के कारण इस नीति के कार्यान्वयन को कठिनाई में नहीं पड़ने दिया जाएगा। ज्ञातव्य है कि पद धारण के तुरंत बाद भूतपूर्व प्रधानमंत्री श्री राजीव गांधी ने नई शिक्षा नीति का निर्माण करने का वायदा किया था।

प्रारूप नीति की मुख्य बातें निम्नलिखित प्रकार हैं-

नई शिक्षा नीति में इस बात पर बल दिया गया है कि मानव धनात्मक संपत्ति है और वह बहुमूल्य संसाधन है जिसका पालन पोषण बड़ी कोमलता एवं सावधानी एवं गतिशीलता के साथ करना चाहिए। इसलिए शिक्षा सबके लिए अत्यावश्यक मानी गई है। यह हमारे चहुमुखी विकास¸ भौतिक एवं आध्यात्मिक के लिए आवश्यक है। शिक्षा वर्तमान और भविष्य दोनों के लिए ही अद्वितीय विनियोग है। यह सिद्धांत नई राष्ट्रीय शिक्षा नीति की कुंजी है।

नई नीति का प्रयास राष्ट्रीय शिक्षा पद्धति निर्मित करने का है जिसके लिए 1986 की नीति द्वारा संस्तुत कॉमन स्कूल पद्धति की दिशा में कदम उठाए जाएंगे। राष्ट्रीय शिक्षा पद्धति का ध्येय कॉमन स्कूल ढांचा तैयार करना है। यह राष्ट्रीय पाठ्यक्रम ढांचे पर आधारित होगा जिसमें कुछ मूलभूत बातें होंगी और शेष बातें लचीली होंगी। इन मूलभूत बातों में भारत का स्वतंत्रता संग्राम होगा¸ संवैधानिक दायित्व और राष्ट्रीय पहचान को बनाए रखने के आवश्यक तत्व होंगे। इसका उद्देश्य कुछ मान्यताओं जैसे भारत की कॉमन सांस्कृतिक विरासत¸ समानता¸ प्रजातंत्र और धर्म निरपेक्षता¸ पुरुष और महिलाओं की समानता¸ वातावरण की शुद्धि¸ सामाजिक बाधाओं की समाप्ति¸ छोटा परिवार रखना और वैज्ञानिक दृष्टिकोण का विकास¸ को बढ़ावा देना है। नई शिक्षा हमारे विकास के प्रति व्यापक दृष्टिकोण को मजबूत बनाएगी और नीचे वाली पीढ़ी को अंतरराष्ट्रीय सहयोग और शांतिमय सहअस्तित्व की ओर प्रेरित करेगी।

नई नीति असमानताओं को समाप्त करने और शैक्षिक अवसरों को बराबर करने पर विशेष बल देती है।

शिक्षा को महिलाओं के स्तर में आधारभूत परिवर्तन के रूप में प्रयोग किया जाएगा। महिला निरक्षरता के उन्मूलन को सबसे अधिक प्राथमिकता प्रदान की जाएगी।

अनुसूचित जातियों के शैक्षिक विकास के लिए केंद्रीय बिंदु है। उनको गैर अनुसूचित जातियों के बराबर लाना¸ शिक्षा के प्रत्येक स्तर पर¸ जिसके लिए नई शिक्षा नीति में कई उपायों का उल्लेख किया गया है। अनुसूचित जनजातियों को भी अन्य जातियों के बराबर लाने के लिए कदम उठाए जाएंगे।

कुछ अल्पसंख्यक समूह भी शैक्षिक रूप से वंचित पिछड़े हुए हैं। समानता और सामाजिक न्याय की खातिर इन समूहों के विकास के लिए अधिक ध्यान दिया जाएगा। शारीरिक और मानसिक रूप से अपंग लोगों को सामान्य समुदाय के बराबर के हिस्सेदार लाने के लिए भी कदम उठाए जायेंगे।  

नई शिक्षा नीति में प्रौढ़ शिक्षा को महत्वपूर्ण स्थान प्रदान किया है। संपूर्ण राष्ट्र निरक्षरता के उन्मूलन के लिए विशेषकर 15 से 35 आयु वर्ग में अपने को समर्पित करेगा। विभिन्न तरीकों से प्रौढ़ और सतत शिक्षा का वृहत्त कार्यक्रम चलाया जाएगा।

