Wednesday, 23 August 2017

गुरु नानक देव जी की जीवनी

गुरु नानक देव जी की जीवनी 

guru nanak jeevni
सिख धर्म के प्रथम गुरु नानक देव का जन्म कार्तिक पूर्णिमा सम्वत 1526 (15अप्रैल,1469) को लाहौर जिले के तलवंडी ग्राम में हुआ था। जो आजकल ननकाना साहिब के नाम से जाना जाता है। यह स्थान अब पश्चिमी पंजाब ( पाकिस्तान ) में है। इनके पिता का नाम कालूचाँद बेदी था जो तलवंडी के पटवारी थे। इनकी माता का नाम तृप्त देवी था जो एक शांत स्वभाव की धर्म परायण महिला थी। 


नानक से गुरु नानक बनने का सफर

guru nanak jeevni
 गुरु नानक बाल्यकाल से ही एकांत प्रेमी और चिंतनशील स्वभाव के बालक थे। अतएव किसी भी विषय को शीघ्र ही समझ लेते थे। परन्तु इनका मन खेल-कूद और विद्याध्ययन में बिलकुल न लगकर साधू-संतों की संगति में लगता था। ऐसी प्रकृति को देखते हुए आपके पिताजी ने इनको पशु चराने का काम दिया हुआ था जो इनके लिए बहुत ही सुगम था। ये पशुओं की चिंता छोड़ ईश्वर भजन में ही समय व्यतीत किया करते थे। कालान्तर में इनके पिताजी ने इनको पुनः सांसारिक कार्यों में लगाने के लिए नानक जी को बीस रूपए दिए और कहा -" बेटा यह ले लो और इनसे कुछ कार्य कर लो, जिससे कुछ आमदनी भी होगी और मेरा सहारा नहीं बनेगा " नानक जी ने पैसे ले लिए और लाहौर की ओर चल दिए। पिता जी ने दो विश्वस्त नौकर साथ भेजे और कहा -"बेटा  सोच समझकर खरा सौदा करना। " मार्ग में कुछ साधू-संत तपस्या में लीन मिले ,नानक जी कुछ समय उनके पास ही ठहर गए। नानक के मन में आया की इन साधू-संतो के जलपान की व्यवस्था करनी चाहिए ,इससे इन बीस रुपयों का सदुपयोग होगा। इन्होने बीस रूपए जलपान में लगा दिए और वापस घर आ गए। इनके पिताजी इनके इस आचरण से प्रभावित हुए और इन्हे पुनः पशु चराने में लगा दिया। कुछ समय बाद एक और असाधारण घटना घटित हुई। ग्रीष्म ऋतू का काल था, दोपहर में लू चल रही थी। पशु चराते-चराते नानक जी थककर पेड़ की छाया में सो गए। नानक जी बेसुध सो रहे थे और इनके मुख पर तेज धूप पड़ रही थी। तभी वहां एक नाग आया और उसने अपने फन से इनके मुख पर छाया कर दी। यह दृश्य गाँव के मुखिया ने देखा और विस्मित रह गए। उन्होंने नानक देव को गले लगा लिया। तभी से सबने यह मान लिया की नानक देव एक साधारण मनुष्य नहीं है अपितु कोई देव स्वरुप हैं। उसी समय से गुरु नानक के नाम के आगे देव शब्द लग गया और नानक, नानक देव बन गया।

