Sunday, 25 February 2018

भारत का पड़ोसी देशों से संबंध। bharat aur uske padosi desh par nibandh

भारत का पड़ोसी देशों से संबंध। bharat aur uske padosi desh par nibandh

bharat aur uske padosi desh par nibandh

विश्व मानचित्र में भारत की बहुत महत्वपूर्ण स्थिति है। भौगोलिक दृष्टिकोण से दक्षिण एशिया में भारत एक विस्तृत क्षेत्र में फैला हुआ देश है जिसके उत्तर में संसार की सबसे ऊंची हिमालय पर्वत श्रेणी है एवं दक्षिण में विशाल हिंद महासागर है। राजनीतिक क्षेत्र में भारत ने विश्व समुदाय के मध्य एक महत्वपूर्ण स्थान बना लिया है। स्वतंत्रता एवं गुटनिरपेक्षता के आदर्शों की इसके द्वारा साहसिक वकालत¸ उपनिवेशवाद और किसी भी प्रकार के साम्राज्यवाद एवं रंगभेद नीति को खत्म करने की इस की हिमायत तथा न्यायमुक्त सामाजिक व्यवस्था की स्थापना की वकालत के कारण विश्व के लोग यह अनुभव करने लगे हैं कि भारत एक ध्यान देने योग्य शक्ती है और विश्व के देशों के प्रति इसकी नीतियों और व्यवहार से समस्त मानव जाति का भाग्य प्रभावित हो सकता है। इसी संदर्भ में इसके चारों ओर स्थित देश अर्थात् इसके पड़ोसियों की भारत के रूख एवं व्यवहार से अत्यधिक प्रभावित होने की संभावना है। भारत और ये देश कुल मिलाकर विश्व की समस्त जनता का लगभग पाँचवाँ हिस्सा रखते हैं इसलिए अंतर्राष्ट्रीय क्षेत्र में भूमंडल के इस भाग का अध्ययन बहुत ही रुचिकर है।

भारत के पड़ोसी हैं- श्रीलंका¸ पाकिस्तान¸ नेपाल¸ भूटान¸ म्यांमार एवं बांग्लादेश। स्वतंत्रता प्राप्ति के पश्चात से ही भारत ने अपने सभी पड़ोसी देशों से निकटतम संबंध बनाए रखने का निरंतर प्रयास किया है। अपने प्रारंभ से ही इसने शांतिमय  सह-अस्तित्व की नीति और पड़ोसियों सहित प्रत्येक स्थान पर स्वतंत्रता के प्रति प्रतिबद्धता की घोषणा की है किंतु दुर्भाग्य से पड़ोसी देशों के साथ संबंध तनाव के रास्ते से गुजरे हैं। पाकिस्तान के साथ निरंतर तनाव बना रहा है और स्वतंत्रता के पश्चात ही कश्मीर को लेकर दोनों देशों के बीच कई युद्ध हुए। तब से दोनों के बीच लगभग 3  बार बड़े पैमाने पर संघर्ष हो चुका है जिसके कारण आपस में वैमनस्यता बढ़ी है। पिछले कुछ वर्षों में तो यह वैमनस्यता बिल्कुल ही उजागर हुई है। समझा जाता है कि पंजाब और जम्मू कश्मीर में आतंकवाद का संबंध पाकिस्तान से है। भारत के इन दोनों सीमावर्ती राज्यों में आतंकवादियों को सहायता देने एवं उन्हें भड़काने में पाकिस्तान के हाथ होने के प्रमाण बिना किसी संदेह स्थापित हो चुके हैं।