उपयुक्त शिशु विकास की महती आवश्यकता को दृष्टिगत रखते हुए ‘अर्ली चाइल्डहुड केयर एंड एजुकेशन’ को उच्च प्राथमिकता प्रदान की जाएगी और जहां तक संभव हो सकेगा इसको समन्वित बाल विकास कार्यक्रम उपयुक्त रुप से जोड़ दिया जाएगा।

प्रारंभिक शिक्षा में दो बातों पर बल दिया जाएगा : (1) यूनिवर्सल एनरोलमेंट और 14 वर्ष तक की आयु तक सभी बच्चों को स्कूल में बनाए रखना और (2) शिक्षा की गुणवत्ता में पर्याप्त सुधार। शारीरिक दंड को शैक्षिक प्रणाली में से मजबूती के साथ निकाल दिया जाएगा।

ड्रॉपआउट के लिए अनौपचारिक शिक्षा का एक वृहद एवं प्रणालीबद्ध कार्यक्रम चलाया जाएगा। 1995 तक 14 वर्षों तक के सभी बच्चों को निशुल्क और अनिवार्य शिक्षा प्रदान की जाएगी।

माध्यमिक शिक्षा तक पहुंच को और अधिक व्यापक बना दिया जाएगा जिससे कि अब तक जो क्षेत्र से बाहर रहे हैं वे भी अब इससे आच्छादित हो जाएं।

विशेष प्रतिभाशाली बच्चों को अधिक तीव्र गति से आगे बढ़ने का अवसर देने के लिए एक निश्चित ढांचे में देश के विभिन्न हिस्सों में पेस-सेटिंग स्कूलों की स्थापना की जाएगी किंतु अभिनवीकरण और परीक्षण के लिए पूर्ण क्षेत्र प्रदान किया जाएगा। यह नवोदय विद्यालय केंद्रीय विद्यालयों से भिन्न होंगे।

प्रस्तावित शैक्षिक पुनर्गठन में व्यावसायिक शिक्षा को प्रणालीबद्ध तरीके से चलाया जाना अत्यंत महत्वपूर्ण है।  प्रस्तावित किया गया था कि वर्ष 1990 तक 10% माध्यमिक छात्र व्यावसायिक वर्षों से आच्छादित हो जाएं और 1995 तक 25% आच्छादित हो जाए जबकि वर्ष 2010 तक का लक्ष्य 80% तक का रखा गया था।

जहां तक उच्च शिक्षा का प्रश्न है¸ मुख्य बल शिक्षा की वर्तमान संस्थाओं में उपलब्ध सुविधाओं का सुदृढ़ीकरण एवं विस्तार करना होगा। पद्धति को स्तरों के पतन से रोकने के लिए तत्परता से कदम उठाए जाएंगे। विश्वविद्यालय में अनुसंधान कार्य को और अधिक सहायता प्रदान की जाएगी और इसकी गुणवत्ता सुनिश्चित करने के लिए कदम उठाए जाएंगे। भारत के प्राचीन ज्ञान समूह में और अधिक नीचे उतरने और इसको वर्तमान की वास्तविकताओं से संम्बद्ध करने के लिए प्रयास किए जाएंगे।

डिग्रियों को नौकरियों से उन्हीं सर्विसों से अलग किया जाएगा जिनमें विश्वविद्यालय की डिग्री को अनिवार्य योग्यता आवश्यक नहीं समझा जाता।

ओपन यूनिवर्सिटी पद्धति को और विकसित किया जायेगा। ग्रामीण यूनिवर्सिटी के नए ढांचे का सुदृढ़ीकरण किया जाएगा और उसकी शिक्षा पर महात्मा गांधी के क्रांतिकारी विचारों के आधार पर विकास किया जाएगा।

टेक्निकल और मैनेजमेंट एजुकेशन को नए आयाम प्राप्त होंगे। कंप्यूटरों की सर्वव्यापकता को दृष्टिगत रखते हुए कंप्यूटरों के विषय में आवश्यक प्रशिक्षण व्यावसायिक शिक्षा का अंग बनाया जाएगा। टेक्निकल और मैनेजमेंट एजुकेशन के सभी स्तरों पर कुशलता और प्रभावीपन को और अधिक बढ़ावा देने के लिए कदम उठाए जाएंगे।

