Monday, 19 March 2018

Bureaucracy Essay in Hindi - नौकरशाही पर निबंध

Bureaucracy Essay in Hindi - नौकरशाही पर निबंध 

Bureaucracy Essay in Hindi
राजनीतिक व्यवस्था का स्वरूप चाहे लोकतंत्रात्मक हो अथवा तानाशाही¸ पूंजीवादी हो अथवा समाजवादी अथवा मिश्रित अर्थव्यवस्था वाला¸ सरकार की नीतियों को कार्य रूप देने का कार्य नौकरशाही द्वारा ही किया जाता है। नौकरशाही व्यक्तियों (सरकारी कर्मचारियों) का ऐसा व्यवस्थित संगठन है जिसके द्वारा संप्रभु के आदेशों और इच्छाओं को क्रियांवित किया जाता है। लोकतंत्रात्मक शासन प्रणाली के अंतर्गत विधायिका द्वारा बनाए गए कानूनों और व्यवस्थाओं के संदर्भ में कार्यपालिका द्वारा लिए गए निर्णय एवं नीतियों का कार्यान्वयन विधि द्वारा गठित नागरिक सेवाओं के सदस्यों¸ जिन्हें नौकरशाह कहते हैं द्वारा किया जाता है। राजनीतिक नेतृत्व में आए दिन बदलाव कल्याणकारी राज्य की स्थापना की दिशा में किए जा रहे प्रयत्न आदि के परिणामस्वरुप सरकार के कार्यों में अप्रत्याशित रूप से बहुत अधिक वृद्धि हो गई है। भारत जैसे विकासशील तथा पिछड़े देशों जहां की लगभग आधी जनसंख्या लिखना पढ़ना भी नहीं जानती¸ में राजनीतिक नेतृत्व एवं विधायिका का स्वरूप प्रशासन की बारीकियों एवं जटिलताओं से अनभिज्ञ रहता है। इन समस्त कारणों से विश्व के सभी देशों में नौकरशाही सरकार का सर्वाधिक शक्तिशाली अंग बन गई है।

स्वतंत्रता प्राप्ति के बाद भारत में ब्रिटिश शासन की जिन अनेक व्यवस्थाओं और संस्थाओं को ज्यों का त्यों अंगीकार कर लिया था उनमें से कदाचित नौकरशाही ही सर्वाधिक महत्वपूर्ण एवं जीवन्त अंग थी। भारत में नौकरशाही की प्रकृति और कार्य पद्धति में कोई विशेष परिवर्तन नहीं किया गया। परिणामस्वरुप ब्रिटिशकालीन नौकरशाह का विकृत व विस्तृत स्वरूप ही हमें देखने को मिला है। भारत में नौकरशाही की आलोचना प्रायः इस आधार पर की जाती है कि इसमें लोकतंत्र और लोककल्याणकारी राज्य के प्रति कोई सकारात्मक दृष्टिकोण नहीं है। उनमें उन सिद्धांतों के प्रति ना तो आस्था है¸ ना विश्वास है और ना कार्य करने की इच्छा है। विधायिका और राजनीतिक कार्यपालिका व्यवहारिक रूप से नौकरशाही के चंगुल में फंस कर रह गई है। समाजवादी समाज की स्थापना के उद्देश्य को लेकर स्थापित किए गए सार्वजनिक उपक्रमों के प्रबंध-तंत्र पर काबिज होकर भारत के नौकरशाहों राजनीतिक और आर्थिक दोनों ही प्रकार की आर्थिक शक्तियों का केंद्र बिंदु बन गए हैं।