भारत की वर्तमान सरकार ने पड़ोसियों के साथ अपने संबंधों को नए पहलुओं से देखने का कार्य अपने हाथ में लिया है। पाकिस्तान के साथ कोई कड़ा संघर्ष टालने के लिए भारत अधिकतम संयम का परिचय दिया है। इसमें सभी माध्यमों का जिसमें कूटनीतिज्ञ माध्यम भी सम्मिलित है इस दृष्टि से प्रयोग किया है कि उस देश के साथ संबंध सुधर सकें। उसने पाकिस्तान को उसके साथ किसी भी दुस्साहस की क्रिया के प्रति सचेत किया है। भारत के कई गतिशील विदेश मंत्री तथा प्रधानमंत्रियों ने पाकिस्तान के साथ परिचर्चा और बातचीत के जरिए समस्याओं के समाधान हेतु कई प्रकार की राजनीतिक पहल की। हमने पाकिस्तान को उसके साथ व्यापार¸ वाणिज्य और संस्कृति सहित अनेक क्षेत्रों में सहयोग करने के लिए पेशकश की है। कई बार भारत के द्वारा युद्ध विसर्जन संधि की पाकिस्तान के साथ पेशकश भारत की नीति का महत्वपूर्ण अंग रही है। दूसरी ओर से प्रतिक्रिया कभी भी निष्ठापूर्ण नहीं रही और इसलिए इससे भविष्य की कोई आशा नहीं बंधती। पाकिस्तान के द्वारा कश्मीर के विय पर बार-बार चिल्लाते रहना इसके बावजूद कि कश्मीर का भारत के साथ विलय सम्पूर्ण रूप से अस्त्रीकरण की इसकी नीति ने भारतीय उपमहाद्वीप में शस्त्रों की होड़ को जन्म दिया है। जिससे इस क्षेत्र में शांति को एक निश्चित खतरा उत्पन्न हो गया है। पाकिस्तान की भूतपूर्व प्रधानमंत्री ने स्वीकार किया कि वह पाकिस्तान पंजाब और कश्मीर के आतंकियों का समर्थन करता रहेगा। पाकिस्तान कि वर्तमान सरकार के इस दृष्टिकोण में कोई परिवर्तन नहीं आया है। अभी भी आतंकवादियों को पाकिस्तान में ना केवल प्रशिक्षण दिया जाता है अपितु शस्त्रास्त्र भी दिए जाते हैं। जब तक पाकिस्तान इस नीति में परिवर्तन नहीं करता पारस्परिक संबंध मधुर नहीं हो सकते। दोनों देशों द्वारा नाभिकीय क्षमता विकसित कर लिए जाने के परिप्रेक्ष्य में दोनों के बीच निकट भविष्य में नाभिकीय युद्ध की संभावना से इनकार नहीं किया जा सकता। इस बात की जानकारी के बावजूद कि इससे दोनों ही देश तबाह हो जाएंगे।

व्यापारिक दृष्टिकोण से श्रीलंका ब्रिटिश इंडिया का ही एक भाग था और उसने भारत द्वारा स्वतंत्रता प्राप्त प्राप्त करने के लगभग 6 माह पश्चात ही स्वतंत्रता प्राप्त की। सभ्यता और संस्कृति की दृष्टि से दोनों देशों के बीच बहुत कुछ समानता है। इसलिए उस देश के साथ भारत के अच्छे संबंधों की शुरुआत हुई।

दोनों देशों के बीच संबंध इंदिरा गांधी के शासन के उत्तरार्ध में इसलिए बिगड़ने लगे क्योंकि श्रीलंका को यह संदेह होने लगा कि श्रीलंका में जातीय हिंसा के पीछे भारत का हाथ है। स्थिति के द्वारा उत्पन्न मजबूरियों के कारण उस देश ने भारत से सहायता मांगी और इसका परिणाम था 29 जुलाई 1987 का भारत श्रीलंका समझौता जिसके तहत भारतीय शांति सेना को वहां शांति स्थापित करने हेतु भेजा गया। जैसा कि आशा की जा रही थी उसके अनुसार स्थिति नहीं बनी और तमिल उग्रवादियों के संगठन लिट्टे से भारत को उलझना पड़ गया। भारतीय सेना के श्रीलंका में आने के प्रति वहां की जनता में भारी रोष उत्पन्न हुआ और वे शांति सेना की वापसी की जोरदार मांग करने लगे। उस देश में राष्ट्रपति के चुनाव के पश्चात नए राष्ट्रपति श्री प्रेमदास ने अपने देश से भारतीय सेना की अतिशीघ्र वापसी का आग्रह किया क्योंकि उन्होंने अपने देशवासियों के साथ ही यह अनुभव किया कि उसकी धरती पर विदेशी फौजों की उपस्थिति से उसकी सार्वभौमिकता नष्ट होती है। राजीव गांधी सरकार के द्वारा सेना की वापसी के प्रश्न पर कोई ठोस कदम न उठाए जाने के कारण दोनों के बीच संबंध और कटु हो गए।