नई शिक्षा नीति का यह भी उद्देश्य है कि प्रणाली ठीक तरह से कार्य करें। इसलिए पद्धति में अनुशासन फूंकने के लिए उपायों को उच्च प्राथमिकता प्रदान की जाएगी।

नई शिक्षा नीति का उद्देश्य यही भी है कि शिक्षा को सामाजिक और नैतिक मूल्यों को पोषित करने हेतु एक सबल यंत्र बनाया जाना चाहिए।

जहां तक भाषाओं का प्रश्न है इस संबंध में 1968 की शिक्षा नीति को अत्यधिक संगत समझा गया है।

विज्ञान और गणित के अध्ययन को प्राथमिकता प्रदान की जाएगी। स्पोर्ट्स और शारीरिक शिक्षा को सीखने की प्रक्रिया का एक अभिन्न अंग माना गया है। मूल्यांकन प्रक्रिया और परीक्षा सुधार कार्यक्रम भी लिया जाएगा जिससे चांस और आत्मगत मूल्यांकन के तत्व को कम किया जा सके।

डिस्ट्रिक्ट इंस्टिट्यूट ऑफ एजुकेशन एंड ट्रेनिंग की स्थापना की जाएगी जिससे अध्यापकों का प्रशिक्षण अधिक उद्देश्यपूर्ण बनाया जा सके।

शिक्षा में एक उपयुक्त प्रबंध ढांचा सुनिश्चित करने के लिए अन्य अखिल भारतीय सेवाओं के ढांचे के आधार पर अखिल भारतीय शिक्षा सेवा की स्थापना आवश्यक होगी। यह भी प्रस्ताव है कि इसके पश्चात शिक्षा पर राष्ट्रीय आय का 6% से अधिक व्यय किया जाएगा। यह सुझाव 1968 की नीति में दिया गया था।

शिक्षा नीति में संशोधन - 2020 से पूर्व प्रारंभिक शिक्षा की सार्वभौमिकता को प्राप्त करने हेतु एक राष्ट्रीय मिशन परीक्षा¸ पद्धति की समीक्षा¸ शिक्षा अधिकरणों की स्थापना तथा ‘ऑपरेशन ब्लैक बोर्ड’ का विस्तार ये राष्ट्रीय शिक्षा नीति 1986 के अंतर्गत प्रस्तावित संशोधन हैं जिनकी घोषणा मई 1992 में सरकार द्वारा की गई।

संपूर्ण देश में अधिक मात्रा में एकरूपता लाने हेतु प्रस्तावित किया गया है कि +2 स्तर को स्कूली शिक्षा का सभी जगह एक अंग बनाया जाए। प्रौढ़ साक्षरता कार्यक्रम में अब तक मिली सफलताओं के आलोक में उसके क्रियान्वयन में परिवर्तन¸ संस्कृत एवं अन्य प्राचीन भाषाओं के लिए एक स्वायत्तशासी आयोग की स्थापना आदि भी इन संशोधनों में प्रस्तावित किए गए हैं।

1986 में निर्मित राष्ट्रीय शिक्षा नीति 1990 तक प्राइमरी शिक्षा (कक्षा 5 तक) एवं 1995 तक एलीमेंट्री शिक्षा (कक्षा आठ तक) सार्वभौम बनाना प्रस्तावित किया था¸ इन लक्ष्यों की प्राप्ति नहीं हो सकी। इसके कारण सरकार को लक्ष्यों में संशोधन करने की आवश्यकता अनुभव हुई और यह लक्ष्य रखा गया कि 14 वर्ष तक की आयु के सभी बच्चों को संतोषजनक प्रकार की निशुल्क और अनिवार्य शिक्षा उपलब्ध कराई जाए। इस उद्देश्य की प्राप्ति हेतु एक राष्ट्रीय मिशन का प्रारंभ किया जाए।

