Tuesday, 7 November 2017

बाल कहानी साहस का प्रतिफल।

बाल कहानी साहस का प्रतिफल। 

बाल कहानी साहस का प्रतिफल।

बहुत समय पहले की बात है। धरती पर दो सालों तक बिलकुल वर्षा नहीं हुई। चारों ओर सूखा अकाल पड़ गया। अपने तालाब को सूखता देख कर मेढ़क को चिंता हुई। उसने सोचाअगर ऐसे ही रहा तो वह भूखा मर जाएगा। उसने सोचा कि इस अकाल के बारे स्वर्ग में जाकर वहां के राजा से बात करनी चाहिए।

बड़ी हिम्मत कर मेंढक अकेला ही स्वर्ग की ओर चल पड़ा। रास्ते में उसे मधुमक्खियों का एक झुंड मिला। मक्खियों के पूछने पर उसने बताया कि भूखे मरने से तो अच्छा है कि कुछ किया जाए। मक्खियों का भी सूखे से बुरा हाल था। जब फूल ही नहीं रहे तो उन्हें शहद कहां से मिलता। वे भी मेंढक के साथ चल दीं।

आगे बढ़ने पर उन्हें एक मुर्गा मिला। मुर्गा बहुत उदास था। जब फसल ही नहीं हुईतो उसे दाने कहां से मिलते। अब तो हाल ये थे की उसे खाने को कीड़े भी नहीं मिल रहे थे। इसलिए मुर्गा भी उनके साथ चल दिया।

अभी वे सब थोड़ा ही आगे गए थे कि एक खूंखार शेर मिल गया। वह भी बहुत दुखी था। उसे खाने को जानवर नहीं मिल रहे थे। उनकी बातें सुन शेर भी उनके साथ हो लिया।

कई दिनों की लम्बी यात्रा के बाद वे स्वर्ग में पहुंचे। मेंढक ने अपने सभी साथियों को राजा के महल के बाहर ही रुकने को कहा। उसने कहा कि पहले वह भीतर जाकर पता तो कर आये की राजा अभी है भी की नहीं ?

मेंढक उछलता हुआ महल के भीतर चला गया। कई कमरों में से होता हुआ वह राजा के कमरे तक पहुंच गया। राजा अपने कमरे में बैठा परियों के साथ आनंद ले रहा था। मेंढक को क्रोध आ गया। उसने लम्बी छलांग लगाई और उनके बीच पहुंच गया। परियां एकदम चुप हो गईं। राजा को एक छोटे से मेंढक की करतूत देख गुस्सा आ गया।


उसने मेंढक से कहा की ‘छोटे पागल जीव! तुमने हमारे बीच आने का साहस कैसे किया ?’  परंतु मेंढक बिलकुल भी नहीं डरा। उसे तो धरती पर भी भूख से मरना था। बैसे भी जब मौत साफ दिखाई दे तो हर कोई निडर हो जाता है।


राजा ने चीखकर पहरेदारों को आवाज लगाईं की वे उस मेंढक को महल से निकालकर बाहर फेंक दें। मगर इधर-उधर उछलता मेंढक उनकी पकड़ में नहीं आ रहा था। मेंढक ने मधुमक्खियों को आवाज दी। वे सब भी अंदर आ गईं और पहरेदारों के चेहरों पर डंक मारने लगीं। उनसे बचने के लिए सभी पहरेदार भाग गए।

राजा हैरान था। तब उसने तूफान के देवता को बुलाया। पर जैसे ही मुर्गे ने शोर मचाया और और गुस्से में पंख फड़फड़ाना शुरू किया, वह भी डरकर भाग गया। तब राजा ने अपने कुत्तों को बुलाया। उनके लिए भूखा खूंखार शेर पहले से ही तैयार बैठा था।

अब राजा ने डर कर मेंढक की ओर देखा। मेंढक ने कहा, ‘महाराज! हम तो आपके पास प्रार्थना करने आए थे। धरती पर अकाल पड़ा हुआ है। हमें वर्षा चाहिए।

राजा ने उससे पीछा छुड़ाने के लिए कहा, ‘अच्छा चाचा! वर्षा को भेज देता हूं।

जब मेंढक अपने साथियों के साथ धरती पर वापस आया तो वर्षा भी उनके साथ थी। इसलिए वियतनाम में मेंढक को स्वर्ग का चाचा’ कह कर पुकारा जाता है। लोगों को जब मेंढक की आवाज़ सुनाई देती है वे कहते हैं, ‘चाचा आ गया तो वर्षा भी आती ही होगी।

दोस्तों यह कहानी वियतनाम की लोककथा है जिसे आज भी लोग एक-दूसरे को सुनाते हैं। आपको यह कहानी कैसी लगी हमें बताएं। 

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