उसके पश्चात भारत की राष्ट्रीय मोर्चे की सरकार ने अपने पड़ोसियों से संबंध सुधारने के लिए तुरंत कदम उठाएं। श्रीलंका की सार्वभौमिकता के प्रति अपनी प्रतिबद्धता एवं सम्मान को दोहराया और घोषणा की कि जितना संभव हो सकेगा भारत शांति सेना को वापस बुला लेगा। अपनी घोषणा के अनुसार श्रीलंका से भारतीय शांति सेना की वापसी 24  मार्च 1990 को ही पूरी हुई। इस प्रकार दोनों देशों में संबंध सामान्य बनाने में राष्ट्रीय मोर्चे की सरकार श्रेय की अधिकारी है। पी. वी. नरसिंह राव के प्रधानमंत्रित्व में स्थिति ज्यों की त्यों बनी रही। वर्तमान में प्रधानमन्त्री मोदी की नेतृत्व वाली सरकार में भारत-श्रीलंका के द्विपक्षीय संबंधों में सुधार आया है। 

आठवें दशक के अंतिम दिनों में भारत नेपाल संबंध बहुत बिगड़ गए थे। दोनों के बीच व्यापार एवं पारगमन संधि के समाप्त होने से तो स्थिति और भी अधिक खराब हो गई। नेपाल को सामान की आपूर्ति पर अघोषित पाबंदी ने नेपाल के लोगों की परेशानी को और बढ़ाया जिसके फलस्वरुप दोनों देशों के बीच संबंध और अधिक कटु हो गए। नई सरकार की पड़ोसी देशों के प्रति मित्रतापूर्ण एवं सहयोगी संबंध बनाए रखने की घोषणा से संबंधों में गिरावट की प्रवृत्ति रूकी। राष्ट्रीय मोर्चे की सरकार के प्रयासों के फलस्वरुप भारत और नेपाल के बीच अच्छे पड़ोसियों के संबंध बनने की दिशा में एक नई आशा की किरण दिखाई दी। ट्रेण्ड एंड ट्रान्जिट ट्रीटी पुनः हुई। भारत के प्रधानमंत्री ने नेपाल की यात्रा करके संबंधों को और सूदृढ़ बनाया। नेपाल के प्रधानमंत्री की भारत यात्रा और उस समय की भारत सरकार द्वारा किया गया उनका भव्य स्वागत इस बात का प्रतीक है कि दोनों देशों के बीच संबंध महत्वपूर्ण धनात्मक चरण में पहुंचना प्रारंभ हो गए थे। वर्तमान में भारत और नेपाल अच्छे और सामान्य संबंध बनाए हुए हैं और उनका अनेक क्षेत्रों में जिनमें तकनीकी¸ आर्थिक¸ व्यापार¸ वाणिज्य और सांस्कृतिक सम्मिलित हैं आपसी सहयोग बढ़ रहा है।

भारत और भूटान के बीच पारंपरिक मित्रता है। भारत में भूटान के विकास में निरंतर दिलचस्पी ली है। दोनों देशों के बीच व्यापार और वाणिज्य बिना किसी प्रतिबंध के होता रहा है। इंदिरा गांधी और राजीव गांधी के ही शासन काल में दोनों देशों के बीच मित्रता बढ़ी। तब से बाद में आने वाली सरकारें भूटान के साथ अपने संबंधों को बनाए रखने में ही सफल नहीं रही बल्कि उन्हें अधिक विस्तृत और गहरा किया गया है। भूटान के नरेश का भारत आगमन और भारत के द्वारा उन्हें अत्यंत प्रेमपूर्ण स्वागत किया जाना इस बात का द्योतक है की नई सरकार पारंपरिक विश्वास¸ समझ और मित्रता की मिसाल को बराबर जलाते रहने हेतु पहल करना चाहती है। म्यांमार के साथ तो भारत की मुश्किल से ही कोई समस्या होगी।