स्कूली शिक्षा के व्यवसायीकरण के संबंध में भी लक्ष्यों में संशोधन किए गए हैं। अब यह प्रस्तावित किया गया है कि व्यावसायिक पाठ्यक्रमों से उच्चतर माध्यमिक स्तर के 10% विद्यार्थी 1995 तक आच्छादित हो जाए तथा 20202 ईस्वी तक 80%।

जहां तक परीक्षा पद्धति का प्रश्न है दस्तावेज वर्तमान पद्धति की खामियों से परिचित है इसलिए इसके द्वारा राष्ट्रीय परीक्षा सुधार ढांचे की स्थापना का प्रस्ताव किया गया है जो की विभिन्न परीक्षा संस्थाओं के लिए दिशा निर्देश प्रदान करेगा और जिनको वे विशिष्ट परिस्थितियों के संदर्भ में लागू करेंगी। संस्थागत स्तर पर मूल्यांकन को अधिक सक्षम बनाया जाएगा और बाह्य परीक्षा की प्रधानता को कम किया जाएगा। शिकायतों को शीघ्र निपटाने हेतु शिक्षा अधिकरण की स्थापना का प्रस्ताव किया गया है जो राष्ट्रीय और राज्य दोनों स्तरों पर होगा। इन्हीं कारणों का गठन प्रशासनिक अधिकरणों के अनुरूप होगा।

संशोधित नीति दस्तावेज में माध्यमिक शिक्षा पर बहुत कुछ कहा गया है। शिक्षा की गुणवत्ता में सुधार लाने हेतु जहां माध्यमिक शिक्षा परिषद का पुनर्गठन किया जाएगा और उसको अधिक स्वायत्तता प्रदान की जाएगी वहीं यह भी प्रयास किया जाएगा कि माध्यमिक शिक्षा अधिक से अधिक बच्चों को उपलब्ध हो सके। इस संबंध में अनुसूचित जाति एवं अनुसूचित जनजाति एवं लड़कियों के प्रवेश पर विशेष ध्यान दिया जाएगा विशेषकर विज्ञान¸ वाणिज्य और व्यावसायिक पाठ्यक्रमों में।


‘ऑपरेशन ब्लैक बोर्ड’ के क्षेत्र को और अधिक व्यापक बनाया जाएगा जिससे कि और अधिक संख्या में प्राइमरी स्कूलों में इन सुविधाओं को उपलब्ध कराया जा सके। दो क्लास रूम एवं दो अध्यापकों की सीमा से इसका विस्तार 3  क्लास रूम और तीन अध्यापक तक किया जाएगा।