भारतीय लोकतांत्रिक व्यवस्था में नौकरशाही नीतियों के निर्धारण एवं क्रियान्वयन में महत्वपूर्ण भूमिका निभाती है। विगत 50 वर्षों में भारत में लोकतंत्र का जो स्वरूप विकसित हुआ है उसमें बहुमत के आधार पर कोई भी व्यक्ति विधायकों की सदस्यता पा जाता है और यदि उसे जोड़ तोड़ की राजनीति आती है तो वह मँत्रीपद भी प्राप्त कर लेता है। ऐसे लोगों से यह अपेक्षा करना रेगिस्तान में पानी ढूंढना होगा कि वे लोकवित्त¸ मौद्रिकनीति¸ विदेश व्यापार¸ बैंकिंग¸ पूंजी बाजार¸ औद्योगिक नीति और सामान्य प्रशासन¸ विधि व्यवस्था¸ बजट निर्माण और विधायिका में उसका प्रस्तुतीकरण जैसे अत्याधिक तकनीकी और विशिष्ट विषयों के जानकार होंगे। ऐसी स्थिति में उनके पास नौकरशाहों पर निर्भर रहने के अलावा अन्य कोई चारा नहीं रहता।

प्रायः यह कहा जाता है कि भारतीय नेतृत्व में ना तो योग्यता है और ना राष्ट्र के प्रति समर्पण का भाव। सत्ता की प्राप्ति और स्वहित के लिए उसका प्रयोग ही इस नेतृत्व की विशेषता बन गई है। लोकतंत्र में जनप्रतिनिधि जनहित के रक्षक समझे जाते हैं। परंतु जब इन्हीं जनप्रतिनिधियों ने अपने तथा अपने समर्थकों के निहित स्वार्थों की पूर्ति हेतु नौकरशाह से उचित-अनुचित कार्य करवाने का क्रम प्रारंभ कर दिया तो नौकरशाही धीरे-धीरे परोक्ष रूप से इन पर हावी तथा भ्रष्ट होती गई। आज राजनीतिज्ञों तथा नौकरशाहों को भ्रष्टाचार का केंद्र बिंदु तथा अभिन्न अंग माना जाता है। सर्वाधिक आश्चर्यजनक बात तो यह है कि भारत के राजनीतिज्ञ तथा नौकरशाह खुले तौर पर भ्रष्टाचार में लिप्त पाए जाते हैं परंतु कानून की जटिलताओं और खामियों के सहारे वे साफ बच जाते हैं। भारत के महालेखा नियंत्रक तथा केंद्रीय जांच ब्यूरो प्रतिवर्ष कितने ही नौकरशाहों के विरुद्ध पद एवं सार्वजनिक धन के दुरुपयोग के मामले प्रकाश में लाते हैं परंतु उनमें से ऐसे मामले उंगलियों पर गिनने लायक होते हैं जिसमें दोषी अधिकारी-कर्मचारियों को दंडित किया गया हो। ऐसी परिस्थितियों में स्वाभाविक रूप से यह प्रश्न उठने लगता है कि नौकरशाही के संगठन और स्वरुप में आमूलचूल परिवर्तन करके उसे भारत की राजनीतिक¸ सामाजिक और आर्थिक दशाओं के अनुरूप ढाला जाए।

नौकरशाही में सुधार के लिए कुछ प्राथमिकताएं निर्धारित की जानी चाहिए। प्रगति में बाधक पुरानी मान्यताओं और आदतों को नकार दिया जाना चाहिए। आज ऐसी नौकरशाही की आवश्यकता है जो स्वयं को जनता का सेवक समझे जो सीधे तौर पर जनता के प्रति जवाबदेह हो तथा विधायकों और मंत्रियों के प्रभाव से मुक्त होकर विधि सम्मत ढंग से कार्य करे। नौकरशाही अपेक्षा के अनुसार उद्देश्यों में सफल हो सके इसके लिए यह आवश्यक है कि वह अपनी इमानदारी और कार्यकुशलता बनाए रखें। सिविल सेवा से संबंधित कानूनों में निहित प्रावधान हो जो नौकरशाही को भ्रष्टाचार से दूर रखे सके। केवल ईमानदार जन सेवक ही विश्वास उत्पन्न करता है और उस जनता का सम्मान प्राप्त करता है जो उसका स्वामी है। अब वे दिन नहीं रहे जब बड़े अधिकारी जनता की उपेक्षा कर सकते थे। आज का जन अपने ही लोगों से उदय होता है उनका कल्याण वह आदर्श है जिनका उन्हें अनुसरण करना है। उन्हें सच्चे अर्थ का संवेदनशील प्रशासन देना है।


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