म्यांमार में जो लोकतांत्रिक उथल-पुथल कुछ समय पूर्व हुई थी उस को भारत ने नैतिक समर्थन प्रदान किया था किंतु भारत का उसके आंतरिक मामलों में हस्तक्षेप करने का कोई इरादा नहीं था। अधिनायकवाद एवं किसी भी प्रकार के अन्याय के विरुद्ध संघर्ष को समर्थन प्रदान करना भारत की विदेश नीति का अंग रहा है। म्यांमार के साथ संबंधों में भारत प्रत्यक्ष रुप से फँसना नहीं चाहता यद्यपि वह यह अवश्य चाहता है कि उस देश में सैनिक तानाशाही का अंत हो और लोकतांत्रिक सरकार बहाल हो।

बांग्लादेश तो अपने अस्तित्व के लिए ही भारत का ऋणी है। इसलिए इसके कुछ राजनीतिक नेताओं द्वारा कभी-कभी भारत के विरूद्ध रूख अपनाए जाने के बावजूद इन दोनों देशों के बीच समबन्ध कुल मिलाकर ठीक ही रहे हैं। पहले से चले आ रहे विवाद जैसे फरक्का बैराज मामला¸ नदी के जल से संबंधित विवाद तथा बांग्लादेश से भारत में शरण लेने वाले चकमा शरणार्थियों से उत्पन्न समस्याओं के कारण दोनों देशों के बीच संबंध कटु हो जाने की काफी संभावना थी किन्तु अच्छी समझ पर आधारित कूटनीति ने संकट को टाल दिया। नई सरकार उस देश से अपने संबंध मजबूत करने हेतु परिचर्चा और बातचीत के जरिए किसी भी समस्या को हल करने के लिए उत्सुक है। 
चीन के द्वारा भारत की उत्तरी सीमा पर भारतीय प्रदेश पर बराबर चल रहे कब्जे के कारण भारत और चीन के बीच संबंध सामान्य होने में बाधा उपस्थित हुई है, डोकलाम विवाद इसका प्रत्यक्ष उदाहरण है। चीन के प्रधानमंत्री की भारत की हाल ही की यात्रा ने दोनों देशों के बीच संदेह और अविश्वास को कम करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। भारत ने तिब्बत के विषय में अपना दृष्टिकोण पुनः स्पष्ट किया है जिसको चीन के द्वारा सराहा गया। दोनों देश विभिन्न क्षेत्रों में सहयोग बढ़ाने और पारंपरिक लाभ हेतु भ्रातृत्व की पुरानी भावना को पुनर्जीवित करने हेतु सहमत हुए। दोनों देश इस तथ्य को अनुभव करने लगे थे कि उनके संबंध केवल उन्हीं के लिए कल्याणकारी नहीं होंगे अपितु दक्षिण एशिया में जिसको भविष्य में  उससे भी अधिक महत्वपूर्ण भूमिका अंतरराष्ट्रीय राजनीति में निभानी है जितनी कि भूतकाल में कभी भी यूरोप ने निभाई थी शांति और विकास का मार्ग प्रशस्त करेगी। यथासंभव इसी तथ्य के कारण पुराने कटु अनुभवों के बावजूद अब दोनों देशों के बीच संबंध उत्तरोत्तर मजबूत होते जा रहे हैं।

आज के विश्व परिदृश्य के बदलते संदर्भ में भारत को अत्यंत महत्वपूर्ण भूमिका का निर्वाह करना है। सोवियत यूनियन के युद्ध की समाप्ति के पश्चात की एकध्रुवीय हो जाने की वास्तविकता तृतीय विश्वयुद्ध के सामने उपस्थित है। भारतीय उपमहाद्वीप की भौगोलिक राजनीतिक महत्ता बढ़ गई है। यही कारण है कि भारत के अपने पड़ोसियों के साथ संबंध विभिन्न शक्तियों के कूटनीतिक दृष्टिकोणों को प्रभावित करेंगे।

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