समीक्षा- नई शिक्षा नीति के प्रारंभ हुए अभी पर्याप्त समय बीता है। फिर भी इस थोड़े से समय में ही इस नीति के कुछ प्रावधानों के क्रियान्वयन के लिए ठोस कदम उठाए गए हैं। सारे देश में सैकड़ों नवोदय विद्यालयों की स्थापना की गई है और बहुत से नवोदय विद्यालयों की स्थापना की जा रही है। ऑपरेशन ब्लैक बोर्ड प्रारंभ किया गया है और इसके लिए काफी मात्रा में धन का प्रावधान किया गया है जिससे की प्राइमरी स्कूलों की दशा सुधारी जा सके और उन कठिनाइयों को दूर किया जा सके जिनका की प्रारंभिक शिक्षा सामना करती रही है। प्रारंभिक शिक्षा को अनिवार्य बनाने हेतु प्रयास किए जा रहे हैं। राष्ट्रीय साक्षरता मिशन प्राधिकरण की स्थापना करके प्रौढ़ शिक्षा कार्यक्रम में जान डालने का प्रयत्न किया गया है। देश के सभी जनपदों में जिला शिक्षा एवं प्रशिक्षण संस्थानों की स्थापना की जा चुकी है। प्राइमरी स्तर पर ड्राप आउट्स को रोकने के लिए अध्यापन कार्य को और अधिक रुचि पूर्ण बनाने के प्रयास किए जा रहे हैं। जिला शिक्षा एवं प्रशिक्षण संस्थानों को अध्यापन से अधिक रुचि पूर्ण बनाने के उपाय तलाशने और अध्यापकों को उसका प्रशिक्षण देने का कार्य सौंपा गया है। बहुत से स्कूलों और कॉलेजों में कंप्यूटर शिक्षा प्रारंभ कर दी गई है। माध्यमिक स्तर पर व्यावसायिक शिक्षा की ओर भी ध्यान दिया जा रहा है। डिग्री कॉलेज अध्यापकों के लिए अकादमिक स्टाफ कॉलेज रिओरिएंटेशन कोर्सों को आयोजित कर के उच्च शिक्षा को सार्थक बनाने के लिए और उसको प्रतिष्ठा प्रदान करने हेतु कदम उठाए गए हैं। खुली विश्वविद्यालय प्रणाली को भी प्रारंभ किया गया है जिससे कि रोजगार में कार्यरत लोगों को भी अपनी योग्यता सुधारने का अवसर मिल सके। नीति की कई आधारों पर आलोचना भी की गई है। नवोदय विद्यालय की अवधारणा की आलोचना की गई है। इनको उच्च वर्ग वादी कहा गया है। ऐसी चीज जो कि लोकतांत्रिक व्यवस्था से मेल नहीं खाती। प्राइमरी शिक्षा का सर्वत्रीकरण अभी दूर का सपना ही बना हुआ है। शिक्षा के स्तरों में बराबर गिरावट हो रही है। कुछ राज्यों में उनकी सरकारों ने लोक संतुष्टकारी उपायों के बाद धन की कमी के मद्देनजर संपूर्ण यंत्र पक्षाघात की स्थिति तक पहुंच चुका है। उदाहरण के लिए एक समय उत्तर प्रदेश सरकार को संस्थाओं की वार्षिक मरम्मत हेतु भी पैसा आवंटित नहीं कर पा रही थी¸ अध्यापन में सुधार लाने हेतु उपाय करने की बात तो बहुत दूर है। यह स्थिति इसलिए उत्पन्न हुई थी कि शिक्षा शुल्क को समाप्त कर दिया गया है। हमारे शासक अपने नियोजन में शिक्षा को गौण स्थान प्रदान करतेहैं। शैक्षिक संस्थानों में अनुशासन की स्थिति बहुत ही भयावह हो गई है। ना तो अध्यापक पढ़ाते ही है और ना छात्र पढ़ते ही हैं। संस्थाएं निरंतर बढ़ती दर से राजनीति का गर्म विश्राम स्थल बन गई है। स्थिति को सुधारने के लिए आवंटित धन का एक बड़ा भाग लोग हड़प कर जाते हैं। यह अत्यंत दुख का विषय है कि लोग शिक्षा के लिए उदासीन दृष्टिकोण अपनाए हुए है। प्रत्येक व्यक्ति समझता है कि यह किसी अन्य व्यक्ति का उत्तरदायित्व है। ऐसा प्रतीत होता है कि देखने में लोग संतुष्टकारी उपाय जनता को बेवकूफ बनाने के लिए शिक्षा नीति ही का प्रतिपादन किया गया है। संपूर्ण स्थिति गड़बड़ की स्थिति में है। नई शिक्षा नीति में प्रतिपादित बहुत सी बातों को अभी तक प्रारंभ ही नहीं किया गया है। अखिल भारतीय शिक्षा सेवा की स्थापना अभी दूर का स्वप्न है। अनौपचारिक शिक्षा तो आंख में धूल झोंकने वाली बात है। स्कूलों में स्टाफ और बुनियादी सामान सुविधाओं की कमी है। शारीरिक दंड पर प्रतिबंध लगाने की दिशा में कुछ भी नहीं किया गया है। मूल्यांकन और परीक्षा सुधार का कार्य की पूर्णता में अभी भी प्रारंभ नहीं हुआ है। शिक्षा पर प्रस्तावित बजट का 6% बजट आवंटन करने की दिशा में कुछ भी नहीं हुआ। शिक्षा को क्रांति की आवश्यकता है और शैक्षिक क्रांति द्वारा ही हम अपने समक्ष रखे हुए उद्देश्यों को प्राप्त कर सकते हैं। कहना ना होगा की शिक्षा के लिए सरकार और नियोजकों से अधिक प्रतिबद्धता अपेक्षित है।


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