गुरु नानक जी का सांसारिक जीवन के किस्से 

एक बार की बात है की गुरु नानक जी के पिता ने इनको नवाब लोदी खां के यहाँ नौकरी दिलवा दी। नानक देव जी को मोदीखाने में स्थान दिया गया। वहां भी  साधू-संतों की संगति में लगे रहे और उनकी सेवा सत्कार में खूब खर्च करते रहे। जब नवाब के पास शिकायत पहुंची तो मोदीखाने की जांच-पड़ताल के आदेश दे दिए गए। जांच के दौरान कुछ भी गलत नहीं पाया गया अपितु नानक जी के ही तीन सौ रूपए निकले। 
नानक जी का विवाह लगभग उन्नीस वर्ष की आयु में भोलाराम पटवारी की कन्या से करवा दिया गया। इससे नानक जी के दो पुत्र श्रीचंद और लक्ष्मी दास उत्पन्न हुए। संवत 1596 ( सन 1539 ) में शीर्ष मास की दशमी को सत्तर वर्ष की अवस्था में गुरु जी की मृत्यु हो गयी।  इन दोनों ने नानक जी की मृत्यु के पश्चात् उदासी मत को चलाया। नानक जी ने ईश्वर को सर्वव्यापी मानने पर बल दिया। जात-पात और मूर्तिपूजा का विरोध करते हुए एक ओंकार और सद्गुरु के जप को स्वीकार किया। इनके द्वारा रचित " गुरु ग्रन्थ साहिब " पंजाबी भाषा में है। जो अमृतसर के स्वर्णमंदिर में आज भी रखा हुआ है। 

गुरु नानक की मक्का मदीना यात्रा 
गुरु नानक देव ने दूर-दूर तक यात्राएं की और सत्य धर्म की अलख जगाते रहे। वे मक्का मदीना के इस्लामी तीर्थों की यात्रा पर भी गए थे। जब वे मक्का पहुंचे तो सूर्यास्त का समय था थके होने के कारण वे मक्का की ओर पाँव करके सोये थे तो एक मुसलमान बड़ा नाराज हुआ और गुरु जी से कहा तू कौन है काफिर जो पवित्र काबा की ओर पैर करके सो रहा है ? इस पर नानक जी ने बड़ी विनम्रता से कहा की मुझे नहीं मालूम की काबा ( खुदा का घर ) कहाँ है। तू हमारे पैर पकड़कर उस दिशा में कर दे जिस दिशा में खुदा का घर न हो। उसने गुस्से में नानक जी के पाँव पकड़कर दूसरी दिशा में कर दिए। तभी एक चमत्कार हुआ और काबा ने  दिशा बदल ली। वह मुसलमान जिस दिशा में नानक जी के पाँव घुमाता, काबा भी उसी दिशा में घूम जाता। अंततः उसने घबराकर नानक जी के पैर छोड़ दिए और यह बात अन्य मुसलामानों को बताई। देखते ही देखते वहां भीड़ इकट्ठी हो गयी।  गुरु नानक जी के चरणों में गिर पड़े और उनके शिष्य हो गए।  जब नानक जी वहां से चलने की तैयारी करने लगे तो काबा के पीरों ने गुरु नानक देव जी से विनती करके उनकी एक खड़ाव निशानी के रूप में अपने पास रख ली। गुरु जी जहां भी जाते उनके संग-संग इसी तरह के चमत्कार भी होते रहते थे। 

अंधविश्वास के विरोधी 
गुरु जी अंधविश्वास के खिलाफ थे एक बार हरिद्वार में सब हिन्दुओं को सूर्य की ओर मुख करके पितरों को जल चढ़ाते देखकर नानक जी को कौतुक सूझा। वे उलटी तरफ स्थित अपने गाँव की ओर मुख करके जल चढाने लगे। इस क्रिया से विस्मित दर्शकों में से एक ने पुछा की वह क्या कर रहे हैं तो गुरु जी ने उत्तर दिया की मै अपने गाँव के खेतों में पानी डालकर सिंचाई कर रहा हूँ। इस पर लोगों ने कहा की ऐसा कैसे संभव है ? आपका गाँव तो यहां से बहुत दूर है। इस पर वे बोले की  जब दूसरे लोक जा चुके तुम्हारे पितरों तक तुम्हारा जल पहुँच सकता है  तो फिर मेरे गाँव तक करों नहीं ?


SHARE THIS

Author:

Etiam at libero iaculis, mollis justo non, blandit augue. Vestibulum sit amet sodales est, a lacinia ex. Suspendisse vel enim sagittis, volutpat sem eget, condimentum sem.

0 comments: